न्यायपालिका

Sunil Sagare
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न्यायपालिका: एक परिचय

न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह कानूनों की व्याख्या करती है और यह सुनिश्चित करती है कि देश का शासन संविधान के अनुसार चले।

  • भारत में 'कानून का शासन' है, जिसका अर्थ है कि कानून सभी लोगों पर समान रूप से लागू होता है।

  • कानून के शासन को लागू करने के लिए एक न्यायिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

  • न्यायपालिका केवल अदालतों की इमारत नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला एक तंत्र है।


न्यायपालिका की भूमिका (Role of Judiciary)

न्यायपालिका के कार्यों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:

1. विवादों का निपटारा (Dispute Resolution)

न्यायपालिका निम्नलिखित के बीच होने वाले विवादों को हल करती है:

  • नागरिक बनाम नागरिक: जैसे संपत्ति या पैसे के लेन-देन का विवाद।

  • नागरिक बनाम सरकार: यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन सरकार द्वारा होता है।

  • दो राज्य सरकारों के बीच: जैसे नदी जल बंटवारा (कावेरी जल विवाद)।

  • केंद्र सरकार बनाम राज्य सरकार: शक्तियों या फंड के बंटवारे को लेकर विवाद।

2. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

यह न्यायपालिका की सबसे शक्तिशाली भूमिकाओं में से एक है।

  • न्यायपालिका संविधान की अंतिम व्याख्याकार है।

  • यदि न्यायपालिका को लगता है कि संसद द्वारा पारित किया गया कोई भी कानून संविधान के 'आधारभूत ढांचे' या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह उस कानून को रद्द कर सकती है।

  • इसे ही न्यायिक समीक्षा कहा जाता है।

3. कानून की रक्षा और मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन

  • यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वह सीधे न्यायालय जा सकता है।

  • संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को संवैधानिक उपचार का अधिकार देता है, जिसके तहत वे सीधे Supreme Court जा सकते हैं।

  • उदाहरण: 'पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' (1996) मामले में, न्यायालय ने जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) की व्याख्या करते हुए स्वास्थ्य के अधिकार को भी इसमें शामिल किया।


स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)

लोकतंत्र के सुचारू रूप से चलने के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना अत्यंत आवश्यक है।

  • स्वतंत्रता का अर्थ: न्यायपालिका विधायिका (संसद) और कार्यपालिका (सरकार) के अधीन नहीं है।

  • सरकार अदालतों के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

  • न्यायाधीश अपनी मर्जी से या किसी राजनीतिक दबाव में काम नहीं करते।

स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उपाय

  1. नियुक्ति: उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की बहुत कम दखलंदाजी होती है (कॉलेजियम प्रणाली)।

  2. पद की सुरक्षा: एक बार नियुक्त होने के बाद, किसी न्यायाधीश को हटाना बहुत मुश्किल होता है। उन्हें केवल 'महाभियोग' जैसी जटिल प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।

  3. शक्तियों का बंटवारा: संविधान ने शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत को अपनाया है, जिससे विधायिका और कार्यपालिका न्यायिक कार्यों में बाधा नहीं डाल सकतीं।

नोट: राजनेता या अमीर व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित न कर सकें, इसलिए भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का प्रावधान कड़ाई से किया गया है।


भारत में अदालतों की संरचना

भारत में न्यायिक व्यवस्था एक पिरामिड के आकार की है।

1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)

  • यह देश की सबसे बड़ी अदालत है।

  • स्थान: नई दिल्ली।

  • प्रमुख: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)।

  • स्थापना: 26 जनवरी 1950 को हुई थी। (इससे पहले इसे Federal Court of India कहा जाता था, जो 1937-1949 तक संसद भवन के चेंबर ऑफ प्रिंसेस में था)।

  • इसके फैसले देश की सभी निचली अदालतों को मान्य होते हैं।

2. उच्च न्यायालय (High Court)

  • यह राज्य स्तर की सबसे बड़ी अदालत होती है।

  • वर्तमान में भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं।

  • कई राज्यों का एक साझा उच्च न्यायालय भी हो सकता है (जैसे पंजाब और हरियाणा का उच्च न्यायालय चंडीगढ़ में है)।

  • पूर्वोत्तर के चार राज्यों (असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश) का गुवाहाटी में एक ही उच्च न्यायालय है।

  • ऐतिहासिक तथ्य: भारत में सबसे पहले उच्च न्यायालयों की स्थापना 1862 में कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में की गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय का गठन 1966 में हुआ।

3. अधीनस्थ अदालतें (Subordinate Courts / District Courts)

  • ये वे अदालतें हैं जिनसे आम लोगों का सबसे ज्यादा वास्ता पड़ता है।

  • इन्हें जिला न्यायालय, सत्र न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट आदि नामों से जाना जाता है।

  • हर जिले में एक जिला न्यायाधीश होता है जो इन मामलों की सुनवाई करता है।


एकीकृत न्यायिक व्यवस्था (Integrated Judicial System)

भारत में 'एकीकृत' न्यायिक व्यवस्था है। इसका अर्थ यह है कि ऊपरी अदालतों के फैसले नीचे की सभी अदालतों को मानने होते हैं।

अपील की व्यवस्था (Appellate System)

एकीकृत व्यवस्था को समझने के लिए अपील की प्रक्रिया को समझना जरूरी है।

  • यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि निचली अदालत का फैसला सही नहीं है, तो वह उससे ऊपर की अदालत में अपील कर सकता है।

  • प्रक्रिया: जिला अदालत $\rightarrow$ उच्च न्यायालय $\rightarrow$ सर्वोच्च न्यायालय।

  • सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अंतिम होता है।

उदाहरण (लक्ष्मण कुमार केस - दहेज़ हत्या मामला):

  1. निचली अदालत: लक्ष्मण और उसके परिवार को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई।

  2. उच्च न्यायालय: सबूतों के अभाव में तीनों को बरी कर दिया।

  3. सर्वोच्च न्यायालय: महिला संगठनों की अपील पर सुनवाई की और उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी।


विधि व्यवस्था की शाखाएं (Branches of Legal System)

कानूनी मामलों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है: फौजदारी कानून और दीवानी कानून।

1. फौजदारी कानून (Criminal Law)

यह उन कार्यों से संबंधित है जिन्हें कानून में अपराध माना गया है।

  • विषय: चोरी, हत्या, दहेज के लिए प्रताड़ना, छेड़छाड़।

  • प्रक्रिया:

    1. सबसे पहले पुलिस के पास FIR (First Information Report) दर्ज कराई जाती है।

    2. पुलिस जांच करती है और अदालत में केस फाइल (Charge sheet) करती है।

  • परिणाम: यदि व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो उसे जेल भेजा जा सकता है और उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

2. दीवानी कानून (Civil Law)

इसका संबंध व्यक्ति के अधिकारों के उल्लंघन या अवहेलना से है।

  • विषय: जमीन की बिक्री, चीजों की खरीददारी, किराया, तलाक, बच्चों की कस्टडी।

  • प्रक्रिया: प्रभावित पक्ष द्वारा न्यायालय में एक याचिका दायर की जाती है।

    • किराए के मामले में मकान मालिक या किराएदार मुकदमा दायर कर सकता है।

  • परिणाम: अदालत राहत की व्यवस्था करती है। जैसे - मकान खाली करने का आदेश देना या बकाया किराया चुकाने का आदेश देना। इसमें जेल की सजा नहीं होती, केवल मुआवजा या अधिकार बहाली होती है।


क्या हर व्यक्ति अदालत की शरण में जा सकता है?

सिद्धांत रूप में भारत के सभी नागरिक देश के न्यायालयों की शरण में जा सकते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को अदालत के माध्यम से न्याय मांगने का अधिकार है।

न्याय तक पहुंच में बाधाएं

  • खर्चीली प्रक्रिया: अदालती कार्यवाही में बहुत पैसा और कागजी कार्रवाई लगती है।

  • समय: मुकदमों का निपटारा होने में कई साल लग जाते हैं ("तारीख पे तारीख")।

  • दूरी और साक्षरता: गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए अदालत जाना बहुत मुश्किल होता है।

जनहित याचिका (PIL - Public Interest Litigation)

न्याय तक आम लोगों की पहुंच बढ़ाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 1980 के दशक में PIL की व्यवस्था शुरू की।

  • परिभाषा: यदि किसी व्यक्ति या समूह के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तो कोई अन्य व्यक्ति या संस्था उनकी ओर से उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकती है।

  • सरलीकरण: कानूनी प्रक्रिया को बहुत सरल बना दिया गया। अब सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के नाम भेजे गए पत्र या तार (Telegram) को भी जनहित याचिका माना जा सकता है।

  • महत्वपूर्ण भूमिका:

    • बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने में।

    • बिहार में सजा पूरी होने के बाद भी जेल में बंद कैदियों को रिहा करवाने में।

    • सरकारी स्कूलों में 'मिड-डे मील' (दोपहर का भोजन) की व्यवस्था भी एक PIL के फलस्वरूप ही शुरू हुई थी।

महत्वपूर्ण तथ्य: न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती को भारत में जनहित याचिका का प्रणेता माना जाता है।


अनुच्छेद 22 और फौजदारी न्याय प्रणाली

संविधान का अनुच्छेद 22 और फौजदारी कानून प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ मौलिक अधिकार देता है:

  1. गिरफ्तारी का कारण: गिरफ्तारी के समय ही उसे यह जानने का अधिकार है कि उसे किस जुर्म में गिरफ्तार किया जा रहा है।

  2. 24 घंटे का नियम: गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।

  3. सुरक्षा: हिरासत में या जेल में किसी भी तरह के दुर्व्यवहार या यातना से बचने का अधिकार।

  4. इकबालिया बयान: पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयान को अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

  5. आयु सीमा: 15 साल से कम उम्र के बालक और किसी भी महिला को केवल सवाल पूछने के लिए थाने नहीं बुलाया जा सकता।


प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)

  • पुलिस जांच की शुरुआत FIR दर्ज होने से होती है।

  • कानून में कहा गया है कि किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना मिलने पर थाने के प्रभारी अधिकारी को तुरंत FIR दर्ज करनी होगी।

  • FIR में घटना की तारीख, समय, स्थान और विवरण लिखा जाता है।

  • शिकायतकर्ता को FIR की एक मुफ्त नकल पाने का कानूनी अधिकार है।


सरकारी वकील (Public Prosecutor)

  • जब पुलिस जांच पूरी करके चार्जशीट अदालत में दाखिल करती है, तब सरकारी वकील की भूमिका शुरू होती है।

  • वह राज्य का पक्ष रखता है।

  • उसका काम निष्पक्ष रूप से अदालत के सामने तथ्य, गवाह और सबूत पेश करना है ताकि न्यायाधीश सही फैसला ले सकें।

  • अपराध केवल पीड़ित के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ माना जाता है, इसलिए सरकार (राज्य) मुकदमा लड़ती है।


निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial)

संविधान के अनुच्छेद 21 में 'जीवन के अधिकार' में निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी शामिल है। इसके लिए आवश्यक शर्तें:

  1. मुकदमा खुली अदालत में हो।

  2. आरोपी को अपने बचाव का पूरा मौका मिले।

  3. आरोपी को वकील करने का अधिकार हो। (यदि आरोपी गरीब है, तो अनुच्छेद 39A के तहत राज्य उसे वकील मुहैया कराएगा)।

  4. न्यायाधीश बिना किसी पूर्वाग्रह के, केवल सबूतों के आधार पर फैसला सुनाएं।


परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य (Key Facts for CTET)

  • सेपरेशन ऑफ पावर्स (शक्ति का पृथक्करण): यह भारतीय संविधान का एक मुख्य लक्षण है जो न्यायपालिका को स्वतंत्र रखता है।

  • संविधान का संरक्षक: न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) कहा जाता है।

  • अंतिम व्याख्या: कानूनों की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है।

  • न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism): जब न्यायपालिका, कार्यपालिका या विधायिका के कार्यों में हस्तक्षेप करके जनता के हित में सक्रिय भूमिका निभाती है (जैसे प्रदूषण कम करने के आदेश)।

  • लोक अदालत: यह विवादों के निपटारे का एक वैकल्पिक मंच है, जहां समझौते के माध्यम से फैसले होते हैं। यह त्वरित और सस्ता न्याय प्रदान करती है।

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA): समाज के कमजोर वर्गों को मुफ्त कानूनी सेवाएं प्रदान करने के लिए इसका गठन किया गया है।


सारांश

भारत की न्यायपालिका एक मजबूत और स्वतंत्र संस्था है जो लोकतंत्र की रक्षा करती है। एकीकृत न्यायिक प्रणाली, जनहित याचिका और न्यायिक समीक्षा जैसे प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का प्रत्येक नागरिक, चाहे वह अमीर हो या गरीब, न्याय प्राप्त कर सके। CTET परीक्षा में अक्सर दीवानी बनाम फौजदारी कानून और PIL से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इन अवधारणाओं को स्पष्ट रखना आवश्यक है।



न्यायपालिका

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

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