मध्यकालीन इतिहास: भूमिका

Sunil Sagare
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मध्यकालीन इतिहास: भूमिका (एक हजार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तन)

इतिहास केवल राजाओं और रानियों की कहानियाँ नहीं है, बल्कि यह समय के साथ समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति में आए बदलावों का अध्ययन है। मध्यकाल का अध्ययन सामान्यतः $700$ ई. से $1750$ ई. तक के लगभग एक हजार वर्षों के कालखंड को कवर करता है। इस दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक परिवर्तन हुए।


1. मानचित्र और मानचित्रकार (Cartography in History)

इतिहासकार जब बीते युगों के दस्तावेजों, नक्शों और लेखों का अध्ययन करते हैं, तो उनके लिए उन सूचनाओं के संदर्भों का ध्यान रखना जरूरी होता है। समय के साथ सूचनाओं के संदर्भ बदलते हैं।

अल-इदरीसी का मानचित्र:

  • समय: $1154$ ई. (बारहवीं सदी)।

  • निर्माता: अरब भूगोलवेत्ता अल-इदरीसी।

  • विशेषता: अल-इदरीसी द्वारा बनाए गए दुनिया के नक्शे में भारतीय उपमहाद्वीप को भूमि से समुद्र की ओर दिखाया गया है।

  • दिशा भ्रम: इस नक्शे में दक्षिण भारत उस जगह है जहाँ आज हम उत्तर भारत को देखते हैं। श्रीलंका का द्वीप ऊपर की तरफ बना हुआ है।

  • स्थानों के नाम: जगहों के नाम अरबी भाषा में चिह्नित हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश का 'कन्नौज' इसमें 'कनौज' के रूप में दर्शाया गया है।

फ्रांसीसी मानचित्रकार का मानचित्र:

  • समय: $1720$ के दशक में (अठारहवीं सदी)।

  • निर्माता: एक फ्रांसीसी मानचित्रकार।

  • विशेषता: यह नक्शा अल-इदरीसी के नक्शे के लगभग $600$ वर्ष बाद बनाया गया। इस कालावधि में उपमहाद्वीप के बारे में सूचनाएं काफी बदल गई थीं।

  • समानता: यह नक्शा हमें आज के मानचित्र से काफी मिलता-जुलता लगता है। इसमें तटीय इलाकों का बहुत बारीक ब्यौरा दिया गया है।

  • उपयोग: यूरोप के नाविक और व्यापारी अपनी समुद्र यात्रा के लिए इस नक्शे का इस्तेमाल किया करते थे।

निष्कर्ष:

दो अलग-अलग कालखंडों में 'नक्शा बनाने का विज्ञान' भी बहुत बदल गया था। इतिहासकारों को दस्तावेजों को पढ़ते समय समय की पृष्ठभूमि का ध्यान रखना पड़ता है।


2. नई और पुरानी शब्दावली (Terminologies)

समय के साथ न केवल व्याकरण और शब्दभंडार में बदलाव आता है, बल्कि शब्दों के अर्थ भी बदल जाते हैं। ऐतिहासिक अभिलेख कई तरह की भाषाओं में मिलते हैं। उदाहरण के लिए, मध्ययुगीन फारसी आज की आधुनिक फारसी भाषा से भिन्न है।

'हिंदुस्तान' शब्द का बदलता अर्थ:

आज हम 'हिंदुस्तान' शब्द का प्रयोग आधुनिक राष्ट्र-राज्य 'भारत' के अर्थ में करते हैं, लेकिन मध्यकाल में ऐसा नहीं था।

  • मिन्हाज-ए- सिराज ($13$वीं सदी):

    • जब फारसी इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने 'हिंदुस्तान' शब्द का प्रयोग किया, तो उसका आशय पंजाब, हरियाणा और गंगा-यमुना के बीच स्थित इलाकों से था।

    • उसने इस शब्द का राजनीतिक अर्थ में उन इलाकों के लिए इस्तेमाल किया जो दिल्ली के सुल्तान के अधिकार क्षेत्र में आते थे।

    • सल्तनत के प्रसार के साथ इस शब्द के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र बढ़ते गए, लेकिन इसमें दक्षिण भारत का समावेश कभी नहीं हुआ।

  • बाबर ($16$वीं सदी):

    • बाबर ने 'हिंदुस्तान' शब्द का प्रयोग इस उपमहाद्वीप के भूगोल, पशु-पक्षियों और यहाँ के निवासियों की संस्कृति का वर्णन करने के लिए किया।

  • मीर खुसरो ($14$वीं सदी):

    • अमीर खुसरो ने 'हिंद' शब्द का प्रयोग किया था।

    • इनका प्रयोग भी कुछ-कुछ बाबर जैसा ही था, मगर उस समय 'हिंदुस्तान' को वह राजनीतिक और राष्ट्रीय अर्थ नहीं मिला था जो आज हम जोड़ते हैं।

'परदेसी' शब्द का बदलता अर्थ:

  • आधुनिक अर्थ: आज 'परदेसी' का अर्थ वह व्यक्ति होता है जो भारतीय न हो (विदेशी)।

  • मध्यकालीन अर्थ: मध्यकाल में किसी गाँव में आने वाला कोई भी अनजान व्यक्ति, जो उस समाज या संस्कृति का अंग न हो, 'परदेसी' कहलाता था।

    • हिंदी में इसे 'परदेसी' और फारसी में 'अजनबी' कहा जा सकता है।

    • इसलिए, किसी नगरवासी के लिए वनवासी 'परदेसी' होता था।

    • किंतु, एक ही गाँव में रहने वाले दो किसान, अलग-अलग धर्म या जाति के होने पर भी एक-दूसरे के लिए परदेसी नहीं होते थे।


3. इतिहासकार और उनके स्रोत (Sources of History)

इतिहासकार किस युग का अध्ययन कर रहे हैं और उनकी खोज की प्रकृति क्या है, इस आधार पर वे विभिन्न स्रोतों का सहारा लेते हैं।

निरंतरता और बदलाव:

$700$ से $1750$ ई. के बीच के अध्ययन के लिए इतिहासकार अभी भी सिक्कों, शिलालेखों, स्थापत्य (भवन निर्माण कला) और लिखित सामग्री पर निर्भर करते हैं। लेकिन इस युग में लिखित सामग्री की संख्या और विविधता में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई।

कागज का मूल्य और प्रसार:

इस काल में कागज सस्ता होता गया और बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने लगा। इसका प्रभाव लिखित इतिहास पर पड़ा।

  • तुलना:

    • $13$वीं सदी के मध्य में: एक विद्वान को पुस्तक की प्रतिलिपि बनाने के लिए कागज नहीं मिला, तो उसने एक पुरानी पांडुलिपि (जिसकी उसे जरूरत नहीं थी) को धो डाला और उसे सुखाकर उसका कागज इस्तेमाल किया।

    • $14$वीं सदी में: यदि आप बाजार से कोई खाद्य पदार्थ खरीदते, तो हो सकता था कि दुकानदार उसे कागज में लपेट कर देता।

लिखित सामग्री का उपयोग:

लोग कागज का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए करने लगे:

  • धर्मग्रंथ लिखने के लिए।

  • शासकों के वृत्तांत।

  • संतों के लेखन और उपदेश।

  • अर्जियाँ, अदालतों के दस्तावेज।

  • हिसाब और करों (Tax) के खाते।

अभिलेख और पांडुलिपियाँ:

  • पांडुलिपि (Manuscript): धनी व्यक्तियों, शासकों, मठों और मंदिरों द्वारा पांडुलिपियाँ एकत्र की जाती थीं। ये हाथ से लिखी गई पुस्तकें होती थीं।

  • अभिलेखागार (Archive): वह स्थान जहाँ दस्तावेजों और पांडुलिपियों को संग्रहित किया जाता है। आज सभी राष्ट्रीय और राज्य सरकारों के अभिलेखागार होते हैं जहाँ वे अपने पुराने सरकारी रिकॉर्ड रखते हैं।


4. लेखन कला और नकलनवीस की समस्या

उस समय छापेखाने (Printing Press) नहीं थे, इसलिए पांडुलिपियों की प्रतिकृति (कॉपी) हाथ से ही बनाई जाती थी। यह प्रक्रिया इतिहास लेखन में एक बड़ी समस्या का कारण बनी।

  • लिपिक या नकलनवीस: जो लोग हाथ से नकल करते थे, उन्हें नकलनवीस कहा जाता था।

  • परिवर्तन की प्रक्रिया: नकल करते समय लिपिक कभी-कभी कोई शब्द या कोई वाक्य बदल देते थे। "कहीं एक शब्द, कहीं एक वाक्य" - सदी दर सदी प्रतिलिपियों की भी प्रतिलिपियाँ बनती रहीं और अंततः मूल ग्रंथ की प्रतिलिपि उससे पूरी तरह अलग हो गई।

  • नुकसान: हमें आज लेखक की मूल पांडुलिपि शायद ही कहीं मिलती है। हमें बाद के लिपिकों द्वारा बनाई गई प्रतिलिपियों पर ही पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए, सही बात जानने के लिए इतिहासकारों को एक ही ग्रंथ की विभिन्न प्रतिलिपियों का अध्ययन करना पड़ता है।

जियाउद्दीन बरनी का उदाहरण:

  • $14$वीं सदी के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने अपना वृत्तांत दो बार लिखा।

  • पहली बार: $1356$ ई. में।

  • दूसरी बार: $1358$ ई. में (दो वर्ष बाद)।

  • दोनों में अंतर है, लेकिन $1971$ तक इतिहासकारों को पहली बार वाले वृत्तांत की जानकारी ही नहीं थी क्योंकि वह पुस्तकालयों के विशाल संग्रह में कहीं दबा पड़ा था।

लेखन शैलियाँ:

लिखावट की भिन्न प्रकार की शैलियों के कारण फारसी और अरबी पढ़ने में कठिनाई हो सकती है:

  • नस्तलीक शैली: इसमें वर्ण जोड़कर धाराप्रवाह रूप से लिखे जाते हैं। इसे पढ़ना आसान है।

  • शिकस्ते शैली: यह अधिक सघन, संक्षिप्त और कठिन शैली है।


5. नए सामाजिक और राजनीतिक समूह

$700$ और $1750$ के बीच के हजार वर्षों में समाज में भारी बदलाव आए। नई प्रौद्योगिकियों और फसलों का आगमन हुआ।

प्रौद्योगिकी में बदलाव:

  • सिंचाई: रहट (Persian Wheel) का प्रयोग।

  • कताई: चरखे का इस्तेमाल।

  • युद्ध: आग्नेय शास्त्रों (बारूद वाले हथियार) का इस्तेमाल।

खान-पान में बदलाव:

विदेशों से कई नई फसलें उपमहाद्वीप में आईं:

  • आलू, मक्का, मिर्च, चाय और कॉफी।

    ध्यान रहे कि ये तमाम परिवर्तन और नई प्रौद्योगिकियां उन लोगों के साथ आईं जो नए विचार भी लेकर आए थे।

राजपूत और क्षत्रिय:

इस काल में कुछ समूहों का महत्व बढ़ा।

  • राजपूत: यह शब्द 'राजपुत्र' (राजा का पुत्र) से निकला है।

  • $8$वीं से $14$वीं सदी: यह नाम आमतौर पर योद्धाओं के उस समूह के लिए प्रयुक्त होता था जो क्षत्रिय वर्ण के होने का दावा करते थे।

  • विस्तार: 'राजपूत' शब्द के अंतर्गत केवल राजा और सामंत ही नहीं, बल्कि वे सेनापति और सैनिक भी आते थे जो पूरे उपमहाद्वीप में अलग-अलग शासकों की सेनाओं में सेवारत थे।

  • गुण: कवि और चारण राजपूतों की आचार संहिता – 'प्रबल पराक्रम और स्वामीभक्ति' का गुणगान करते थे।

अन्य समूह:

इस युग में राजनीतिक दृष्टि से महत्व हासिल करने के लिए मराठा, सिख, जाट, अहोम और कायस्थ (लिपिकों और मुंशियों का कार्य करने वाली जाति) आदि समूहों ने भी अवसरों का लाभ उठाया।


6. पर्यावास और जाति व्यवस्था

इस काल में जंगलों की कटाई हो रही थी और खेती का इलाका बढ़ रहा था। इसके कारण 'पर्यावास' (Habitat) में परिवर्तन आया।

  • वनवासियों का पलायन: पर्यावास में बदलाव के कारण कई वनवासियों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ी।

  • किसान समूह: कुछ वनवासी जमीन की जुताई करने लगे और किसान बन गए। कृषकों के ये नए समूह क्षेत्रीय बाजार, मुखियाओं, पुजारियों, मठों और मंदिरों से प्रभावित होने लगे।

  • जाति भेद: समाज में आर्थिक और सामाजिक अंतर बढ़ने लगा। लोग 'जातियों' और 'उपजातियों' में बांटे जाने लगे।

  • दर्जा: जातियों का दर्जा स्थायी नहीं था। यह उस जाति के सदस्यों के हाथों में कितनी सत्ता, प्रभाव और संसाधनों का नियंत्रण है, इसके आधार पर बदलता रहता था। एक ही जाति का दर्जा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकता था।

जाति पंचायत:

  • अपने सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए जातियां स्वयं अपने नियम बनाती थीं।

  • इन नियमों का पालन जाति के बड़े-बुजुर्गों की एक सभा करवाती थी, जिसे कुछ इलाकों में 'जाति पंचायत' कहा जाता था।

  • हालाँकि, जातियों को अपने गाँव के रिवाजों का पालन भी करना पड़ता था। गाँवों पर मुखिया का शासन होता था।


7. क्षेत्र और साम्राज्य (Region and Empire)

चोल, तुगलक या मुगल जैसे बड़े राजवंशों के अंतर्गत कई सारे क्षेत्र आ जाते थे।

प्रशस्ति का उदाहरण (ग गयासुद्दीन बलबन):

दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन ($1266-1287$) की प्रशंसा में लिखी गई एक संस्कृत प्रशस्ति में उसे एक विशाल साम्राज्य का शासक बताया गया है।

  • विस्तार: पूर्व में बंगाल (गौड़) से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान के गज़नी (गज्जन) तक।

  • दक्षिण भारत: इसमें संपूर्ण दक्षिण भारत (द्रविड़) भी शामिल बताया गया है।

  • विजेता: गौड़, आंध्र, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के शासक उसकी सेना के आगे हथियार डाल देते थे।

  • नोट: इतिहासकार इसे अतिशयोक्तिपूर्ण (बढ़ा-चढ़ाकर किया गया दावा) मानते हैं।

भाषा और क्षेत्र (अमीर खुसरो का वर्णन - $1318$ ई.):

कवि अमीर खुसरो ने गौर किया कि इस देश के हर क्षेत्र की एक अलग भाषा है:

  • सिंधी, लाहौरी, कश्मीरी, द्वारसमुद्री (दक्षिण कर्नाटक), तेलंगानी (आंध्र प्रदेश), गुजरी (गुजरात), म'अबारी (तमिलनाडु), गौड़ी (बंगाल), अवधी (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और हिंदवी (दिल्ली के आसपास)।

  • इन क्षेत्रीय भाषाओं के विपरीत 'संस्कृत' एक ऐसी भाषा थी जो किसी विशेष क्षेत्र की नहीं थी। यह एक प्राचीन भाषा थी जिसे केवल ब्राह्मण जानते थे, आम जनता नहीं।

सर्वक्षेत्रीय साम्राज्य:

जब मुगल साम्राज्य ($18$वीं सदी में) पतन की ओर था, तो फिर से क्षेत्रीय राज्य उभरने लगे। लेकिन वर्षों के सर्वक्षेत्रीय शासन (Pan-regional rule) के कारण क्षेत्रों की प्रकृति बदल गई थी। उन पर कई छोटे-बड़े राज्यों का शासन रहा था, जिसके कारण वहां की संस्कृतियाँ घुल-मिल गई थीं।


8. पुराने और नए धर्म

इतिहास के जिन हजार वर्षों की पड़ताल हम कर रहे हैं, उस दौरान धार्मिक परंपराओं में भी बड़े बदलाव आए।

हिंदू धर्म में परिवर्तन:

  • देवी-देवता: नए देवी-देवताओं की पूजा शुरू हुई।

  • मंदिर: राजाओं द्वारा भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया गया।

  • ब्राह्मणों का महत्व: समाज में पुरोहितों के रूप में ब्राह्मणों का महत्व और सत्ता बढ़ी क्योंकि वे संस्कृत ग्रंथों के ज्ञाता थे।

  • संरक्षक: नए शासक जो प्रतिष्ठा की चाह में थे, वे इन ब्राह्मणों के 'संरक्षक' (Patrons) बने। इससे ब्राह्मणों को भारी सम्मान मिला।

  • भक्ति की अवधारणा: इस युग में भक्ति की विचारधारा उभरी। इसमें ईश्वर की कल्पना एक ऐसे इष्टदेव/देवी के रूप में की गई थी जिस तक पुजारियों के कर्मकांड के बिना भी भक्त स्वयं पहुँच सके।

इस्लाम का आगमन:

यही वह युग था जब उपमहाद्वीप में नए धर्मों का भी आगमन हुआ। कुरान शरीफ का संदेश भारत में $7$वीं सदी में व्यापारियों और आप्रवासियों के जरिए पहुंचा।

  • एकेश्वरवाद: मुसलमान कुरान शरीफ को अपना धर्मग्रंथ मानते हैं और केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की सत्ता को स्वीकार करते हैं।

  • समानता: इस्लाम में प्रेम, करुणा और समस्त मानव जाति के लिए समानता का भाव है, चाहे वे अमीर हों या गरीब।

  • शाखाएं: हिंदू धर्म की तरह इस्लाम में भी विविधता थी:

    • शिया: जो पैगंबर साहब के दामाद 'अली' को मुसलमानों का विधि-सम्मत नेता मानते थे।

    • सुन्नी: जो 'खलीफाओं' (Khalifas) के प्रभुत्व को स्वीकार करते थे।

  • उलेमा: इस्लामी न्याय सिद्धांत और धर्मशास्त्र के विद्वानों को उलेमा कहा जाता है।


9. समय और इतिहास के कालखंड (Periodization)

इतिहासकार समय को केवल घड़ी या कैलेंडर की तरह नहीं देखते। वे इसे सामाजिक और आर्थिक संगठन में आने वाले परिवर्तनों के रूप में देखते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इतिहास को बड़े-बड़े हिस्सों (युगों या कालों) में बांटा जाता है।

अंग्रेजों द्वारा विभाजन (धर्म आधारित):

$19$वीं सदी के मध्य में अंग्रेज इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को तीन युगों में बांटा था:

  1. हिंदू काल

  2. मुस्लिम काल

  3. ब्रिटिश काल

  • समस्या: यह विभाजन इस विचार पर आधारित था कि शासकों का धर्म ही एकमात्र महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन होता है। यह विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप की अपार विविधता और आर्थिक-सामाजिक परिवर्तनों की उपेक्षा करता था। इसलिए आधुनिक इतिहासकार इसे स्वीकार नहीं करते।

आधुनिक विभाजन:

अधिकतर इतिहासकार आर्थिक और सामाजिक कारकों के आधार पर अतीत का वर्गीकरण करते हैं।

  • प्राचीन काल: इसमें शिकारी-संग्राहक, प्रारंभिक किसान और प्रारंभिक साम्राज्य शामिल हैं।

  • मध्यकाल: इसमें कृषक समाज का विस्तार, क्षेत्रीय और साम्राज्यवादी राज्यों का उदय, और हिंदू-इस्लाम धर्मों के विकास को शामिल किया जाता है।

  • आधुनिक काल: यह विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र, मुक्ति और समानता से जुड़ा है।

मध्यकाल की तुलना अक्सर आधुनिक काल से की जाती है। 'आधुनिकता' के साथ भौतिक उन्नति और बौद्धिक प्रगति का भाव जुड़ा है। इसका अर्थ यह निकलता है कि मध्यकाल रूढ़िवादी था, जबकि वास्तविकता में यह काल भारी परिवर्तनों का गवाह रहा।


सारांश (Quick Summary for Revision)

  • $700-1750$: परिवर्तनों का काल।

  • मानचित्र: समय के साथ सटीकता बढ़ी (अल-इदरीसी vs फ्रांसीसी)।

  • शब्दावली: हिंदुस्तान (राजनैतिक vs भौगोलिक), परदेसी (अजनबी)।

  • स्रोत: पांडुलिपि, अभिलेख, सिक्के। कागज का बढ़ता प्रयोग।

  • समाज: राजपूतों का उदय, जाति और उपजाति (जाति पंचायत)।

  • खेती: वनों की कटाई, नए किसान समूह, नई फसलें (आलू, मक्का, मिर्च)।

  • धर्म: भक्ति आंदोलन, इस्लाम का आगमन, संरक्षक।



मध्यकालीन इतिहास: भूमिका

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