1. अधिगम: अर्थ और अवधारणा
अधिगम एक मानसिक प्रक्रिया है जो जीवन भर चलती रहती है। सामान्य भाषा में इसे 'सीखना' कहा जाता है।
परिभाषा: अभ्यास, अनुभव और प्रशिक्षण के कारण व्यवहार में होने वाला स्थायी परिवर्तन अधिगम कहलाता है।
नोट: बीमारी, थकान या नशीली दवाओं के कारण व्यवहार में आया परिवर्तन अधिगम नहीं माना जाता क्योंकि वह अस्थायी होता है।
प्रमुख मनोवैज्ञानिकों की परिभाषाएँ
जे.पी. गिलफोर्ड: "व्यवहार के कारण व्यवहार में आया कोई भी परिवर्तन अधिगम है।"
बी.एफ. स्किनर: "अधिगम व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।"
वुडवर्थ: "नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही अधिगम है।"
क्रो एंड क्रो: "आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन ही अधिगम है।"
2. अधिगम की प्रमुख विशेषताएँ
एक शिक्षक के रूप में आपको अधिगम की प्रकृति को समझना आवश्यक है:
निरंतर प्रक्रिया: सीखना गर्भ से लेकर कब्र तक (Womb to Tomb) चलने वाली प्रक्रिया है।
परिवर्तन: यह व्यवहार में सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रकार का परिवर्तन हो सकता है, लेकिन शिक्षा में हम सकारात्मक परिवर्तन पर ध्यान देते हैं।
सार्वभौमिकता: केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीव-जंतु सीखते हैं।
उद्देश्यपूर्ण: सीखना लक्ष्य-निर्देशित होता है। बिना उद्देश्य के अधिगम प्रभावी नहीं होता।
अनुकूलन: अधिगम व्यक्ति को नए वातावरण में समायोजित होने में मदद करता है।
सक्रियता: अधिगम के लिए शिक्षार्थी का सक्रिय होना अनिवार्य है।
स्थानांतरण: एक स्थिति में सीखा गया ज्ञान दूसरी स्थिति में प्रयोग किया जा सकता है।
3. अधिगम के नियम (Laws of Learning) - थार्नडाइक
अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ई.एल. थार्नडाइक ने अपनी पुस्तक 'Educational Psychology' में सीखने के नियमों का प्रतिपादन किया। इन्हें दो वर्गों में बांटा गया है:
A. मुख्य नियम (Primary Laws)
ये नियम अधिगम की आधारशिला हैं:
तत्परता का नियम (Law of Readiness):
जब कोई विद्यार्थी सीखने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होता है, तो वह जल्दी सीखता है।
यदि बच्चे को जबरदस्ती सिखाया जाए, तो वह झुंझलाहट महसूस करता है और अधिगम नहीं होता।
उदाहरण: "घोड़े को तालाब तक ले जाया जा सकता है, लेकिन उसे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।"
अभ्यास का नियम (Law of Exercise):
इसे 'उपयोग और अनुपयोग का नियम' भी कहते हैं।
जिस कार्य का अभ्यास बार-बार किया जाता है, वह पक्का हो जाता है। अभ्यास छोड़ने पर हम उसे भूलने लगते हैं।
सूत्र: करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
प्रभाव का नियम (Law of Effect):
इसे 'संतोष और असंतोष का नियम' भी कहते हैं।
यदि सीखने के बाद बालक को संतोष या पुरस्कार मिलता है, तो वह उस कार्य को दोबारा करना चाहेगा।
यदि दंड या असफलता मिलती है, तो वह उस कार्य से बचेगा।
B. गौण नियम (Secondary Laws)
बहु-अनुक्रिया का नियम: समस्या समाधान के लिए अनेक प्रयास करना।
मानसिक स्थिति का नियम: सकारात्मक दृष्टिकोण से सीखना आसान होता है।
आंशिक क्रिया का नियम: विषयवस्तु को छोटे-छोटे भागों में बांटकर सीखना।
साहचर्य परिवर्तन का नियम: एक परिस्थिति के ज्ञान को दूसरी परिस्थिति में जोड़ना।
4. अधिगम के प्रमुख सिद्धांत (Major Theories of Learning)
CTET परीक्षा में इन सिद्धांतों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। यहाँ प्रमुख सिद्धांतों का सार प्रस्तुत है:
1. प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत (Trial and Error Theory)
प्रतिपादक: ई.एल. थार्नडाइक (अमेरिका)
प्रयोग: भूखी बिल्ली पर (Puzzle Box में)।
मुख्य विचार:
सीखने के लिए एक उद्दीपक (Stimulus) की आवश्यकता होती है जो अनुक्रिया (Response) को प्रेरित करे। इसे $S-R$ Theory भी कहते हैं।
बिल्ली ने मछली (उद्दीपक) प्राप्त करने के लिए पिंजरे में कई गलत अनुक्रियाएं कीं, और अंततः सही लीवर दबाना सीख गई।
शैक्षिक महत्व:
मन्दबुद्धि बालकों के लिए उपयोगी।
गणित और विज्ञान जैसे विषयों में अभ्यास के लिए महत्वपूर्ण।
बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देता है।
2. शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत (Classical Conditioning Theory)
प्रतिपादक: इवान पावलोव (रूस) - 1904 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त।
प्रयोग: कुत्ते पर।
मुख्य विचार:
स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) के साथ अस्वाभाविक उद्दीपक (घंटी) को बार-बार प्रस्तुत करने पर, कुत्ता घंटी की आवाज पर भी वही प्रतिक्रिया (लार आना) देने लगता है।
इसे $S$ Type (Stimulus Type) थ्योरी भी कहते हैं।
शैक्षिक महत्व:
आदतों के निर्माण में सहायक (जैसे सुबह जल्दी उठना, सफाई रखना)।
डर और भय को दूर करने में उपयोगी।
सुलेख और अक्षर विन्यास सिखाने में कारगर।
3. क्रियाप्रसूत अनुबंधन सिद्धांत (Operant Conditioning Theory)
प्रतिपादक: बी.एफ. स्किनर (अमेरिका)
प्रयोग: चूहे और कबूतर पर।
मुख्य विचार:
इसमें प्राणी पहले क्रिया (Response) करता है, उसके बाद उसे परिणाम (Reinforcement) मिलता है। इसे $R-S$ Theory कहते हैं।
पुनर्बलन (Reinforcement): सकारात्मक पुनर्बलन (पुरस्कार) व्यवहार को बढ़ाता है, जबकि नकारात्मक पुनर्बलन व्यवहार को घटाता है।
शैक्षिक महत्व:
अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Learning) इसी पर आधारित है।
तत्काल प्रतिपुष्टि (Feedback) देने पर बल देता है।
जटिल कार्यों को छोटे-छोटे चरणों में सिखाया जाता है।
4. अंतर्दृष्टि या सूझ का सिद्धांत (Insight Theory/Gestalt Theory)
प्रतिपादक: कोहलर, कोफ्का और वर्दीमर (जर्मनी)।
प्रयोग: 'सुल्तान' नामक चिम्पांजी पर।
मुख्य विचार:
सीखना प्रयास और त्रुटि से नहीं, बल्कि अचानक आई 'सूझ' (Idea) से होता है।
समस्या को टुकड़ों में नहीं, बल्कि 'समग्र' (Whole) रूप में देखना चाहिए।
शैक्षिक महत्व:
समस्या समाधान विधि के लिए आधार।
रचनात्मक कार्यों और उच्च स्तरीय चिंतन के लिए उपयोगी।
"पूर्ण से अंश की ओर" शिक्षण सूत्र इसी पर आधारित है।
5. सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)
प्रतिपादक: अल्बर्ट बंडूरा।
मुख्य विचार: बच्चे दूसरों के व्यवहार का अवलोकन (Observation), अनुकरण (Imitation) और मॉडलिंग के माध्यम से सीखते हैं।
प्रयोग: बोबो डॉल (Bobo Doll) प्रयोग।
शैक्षिक महत्व: शिक्षक का व्यवहार आदर्श होना चाहिए क्योंकि छात्र उनका अनुकरण करते हैं।
6. संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Cognitive Development) - जीन प्याजे
प्याजे ने बच्चों को "नन्हे वैज्ञानिक" कहा है जो अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं। उन्होंने विकास की चार अवस्थाएं बताईं:
संवेदी-गामक अवस्था (0-2 वर्ष): इंद्रियों के माध्यम से सीखना, वस्तु स्थायित्व का गुण।
पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष): भाषा विकास, आत्मकेंद्रित सोच, जीववाद।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष): तर्क का आरंभ, वर्गीकरण, संरक्षण का ज्ञान।
अमूर्त/औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11-15 वर्ष): अमूर्त चिंतन, परिकल्पनात्मक सोच।
5. शिक्षण-अधिगम के प्रभावी सिद्धांत एवं सूत्र
एक शिक्षक को कक्षा में निम्नलिखित सामान्य सिद्धांतों का पालन करना चाहिए:
क्रियाशीलता का सिद्धांत (Principle of Activity):
इसे 'Learning by Doing' कहते हैं।
जब बच्चा स्वयं हाथ से कार्य करता है (प्रोजेक्ट, प्रयोग), तो ज्ञान स्थायी होता है।
उदाहरण: पौधों के भागों को रटाने के बजाय, बच्चे को बगीचे में ले जाकर अवलोकन कराना।
मूर्त से अमूर्त की ओर (Concrete to Abstract):
पहले ठोस वस्तुओं (मूर्त) को दिखाना, फिर विचारों (अमूर्त) की ओर ले जाना।
उदाहरण: गणित में जोड़ सिखाने के लिए पहले कंचों या तीलियों का प्रयोग करना, फिर संख्याओं का।
ज्ञात से अज्ञात की ओर (Known to Unknown):
नए ज्ञान को विद्यार्थी के पूर्व ज्ञान (Previous Knowledge) से जोड़ना।
प्रस्तावना प्रश्न इसी सिद्धांत पर आधारित होते हैं।
वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धांत (Individual Difference):
हर बच्चे की सीखने की गति और क्षमता अलग होती है।
शिक्षक को सभी के लिए एक ही विधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए, बल्कि बहु-विधि (Multi-method) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अभिप्रेरणा का सिद्धांत (Principle of Motivation):
अभिप्रेरणा (Motivation) अधिगम का 'हृदय' या 'स्वर्ण पथ' है।
आंतरिक अभिप्रेरणा (रुचि, जिज्ञासा) बाह्य अभिप्रेरणा (पुरस्कार, दंड) से बेहतर होती है।
6. NCF 2005 और पर्यावरण अध्ययन
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) अधिगम को रटंत प्रणाली से मुक्त करने और बाहरी जीवन से जोड़ने पर बल देती है।
EVS की 6 थीम्स (Themes)
NCF 2005 के अनुसार, कक्षा 3 से 5 तक पर्यावरण अध्ययन को विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में न बांटकर निम्नलिखित 6 थीम्स में एकीकृत किया गया है:
परिवार एवं मित्र (Family and Friends): इसमें रिश्ते, काम, खेल, जानवर और पौधे शामिल हैं।
भोजन (Food)
जल (Water)
आवास (Shelter)
यात्रा (Travel)
हम चीजें कैसे बनाते हैं और करते हैं (Things We Make and Do)
महत्वपूर्ण बिंदु:
कक्षा 1 और 2 में पर्यावरण अध्ययन की कोई पाठ्यपुस्तक नहीं है; इसे भाषा और गणित के माध्यम से पढ़ाया जाता है।
मूल्यांकन सतत और व्यापक (CCE) होना चाहिए।
7. बच्चों की समझ और त्रुटियाँ
त्रुटियाँ अधिगम का हिस्सा हैं: बच्चों द्वारा की गई गलतियाँ यह दर्शाती हैं कि वे कैसे सोच रहे हैं। शिक्षकों को गलतियों को नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि उन्हें "सीखने की खिड़की" समझना चाहिए।
वैकल्पिक अवधारणाएँ: बच्चे अपने अनुभव से दुनिया के बारे में कुछ धारणाएं बना लेते हैं (जैसे- "चांद हमारे साथ चलता है")। इन्हें भ्रांतियां न कहकर 'वैकल्पिक अवधारणाएं' कहना चाहिए और चर्चा द्वारा सही दिशा देनी चाहिए।
8. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और अधिगम
नई शिक्षा नीति ने अधिगम के ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन किए हैं:
शैक्षणिक ढांचा: पुराना $10+2$ समाप्त होकर अब
$$5+3+3+4$$का ढांचा लागू किया गया है।
Foundational (5 वर्ष): प्री-स्कूल + कक्षा 1-2 (खेल आधारित अधिगम)।
Preparatory (3 वर्ष): कक्षा 3-5 (खोज और गतिविधि आधारित)।
Middle (3 वर्ष): कक्षा 6-8 (विषय आधारित और कौशल विकास)।
Secondary (4 वर्ष): कक्षा 9-12 (बहु-विषयक और तार्किक चिंतन)।
अनुभवात्मक अधिगम (Experiential Learning): रटने के बजाय अनुभव और करके सीखने पर जोर।
मूल्यांकन: 360-डिग्री समग्र रिपोर्ट कार्ड, जिसमें स्व-मूल्यांकन और सहपाठी-मूल्यांकन भी शामिल हो।
9. अधिगम वक्र (Learning Curves)
अधिगम की गति हमेशा एक समान नहीं होती। इसे ग्राफ पर दर्शाने को अधिगम वक्र कहते हैं।
सरल रेखीय वक्र: सीखने की गति स्थिर रहती है (बहुत दुर्लभ)।
उन्नतोधर वक्र (Convex): शुरू में गति तेज, बाद में धीमी।
नतोदर वक्र (Concave): शुरू में धीमी, बाद में अभ्यास से तेज।
मिश्रित वक्र (S-Shaped): कभी तेज, कभी धीमी।
अधिगम पठार (Learning Plateau): जब सीखने की प्रक्रिया में प्रगति रुक जाती है (न उतार न चढ़ाव), तो उसे पठार कहते हैं। यह थकान या रुचि की कमी के कारण होता है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (One Liners)
डिस्लेक्सिया (Dyslexia): पठन संबंधी विकार।
डिस्ग्राफिया (Dysgraphia): लेखन संबंधी विकार।
डिस्कैलकुलिया (Dyscalculia): गणितीय गणना संबंधी विकार।
ज़ोन ऑफ प्रॉक्सिमल डेवलपमेंट (ZPD): वाइगोत्स्की का संप्रत्यय - बच्चा जो स्वयं कर सकता है और जो मदद से कर सकता है, उसके बीच का अंतर।
स्काफोल्डिंग (Scaffolding): सीखने के दौरान दी जाने वाली अस्थायी मदद (इशारा, संकेत)।
पर्यावरण अधिगम के सिद्धांत
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