१८वीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

Sunil Sagare
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१. मुगल साम्राज्य का पतन और संकट

१८वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और घटनाक्रम जिम्मेदार थे।

मुख्य कारण:

  • औरंगजेब की दक्कन नीति: बादशाह औरंगजेब ने अपने शासनकाल के अंतिम २५ वर्ष दक्कन (दक्षिण भारत) में मराठों के खिलाफ युद्ध लड़ने में बिता दिए। इससे साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय संसाधन पूरी तरह समाप्त हो गए।

  • कमजोर उत्तराधिकारी: औरंगजेब की मृत्यु (१७०७) के बाद आने वाले शासक कमजोर थे। वे अपने शक्तिशाली मनसबदारों पर नियंत्रण रखने में असमर्थ रहे।

  • अभिजात वर्ग का प्रभाव: मुगल प्रशासन में अभिजात वर्ग (Nobles) बहुत शक्तिशाली हो गया था। वे मुख्य रूप से दो गुटों में बंट गए थे:

    • ईरानी गुट

    • तूरानी (तुर्क मूल के) गुट

  • कठपुतली शासक: बाद के मुगल बादशाह इन गुटों के हाथों की कठपुतली बन गए। उदाहरण के लिए, फारुखसियर और आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई, जबकि अहमद शाह और शाह आलम द्वितीय को उनके ही अभिजातों ने अंधा कर दिया था।

जागीरदारी संकट:

  • सूबेदार (गवर्नर) के रूप में नियुक्त अभिजातों ने राजस्व और सैन्य प्रशासन (दीवानी और फौजदारी) दोनों पर नियंत्रण कर लिया।

  • जैसे-जैसे केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, इन सूबेदारों ने प्रांतों से आने वाले राजस्व को दिल्ली भेजना बंद या कम कर दिया।

  • किसानों और जमींदारों के विद्रोहों ने स्थिति को और खराब कर दिया।


२. विदेशी आक्रमण: नादिरशाह और अब्दाली

मुगल सत्ता के कमजोर होते ही विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को लूटना शुरू कर दिया।

नादिरशाह का आक्रमण (१७३९):

  • ईरान के शासक नादिरशाह ने १७३९ में दिल्ली पर आक्रमण किया।

  • उसने दिल्ली शहर को बुरी तरह लूटा।

  • लूट का विवरण: वह अपने साथ लगभग ६० लाख रुपये, कई हजार सोने के सिक्के, १ करोड़ रुपये के सोने के बर्तन, ५० करोड़ रुपये के गहने, 'मयूर सिंहासन' (तख्त-ए-ताऊस) और 'कोहिनूर हीरा' ले गया।

अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण:

  • नादिरशाह के बाद, अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने आक्रमण किया।

  • उसने १७४८ से १७६१ के बीच उत्तरी भारत पर ५ बार आक्रमण किया।

  • उसने मुगलों की शक्ति को पूरी तरह क्षीण कर दिया।


३. नए राज्यों का उदय

१८वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के विखंडन से तीन प्रकार के राज्य उभर कर सामने आए:

  1. पुराने मुगल प्रांत (Successor States): ये वे राज्य थे जो मुगलों के अधीन सूबे थे, लेकिन अब स्वतंत्र हो गए थे। (उदाहरण: अवध, बंगाल, हैदराबाद)।

  2. वतन जागीर: राजपूत राजाओं के प्रदेश, जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।

  3. स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले राज्य: मराठा, सिख और जाट, जिन्होंने लंबे युद्धों के बाद स्वतंत्रता हासिल की।


४. पुराने मुगल प्रांत (Old Mughal Provinces)

ये राज्य औपचारिक रूप से मुगलों से अलग नहीं हुए थे, लेकिन व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र थे। इनके संस्थापकों ने मुगल बादशाह से उच्च मनसब प्राप्त किए थे।

(क) हैदराबाद (Hyderabad)

  • संस्थापक: निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह।

  • स्थापना: १७२४ ई.।

  • आसफ जाह मुगल दरबार के सबसे शक्तिशाली सदस्यों में से एक था। उसे पहले अवध की सूबेदारी दी गई थी, बाद में उसे दक्कन का कार्यभार सौंपा गया।

  • प्रशासनिक सुधार:

    • उसने कुशल सैनिकों और प्रशासकों को उत्तरी भारत से दक्षिण लाया।

    • उसने मनसबदार नियुक्त किए और उन्हें जागीरें दीं।

    • हालाँकि वह मुगल बादशाह का सेवक था, लेकिन वह पूरी तरह स्वतंत्र रूप से शासन करता था और दिल्ली से कोई निर्देश नहीं लेता था।

  • संघर्ष: हैदराबाद राज्य पश्चिम में मराठों और पठारी क्षेत्र के स्वतंत्र तेलुगु सेनानायकों (नायकों) के साथ निरंतर संघर्ष में रहता था।

  • कोरोमंडल तट: पूर्व दिशा में कोरोमंडल तट पर स्थित वस्त्र उत्पादक धनवान क्षेत्रों पर भी निजाम का नियंत्रण था।

(ख) अवध (Awadh)

  • संस्थापक: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान।

  • नियुक्ति: १७२२ में अवध का सूबेदार नियुक्त।

  • अवध एक समृद्ध क्षेत्र था जो गंगा नदी के उपजाऊ मैदान में फैला था और उत्तर भारत व बंगाल के बीच व्यापार का मुख्य मार्ग यहीं से गुजरता था।

  • सआदत खान के पास सूबेदारी, दीवानी और फौजदारी तीनों कार्यालयों का संयुक्त भार था।

  • मुगल प्रभाव में कमी:

    • उसने मुगल द्वारा नियुक्त जागीरदारों की संख्या में कटौती की।

    • जागीरदारों के खातों की जांच के लिए अपने अधिकारी नियुक्त किए।

    • राजपूत जमींदारों और रुहेलखंड के अफगानों की उपजाऊ भूमि को अपने राज्य में मिला लिया।

  • इजारेदारी प्रथा (Revenue Farming):

    • राज्य ने राजस्व वसूलने का अधिकार सबसे ऊंची बोली लगाने वाले ठेकेदारों (इजारेदारों) को दिया।

    • इजारेदार राज्य को एक निश्चित रकम देने का वचन देते थे।

    • बदले में उन्हें किसानों से कर वसूलने की खुली छूट मिल जाती थी।

    • इस व्यवस्था से साहूकारों और महाजनों (बैंकरों) का प्रभाव बढ़ गया।

(ग) बंगाल (Bengal)

  • संस्थापक: मुर्शिद कुली खान।

  • वह बंगाल के 'नायब' (प्रांत के सूबेदार के प्रतिनियुक्त) थे, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली।

  • राजधानी: उन्होंने अपनी राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की।

  • राजस्व सुधार:

    • बंगाल में राजस्व का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्धारण किया गया।

    • जमींदारों से बड़ी कठोरता से नकद राजस्व वसूला जाता था।

    • राजस्व न चुका पाने वाले जमींदारों को अपनी जमीनें महाजनों को बेचनी पड़ती थीं।

  • अलीवर्दी खान: इनके शासनकाल (१७४०-१७५६) में बंगाल में बैंकिंग घराने, विशेषकर जगत सेठ का घराना बहुत समृद्ध और शक्तिशाली हो गया।


५. राजपूतों की वतन जागीर

बहुत से राजपूत शासक (जैसे आंबेर और जोधपुर के राजा) मुगलों के अधीन काफी समय से सेवा कर रहे थे। बदले में उन्हें अपनी 'वतन जागीर' पर स्वायत्तता मिली हुई थी।

प्रमुख शासक और सुधार:

  • अजीत सिंह (जोधपुर): इन्होंने मुगल दरबार की गुटीय राजनीति में हस्तक्षेप किया और गुजरात की सूबेदारी प्राप्त की।

  • सवाई राजा जयसिंह (आंबेर):

    • इन्हें मालवा की सूबेदारी मिली।

    • इन्होंने अपनी नई राजधानी जयपुर में बसाई।

    • १७२२ में उन्हें आगरा की सूबेदारी दी गई।

    • खगोल विज्ञान: सवाई जयसिंह ने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में पांच खगोलीय वेधशालाओं (जंतर मंतर) का निर्माण कराया।


६. आजादी हासिल करना (Seizing Independence)

ये वे समुदाय थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया।

(क) सिख (The Sikhs)

  • खालसा पंथ: १६९९ में गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की।

  • बंदा बहादुर: गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु (१७०८) के बाद, बंदा बहादुर ने मुगलों के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह के नाम वाले सिक्के जारी किए। १७१५ में उन्हें पकड़ लिया गया और १७१६ में मार दिया गया।

  • दल खालसा और मिसल:

    • १८वीं सदी में सिखों ने अपने आप को 'जत्थों' और बाद में 'मिसलों' में संगठित किया।

    • इन सभी जत्थों की संयुक्त सेना को 'दल खालसा' कहा जाता था।

    • वे बैसाखी और दीवाली के पर्व पर अमृतसर में मिलते थे और सामूहिक निर्णय लेते थे, जिसे 'गुरमत्ता' (गुरु का प्रस्ताव) कहा जाता था।

  • राखी व्यवस्था (Rakhi System): सिखों ने किसानों से उनकी उपज का

    $$20\%$$

    कर के रूप में लेकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की व्यवस्था शुरू की, जिसे 'राखी' कहा जाता था।

  • महाराजा रणजीत सिंह: १८वीं सदी के अंत में सिख मिसलें आपस में लड़ने लगीं। महाराजा रणजीत सिंह ने १७९९ में विभिन्न सिख समूहों को फिर से एक किया और लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।

(ख) मराठा (The Marathas)

मराठा राज्य एक अन्य शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था जो मुगल शासन का लगातार विरोध करके उभरा था।

  • शिवाजी (१६२७-१६८०): शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुखों) की सहायता से एक स्थिर राज्य की स्थापना की। 'कुनबी' (किसान-पशुचारक) मराठा सेना का मुख्य आधार बने।

  • पेशवा का युग:

    • शिवाजी की मृत्यु के बाद, सत्ता 'चितपावन ब्राह्मणों' के हाथ में आ गई जो शिवाजी के उत्तराधिकारियों के 'पेशवा' (प्रधानमंत्री) के रूप में सेवा करते थे।

    • पूना मराठा राज्य की राजधानी बना।

  • सैन्य विस्तार: १७२० से १७६१ के बीच मराठा साम्राज्य का काफी विस्तार हुआ। उन्होंने मालवा और गुजरात को मुगलों से छीन लिया।

  • कर प्रणाली (Tax System): मराठों ने दो प्रमुख कर लगाए:

    1. चौथ (Chauth): जमींदारों द्वारा वसूले जाने वाले भू-राजस्व का

      $$25\%$$

      । यह दक्कन में मुगलों द्वारा नहीं, बल्कि मराठों द्वारा वसूला जाता था।

    2. सरदेशमुखी (Sardeshmukhi): दक्कन के मुख्य राजस्व संग्रहकर्ता को दिए जाने वाले भू-राजस्व का

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      हिस्सा।

  • पानीपत की तीसरी लड़ाई (१७६१): १७६१ में मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। इसमें मराठों की हार हुई, जिससे दिल्ली पर शासन करने का उनका सपना टूट गया।

  • मराठा संघ: मराठा राज्य कई सरदारों में बंट गया (गायकवाड़, होल्कर, भोंसले, सिंधिया)। ये सभी पेशवा के अधीन एक 'कन्फेडरेसी' (राज्यमंडल) के सदस्य थे। महादजी सिंधिया और नाना फड़नवीस १८वीं सदी के आखिर के दो प्रसिद्ध मराठा योद्धा और राजनीतिज्ञ थे।

(ग) जाट (The Jats)

  • अन्य राज्यों की तरह जाटों ने भी अपनी शक्ति बढ़ाई।

  • चूड़ामन: इनके नेतृत्व में जाटों ने दिल्ली के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। १६८० के दशक तक उनका प्रभुत्व दिल्ली और आगरा के बीच के क्षेत्र पर हो गया।

  • जाट समृद्ध कृषक थे। पानीपत और बल्लभगढ़ उनके क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गए।

  • सूरजमल: इनके नेतृत्व में भरतपुर एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।

    • १७३९ में जब नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला किया, तो कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भरतपुर में शरण ली।

    • सूरजमल ने भरतपुर के किले का निर्माण कराया।

    • इन्हें 'जाटों का प्लेटो' (Plato of Jats) भी कहा जाता है।


७. १८वीं शताब्दी की सामान्य विशेषताएं

  • अर्थव्यवस्था: हालांकि राजनीतिक उथल-पुथल थी, लेकिन कई राज्यों में व्यापार और कृषि समृद्ध हुई।

  • बैंकिंग: महाजनों और साहूकारों का राजनीतिक व्यवस्था में महत्व बढ़ा (जैसे बंगाल में जगत सेठ)।

  • प्रशासन: नए राज्यों ने मुगलों की पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह नहीं हटाया, बल्कि उसमें कुछ बदलाव किए (जैसे इजारेदारी प्रथा)।

  • स्थापत्य कला: लखनऊ (अवध) और जयपुर (राजपूत) जैसे शहरों में वास्तुकला की नई शैलियों का विकास हुआ।


CTET अभ्यर्थियों के लिए सारांश (Key Takeaways):

  1. मुगलों के पतन का कारण औरंगजेब की नीतियां और कमजोर उत्तराधिकारी थे।

  2. नादिरशाह (१७३९) और अब्दाली (१७४८-१७६१) ने भारत को लूटा।

  3. हैदराबाद (निजाम-उल-मुल्क), अवध (सआदत खान) और बंगाल (मुर्शिद कुली खान) पुराने मुगल प्रांत थे।

  4. सिखों ने 'राखी' व्यवस्था और 'मिसल' का गठन किया।

  5. मराठों ने 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' कर लागू किए।

  6. जाट नेता सूरजमल ने भरतपुर को शक्तिशाली बनाया।



१८वीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

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