१. यूरोपीय शक्तियों और ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन
भारत के इतिहास में १८वीं शताब्दी का उत्तरार्ध एक महत्वपूर्ण मोड़ था। मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही यूरोपीय कंपनियों ने भारत की राजनीति में कदम रखना शुरू कर दिया।
पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा (१४९८)
सन १४९८ में पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा ने भारत के लिए समुद्री मार्ग की खोज की।
वह पहली बार भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट बंदरगाह पर पहुंचा।
इस खोज ने यूरोपीय व्यापार के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए। पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव में अपने ठिकाने बनाए।
ईस्ट इंडिया कंपनी का चार्टर (१६००)
सन १६०० में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक चार्टर (इजाजतनामा) जारी किया।
इस चार्टर का अर्थ था कि इंग्लैंड की कोई और व्यापारिक कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी से होड़ नहीं कर सकती थी।
कंपनी को 'पूर्व' के देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार मिल गया।
शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार करना और मुनाफा कमाना था, न कि इलाक़ों पर कब्जा करना।
भारत में पहली फैक्ट्री और व्यापार
अंग्रेजों ने अपनी पहली फैक्ट्री १६५१ में हुगली नदी के किनारे शुरू की।
कंपनी ने व्यापारियों को फैक्ट्री के आसपास बसने के लिए प्रेरित किया।
१६९६ तक कंपनी ने इस आबादी के चारों ओर एक किला बनाना शुरू कर दिया।
औरंगजेब का फरमान: कंपनी ने मुग़ल बादशाह औरंगजेब से एक फरमान प्राप्त किया, जिसके तहत उन्हें 'बिना शुल्क चुकाए' व्यापार करने का अधिकार मिल गया। हालांकि, यह अधिकार केवल कंपनी के लिए था, लेकिन कंपनी के अफसर निजी व्यापार के लिए भी इसका दुरुपयोग करने लगे, जिससे बंगाल के राजस्व को भारी नुकसान हुआ।
२. व्यापार से युद्ध की ओर: बंगाल में संघर्ष
औरंगजेब की मृत्यु (१७०७) के बाद बंगाल के नवाबों ने अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी। मुर्शीद कुली खान, अलीवर्दी खान और फिर सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। इन्होंने कंपनी को रियायतें देने से मना कर दिया और सिक्कों को ढालने व किलेबंदी बढ़ाने पर रोक लगा दी।
प्लासी का युद्ध (१७५७)
यह कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच पहला बड़ा युद्ध था।
कारण: नवाब सिराजुद्दौला ने कंपनी को राजनीति में टांग अड़ाने और किलेबंदी करने से रोका। बात न मानने पर नवाब ने कासिम बाजार स्थित इंग्लिश फैक्ट्री पर कब्जा कर लिया।
घटनाक्रम: रॉबर्ट क्लाइव ने मद्रास से सेना का नेतृत्व किया।
षड्यंत्र: रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को अपनी ओर मिला लिया। क्लाइव ने उसे नवाब बनाने का लालच दिया।
परिणाम: १७५७ में प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला की हार हुई और उसे मार दिया गया।
महत्व: यह भारत में कंपनी की पहली बड़ी जीत थी। मीर जाफर को कठपुतली नवाब बनाया गया।
बक्सर का युद्ध (१७६४)
जब मीर जाफर ने कंपनी का विरोध किया, तो उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया गया। मीर कासिम ने भी कंपनी की नीतियों से परेशान होकर अवध के नवाब और मुग़ल बादशाह के साथ गठबंधन किया।
युद्ध: १७६४ में बक्सर में लड़ाई हुई।
पक्ष: हेक्टर मुनरो (अंग्रेज) बनाम मीर कासिम (बंगाल), शुजाउद्दौला (अवध) और शाह आलम द्वितीय (मुग़ल बादशाह)।
परिणाम: कंपनी की जीत हुई।
इलाहाबाद की संधि (१७६५): इस संधि के तहत मुग़ल बादशाह ने कंपनी को बंगाल प्रांत का दीवान नियुक्त कर दिया।
दीवानी का अर्थ: अब कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया। अब वे भारत से होने वाली कमाई से ही अपना खर्च चला सकते थे और व्यापार कर सकते थे (पहले उन्हें ब्रिटेन से सोना-चांदी लाना पड़ता था)।
३. कंपनी का विस्तार: मैसूर और मराठा
कंपनी ने सीधे सैन्य हमले कम किए, लेकिन कूटनीतिक और राजनीतिक तरीकों से भारतीय रियासतों का अधिग्रहण किया।
आंग्ल-मैसूर युद्ध (टीपू सुल्तान)
दक्षिण भारत में मैसूर एक शक्तिशाली रियासत थी, जो हैदर अली और उसके पुत्र टीपू सुल्तान के नेतृत्व में फली-फूली।
मालाबार तट पर होने वाला व्यापार मैसूर के नियंत्रण में था (जहाँ से कंपनी काली मिर्च और इलायची खरीदती थी)।
१७८५ में टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत के बंदरगाहों से चंदन, काली मिर्च और इलायची के निर्यात पर रोक लगा दी।
चार युद्ध: अंग्रेजों और मैसूर के बीच चार बार जंग हुई (१७६७-६९, १७८०-८४, १७९०-९२ और १७९९)।
श्रीरंगपट्टनम की संधि: १७९९ की आखिरी लड़ाई में टीपू सुल्तान अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए मारे गए।
मैसूर का राजकाज पुराने वोडियार राजवंश के हाथों में सौंप दिया गया और उन पर 'सहायक संधि' थोप दी गई।
आंग्ल-मराठा युद्ध
पानीपत की तीसरी लड़ाई (१७६१) में हार के बाद मराठों का दिल्ली से देश चलाने का सपना टूट गया था। वे कई राज्यों (सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़, भोंसले) में बंटे हुए थे, जिनका प्रमुख पेशवा (पुणे) होता था।
पहला युद्ध (१७८२): सालबाई की संधि के साथ खत्म हुआ। कोई स्पष्ट जीत नहीं।
दूसरा युद्ध (१८०३-०५): अंग्रेजों ने ओडिशा और यमुना के उत्तर में स्थित आगरा व दिल्ली जैसे भू-भागों पर कब्जा किया।
तीसरा युद्ध (१८१७-१९): मराठों की ताकत को पूरी तरह कुचल दिया गया। पेशवा को पुणे से हटाकर कानपुर के पास बिठूर में पेंशन पर भेज दिया गया।
अब विंध्य के दक्षिण में स्थित पूरे भू-भाग पर कंपनी का नियंत्रण हो गया।
४. विस्तार की प्रमुख नीतियाँ
अंग्रेजों ने भारतीय राज्यों को अपने अधीन करने के लिए विशेष राजनीतिक उपकरणों का प्रयोग किया।
१. सहायक संधि (Subsidiary Alliance)
इस नीति को लॉर्ड वेलेजली ने कड़ाई से लागू किया।
नियम: जो रियासत इस संधि को मानती थी, उसे अपनी स्वतंत्र सेना रखने का अधिकार नहीं था।
उसे कंपनी की तरफ से 'सहायक सेना' की सुरक्षा मिलती थी, लेकिन इसके बदले राजा को भारी रकम (भुगतान) चुकानी पड़ती थी।
जुर्माना: अगर राजा रकम नहीं चुका पाता, तो जुर्माने के तौर पर उसका इलाक़ा छीन लिया जाता था।
दरबार में रेजीडेंट: राजा के दरबार में एक अंग्रेज अधिकारी (रेजीडेंट) नियुक्त किया जाता था, जो राजा के आंतरिक मामलों में दखल देता था।
उदाहरण: अवध और हैदराबाद को इस संधि के तहत अपने इलाक़े का बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा।
२. विलय नीति (Doctrine of Lapse)
यह नीति लॉर्ड डलहौजी (१८4८-१८५६) ने अपनाई।
सिद्धांत: अगर किसी शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई पुरुष वारिस (अपना बेटा) नहीं है, तो उसकी रियासत हड़प ली जाएगी। गोद लिए हुए बेटे को वारिस नहीं माना जाएगा।
शिकार हुए राज्य: इस नीति के तहत सतारा (१८४८), संबलपुर (१८५०), उदयपुर (१८५२), नागपुर (१८५३) और झाँसी (१८५४) को अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया।
अवध का विलय (१८५६): अवध को 'कुशासन' (गलत शासन) का आरोप लगाकर छीना गया।
३. सर्वोच्चता की दावा
लॉर्ड हेस्टिंग्स (१८१३-१८२३) के नेतृत्व में 'सर्वोच्चता' की एक नई नीति शुरू की गई। कंपनी का दावा था कि उसकी सत्ता सर्वोच्च है, इसलिए वह भारतीय राज्यों से ऊपर है। अपने हितों की रक्षा के लिए वह किसी भी भारतीय रियासत का अधिग्रहण करने का अधिकार रखती है।
कित्तूर का विद्रोह: जब अंग्रेजों ने कित्तूर (कर्नाटक) के छोटे से राज्य को कब्जे में लेने की कोशिश की, तो रानी चेनम्मा ने हथियार उठा लिए और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चलाया।
५. नागरिक प्रशासन और नई न्याय व्यवस्था
कंपनी ने न केवल इलाक़े जीते, बल्कि शासन चलाने के तरीके में भी बड़े बदलाव किए।
प्रेसीडेंसी
ब्रिटिश इलाक़े मोटे तौर पर प्रशासकीय इकाइयों में बंटे हुए थे जिन्हें प्रेसीडेंसी कहा जाता था। उस समय तीन मुख्य प्रेसीडेंसी थीं:
बंगाल
मद्रास
बंबई
हर प्रेसीडेंसी का शासन एक गवर्नर के पास होता था और सबसे ऊपर गवर्नर-जनरल होता था।
वारेन हेस्टिंग्स भारत का पहला गवर्नर-जनरल बना।
न्याय व्यवस्था में सुधार (१७७२)
वारेन हेस्टिंग्स ने १७७२ में एक नई न्याय व्यवस्था स्थापित की। हर जिले में दो अदालतें बनाई गईं:
फौजदारी अदालत (Criminal Court): यह अभी भी काजी और मुफ्ती के ही अंतर्गत थी, लेकिन वे कलेक्टर की निगरानी में काम करते थे।
काजी: एक न्यायाधीश।
मुफ्ती: मुस्लिम समुदाय का एक न्यायविद जो कानूनों की व्याख्या करता था।
दीवानी अदालत (Civil Court): इसका मुखिया यूरोपीय जिला कलेक्टर होता था। मौलवी और हिंदू पंडित उनके लिए भारतीय कानूनों की व्याख्या करते थे।
रेगुलेटिंग एक्ट (१७७३)
इस एक्ट के तहत एक नए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना कलकत्ता में की गई।
इसके अलावा अपीली अदालत 'सदर निजामत अदालत' की भी स्थापना हुई।
कलेक्टर की भूमिका
भारतीय इतिहास में 'कलेक्टर' का पद बहुत शक्तिशाली बन गया। जैसा कि नाम से पता चलता है, उसका मुख्य काम था:
लगान और कर (Tax) इकट्ठा करना।
न्यायाधीशों और पुलिस अधिकारियों की मदद से जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखना।
उसका कार्यालय (कलेक्ट्रेट) सत्ता और संरक्षण का नया केंद्र बन गया।
६. कंपनी की सेना
मुग़ल सेना मुख्य रूप से घुड़सवारों और पैदल सैनिकों पर निर्भर थी जो तीरंदाजी और तलवारबाजी में निपुण थे। लेकिन कंपनी की सेना अलग थी।
सिपाही (Sepoy): कंपनी ने अपनी सेना के लिए भारतीय किसानों को भर्ती किया और उन्हें पेशेवर सैनिक बनाया। इसे 'सिपाही आर्मी' कहा जाता था।
नई तकनीक: १८२० के दशक से जैसे-जैसे युद्ध तकनीक बदली, कंपनी की सेना में घुड़सवारों की जरूरत कम होती गई।
हथियार: ब्रिटिश सैनिकों को मस्कट (तोड़ेदार बंदूक) और मैचलॉक (भारी बंदूक) जैसे आधुनिक हथियारों से लैस किया गया।
अनुशासन: कंपनी ने सैनिकों को यूरोपीय ढंग का प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुशासन सिखाया। इससे सैनिकों का जीवन पूरी तरह नियंत्रित हो गया। जाति और समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज कर उन्हें केवल एक सिपाही माना जाता था (जो १८५७ के विद्रोह का एक कारण भी बना)।
निष्कर्ष
१०० वर्षों (१७५७-१८५७) के भीतर, ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी से एक भौगोलिक औपनिवेशिक शक्ति बन गई।
भाप के इंजन और जहाजों के आविष्कार ने यात्रा का समय कम कर दिया (६-८ महीने से ३ हफ्ते), जिससे अधिक अंग्रेज भारत आ सके।
१८५७ तक भारतीय उपमहाद्वीप के ६३% भू-भाग और ७८% आबादी पर कंपनी का सीधा शासन था।
शेष भाग पर उनका अप्रत्यक्ष प्रभाव था। व्यावहारिक रूप से पूरा भारत अंग्रेजों के अधीन हो चुका था।
आधुनिक इतिहास: कंपनी सत्ता की स्थापना
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