पर्यावरणीय अध्ययन : अवधारणा, क्षेत्र और महत्त्व

Sunil Sagare
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1. पर्यावरण: अर्थ और परिभाषा

'पर्यावरण' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: परि + आवरण

  • परि: चारों ओर

  • आवरण: घेराव

अर्थात्, वह सब कुछ जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है, पर्यावरण कहलाता है। इसमें सजीव (जैविक) और निर्जीव (अजैविक) दोनों घटक शामिल होते हैं।

प्रमुख परिभाषाएँ:

  • सामान्य अर्थ: हमारे चारों ओर का वह क्षेत्र जो हमें प्रभावित करता है।

  • सी. सी. पार्क के अनुसार: "मनुष्य एक विशेष स्थान पर विशेष समय पर जिन सम्पूर्ण परिस्थितियों से घिरा होता है, उसे पर्यावरण कहा जाता है।"

  • हॉलैण्ड एवं डगलस के अनुसार: "जीव जगत के प्राणियों के विकास, परिपक्वता, प्रकृति, व्यवहार तथा जीवन शैली को प्रभावित करने वाली समस्त बाह्य शक्तियों को पर्यावरण में सम्मिलित किया जाता है।"

पर्यावरण के घटक:

  1. प्राकृतिक घटक: भूमि, जल, वायु, पेड़-पौधे और जीव-जंतु।

  2. मानव निर्मित घटक: इमारतें, पार्क, पुल, सड़क, उद्योग और स्मारक।

  3. सामाजिक-सांस्कृतिक घटक: परिवार, समुदाय, धर्म, शिक्षा और आर्थिक स्थितियाँ।


2. पर्यावरणीय अध्ययन की संकल्पना (Concept of EVS)

प्राथमिक स्तर पर हम बच्चों को 'पर्यावरण विज्ञान' नहीं पढ़ाते, बल्कि 'पर्यावरण अध्ययन' पढ़ाते हैं। इसकी संकल्पना को समझना आवश्यक है:

  • बहुआयामी प्रकृति: यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह जैविक, भौतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों का योग है।

  • जीवन से जुड़ाव: इसका उद्देश्य बच्चों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ना है।

  • बालक और पर्यावरण: बालक का जीवन, विकास और व्यवहार उसके पर्यावरण पर निर्भर करता है। इसलिए, प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों में पर्यावरण संरक्षण और समझ विकसित करना अनिवार्य है।

प्राथमिक स्तर पर EVS की आवश्यकता क्यों?

  • जागरूकता: प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के दोहन जैसी समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता जगाने के लिए।

  • आदतों का निर्माण: बचपन से ही स्वच्छता, वृक्षारोपण और जीवों के प्रति दया भाव जैसी अच्छी आदतें विकसित करने के लिए।

  • सक्रिय भागीदारी: बच्चों को केवल मूक दर्शक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदार बनाने के लिए।


3. एकीकृत पर्यावरणीय अध्ययन (Integrated EVS)

CTET परीक्षा में 'एकीकृत उपागम' (Integrated Approach) सबसे महत्त्वपूर्ण टॉपिक है।

एकीकृत उपागम का अर्थ:

बच्चे अपनी दुनिया को अलग-अलग विषयों (जैसे- भौतिकी, रसायन, इतिहास, भूगोल) में विभाजित करके नहीं देखते। वे अपने परिवेश को एक समग्र (Holistic) रूप में देखते हैं। उदाहरण के लिए, जब एक बच्चा 'भोजन' के बारे में सोचता है, तो वह उसके स्वाद, स्रोत (भूगोल), शरीर पर प्रभाव (विज्ञान) और सांस्कृतिक महत्त्व (सामाजिक विज्ञान) को एक साथ देखता है।

NCF 2005 और एकीकृत EVS:

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा $2005$ की सिफारिशों के अनुसार:

  • कक्षा 1 और 2: इस स्तर पर पर्यावरण अध्ययन की कोई अलग पाठ्यपुस्तक नहीं होती है। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को भाषा और गणित के माध्यम से पढ़ाया जाता है।

  • कक्षा 3 से 5: इस स्तर पर विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और पर्यावरण शिक्षा को एकीकृत करके 'पर्यावरण अध्ययन' (EVS) नामक एक ही विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।

एकीकृत उपागम के लाभ:

  • यह बस्ते का बोझ कम करता है (Learning without Burden)।

  • विषय-वस्तु को व्यावहारिक जीवन से जोड़ता है।

  • ज्ञान को टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक इकाई के रूप में प्रस्तुत करता है।


4. पर्यावरणीय अध्ययन का क्षेत्र (Scope of EVS)

पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसे NCF 2005 ने 6 मुख्य थीम्स (Themes) में विभाजित किया है, जो इसका वास्तविक पाठ्यक्रम है।

EVS की 6 थीम्स:

  1. परिवार और मित्र (Family and Friends): इसके अंतर्गत आपसी संबंध, काम और खेल, जानवर और पौधे आते हैं।

  2. भोजन (Food): स्वाद, पाचन, पकाना, संरक्षण और किसान।

  3. पानी (Water): उपलब्धता, स्रोत, उपयोग और जल प्रदूषण।

  4. आवास (Shelter): विभिन्न प्रकार के घर, आश्रय और भौगोलिक विविधता।

  5. यात्रा (Travel): परिवहन, स्थान, अंतरिक्ष और पेट्रोल।

  6. हम चीजें कैसे बनाते हैं और करते हैं (Things We Make and Do): सामग्री, कला, शिल्प और व्यवसाय।

अन्य विषय क्षेत्र (विस्तृत दृष्टिकोण):

इसके अलावा, EVS का दायरा निम्नलिखित क्षेत्रों तक फैला हुआ है:

  • पारिस्थितिकी (Ecology): जीव और उनके वातावरण के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन।

  • मानव स्वास्थ्य (Human Health): जल, वायु और मिट्टी के प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव।

  • वानिकी (Forestry): वनों का प्रबंधन और संरक्षण। वन हमारी सामाजिक धरोहर हैं।

  • जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology): पर्यावरण संरक्षण में तकनीकी का उपयोग।


5. भारत में पर्यावरण शिक्षा का ऐतिहासिक विकास

शिक्षण विधियों को समझने के लिए इसके इतिहास को जानना आवश्यक है:

  • कोठारी आयोग ($1964-66$): इसने सिफारिश की कि प्राथमिक स्तर पर विज्ञान पढ़ाने का उद्देश्य बच्चों को उनके भौतिक और जैविक पर्यावरण से परिचित कराना होना चाहिए।

  • ईश्वर भाई पटेल समिति ($1977$): इसने औपचारिक शिक्षा में पर्यावरण को महत्त्व दिया।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE $1986$): इसने पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने पर जोर दिया।

  • NCF $1988$: इसने निर्देश दिया कि प्राथमिक स्तर पर विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को अलग न करके एक ही विषय के रूप में पढ़ाया जाए।

  • NCF $2005$: इसने रटने की प्रवृत्ति का विरोध किया और 'करके सीखने' (Learning by Doing) पर बल दिया। इसने पाठ्यपुस्तकों को केवल एक संसाधन माना, एकमात्र आधार नहीं।


6. पर्यावरणीय अध्ययन का महत्त्व

EVS का शिक्षण प्राथमिक स्तर पर निम्नलिखित कारणों से अति महत्त्वपूर्ण है:

  • पर्यावरणीय मुद्दों की समझ: बच्चे प्रदूषण, आपदाओं और संसाधनों की कमी जैसी जटिल समस्याओं को समझने योग्य बनते हैं।

  • कौशल विकास: अवलोकन, वर्गीकरण, निष्कर्ष निकालना और मानचित्रण जैसे कौशलों का विकास होता है।

  • मूल्यों का विकास: अनुशासन, सहयोग, न्याय और समानता के प्रति सम्मान जैसे मूल्य विकसित होते हैं।

  • स्थानीय से वैश्विक: बच्चे अपनी स्थानीय समस्याओं (जैसे- पानी की बर्बादी) को समझते हुए वैश्विक समस्याओं (ग्लोबल वार्मिंग) से जुड़ना सीखते हैं।


7. शिक्षण-शास्त्र (Pedagogy) और शिक्षण विधियाँ

एक EVS शिक्षक के रूप में आपकी भूमिका 'ज्ञान देने वाले' की नहीं, बल्कि 'सुगमकर्ता' (Facilitator) की होनी चाहिए।

प्रभावी शिक्षण विधियाँ:

  • कहानियाँ और कविताएँ: इनका उद्देश्य मनोरंजन करना नहीं, बल्कि नीरस विषयवस्तु को रोचक बनाना और बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ाना है।

  • क्षेत्र भ्रमण (Field Trips): यह सबसे प्रभावी विधि है क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुभव (Real-life experience) प्रदान करती है।

  • समूह कार्य (Group Work): सहपाठी अधिगम (Peer Learning) और सामाजिक कौशल को बढ़ावा देता है।

  • सर्वेक्षण और प्रोजेक्ट: बच्चों में खोज करने और डेटा एकत्र करने की क्षमता विकसित करते हैं।

मूल्यांकन (Assessment):

  • मूल्यांकन सतत और व्यापक (CCE) होना चाहिए।

  • ग्रेडिंग और रैंकिंग के बजाय बच्चों की सीखने की प्रक्रिया (Process Skills) पर ध्यान देना चाहिए।

  • 'करके देखो' और 'हम क्या समझे' जैसे खंड पाठ्यपुस्तकों में इसीलिए जोड़े गए हैं ताकि रटने की बजाय समझ का आकलन हो सके।


8. मुख्य बिंदु: त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)

  • NCF 2005 का मूल मंत्र: "शिक्षा बिना बोझ के" (Learning without Burden)।

  • पाठ्यक्रम का आधार: बाल-केंद्रित (Child-centered)।

  • शिक्षण सूत्र: ज्ञात से अज्ञात की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर, स्थानीय से वैश्विक की ओर।

  • पाठ्यपुस्तक की भाषा: औपचारिक या तकनीकी नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों की दैनिक जीवन की भाषा होनी चाहिए।

  • विज्ञान संग्रहालय: अवलोकन और संग्रह करने की आदत विकसित करने के लिए उपयोगी हैं।


शिक्षक के लिए विशेष निर्देश (Teacher's Role)

  • बच्चों के पूर्व ज्ञान (Previous Knowledge) का सम्मान करें।

  • बच्चों को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करें।

  • लैंगिक असमानता और रूढ़िवादिता जैसे मुद्दों पर संवेदनशीलता से चर्चा करें।

  • कक्षा की दीवारों से बाहर निकलकर प्रकृति के साथ अंतर्संक्रिया करने के अवसर दें।



पर्यावरणीय अध्ययन : अवधारणा, क्षेत्र और महत्त्व

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