1. नए राजवंशों का उदय
सातवीं सदी के बाद कई नए राजवंश सत्ता में आए। इनकी उत्पत्ति और शक्ति प्रदर्शन की प्रक्रिया निम्नलिखित थी:
सामंतों की बदलती स्थिति
आरंभ में ये राजा के अधीन होते थे। इनका काम राजा के लिए उपहार लाना और सैन्य सहायता देना था।
जब सामंत अधिक सत्ता और संपदा हासिल कर लेते थे, तो वे खुद को महा-सामंत या महामंडलेश्वर (पूरे मंडल का महान स्वामी) घोषित कर देते थे।
कभी-कभी वे अपने स्वामी (राजा) के आधिपत्य को अस्वीकार कर स्वतंत्र हो जाते थे।
दंतिदुर्ग और राष्ट्रकूटों का उदय
दक्कन में राष्ट्रकूट, कर्नाटक के चालुक्यों के अधीन थे।
आठवीं सदी के मध्य में एक राष्ट्रकूट प्रधान दंतिदुर्ग ने अपने चालुक्य स्वामी की अधीनता से इनकार कर दिया।
दंतिदुर्ग ने एक विशेष अनुष्ठान किया जिसे हिरण्यगर्भ (शाब्दिक अर्थ: सोने का गर्भ) कहा जाता है।
महत्व: यह माना जाता था कि इस अनुष्ठान को ब्राह्मणों की सहायता से संपन्न करने पर, 'जन्मना क्षत्रिय' न होते हुए भी यजमान 'क्षत्रिय' के रूप में दोबारा क्षत्रित्व प्राप्त कर सकता था।
अन्य उदाहरण (ब्राह्मण से शासक)
कुछ ब्राह्मणों ने अपने परंपरागत पेशे को छोड़कर शस्त्र अपनाए और राज्य स्थापित किए:
कदंब मयूरशर्मन: इन्होंने कर्नाटक में अपना राज्य स्थापित किया।
गुर्जर-प्रतिहार हरिश्चंद्र: इन्होंने राजस्थान में अपना राज्य कायम किया।
2. राज्यों में प्रशासन (Administration)
नए राजाओं ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए भारी-भरकम उपाधियाँ धारण कीं:
महाराजाधिराज: राजाओं का राजा।
त्रिभुवन-चक्रवर्तिन: तीन भुवनों का स्वामी।
संसाधन और कर (Taxation)
राजा अपनी व्यवस्था चलाने, मंदिरों का निर्माण करने और युद्ध लड़ने के लिए संसाधन उत्पादकों (किसानों, पशुपालकों, कारीगरों) से इकट्ठा करते थे।
चोल साम्राज्य के अभिलेखों में करों के प्रकार:
तमिलनाडु में शासन करने वाले चोल वंश के अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है (CTET में यह बार-बार पूछा जाता है):
वेट्टी (Vetti): यह नकद के रूप में नहीं, बल्कि जबरन श्रम (Forced Labor) के रूप में लिया जाने वाला कर था।
कडमाई (Kadamai): यह भू-राजस्व (Land Revenue) था।
इसके अलावा मकान पर छाजन डालने, खजूर या ताड़ के पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी के इस्तेमाल पर, और पारिवारिक संपत्ति का उत्तराधिकार हासिल करने के लिए भी कर लगते थे।
3. प्रशस्तियाँ और भूमि अनुदान
प्रशस्ति (Prashasti): यह एक विशेष प्रकार का अभिलेख होता है जो राजाओं की प्रशंसा में लिखा जाता था। यह जरूरी नहीं कि ये पूर्णतः सत्य हों, लेकिन ये बताते हैं कि राजा खुद को कैसा दर्शाना चाहते थे (जैसे- शूरवीर या विजयी योद्धा)।
ये विद्वान ब्राह्मणों द्वारा रची जाती थीं।
नागभट्ट की प्रशस्ति:
संस्कृत में लिखी गई और ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में पाई गई एक प्रशस्ति में प्रतिहार नरेश नागभट्ट के कारनामों का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि आंध्र, सैंधव (सिंध), विदर्भ (महाराष्ट्र) और कलिंग (ओडिशा) के राजा उनके आगे धराशायी हो गए थे।
भूमि अनुदान (Land Grants):
राजा ब्राह्मणों को भूमि अनुदान से पुरस्कृत करते थे।
ये अनुदान ताम्रपत्रों (Copper Plates) पर अभिलिखित होते थे। इन ताम्रपत्रों पर राजसी मुहर लगी होती थी ताकि यह प्रमाणित हो सके कि यह आधिकारिक दस्तावेज है।
कल्हण और राजतरंगिणी:
12वीं सदी में कल्हण नाम के एक रचनाकार ने कश्मीर के राजाओं के इतिहास पर एक वृहद संस्कृत काव्य लिखा, जिसे राजतरंगिणी कहा जाता है।
कल्हण ने अपना वृत्तांत लिखने के लिए शिलालेखों, दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शियों के वर्णन और पहले के इतिहासों का उपयोग किया।
अंतर: प्रशस्तियों के विपरीत, कल्हण अक्सर शासकों और उनकी नीतियों के बारे में आलोचनात्मक रुख अपनाता था।
4. धन के लिए युद्ध (Warfare for Wealth)
शासक न केवल अपने क्षेत्र पर नियंत्रण रखते थे, बल्कि दूसरे क्षेत्रों पर भी अधिकार करने का प्रयास करते थे।
त्रिपक्षीय संघर्ष (The Tripartite Struggle)
गंगा घाटी में स्थित कन्नौज नगर सदियों तक आकर्षण का केंद्र था।
कन्नौज पर नियंत्रण को लेकर तीन प्रमुख राजवंशों के बीच लंबा संघर्ष चला। इतिहासकार इसे 'त्रिपक्षीय संघर्ष' कहते हैं।
तीन पक्ष:
गुर्जर-प्रतिहार
राष्ट्रकूट
पाल
सुल्तान महमूद गजनवी (अफगानिस्तान)
शासन काल: $997$ से $1030$ ई. तक।
उसने मध्य एशिया, ईरान और उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी हिस्से तक नियंत्रण किया।
उद्देश्य: वह भारत के संपन्न मंदिरों को लूटने आता था। उसका सबसे प्रसिद्ध आक्रमण गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर था।
अल-बरूनी: महमूद ने अपने द्वारा जीते गए लोगों का लेखा-जोखा लिखने के लिए अल-बरूनी नामक विद्वान को नियुक्त किया।
उसकी अरबी कृति किताब-अल-हिंद (Kitab-al-Hind) इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
अल-बरूनी ने इसे तैयार करने के लिए संस्कृत के विद्वानों से परामर्श किया था।
चाहमान (चौहान)
ये दिल्ली और अजमेर के आसपास के क्षेत्र पर शासन करते थे।
सबसे प्रसिद्ध चाहमान शासक पृथ्वीराज तृतीय ($1168-1192$) थे।
तराइन के युद्ध:
$1191$ (प्रथम युद्ध): पृथ्वीराज ने अफगान शासक सुल्तान मुहम्मद गोरी को हराया।
$1192$ (द्वितीय युद्ध): मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज को हरा दिया। यह भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था।
5. चोल साम्राज्य (The Cholas)
उदय: कावेरी डेल्टा में 'मुट्टरियार' नाम से प्रसिद्ध एक छोटे से परिवार की सत्ता थी। वे कांचीपुरम के पल्लव राजाओं के अधीनस्थ थे। उरैयार के चोलवंशीय विजयालय ने 9वीं सदी के मध्य में मुट्टरियारों को हराकर डेल्टा पर कब्जा जमाया।
उसने वहाँ तंजावुर शहर और निशुंभसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।
प्रमुख शासक
राजराज प्रथम: सबसे शक्तिशाली चोल शासक माने जाते हैं। ($985$ में राजा बने)। उन्होंने प्रशासन का पुनर्गठन किया।
राजेंद्र प्रथम: राजराज के पुत्र।
इन्होंने अपनी नौसेना (Navy) का उपयोग करके श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों पर अभियान चलाए।
इन्होंने गंगा घाटी तक अभियान चलाया, इसलिए इन्हें गंगईकोंडचोल की उपाधि मिली।
नई राजधानी का नाम गंगईकोंडचोलपुरम रखा।
भव्य मंदिर और कांस्य मूर्तिकला
राजराज और राजेंद्र प्रथम द्वारा बनवाए गए तंजावुर और गंगईकोंडचोलपुरम के मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से चमत्कार हैं।
चोल मंदिर अक्सर अपने आसपास विकसित होने वाली बस्तियों के केंद्र बन गए। ये शिल्प उत्पादन के केंद्र थे।
मंदिरों के साथ केवल पुजारी नहीं, बल्कि मालाकार, बावर्ची, मेहतर, संगीतकार और नर्तक भी जुड़े होते थे।
कांस्य प्रतिमाएँ: चोल कांस्य प्रतिमाएँ (विशेषकर नटराज की प्रतिमा) संसार की सबसे उत्कृष्ट कांस्य प्रतिमाओं में गिनी जाती हैं। ये 'लुप्त मोम तकनीक' (Lost Wax Technique) से बनाई जाती थीं।
कृषि और सिंचाई
कावेरी नदी बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले कई छोटी-छोटी शाखाओं में बंट जाती है। ये शाखाएँ किनारों पर उपजाऊ मिट्टी जमा करती हैं, जो चावल की खेती के लिए आदर्श है।
सिंचाई के लिए कृत्रिम साधन अपनाए गए: कुएँ खोदे गए और विशाल सरोवर (Tanks) बनाए गए।
जल के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए स्लुइस गेट (Sluice gate) बनाए गए।
6. चोल प्रशासन (सूक्ष्म अवलोकन) - CTET का सबसे महत्वपूर्ण भाग
चोलों का प्रशासन बहुत ही संगठित था।
प्रशासनिक इकाइयाँ (Hierarchy)
उर (Ur): किसानों की बस्तियाँ 'उर' कहलाती थीं। सिंचित खेती के कारण ये बहुत समृद्ध हो गई थीं।
नाडू (Nadu): गाँवों के समूह को 'नाडू' कहा जाता था।
ग्राम परिषद और नाडू मिलकर न्याय करने और कर वसूलने जैसे प्रशासनिक कार्य करते थे।
वलनाडू (Valanadu): यह नाडू से बड़ी इकाई होती थी (जिले के समान)।
वेल्लाल जाति का प्रभाव
वेल्लाल जाति के धनी किसानों का 'नाडू' के कामकाज पर अच्छा नियंत्रण था।
चोल राजाओं ने धनी भूस्वामियों को कुछ उपाधियाँ दीं, जैसे:
मुवेंदवेलन (Muvendavelan): तीन राजाओं को अपनी सेवाएँ प्रदान करने वाला किसान (वेलन)।
अरैयार (Araiyar): प्रधान।
भूमि के प्रकार (चोल अभिलेखों के अनुसार)
वेल्लनवगाई: गैर-ब्राह्मण किसान स्वामी की भूमि।
ब्रह्मदेय: ब्राह्मणों को उपहार में दी गई भूमि।
शालाभोग: किसी विद्यालय के रखरखाव के लिए भूमि।
देवदान / तिरुनमट्टक्कनी: मंदिर को उपहार में दी गई भूमि।
पल्लिच्चंदम: जैन संस्थानों को दान दी गई भूमि।
नगरम् (Nagaram)
व्यापारियों के संघ को अक्सर नगरम् कहा जाता था। ये शहरों में प्रशासनिक कार्य भी करते थे।
7. सभा (Sabha) और समितियाँ
ब्राह्मणों की बस्तियों (ब्रह्मदेय) का कामकाज एक सभा द्वारा संभाला जाता था।
उत्तरमेरूर अभिलेख: तमिलनाडु के चिंगलपुट जिले के उत्तरमेरूर से प्राप्त अभिलेख में सभा के गठन का विस्तार से वर्णन है।
सभा अपना काम समितियों (वारियम) के जरिए करती थी (जैसे- सिंचाई समिति, उद्यान समिति, मंदिर समिति)।
सदस्यों का चुनाव लॉटरी प्रणाली से होता था (ताड़ के पत्तों पर नाम लिखकर, एक छोटे लड़के द्वारा पर्ची निकलवाकर)।
सभा का सदस्य बनने की योग्यता (Qualifications)
उत्तरमेरूर अभिलेख के अनुसार, सभा की सदस्यता के लिए इच्छुक लोगों को:
ऐसी भूमि का स्वामी होना चाहिए जहाँ से भू-राजस्व वसूला जाता है।
उनके पास अपना घर होना चाहिए।
उनकी उम्र $35$ से $70$ वर्ष के बीच होनी चाहिए।
उन्हें वेदों का ज्ञान होना चाहिए।
उन्हें प्रशासनिक मामलों की अच्छी जानकारी होनी चाहिए और ईमानदार होना चाहिए।
यदि कोई पिछले 3 सालों में किसी समिति का सदस्य रहा है, तो वह किसी और समिति का सदस्य नहीं बन सकता।
जिसने अपने या अपने संबंधियों के खाते (Accounts) जमा नहीं कराए हैं, वह चुनाव नहीं लड़ सकता।
8. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Miscellaneous Facts)
टांग वंश (चीन): जिस समय भारत में चोल साम्राज्य था, उसी समय चीन में टांग राजवंश ($7$वीं से $10$वीं सदी) का शासन था। वहां नौकरशाही परीक्षा के माध्यम से भर्ती की जाती थी, जो सभी के लिए खुली थी। यह व्यवस्था $1911$ तक कायम रही।
साम्राज्य का विस्तार: राजेंद्र प्रथम की नौसेना इतनी शक्तिशाली थी कि उसने दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीविजय साम्राज्य) तक के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
नए राजा और उनके राज्य
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