संज्ञान और संवेग (Cognition and Emotion) मनोविज्ञान के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। एक शिक्षक के रूप में, यह समझना अनिवार्य है कि बच्चे कैसे सोचते हैं (संज्ञान) और वे कैसा महसूस करते हैं (संवेग)। ये दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं और सीखने की प्रक्रिया (Learning Process) को सीधे प्रभावित करती हैं।
यह अध्याय CTET परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि विगत वर्षों (2011-2021) के विश्लेषण से पता चलता है कि इस अध्याय से हर साल औसतन 2-3 प्रश्न पूछे जाते हैं।
1. संज्ञान (Cognition) : अर्थ और स्वरूप
संज्ञान का सामान्य अर्थ है—'समझ' या 'ज्ञान'। यह वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम ज्ञान अर्जित करते हैं और दुनिया को समझते हैं। यह केवल रटने या याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सूचनाओं को ग्रहण करना, उनका प्रसंस्करण (Processing) करना और निर्णय लेना शामिल है।
परिभाषाएँ:
स्टॉट के अनुसार: "संज्ञानात्मक संरचना बाह्य वातावरण में विचारपूर्वक, प्रभावपूर्ण ढंग से तथा सुविधा के अनुसार कार्य करने की क्षमता है।"
हिलगार्ड के अनुसार: "किसी व्यक्ति ने स्वयं अपने बारे में तथा अपने पर्यावरण के बारे में विचार, ज्ञान, व्याख्या, समझ व धारणा अर्जित की है, वही संज्ञान है।"
संज्ञान के प्रमुख घटक (Components of Cognition)
ब्लूम (Bloom) के वर्गीकरण और सामान्य मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, संज्ञान में निम्न मानसिक क्रियाएं क्रमिक रूप से शामिल होती हैं:
ज्ञान (Knowledge):
यह संज्ञान का सबसे निचला स्तर है।
इसमें सूचनाओं, तथ्यों, परिभाषाओं या नामों को याद रखना (Recall) या पहचानना (Recognition) शामिल है।
उदाहरण: भारत की राजधानी नई दिल्ली है, यह जानना।
समग्रता/बोध (Comprehension):
सूचना केवल याद करना काफी नहीं है, उसे समझना भी जरूरी है।
इसमें तथ्यों, सिद्धांतों और उनके अर्थ को समझना शामिल है।
उदाहरण: यह समझना कि राजधानी का क्या कार्य होता है।
अनुप्रयोग (Application):
सीखी गई जानकारी का नई परिस्थितियों में उपयोग करना।
यह वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने में मदद करता है।
उदाहरण: गणित के जोड़-घटाव सीखने के बाद बाजार में हिसाब करना।
विश्लेषण (Analysis):
किसी जटिल सूचना को छोटे-छोटे भागों में तोड़ना ताकि उसकी संरचना समझी जा सके।
यह तार्किक चिंतन का आधार है।
उदाहरण: किसी कहानी के विभिन्न पात्रों के व्यवहार के कारणों को अलग-अलग समझना।
संश्लेषण (Synthesis):
विभिन्न टुकड़ों या विचारों को जोड़कर एक नया 'संपूर्ण' या नया विचार बनाना।
यह रचनात्मकता (Creativity) से जुड़ा है।
उदाहरण: कई स्रोतों से जानकारी लेकर अपना एक नया निबंध लिखना।
मूल्यांकन (Evaluation):
यह संज्ञान का उच्चतम स्तर है।
इसमें किसी विचार, समाधान या वस्तु के मूल्य का निर्णय लेना शामिल है।
उदाहरण: यह तय करना कि कौन सा तरीका समस्या सुलझाने के लिए सबसे बेहतर था।
2. संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development)
संज्ञानात्मक विकास का अर्थ है बच्चों के सोचने, तर्क करने और समस्या सुलझाने की क्षमता का समय के साथ विकसित होना। इसमें अवधान (Attention), स्मृति (Memory) और मेटा-संज्ञान (Metacognition) जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
विकास की प्रमुख अवस्थाएँ (पियाजे के संदर्भ में संक्षिप्त अवलोकन)
जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार चरणों में बांटा है:
संवेदी-गामक अवस्था (जन्म से $2$ वर्ष): इन्द्रियों और क्रियाओं के माध्यम से सीखना।
पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था ($2$ से $7$ वर्ष): भाषा का विकास और प्रतीकात्मक चिंतन।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ($7$ से $11$ वर्ष): तर्क का विकास लेकिन केवल मूर्त वस्तुओं तक।
अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ($11$ वर्ष से ऊपर): अमूर्त चिंतन और परिकल्पनात्मक तर्क।
बाल्यावस्था में संज्ञानात्मक विकास की विशेषताएं
क. प्रारंभिक बाल्यावस्था ($2$ से $6$ वर्ष):
प्रतीकात्मक चिंतन: बच्चे वस्तुओं को दर्शाने के लिए शब्दों और छवियों (Images) का उपयोग करने में निपुण हो जाते हैं। जैसे—झाड़ू को घोड़ा बनाकर खेलना।
भाषा विकास: शब्दावली तेजी से बढ़ती है। बच्चे बहुभाषी बनने की क्षमता रखते हैं।
अवधान (Attention): ध्यान देने की अवधि बढ़ जाती है। एक 6 साल का बच्चा किसी रोचक कार्य में 1 घंटे तक लगा रह सकता है।
केंद्रीकरण: बच्चे एक समय में किसी वस्तु के केवल एक पहलू पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।
ख. मध्य बाल्यावस्था ($6$ से $12$ वर्ष):
तार्किक चिंतन: बच्चा अब तर्क का उपयोग करने लगता है, लेकिन यह तर्क केवल उन चीजों पर लागू होता है जिन्हें वह देख या छू सकता है (मूर्त)।
शब्दार्थ समझ: वे शब्दों के पर्यायवाची, विलोम और मुहावरों के अर्थ समझने लगते हैं।
जिज्ञासा: बच्चे बाहरी दुनिया के बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं।
3. संज्ञानात्मक विकास के महत्वपूर्ण उपागम (Approaches)
संज्ञान केवल बढ़ने के बारे में नहीं है, बल्कि यह कैसे काम करता है, इसके कुछ मुख्य तंत्र हैं:
अवधान (Attention):
किसी विशिष्ट उद्दीपक पर चेतना को केंद्रित करना।
यदि कक्षा का वातावरण सकारात्मक है, तो बच्चे का अवधान बेहतर होगा और संज्ञान का विकास तेजी से होगा।
स्मृति (Memory):
वातावरण से प्राप्त सूचनाओं को मस्तिष्क में संग्रहीत (Store) करना और जरूरत पड़ने पर पुनः प्राप्त (Retrieve) करना।
यह सीखने का आधार है।
मेटा-संज्ञान (Metacognition):
इसे 'चिंतन के बारे में चिंतन' (Thinking about thinking) कहा जाता है।
जब एक छात्र यह जानता है कि उसे क्या याद है, क्या नहीं, और उसे कैसे सीखना है, तो वह मेटा-संज्ञान का उपयोग कर रहा है।
इसमें अपनी सीखने की प्रक्रियाओं की निगरानी और नियंत्रण शामिल है।
मस्तिष्क मानचित्रण (Brain Mapping/Mind Mapping):
यह सूचनाओं को दृश्य रूप (Visual form) में व्यवस्थित करने की तकनीक है।
मन के विचारों का चित्र बनाना। यह अवधारणाओं को समझने और याद रखने में बहुत प्रभावी है।
इसे 'मन की क्रियाशीलता का अनुसंधान' भी कहा जाता है।
4. संवेग (Emotion) : अर्थ और प्रकृति
'संवेग' शब्द अंग्रेजी के 'Emotion' का हिंदी रूपांतरण है, जो लैटिन भाषा के शब्द 'Emovere' से बना है। 'Emovere' का अर्थ है—'उत्तेजित होना' या 'हिला देना'।
अतः, संवेग व्यक्ति की वह 'उत्तेजित दशा' है जिसमें शारीरिक और मानसिक स्तर पर तीव्र परिवर्तन होते हैं। सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या—ये सभी संवेग के उदाहरण हैं।
प्रमुख परिभाषाएँ:
वुडवर्थ: "संवेग, व्यक्ति की उत्तेजित दशा है।"
मैकडूगल: "संवेग प्रकृति का हृदय है।"
जरसील्ड: "किसी भी प्रकार के आवेश आने, भड़क उठने तथा उत्तेजित हो जाने की अवस्था को संवेग कहते हैं।"
संवेग के घटक (Components of Emotion)
संवेग केवल एक एहसास नहीं है, यह तीन घटकों का मिश्रण है:
शारीरिक परिवर्तन (Physiological): जैसे हृदय गति बढ़ना, पसीना आना, रक्तचाप बढ़ना, पुतली का फैलना।
संज्ञानात्मक अनुभव (Cognitive): व्यक्ति का उस स्थिति के बारे में विचार। जैसे—"यह सांप खतरनाक है, मुझे डरना चाहिए।"
व्यवहारात्मक अभिव्यक्ति (Behavioral): भागना, चिल्लाना, चेहरे के हाव-भाव (जैसे क्रोध में आंखें लाल होना)।
संवेग की विशेषताएँ
व्यापकता: संवेग सभी प्राणियों में पाए जाते हैं और सार्वभौमिक होते हैं।
अस्थिरता: संवेग क्षणिक होते हैं; वे आते हैं और चले जाते हैं।
स्थानांतरण: संवेग एक स्थिति से दूसरी स्थिति में स्थानांतरित हो सकते हैं (जैसे—दफ्तर का गुस्सा घर पर निकालना)।
व्यक्तिगत भिन्नता: एक ही स्थिति में अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग संवेग महसूस कर सकते हैं।
5. संवेग के प्रमुख सिद्धांत (Theories of Emotion)
यह भाग CTET और उच्च स्तरीय परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। यह समझाता है कि संवेग कैसे उत्पन्न होते हैं।
1. जेम्स-लेंज सिद्धांत (James-Lange Theory)
मूल मंत्र: "हम डरते हैं क्योंकि हम कांपते हैं।"
इस सिद्धांत के अनुसार, पहले शारीरिक प्रतिक्रिया होती है, और उसके बाद हमें संवेग का अनुभव होता है।
क्रम: घटना $\rightarrow$ शारीरिक उत्तेजना (कांपना/भागना) $\rightarrow$ संवेग (डर)।
विलियम जेम्स का मानना था कि यदि आप भालू को देखकर भागते नहीं, तो आपको डर नहीं लगता। भागना (शारीरिक क्रिया) ही डर (संवेग) का कारण है।
2. कैनन-बार्ड सिद्धांत (Cannon-Bard Theory)
इस सिद्धांत ने जेम्स-लेंज का विरोध किया।
इसके अनुसार, शारीरिक उत्तेजना और संवेगात्मक अनुभव एक साथ (Simultaneously) होते हैं।
मस्तिष्क का 'थैलेमस' (Thalamus) भाग एक ही समय में शरीर को प्रतिक्रिया का संकेत भेजता है और मस्तिष्क को संवेग का अनुभव कराता है।
क्रम: घटना $\rightarrow$ एक साथ (शारीरिक उत्तेजना + संवेग)।
3. स्कैचर-सिंगर सिद्धांत / द्विकारक सिद्धांत (Schachter-Singer Two-Factor Theory)
यह सिद्धांत संवेग में संज्ञान (Cognition) की भूमिका पर जोर देता है।
इसके अनुसार, संवेग दो कारकों पर निर्भर करता है:
शारीरिक उत्तेजना (Physical Arousal)
संज्ञानात्मक लेबलिंग (Cognitive Labeling - उस उत्तेजना की व्याख्या)।
उदाहरण: यदि आपका दिल तेजी से धड़क रहा है और आप एक परीक्षा हॉल में हैं, तो आप इसे 'चिंता' कहेंगे। लेकिन यदि वही दिल तेजी से धड़क रहा है और आप जिम में हैं, तो आप इसे 'व्यायाम का प्रभाव' मानेंगे।
4. संज्ञान और संवेग का संबंध: दो दृष्टिकोण (Zajonc vs Lazarus)
यह वर्तमान परीक्षाओं का एक 'हॉट टॉपिक' है।
रॉबर्ट ज़जोंक (Robert Zajonc):
इनका मानना था कि संवेग और संज्ञान स्वतंत्र (Independent) हो सकते हैं।
हम किसी चीज़ के बारे में सोचे बिना भी उससे डर सकते हैं या उसे पसंद कर सकते हैं (जैसे—अचानक तेज आवाज सुनकर चौंकना)।
भाव (Affect) संज्ञान से पहले आ सकता है।
रिचर्ड लज़ारस (Richard Lazarus):
इनका मानना था कि संज्ञान और संवेग गुंथे हुए (Intertwined) हैं।
संवेग के लिए विचार या मूल्यांकन (Appraisal) आवश्यक है।
हम किसी स्थिति का मूल्यांकन करते हैं (क्या यह मेरे लिए अच्छा है या बुरा?), और उसी आधार पर संवेग उत्पन्न होता है।
निष्कर्ष (CTET के लिए): सामान्यतः प्रश्न आने पर उत्तर होता है कि संज्ञान और संवेग सन्निहित (Interwoven) हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं (द्विदिशीय संबंध)।
6. मैकडूगल की मूल प्रवृत्तियाँ और संवेग
विलियम मैकडूगल ने बताया कि मनुष्य का व्यवहार मूल प्रवृत्तियों (Instincts) से संचालित होता है। उन्होंने 14 मूल प्रवृत्तियाँ बताईं, और प्रत्येक मूल प्रवृत्ति एक विशिष्ट संवेग से जुड़ी होती है।
| क्र. | मूल प्रवृत्ति (Instinct) | संबंधित संवेग (Emotion) |
| 1. | पलायन (Escape) | भय (Fear) |
| 2. | युयुत्सा (Combat/Pugnacity) | क्रोध (Anger) |
| 3. | निवृत्ति/अपकर्षण (Repulsion) | घृणा (Disgust) |
| 4. | संतान की कामना (Parental) | वात्सल्य (Tenderness) |
| 5. | शरणागति (Appeal) | करुणा/दुःख (Distress) |
| 6. | काम-प्रवृत्ति (Sex) | कामुकता (Lust) |
| 7. | जिज्ञासा (Curiosity) | आश्चर्य (Wonder) |
| 8. | दैन्य (Submission) | आत्महीनता (Negative Self-feeling) |
| 9. | आत्मगौरव (Self-assertion) | आत्माभिमान (Positive Self-feeling) |
| 10. | सामूहिकता (Gregariousness) | एकाकीपन (Loneliness) |
| 11. | भोजनन्वेषण (Food seeking) | भूख (Hunger) |
| 12. | संग्रहण (Acquisition) | अधिकार भावना (Ownership) |
| 13. | रचनाधर्मिता (Constructiveness) | कृतिभाव/रचनात्मकता (Creativeness) |
| 14. | हास (Laughter) | आमोद (Amusement) |
7. संवेगात्मक बुद्धि (Emotional Intelligence - EQ)
सिर्फ बुद्धि लब्धि (IQ) जीवन में सफलता की गारंटी नहीं है। संवेगों को समझने और प्रबंधित करने की क्षमता को संवेगात्मक बुद्धि कहते हैं।
प्रतिपादक: यद्यपि यह शब्द पहले आया, लेकिन इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय डैनियल गोलमैन (Daniel Goleman) को जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है—"Emotional Intelligence: Why it can matter more than IQ".
संवेगात्मक बुद्धि के 5 मुख्य तत्व (गोलमैन के अनुसार):
आत्म-जागरूकता (Self-Awareness): अपनी भावनाओं को पहचानना और समझना।
आत्म-नियंत्रण (Self-Regulation): अपने आवेगों और संवेगों को नियंत्रित करना।
आत्म-अभिप्रेरणा (Self-Motivation): बाहरी पुरस्कारों के बिना लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना।
समानुभूति (Empathy): दूसरों की भावनाओं को समझना और महसूस करना (दूसरों के जूतों में पैर रखकर देखना)।
सामाजिक कौशल (Social Skills): रिश्तों को प्रभावी ढंग से निभाना।
8. शिक्षा में संवेगों का महत्व और निहितार्थ
एक शिक्षक के लिए यह समझना जरूरी है कि "एक भयभीत बच्चा सीख नहीं सकता।" संवेग सीखने की प्रक्रिया के उत्प्रेरक (Catalyst) या बाधक (Barrier) हो सकते हैं।
कक्षा में निहितार्थ:
सकारात्मक वातावरण: डर और दंड मुक्त वातावरण बनाने से बच्चे का संज्ञानात्मक विकास बेहतर होता है। यदि बच्चा तनाव में है, तो उसकी सीखने की क्षमता (संज्ञान) बाधित होगी।
रुचि जागृत करना: जिज्ञासा और आमोद जैसे संवेगों का उपयोग करके शिक्षक नीरस विषयों को भी रोचक बना सकते हैं।
व्यक्तित्व विकास: संवेगों के परिष्करण (Sublimation) द्वारा बच्चों को समाज के अनुकूल व्यवहार सिखाया जा सकता है।
तनाव प्रबंधन: परीक्षा के तनाव (Test Anxiety) का प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह 'येरक्स-डोडसन नियम' (Yerkes-Dodson Law) से भी जुड़ा है, जो कहता है कि मध्यम स्तर का तनाव प्रदर्शन को बढ़ाता है, लेकिन बहुत अधिक तनाव प्रदर्शन को गिरा देता है।
निष्कर्ष:
संज्ञान और संवेग एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक प्रभावी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया (Teaching-Learning Process) के लिए शिक्षक को केवल बच्चों के दिमाग (संज्ञान) को ही नहीं, बल्कि उनके दिल (संवेग) को भी छूना चाहिए। जैसा कि अरस्तु ने कहा था— "किसी को भी क्रोध आ सकता है, यह आसान है; परन्तु सही व्यक्ति से, सही मात्रा में, सही समय पर, सही उद्देश्य के लिए और सही तरीके से क्रोध करना आसान नहीं है।"
संज्ञान और संवेग
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