अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ और त्रुटियाँ

Sunil Sagare
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1. अधिगम (Learning): अर्थ, प्रकृति और क्षेत्र

अधिगम मनोविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ है। सामान्य भाषा में इसे 'सीखना' कहा जाता है, लेकिन शिक्षाशास्त्र में इसका अर्थ व्यापक है।

1.1 अधिगम की परिभाषा और अर्थ

  • मूल अर्थ: अधिगम का अर्थ है- सीखना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवनपर्यन्त चलती रहती है।

  • व्यावहारिक परिभाषा: अभ्यास, प्रशिक्षण और अनुभव के कारण व्यवहार में आया अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन ही अधिगम है।

  • अपवाद: बीमारी, थकान, परिपक्वता या नशीली दवाओं के कारण व्यवहार में आया परिवर्तन अधिगम नहीं कहलाता क्योंकि वह अस्थायी होता है।

  • क्रो एवं क्रो के अनुसार: "सीखना आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है।"

    • इसमें कार्यों को करने के नवीन तरीके सम्मिलित हैं।

    • यह व्यक्ति को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को पाने में समर्थ बनाती है।

  • गेट्स के अनुसार: "अनुभव द्वारा व्यवहार में रूपान्तर लाना ही अधिगम है।"

1.2 अधिगम की मुख्य विशेषताएँ

मनोवैज्ञानिकों द्वारा बताई गई विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • सार्वभौमिकता: अधिगम सार्वभौमिक होता है, यह सभी मनुष्यों, जीव-जंतुओं और कीड़ों में पाया जाता है।

  • निरन्तरता: अधिगम जीवनपर्यन्त चलता रहता है। यह "गर्भ से कब्र तक" चलने वाली प्रक्रिया है।

  • विकासात्मक: अधिगम विकास की प्रक्रिया है। व्यक्ति हर पल कुछ न कुछ सीखकर अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।

  • परिवर्तन: अधिगम परिवर्तन का माध्यम है। यह व्यवहार, सोच और व्यक्तित्व में बदलाव लाता है।

  • अनुकूलन: अधिगम अनुकूलन है। यह नई परिस्थितियों में समायोजन करने में मदद करता है।

  • अनुभवों का संगठन: अधिगम अनुभवों का संगठन है। यह केवल नए अनुभवों को जोड़ना नहीं, बल्कि पुराने अनुभवों को पुनर्गठित करना भी है।

  • उद्देश्यपूर्ण: सीखना लक्ष्य-निर्देशित होता है। बिना उद्देश्य के अधिगम प्रभावी नहीं होता।

  • सक्रियता: अधिगम एक सक्रिय प्रक्रिया है। सीखने वाले की सक्रिय भागीदारी के बिना सीखना संभव नहीं है।

1.3 अधिगम के डोमेन (पक्ष)

ब्लूम के वर्गीकरण के अनुसार अधिगम तीन पक्षों में होता है:

  1. संज्ञानात्मक: ज्ञान, समझ, और मानसिक कौशल (दिमाग से संबंधित)। जैसे- गणित के सवाल हल करना।

  2. भावात्मक: भावनाएं, मूल्य, और दृष्टिकोण (दिल से संबंधित)। जैसे- बड़ों का आदर करना, दया भाव।

  3. क्रियात्मक/मनोगत्यात्मक: शारीरिक कौशल (हाथ-पैर से संबंधित)। जैसे- लिखना, खेलना, साइकिल चलाना, नृत्य करना।


2. अधिगम के माध्यम (Medium of Learning)

मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम माध्यमों को दो मुख्य भागों में बाँटा है:

2.1 औपचारिक अधिगम

  • यह एक संरचित प्रणाली है।

  • स्थान: विद्यालय, कक्षा, विश्वविद्यालय, प्रशिक्षण संस्थान।

  • स्रोत: इसमें अध्यापक, पाठ्य-पुस्तक, प्रयोगशाला तथा खेल एवं अन्य विविध कार्यों में भाग लेकर सीखने की प्रक्रिया संपन्न होती है।

  • विशेषता: इसका एक निश्चित पाठ्यक्रम, समय-सारिणी और मूल्यांकन (परीक्षा) होता है। इसमें अनुशासन कठोर होता है।

  • प्रमाण: इसमें डिग्री या प्रमाण पत्र दिए जाते हैं।

2.2 अनौपचारिक अधिगम

  • यह जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है जो कहीं भी घटित हो सकती है।

  • स्थान: घर, खेल का मैदान, बाजार, यात्रा आदि।

  • स्रोत: परिवार, मित्र समूह, पड़ोसी तथा समाज।

  • महत्व: बालक समाज में स्थापित नियम, रूढ़ि, भाषा, व्यवहार तथा पूर्वाग्रह अनौपचारिक माध्यम से ही सीखता है।

  • उपयोगिता: सीखने की यह प्रक्रिया बालक को सामाजिक समायोजन में काफी सहायता करती है। इसमें कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं होता।

2.3 गैर-औपचारिक अधिगम

  • यह औपचारिक और अनौपचारिक के बीच का मार्ग है।

  • उदाहरण: दूरस्थ शिक्षा, मुक्त विद्यालय, पत्राचार पाठ्यक्रम।

  • इसमें पाठ्यक्रम तो निश्चित होता है, लेकिन कक्षा में उपस्थिति की कठोरता नहीं होती।


3. अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ (Alternative Conceptions)

यह CTET का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील टॉपिक है। इसे अक्सर 'भ्रांतियां' कहा जाता है, लेकिन बाल-केंद्रित शिक्षा में इसे 'वैकल्पिक अवधारणा' या 'सहज सिद्धांत' कहना अधिक सम्मानजनक और वैज्ञानिक है।

3.1 वैकल्पिक अवधारणा क्या है?

जब बच्चे स्कूल आते हैं, तो वे 'कोरी स्लेट' नहीं होते। वे अपने आसपास की दुनिया के बारे में अपने खुद के सिद्धांत लेकर आते हैं।

  • बच्चे अपने अनुभवों के आधार पर किसी घटना की व्याख्या करने के लिए जो विचार बना लेते हैं, वे वैज्ञानिक रूप से गलत हो सकते हैं, लेकिन बच्चे के लिए वे तर्कसंगत होते हैं।

  • उदाहरण:

    • "जब हम चलते हैं, तो चाँद/सूरज भी हमारे साथ चलता है।"

    • "सर्दी के दिनों में लोहे की छड़ लकड़ी से ज्यादा ठंडी होती है (जबकि तापमान समान हो सकता है)।"

    • "पौधे सजीव नहीं हैं क्योंकि वे इंसानों की तरह चलते-फिरते नहीं हैं।"

3.2 वैकल्पिक अवधारणाओं की विशेषताएँ

  1. स्वाभाविक प्रक्रिया: यह बच्चों के सोचने की प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा है, न कि उनकी मंदबुद्धिता का संकेत।

  2. प्रतिरोधी: ये अवधारणाएँ बहुत मजबूत होती हैं और आसानी से नहीं बदलतीं। केवल रटाने से ये दूर नहीं होतीं।

  3. शिक्षण का संसाधन: शिक्षक के लिए ये एक संसाधन हैं, क्योंकि ये बताती हैं कि बच्चा वर्तमान में क्या और कैसे सोच रहा है।

  4. तर्कपूर्ण: बच्चे की हर वैकल्पिक अवधारणा के पीछे उसका अपना एक 'तर्क' होता है, भले ही वह वयस्कों को गलत लगे।

3.3 त्रुटियाँ (Errors) और उनका शैक्षिक विश्लेषण

आधुनिक शिक्षाशास्त्र में त्रुटियों को 'पाप' या 'असफलता' नहीं माना जाता।

  • अधिगम का अंग: त्रुटियाँ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं।

  • अधिगम में अंतराल: त्रुटियाँ यह बताती हैं कि बच्चे की समझ और वैज्ञानिक तथ्य के बीच कहाँ अंतर रह गया है।

  • अंतर्दृष्टि: ये शिक्षकों को बच्चों की चिंतन प्रक्रिया को समझने की अंतर्दृष्टि देती हैं।

  • शिक्षक की भूमिका:

    • त्रुटियों पर बच्चों को डांटना या अपमानित नहीं करना चाहिए।

    • त्रुटियों को तुरंत लाल स्याही से काटकर सही उत्तर नहीं लिखना चाहिए।

    • इसके बजाय, 'पाड़' (Scaffolding), संकेत, प्रति-उदाहरण या चर्चा के माध्यम से उन्हें स्वयं अपनी गलती सुधारने का मौका देना चाहिए।

    • उदाहरण: यदि बच्चा कहता है "व्हेल एक मछली है", तो शिक्षक को पूछना चाहिए "मछली अंडे देती है या बच्चे? व्हेल क्या करती है?" इससे बच्चा स्वयं सही निष्कर्ष (स्तनधारी) तक पहुँचेगा।

3.4 संकल्पनात्मक परिवर्तन (Conceptual Change) के चरण

शिक्षक को वैकल्पिक अवधारणाओं को वैज्ञानिक अवधारणाओं में बदलने के लिए निम्न चरणों का पालन करना चाहिए:

  1. असंतुष्टि: बच्चे को प्रयोग या उदाहरण द्वारा महसूस कराएं कि उनका वर्तमान विचार किसी समस्या को समझाने में असमर्थ है (Cognitive Conflict पैदा करना)।

  2. बोधगम्यता: नई वैज्ञानिक अवधारणा सरल और समझ में आने योग्य भाषा में हो।

  3. व्यवहारिकता: नई अवधारणा तार्किक लगनी चाहिए और बच्चे के अनुभवों से मेल खानी चाहिए।

  4. फलदायकता: नई अवधारणा से अन्य समस्याओं का भी समाधान होना चाहिए।


4. व्यवहारवादी साहचर्य सिद्धान्त (Behaviorist Theories)

व्यवहारवाद मानता है कि सीखना उद्दीपन और अनुक्रिया के बीच संबंध का परिणाम है। इसमें मानसिक प्रक्रियाओं (सोचना, समझना) की जगह बाह्य व्यवहार और अभ्यास पर जोर दिया जाता है।

4.1 थॉर्नडाइक का 'प्रयास एवं त्रुटि' का सिद्धान्त

  • प्रतिपादक: ई. एल. थॉर्नडाइक (अमेरिका - पशु मनोविज्ञान के जनक)।

  • अन्य नाम: उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धान्त, संयोजनवाद, बन्ध सिद्धान्त।

4.1.1 प्रयोग

  • विषय: एक भूखी बिल्ली।

  • उपकरण: पहेली पेटी।

  • उद्दीपन: पिंजरे के बाहर रखा मछली का टुकड़ा (सुगंध और दृश्य)।

  • प्रक्रिया:

    • बिल्ली भूखी थी, मछली को देखकर उसने अनुक्रिया शुरू की।

    • उसने बाहर निकलने के लिए अनेक गलत प्रयास (उछलना-कूदना, जाली काटना) किए।

    • संयोगवश उसका पंजा खटके (लीवर) पर पड़ा और दरवाजा खुल गया।

    • बिल्ली ने मछली खा ली (इसे पुनर्बलन मिला)।

  • निष्कर्ष: बार-बार प्रयास करने पर गलत अनुक्रियाएं (त्रुटियाँ) कम होती गईं और सही अनुक्रिया के साथ संबंध स्थापित हो गया। अंततः वह बिना गलती के दरवाजा खोलना सीख गई।

4.1.2 थॉर्नडाइक के सीखने के नियम (अति महत्वपूर्ण)

थॉर्नडाइक ने कुल 8 नियम दिए (3 मुख्य + 5 गौण)।

A. मुख्य/प्राथमिक नियम:

  1. तत्परता का नियम: जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को सीखने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार (तत्पर) होता है, तो वह उसे शीघ्र सीख लेता है।

    • शैक्षिक निहितार्थ: पढ़ाने से पहले प्रस्तावना प्रश्न पूछकर बच्चों को मानसिक रूप से तैयार करना चाहिए।

  2. अभ्यास का नियम: "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।"

    • उपयोग का नियम: बार-बार दोहराने से ज्ञान स्थाई होता है।

    • अनुपयोग का नियम: अभ्यास छोड़ देने पर विस्मृति (भूलना) हो जाती है।

  3. प्रभाव का नियम: इसे 'संतोष/असंतोष का नियम' भी कहते हैं।

    • जिस कार्य को करने से सुख या पुरस्कार मिलता है, बच्चा उसे बार-बार करता है।

    • दण्ड या असफलता मिलने पर वह उस कार्य को छोड़ देता है।

B. सहायक/गौण नियम:

  1. बहु-अनुक्रिया का नियम: नई समस्या आने पर व्यक्ति कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं करता है।

  2. मानसिक स्थिति/मनोवृत्ति का नियम: सीखने वाले का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए।

  3. आंशिक क्रिया का नियम: विषयवस्तु को छोटे-छोटे भागों में विभाजित करके प्रस्तुत करना।

  4. सादृश्यता का नियम: पूर्व ज्ञान या पूर्व अनुभव का उपयोग नई समान परिस्थिति में करना। (जैसे- साइकिल चलाने वाला स्कूटर जल्दी सीखता है)।

  5. साहचर्यात्मक स्थानान्तरण: एक उद्दीपन के प्रति होने वाली अनुक्रिया को किसी दूसरे उद्दीपन के साथ जोड़ देना।

4.1.3 शैक्षिक महत्व

  • मंदबुद्धि बालकों के लिए यह सिद्धान्त वरदान है।

  • धैर्य और परिश्रम के गुणों का विकास।

  • गणित, विज्ञान और व्याकरण में अभ्यास के लिए उपयोगी।

  • शू-लेस बाँधना, टाई की गाँठ लगाना आदि कौशल इसी से सीखे जाते हैं।


4.2 पावलोव का शास्त्रीय अनुबन्धन का सिद्धान्त

  • प्रतिपादक: इवान पावलोव (रूस - शरीर विज्ञानी, 1904 में नोबेल पुरस्कार)।

  • अन्य नाम: अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त, सम्बन्ध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त, $S$-Type Conditioning.

4.2.1 प्रयोग

  • विषय: कुत्ता।

  • प्रक्रिया:

    1. चरण 1 (पूर्व-अनुबंधन): कुत्ते को भोजन दिया $\rightarrow$ लार टपकी (स्वाभाविक क्रिया)।

    2. चरण 2 (अनुबन्धन के दौरान): घण्टी बजाई + तुरंत (कुछ सेकंड में) भोजन दिया $\rightarrow$ लार टपकी। इसे कई बार दोहराया गया।

    3. चरण 3 (अनुबन्धन के बाद): केवल घण्टी बजाई (भोजन नहीं दिया) $\rightarrow$ फिर भी कुत्ते ने लार टपकाई।

4.2.2 तकनीकी शब्दावली (परीक्षा उपयोगी)

  • भोजन: अननुबन्धित उद्दीपन (UCS - Unconditioned Stimulus)।

  • लार (भोजन देखकर): अननुबन्धित अनुक्रिया (UCR - Unconditioned Response)।

  • घण्टी: अनुबन्धित उद्दीपन (CS - Conditioned Stimulus)।

  • लार (घण्टी सुनकर): अनुबन्धित अनुक्रिया (CR - Conditioned Response)।

  • निष्कर्ष: जब तटस्थ उद्दीपन (घण्टी) को स्वाभाविक उद्दीपन (भोजन) के साथ बार-बार जोड़ा जाता है, तो तटस्थ उद्दीपन भी स्वाभाविक प्रतिक्रिया उत्पन्न करने लगता है।

4.2.3 प्रमुख संप्रत्यय

  1. विलोपन: यदि लम्बे समय तक केवल घण्टी बजाई जाए और भोजन न दिया जाए, तो कुत्ता लार टपकाना बंद कर देगा। (सीखा हुआ व्यवहार समाप्त होना)।

  2. स्वतः पुनर्लाभ: विलोपन के कुछ समय बाद यदि अचानक घण्टी बजाई जाए, तो बिना प्रशिक्षण के ही हल्की सी लार फिर आ सकती है।

  3. उद्दीपन सामान्यीकरण: मिलती-जुलती आवाज़ों (जैसे- मंदिर की घंटी या दूसरी घंटी) पर भी लार टपकाना।

    • उदाहरण: बच्चा सफेद कुत्ते से डरता है, तो वह सफेद बिल्ली या सफेद खरगोश से भी डरने लगता है।

  4. उद्दीपन विभेदन: केवल मूल घंटी और दूसरी घंटी के बीच अंतर करना सीख जाना।

4.2.4 शैक्षिक महत्व

  • स्वभाव निर्माण: अच्छी आदतों का निर्माण (सफाई, समयपालन)।

  • भय निवारण: बच्चों के मन से अकारण भय निकालने के लिए (वि-अनुबंधन)।

  • अनुशासन: कक्षा में शिक्षक के आने पर बच्चों का चुप हो जाना।

  • दृश्य-श्रव्य सामग्री: शिक्षण सहायक सामग्री का प्रयोग इसी सिद्धान्त पर आधारित है।


4.3 स्किनर का क्रिया-प्रसूत/सक्रिय अनुबन्धन सिद्धान्त

  • प्रतिपादक: बी. एफ. स्किनर (अमेरिका)।

  • अन्य नाम: साधनात्मक अनुबन्धन, नैमित्तिक अनुबंधन, $R-S$ Theory.

4.3.1 प्रयोग

  • विषय: सफेद चूहा और कबूतर।

  • उपकरण: स्किनर बॉक्स।

  • प्रक्रिया:

    • चूहा बॉक्स में स्वतंत्रतापूर्वक इधर-उधर घूमता है (सक्रिय व्यवहार)।

    • अचानक उसका पैर लीवर पर पड़ता है।

    • खट की आवाज़ होती है और प्याली में भोजन (पुनर्बलन) आ जाता है।

    • चूहा यह समझ जाता है कि लीवर दबाने से भोजन मिलता है।

  • निष्कर्ष: यहाँ प्राणी पहले अनुक्रिया (Action) करता है, उसके बाद उसे उद्दीपन/पुनर्बलन (Reward) मिलता है।

4.3.2 पुनर्बलन (Reinforcement) के प्रकार

स्किनर के सिद्धान्त का आधार 'पुनर्बलन' है, उद्दीपन नहीं।

  1. धनात्मक पुनर्बलन: पुरस्कार, प्रशंसा, भोजन, टॉफी। इससे व्यवहार के दोहराए जाने की संभावना बढ़ती है।

  2. ऋणात्मक पुनर्बलन: कष्टदायक उद्दीपन को हटाना।

    • उदाहरण: तेज धूप (कष्ट) से बचने के लिए चश्मा लगाना। ठंड से बचने के लिए स्वेटर पहनना।

    • नोट: ऋणात्मक पुनर्बलन भी व्यवहार को बढ़ाता है।

  3. दण्ड: इसका उद्देश्य अवांछित व्यवहार को घटाना या रोकना है। स्किनर ने दण्ड को सीखने के लिए प्रभावी नहीं माना।

4.3.3 पुनर्बलन अनुसूचियां

  • सतत पुनर्बलन: हर सही क्रिया पर इनाम। (शुरुआत में सीखने के लिए अच्छा, लेकिन विलोपन जल्दी होता है)।

  • आंशिक पुनर्बलन: कभी-कभी इनाम देना।

    • यह सबसे प्रभावी होता है। इसमें सीखा गया व्यवहार जल्दी खत्म नहीं होता।

    • उदाहरण: जुआ, लॉटरी, मछली पकड़ना।

4.3.4 शैक्षिक महत्व

  • अभिक्रमित अनुदेशन: कंप्यूटर आधारित शिक्षण और सेल्फ-लर्निंग मटीरियल इसी पर आधारित है।

  • तत्काल प्रतिपुष्टि: परिणामों का ज्ञान होने से बच्चे जल्दी सीखते हैं।

  • शब्द भंडार: बच्चों के शब्द भंडार में वृद्धि के लिए उपयोगी।

  • व्यवहार परिमार्जन: समस्यात्मक बालकों के व्यवहार में सुधार करना।


5. संज्ञानात्मक व क्षेत्र संगठनात्मक सिद्धान्त (Cognitive Theories)

ये सिद्धान्त मानते हैं कि सीखना केवल यांत्रिक नहीं है, बल्कि इसमें सूझ, बुद्धि, प्रत्यक्षीकरण और समझ का उपयोग होता है।

5.1 कोहलर का अन्तर्दृष्टि/सूझ का सिद्धान्त

  • सम्प्रदाय: गेस्टाल्टवाद (1920, जर्मनी)।

  • गेस्टाल्ट का अर्थ: यह जर्मन शब्द है जिसका अर्थ है- 'समग्र', 'पूर्णाकार', 'पैटर्न' या 'सम्पूर्ण आकृति'।

  • नारा: "पूर्ण अपने अंशों के योग से बड़ा होता है।"

  • मुख्य मनोवैज्ञानिक: मैक्स वर्दीमर (जनक), कोहलर (प्रयोगकर्ता), कोफ्का (सहयोगी), कर्ट लेविन।

5.1.1 प्रयोग

  • विषय: 'सुल्तान' नामक चिम्पैंजी।

  • स्थान: केनरी द्वीप।

  • प्रयोग 1 (बॉक्स समस्या): पिंजरे की छत पर केले लटके थे। सुल्तान का हाथ नहीं पहुँचा। कमरे में बक्से थे। उसने पहले उछल-कूद की (प्रयास-त्रुटि)। फिर वह कोने में बैठकर सोचने लगा। अचानक 'सूझ' (Aha! Moment) आई। उसने बक्सों को एक के ऊपर एक रखा और केले प्राप्त कर लिए।

  • प्रयोग 2 (छड़ी समस्या): केले पिंजरे के बाहर थे। अंदर दो छोटी छड़ियाँ थीं जो आपस में जुड़ सकती थीं। सुल्तान ने खेल-खेल में उन्हें जोड़ा और केले खींच लिए।

5.1.2 निष्कर्ष एवं शैक्षिक महत्व

  • सीखना अचानक होता है, धीरे-धीरे नहीं।

  • समग्रता: शिक्षक को पाठ पढाने से पहले उसका पूरा खाका (Synopsis) या सारांश प्रस्तुत करना चाहिए।

  • पूर्ण से अंश की ओर: यह शिक्षण सूत्र इसी सिद्धान्त की देन है।

  • उच्च स्तरीय अधिगम: यह सिद्धान्त रटने का विरोध करता है। यह विज्ञान, गणित और साहित्य जैसे विषयों के लिए उपयोगी है जहाँ तर्क और कल्पना की जरूरत होती है।

  • समस्या समाधान: यह विधि बच्चों को समस्या निवारक बनाती है।


5.2 कर्ट लेविन का क्षेत्र सिद्धान्त

  • प्रतिपादक: कर्ट लेविन (सामाजिक मनोविज्ञान के जनक)।

  • आधार: वातावरण में व्यक्ति की स्थिति।

  • सूत्र: $B = f(P, E)$

    • व्यवहार ($B$) व्यक्ति ($P$) और उसके मनोवैज्ञानिक वातावरण ($E$) का परिणाम (फलन $f$) है।

5.2.1 मुख्य शब्दावली

  1. जीवन विस्तार (Life Space): वह सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक जगत जिसमें व्यक्ति रहता है। इसमें व्यक्ति, उसके लक्ष्य, विचार और वातावरण शामिल हैं।

  2. सदिश (Vector): वह बल जो व्यक्ति को लक्ष्य की ओर धकेलता है या दूर करता है।

  3. कर्षण (Valence): लक्ष्य का आकर्षण।

    • सकारात्मक: जो अपनी ओर खींचे (पुरस्कार, भोजन, नौकरी)।

    • नकारात्मक: जिससे व्यक्ति दूर भागे (दण्ड, अपमान, आग)।

  4. अवरोध (Barrier): लक्ष्य प्राप्ति के रास्ते में आने वाली बाधाएं।

5.2.2 शैक्षिक महत्व

  • शिक्षक को छात्र की क्षमताओं, आकांक्षा स्तर और उसके वातावरण को समझना चाहिए।

  • प्रेरणा (Motivation) सीखने के लिए केंद्रीय तत्व है।

  • पुरस्कार और दण्ड का प्रयोग सोच-समझकर करना चाहिए।


6. अन्य महत्वपूर्ण अधिगम दृष्टिकोण

6.1 कार्ल रोजर्स का अनुभवजन्य अधिगम

कार्ल रोजर्स (मानवतावादी) ने अधिगम को दो प्रकारों में बाँटा:

  1. संज्ञानात्मक अधिगम: केवल ज्ञान प्राप्ति, जैसे इतिहास की तारीखें या शब्दावली याद करना। यदि इसका जीवन में उपयोग नहीं है, तो यह निरर्थक है।

  2. अनुभवजन्य अधिगम:

    • यह 'करके सीखने' पर आधारित है।

    • इसमें व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि और तल्लीनता होती है।

    • यह स्व-प्रेरित होता है।

    • मूल्यांकन सीखने वाला स्वयं करता है, शिक्षक नहीं।

6.2 अल्बर्ट बंडूरा का सामाजिक अधिगम सिद्धान्त

  • अन्य नाम: प्रेक्षणात्मक अधिगम, अनुकरण, मॉडलिंग।

  • विचार: बच्चे दूसरों (मॉडल) को देखकर सीखते हैं।

  • प्रयोग: बोबो डॉल प्रयोग। (बच्चों ने फिल्म में गुड़िया को पिटते देखा, तो उन्होंने भी गुड़िया के साथ हिंसा की)।

  • अधिगम के 4 चरण (क्रमबद्ध):

    1. अवधान (Attention): व्यवहार को ध्यान से देखना।

    2. धारण (Retention): व्यवहार को स्मृति में सुरक्षित रखना।

    3. पुनरुत्पादन (Reproduction): वैसा ही व्यवहार करके दिखाना।

    4. अभिप्रेरणा (Motivation): यदि व्यवहार पर पुरस्कार मिले, तो उसे दोहराना।

6.3 टॉलमैन का चिन्ह-गेस्टाल्ट सिद्धान्त

  • इसे अव्यक्त अधिगम (Latent Learning) भी कहते हैं।

  • विचार: सीखना हमेशा व्यवहार में तुरंत दिखाई नहीं देता।

  • संज्ञानात्मक मानचित्र: चूहे ने भूलभुलैया का रास्ता दिमाग में याद कर लिया (मानचित्र बना लिया), लेकिन उसका प्रदर्शन तब किया जब उसे भोजन (लक्ष्य) मिला।

  • निष्कर्ष: पुरस्कार सीखने के लिए ज़रूरी नहीं, लेकिन प्रदर्शन (Performance) के लिए ज़रूरी है।


7. अधिगम वक्र और पठार

सीखने की गति हमेशा एक समान नहीं होती। इसे ग्राफ पर दर्शाना अधिगम वक्र कहलाता है।

7.1 वक्र के प्रकार

  1. समान निष्पादन वक्र (Straight Line): सीखने की गति लगातार एक समान रहती है। (व्यावहारिक रूप से असंभव)।

  2. उन्नतोदर/ऋणात्मक वक्र (Convex): शुरुआत में गति तेज, बाद में धीमी। (परीक्षा के दिनों में या कठिन विषय सीखते समय)।

  3. नतोदर/धनात्मक वक्र (Concave): शुरुआत में गति धीमी, बाद में अभ्यास से तेज। (टाइपिंग सीखना, संगीत सीखना)।

  4. मिश्रित/S-आकार का वक्र: शुरुआत में धीमी, फिर तेज, फिर अंत में धीमी। यह सबसे सामान्य वक्र है।

7.2 अधिगम का पठार (Plateau of Learning)

सीखने की प्रक्रिया में एक ऐसी स्थिति आती है जब उन्नति बिल्कुल रुक जाती है। ग्राफ ऊपर जाने के बजाय सीधा (सपाट) हो जाता है।

  • कारण: थकान, रुचि की कमी, प्रेरणा का अभाव, गलत शिक्षण विधि, पुरानी आदतों और नई आदतों में संघर्ष।

  • निराकरण: विश्राम देना, शिक्षण विधि बदलना, प्रेरित करना, उचित वातावरण देना।


8. अधिगम स्थानान्तरण (Transfer of Learning)

एक परिस्थिति में सीखा गया ज्ञान, कौशल या आदत दूसरी परिस्थिति में कैसा प्रभाव डालती है, इसे अधिगम स्थानान्तरण कहते हैं।

  1. धनात्मक स्थानान्तरण: जब पूर्व ज्ञान नए ज्ञान में मदद करे।

    • उदाहरण: हिंदी सीखने के बाद संस्कृत सीखना आसान है। साइकिल चलाने के बाद बाइक चलाना।

  2. ऋणात्मक स्थानान्तरण: जब पूर्व ज्ञान बाधा बने।

    • उदाहरण: भारत में ड्राइविंग सीखने के बाद अमेरिका (जहाँ बाएं की जगह दाएं चलते हैं) में ड्राइविंग करना।

  3. शून्य स्थानान्तरण: जब पूर्व ज्ञान का कोई प्रभाव न पड़े।

    • उदाहरण: कबीर के दोहे याद करने से कार चलाने के कौशल पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

  4. द्विपार्श्विक स्थानान्तरण: शरीर के एक अंग का कौशल दूसरे अंग में जाना।

    • उदाहरण: दाएं हाथ से लिखने वाले का बाएं हाथ से लिखने का प्रयास करना।


9. रचनावाद और कक्षा-कक्ष (Constructivism)

CTET परीक्षा और NCF 2005 का मूल आधार रचनावाद है।

  • मूल मंत्र: ज्ञान का 'हस्तांतरण' (Transfer) नहीं होता, बल्कि बच्चे ज्ञान की 'रचना' (Construction) करते हैं।

  • जीन पियाजे (संज्ञानात्मक रचनावाद):

    • बच्चे "नन्हे वैज्ञानिक" हैं।

    • वे भौतिक जगत के साथ अंतःक्रिया करके ज्ञान बनाते हैं।

    • समायोजन: जब पुरानी अवधारणा गलत साबित हो, तो उसमें बदलाव करना।

  • लेव वाइगोत्स्की (सामाजिक रचनावाद):

    • सीखना एक सामाजिक गतिविधि है।

    • ZPD (समीपस्थ विकास का क्षेत्र): वह क्षेत्र जहाँ बच्चा बड़ों की मदद से कार्य कर सकता है।

    • पाड़ (Scaffolding): बड़ों द्वारा दी गई अस्थायी मदद (संकेत, इशारा, आधा हल किया सवाल)।

शिक्षक की भूमिका (रचनावादी कक्षा में):

  • सुविधादाता: शिक्षक ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि सीखने में मदद करने वाला है।

  • सक्रिय अधिगम: चर्चा, समूह कार्य, प्रोजेक्ट और क्षेत्र भ्रमण को बढ़ावा देना।

  • त्रुटि मित्र: त्रुटियों को सीखने के अवसर के रूप में देखना।

  • पूर्व ज्ञान से जुड़ाव: नई अवधारणा को बच्चे के दैनिक जीवन और पूर्व अनुभवों से जोड़ना।



अधिगम की वैकल्पिक अवधारणाएँ और त्रुटियाँ

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