हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली

Sunil Sagare
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1. आपराधिक न्याय प्रणाली के मुख्य खिलाड़ी (Key Players)

आपराधिक न्याय प्रणाली में चार लोग मुख्य रूप से भूमिका निभाते हैं। पूरी प्रक्रिया इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है:

  • पुलिस: अपराध की जांच करना और सबूत इकट्ठा करना।

  • सरकारी वकील (Public Prosecutor): अदालत में राज्य (सरकार) का पक्ष प्रस्तुत करना।

  • बचाव पक्ष का वकील (Defence Lawyer): आरोपी व्यक्ति का पक्ष रखना और उसे निर्दोष साबित करने का प्रयास करना।

  • न्यायाधीश (Judge): गवाहों और सबूतों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लेना।


2. पुलिस की भूमिका (Role of the Police)

पुलिस न्याय प्रणाली का पहला चरण है, लेकिन पुलिस न्यायपालिका नहीं है। अक्सर छात्र इसमें भ्रमित हो जाते हैं।

पुलिस के मुख्य कार्य

  • शिकायत दर्ज करना: किसी अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर (FIR) दर्ज करना।

  • जांच (Investigation): गवाहों के बयान दर्ज करना और सबूत (Evidence) इकट्ठा करना।

  • आरोप पत्र (Charge Sheet): यदि जांच में पुलिस को लगता है कि आरोपी दोषी है, तो वह अदालत में आरोप पत्र दाखिल करती है।

पुलिस क्या नहीं कर सकती?

  • पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि कोई व्यक्ति दोषी है या निर्दोष। यह अधिकार केवल न्यायाधीश के पास है।

  • पुलिस किसी को पीट नहीं सकती, गोली नहीं मार सकती या यातना नहीं दे सकती।

  • जांच के दौरान मानवाधिकारों का सम्मान करना अनिवार्य है।


3. संविधान का अनुच्छेद 22: गिरफ्तार व्यक्ति के मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान और फौजदारी कानून (Criminal Law) में गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं। यह CTET का सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक है।

अनुच्छेद 22 के तहत अधिकार:

  • गिरफ्तारी का कारण: व्यक्ति को गिरफ़्तारी के समय यह जानने का अधिकार है कि उसे किस अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है।

  • 24 घंटे का नियम: गिरफ्तारी के 24 घंटों के भीतर आरोपी को मजिस्ट्रेट (न्यायालय) के सामने पेश करना अनिवार्य है। इसमें यात्रा का समय शामिल नहीं होता।

  • वकील का अधिकार: अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और बचाव करने का अधिकार।

  • यातना से सुरक्षा: पुलिस हिरासत में किसी भी तरह के दुर्व्यवहार या यातना (Torture) के खिलाफ अधिकार।

  • स्वीकारोक्ति (Confession): पुलिस हिरासत में दिया गया बयान अदालत में आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

  • बाल और महिला अधिकार: 15 साल से कम उम्र के बालक और किसी भी महिला को केवल पूछताछ के लिए थाने में नहीं बुलाया जा सकता।


4. डी.के. बसु दिशा-निर्देश (D.K. Basu Guidelines)

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने गिरफ्तारी, हिरासत और पूछताछ के लिए पुलिस द्वारा पालन की जाने वाली विशिष्ट प्रक्रियाएं निर्धारित की हैं। इन्हें डी.के. बसु दिशा-निर्देश कहा जाता है।

मुख्य दिशा-निर्देश:

  • पहचान: गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी को अपनी वर्दी पर अपना नाम और पद का स्पष्ट टैग (Name Tag) लगाना चाहिए।

  • गिरफ्तारी का ज्ञापन (Memo of Arrest): गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार किया जाना चाहिए जिसमें:

    • गिरफ्तारी का समय और तारीख।

    • कम से कम एक गवाह के हस्ताक्षर (यह परिवार का सदस्य भी हो सकता है)।

    • गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर (Counter-signed)।

  • परिजन को सूचना: गिरफ्तार व्यक्ति को अपने किसी रिश्तेदार या मित्र को जानकारी देने का अधिकार है।

  • बाहरी जिले में सूचना: यदि मित्र या रिश्तेदार जिले से बाहर रहते हैं, तो पुलिस को गिरफ्तारी के 8 से 12 घंटे के भीतर उन्हें सूचित करना होगा।


5. प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR - First Information Report)

कानून के अनुसार, किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की सूचना मिलने पर थाने के प्रभारी अधिकारी को एफआईआर दर्ज करनी होती है।

  • प्रक्रिया: पुलिस एफआईआर दर्ज होने के बाद ही जांच शुरू कर सकती है।

  • रूप: यह लिखित या मौखिक दोनों हो सकती है।

  • एफआईआर में क्या होता है?

    • वारदात की तारीख, समय और स्थान।

    • घटना का विवरण।

    • दोषी व्यक्ति का नाम (यदि पता हो)।

    • गवाहों के नाम।

    • शिकायतकर्ता का नाम और पता।

  • अधिकार: शिकायतकर्ता को पुलिस से एफआईआर की एक मुफ्त नकल (Copy) प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है।


6. सरकारी वकील की भूमिका (Public Prosecutor)

जब पुलिस अपनी जांच पूरी करके अदालत में आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल करती है, तब सरकारी वकील की भूमिका शुरू होती है।

  • राज्य का प्रतिनिधित्व: अपराध केवल पीड़ित के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे समाज और राज्य के खिलाफ माना जाता है। इसलिए, सरकारी वकील राज्य का पक्ष रखता है। उदाहरण: 'राज्य बनाम आरोपी'।

  • निष्पक्षता: उसे अदालत के सामने सभी ठोस तथ्य, गवाह और सबूत पेश करने चाहिए ताकि न्यायाधीश सही फैसला ले सकें।

  • जांच में सरकारी वकील की कोई भूमिका नहीं होती; वह केवल न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।


7. न्यायाधीश की भूमिका (Role of the Judge)

न्यायाधीश की तुलना अक्सर खेल के 'अंपायर' से की जाती है।

  • वह पूरी सुनवाई खुली अदालत में संचालित करते हैं।

  • सभी गवाहों को सुनते हैं और साक्ष्यों (Evidence) की जांच करते हैं।

  • कानून के अनुसार निर्णय लेते हैं।

  • यदि आरोपी दोषी पाया जाता है, तो न्यायाधीश ही उसे सजा (जेल या जुर्माना) सुनाते हैं।


8. निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial)

संविधान के अनुच्छेद 21 में 'जीवन का अधिकार' शामिल है। इसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता को केवल 'कानून द्वारा स्थापित एक तर्कसंगत और न्यायपूर्ण प्रक्रिया' के माध्यम से ही छीना जा सकता है। निष्पक्ष सुनवाई इसी को सुनिश्चित करती है।

निष्पक्ष सुनवाई के आवश्यक तत्व:

  • खुली अदालत (Open Court): सुनवाई सबके सामने होनी चाहिए, बंद कमरे में नहीं।

  • आरोपी की उपस्थिति: सुनवाई के दौरान आरोपी का वहां मौजूद होना जरूरी है।

  • बचाव का मौका: आरोपी को एक वकील दिया जाना चाहिए।

  • जिरह (Cross-examination): बचाव पक्ष के वकील को अभियोजन पक्ष (Prosecution) के गवाहों से सवाल पूछने (जिरह करने) का मौका मिलना चाहिए।

  • निर्दोषिता की धारणा: जब तक दोष साबित न हो जाए, आरोपी को निर्दोष माना जाता है।

  • सबूतों पर आधार: न्यायाधीश का फैसला मीडिया रिपोर्टों या भावनाओं पर नहीं, बल्कि अदालत में पेश किए गए सबूतों पर आधारित होना चाहिए।


9. निशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39A यह निर्देश देता है कि यदि कोई नागरिक गरीबी या किसी अन्य कारण से वकील नहीं रख सकता, तो राज्य (सरकार) उसे वकील मुहैया कराएगा।


10. फौजदारी (Criminal) और दीवानी (Civil) कानून में अंतर

हालांकि यह अध्याय मुख्य रूप से आपराधिक न्याय पर है, लेकिन तुलनात्मक अध्ययन के लिए अंतर जानना जरूरी है।

फौजदारी कानून (Criminal Law)

  • ऐसे व्यवहार या क्रियाओं से संबंधित है जिसे कानूनन अपराध माना गया है (जैसे: चोरी, हत्या, दहेज प्रताड़ना)।

  • प्रक्रिया एफआईआर से शुरू होती है।

  • दोषी पाए जाने पर जेल या जुर्माना हो सकता है।

दीवानी कानून (Civil Law)

  • यह लोगों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है (जैसे: जमीन का विवाद, किराया, तलाक, वस्तुओं की खरीददारी)।

  • इसमें एफआईआर नहीं, बल्कि सीधे न्यायालय में याचिका (Petition) दायर की जाती है।

  • इसमें जेल नहीं होती, बल्कि राहत या मुआवजा देने का आदेश दिया जाता है।


11. महत्वपूर्ण शब्दावली (Glossary)

  • संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence): ऐसे गंभीर अपराध जिनमें पुलिस को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का अधिकार होता है।

  • हिरासत (Detention): किसी को पुलिस द्वारा अवैध रूप से रोके रखना।

  • गवाह (Witness): वह व्यक्ति जिसने अपराध होते देखा हो या जिसके पास जानकारी हो।

  • आरोप पत्र (Charge Sheet): पुलिस द्वारा अदालत में पेश की गई रिपोर्ट जो जांच के निष्कर्ष को दर्शाती है।


निष्कर्ष (Revision Tips)

  • अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी के अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) को याद रखें।

  • एफआईआर केवल संज्ञेय अपराधों के लिए होती है।

  • डी.के. बसु दिशा-निर्देश पुलिस की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करते हैं।

  • सरकारी वकील राज्य का प्रतिनिधित्व करता है, पीड़ित का निजी वकील नहीं होता।



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