1. दिल्ली का महत्व और पृष्ठभूमि
दिल्ली 12वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र और राजधानी के रूप में उभरा।
तोमर राजपूत: दिल्ली सबसे पहले तोमर राजपूतों के अधीन एक साम्राज्य की राजधानी बनी। 12वीं सदी के मध्य में अजमेर के चाहमानों (चौहानों) ने तोमरों को परास्त किया।
वाणिज्यिक केंद्र: तोमर और चौहानों के राज्यकाल में दिल्ली एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र बन गया। यहाँ कई समृद्धशाली जैन व्यापारी रहते थे जिन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया।
देहलीवाल: यहाँ ढाले जाने वाले सिक्कों को 'देहलीवाल' कहा जाता था, जो काफी प्रचलन में थे।
दिल्ली सल्तनत की नींव: 13वीं सदी के आरंभ में (1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद) दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। इसके साथ ही दिल्ली एक ऐसी राजधानी में बदल गई जिसका नियंत्रण इस उपमहाद्वीप के बहुत बड़े क्षेत्र पर फैला था।
2. दिल्ली के शासक (राजवंशों का क्रम)
CTET में अक्सर कालक्रम (Chronology) से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। नीचे दी गई तालिका को ध्यान से याद करें:
I. प्रारंभिक तुर्की शासक (1206 - 1290)
कुतुबुद्दीन ऐबक (1206 - 1210)
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210 - 1236)
रजिया सुल्तान (1236 - 1240)
गयासुद्दीन बलबन (1266 - 1287)
II. खिलजी वंश (1290 - 1320)
जलालुद्दीन खिलजी (1290 - 1296)
अलाउद्दीन खिलजी (1296 - 1316)
III. तुगलक वंश (1320 - 1414)
गयासुद्दीन तुगलक (1320 - 1324)
मुहम्मद तुगलक (1324 - 1351)
फिरोज शाह तुगलक (1351 - 1388)
IV. सैयद वंश (1414 - 1451)
खिज्र खान (1414 - 1421)
V. लोदी वंश (1451 - 1526)
बहलोल लोदी (1451 - 1489)
इब्राहिम लोदी (पानीपत के प्रथम युद्ध में 1526 में बाबर द्वारा पराजित)
3. इतिहास जानने के स्रोत: 'तवारीख'
दिल्ली सल्तनत के बारे में जानकारी हमें अभिलेखों, सिक्कों और स्थापत्य (भवन निर्माण कला) से मिलती है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण स्रोत 'इतिहास' हैं जिन्हें फारसी भाषा में 'तवारीख' (बहुवचन) कहा जाता है।
लेखक: तवारीख के लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारी जैसे सुशिक्षित व्यक्ति होते थे।
विशेषताएँ:
ये लेखक नगरों में (विशेषकर दिल्ली में) रहते थे; गाँव में शायद ही कभी रहते हों।
ये सुल्तान के लिए ढेर सारे इनाम-इकराम पाने की आशा में इतिहास लिखते थे।
ये शासकों को 'जन्मसिद्ध अधिकार' और 'लिंगभेद' पर आधारित 'आदर्श समाज व्यवस्था' बनाए रखने की सलाह देते थे।
महत्वपूर्ण नोट: आम जनता इनके विचारों से सहमत नहीं होती थी।
रजिया सुल्तान और मिन्हाज-ए- सिराज:
सन 1236 में इल्तुतमिश की बेटी रजिया सिंहासन पर बैठी। उस युग के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने स्वीकार किया कि वह अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य और सक्षम थी। लेकिन फिर भी वह एक रानी को शासक के रूप में मान्यता नहीं दे पा रहा था। दरबारी जन भी उसके स्वतंत्र रूप से शासन करने की कोशिशों से प्रसन्न नहीं थे। परिणामस्वरूप 1240 में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।
4. विस्तार: गैरिसन शहर से साम्राज्य तक
आरंभिक 13वीं शताब्दी में सुल्तानों का शासन केवल गैरिसन शहरों (किलेबंद बसाव जहाँ सैनिक रहते हैं) तक सीमित था।
भीतरी प्रदेश (Hinterland): गैरिसन शहरों के सुल्तानों का भीतरी प्रदेशों (शहर की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले मुख्य इलाके) पर कोई नियंत्रण नहीं था। इसलिए उन्हें रसद और सामग्री के लिए लूटमार या व्यापार पर निर्भर रहना पड़ता था।
चुनौतियाँ: बंगाल और सिंध के गैरिसन शहरों का नियंत्रण दिल्ली से बहुत कठिन था। बगावत, युद्ध और खराब मौसम से संपर्क सूत्र टूट जाते थे।
विस्तार की दो नीतियाँ:
भीतरी सीमा: गयासुद्दीन बलबन, अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक के समय वनों को साफ किया गया और गंगा-यमुना दोआब से किसानों को खदेड़कर जमीन कृषि कार्य के लिए दी गई।
बाहरी सीमा: अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दक्षिण भारत को लक्ष्य करके सैनिक अभियान शुरू हुए और यह अभियान मुहम्मद तुगलक के समय अपनी चरम सीमा पर पहुँचे।
5. प्रशासन और समेकन (Administration)
इतने विशाल साम्राज्य को चलाने के लिए विश्वसनीय सूबेदारों और प्रशासकों की आवश्यकता थी।
बंदगाँ (Bandagan):
इल्तुतमिश ने सामंतों और जमींदारों के स्थान पर अपने विशेष गुलामों को सूबेदार नियुक्त करना अधिक पसंद किया। इन गुलामों को फारसी में 'बंदगाँ' कहा जाता था। इन्हें सैनिक सेवा के लिए खरीदा जाता था। चूंकि वे पूरी तरह अपने मालिक पर निर्भर होते थे, इसलिए सुल्तान उन पर विश्वास कर सकते थे।
श्रित (Client) की समस्या:
खिलजी और तुगलक शासक भी बंदगाँ का इस्तेमाल करते रहे और साथ ही अपने आश्रितों (निम्न वर्ग के लोगों) को भी ऊँचे राजनीतिक पदों पर बैठाया। इससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई।
गुलाम और आश्रित अपने मालिकों के प्रति तो वफादार रहते थे, मगर उनके उत्तराधिकारियों के प्रति नहीं।
नए सुल्तानों के अपने नौकर होते थे, जिससे पुराने और नए सरदारों के बीच टकराव होता था।
सुल्तानों द्वारा निचले तबके के लोगों को संरक्षण देने के कारण उच्च वर्ग के लोग (कुलीन वर्ग) नाराज होते थे और तवारीख के लेखकों ने इसकी आलोचना की है।
6. इक्ता और मुक्ति (Iqta and Muqti)
खलजी और तुगलक शासकों ने सेनानायकों को भिन्न-भिन्न आकार के इलाकों का सूबेदार नियुक्त किया।
इक्ता (Iqta): इन इलाकों को इक्ता कहा जाता था।
इक्तादार या मुक्ति (Muqti): इक्ता को संभालने वाले अधिकारी इक्तादार या 'मुक्ति' कहे जाते थे।
मुक्ति का कार्य:
सैनिक अभियानों का नेतृत्व करना।
अपने इक्ता में कानून-व्यवस्था बनाए रखना।
सैनिक सेवाओं के बदले वेतन के रूप में अपने इलाकों से राजस्व (Revenue) वसूलना।
इसी राजस्व से वे अपने सैनिकों को तनख्वाह देते थे।
नियंत्रण: मुक्ति लोगों पर काबू रखने का सबसे प्रभावी तरीका यह था कि उनका पद वंश-परंपरा से न चले और उन्हें कोई भी इक्ता थोड़े समय के लिए ही मिले, जिसके बाद उनका स्थानांतरण कर दिया जाए। अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक ने इन नियमों का सख्ती से पालन किया।
7. कर व्यवस्था (Taxation)
अलाउद्दीन खिलजी के समय भू-राजस्व के निर्धारण और वसूली के कार्य को राज्य ने अपने नियंत्रण में ले लिया। स्थानीय सामंतों से कर लगाने का अधिकार छीन लिया गया और उन्हें स्वयं कर चुकाने को बाध्य किया गया।
उस समय तीन प्रकार के कर (Taxes) प्रमुख थे:
खराज (Kharaj): यह कृषि पर लगने वाला कर था। यह किसान की उपज का लगभग 50% होता था।
मवेशियों पर कर।
घरों पर कर (Ghari)।
8. अलाउद्दीन खिलजी बनाम मुहम्मद तुगलक
यह अनुभाग CTET परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण तुलनात्मक अध्ययन है। मंगोल आक्रमणों (चंगेज खान के नेतृत्व में) का सामना करने के लिए दोनों सुल्तानों ने अलग-अलग नीतियां अपनाईं।
| विशेषता | अलाउद्दीन खिलजी (बचाव पक्ष) | मुहम्मद तुगलक (आक्रमण पक्ष) |
| आक्रमण | दिल्ली पर दो बार हमले हुए (1299/1300 और 1302/1303)। इनका सामना करने के लिए उसने एक विशाल स्थायी सेना खड़ी की। | इसके शासन के प्रारंभिक वर्षों में सल्तनत पर हमला हुआ। इसने मंगोल सेना को हराया और 'ट्रांसऑक्सियाना' (मध्य एशिया) पर आक्रमण की योजना बनाई। |
| शहर/राजधानी | सैनिकों के लिए 'सीरी' (Siri) नामक एक नया गैरिसन शहर बनवाया। | नया शहर बनाने के बजाय, दिल्ली के चार शहरों में से सबसे पुराने शहर 'देहली-ए-कुहना' को खाली करवाकर सैनिकों की छावनी बना दिया और निवासियों को दक्षिण में नई राजधानी दौलताबाद भेज दिया। |
| रसद/भोजन | सैनिकों का पेट भरने के लिए गंगा-यमुना के बीच की भूमि से कर के रूप में अनाज इकट्ठा किया (उपज का 50%)। | सेना को खिलाने के लिए उसी इलाके से खाद्यान्न इकट्ठा किया गया, लेकिन विशाल सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त कर भी लगाए, जिससे अकाल की स्थिति पैदा हुई। |
| वेतन | सैनिकों को नकद वेतन देना शुरू किया। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार नियंत्रण नीति लागू की। जो व्यापारी तय कीमत से ज्यादा लेते थे, उन्हें सजा मिलती थी। | इसने भी नकद वेतन दिया, लेकिन कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया। इसके बजाय 'सांकेतिक मुद्रा' (Token Currency) चलाई। यह मुद्रा तांबे/पीतल की थी, सोने-चाँदी की नहीं। लोग इस मुद्रा की नकल आसानी से कर लेते थे। |
| परिणाम | अलाउद्दीन के प्रशासनिक कदम काफी सफल रहे। इतिहासकारों ने कीमतों में कमी और वस्तुओं की कुशलता से आपूर्ति के लिए उसकी प्रशंसा की। | मुहम्मद तुगलक के कदम असफल रहे। कश्मीर अभियान विफल रहा, दौलताबाद ले जाने से लोग नाराज थे, और टोकन मुद्रा को वापस लेना पड़ा। |
नोट: मुहम्मद तुगलक की आलोचना अक्सर होती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि वह मध्यकालीन इतिहास का पहला सुल्तान था जिसने मंगोल इलाके पर कब्जा करने की योजना बनाई थी।
9. पंद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में सल्तनत
तुगलक वंश के बाद सैयद (1414-1451) और लोदी (1451-1526) राजवंशों ने दिल्ली और आगरा पर राज्य किया।
तब तक जौनपुर, बंगाल, मालवा, गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत में स्वतंत्र शासक उठ खड़े हुए थे।
इसी काल में अफगान और राजपूत जैसे नए शासक समूह उभरे।
शेरशाह सूरी (1540-1545): शेरशाह ने बिहार में अपने चाचा के एक छोटे से इलाके के प्रबंधक के रूप में काम शुरू किया था। बाद में उसने मुगल सम्राट हुमायूं को चुनौती दी और उसे हराया। शेरशाह ने दिल्ली पर अधिकार करके 'सूरी वंश' की स्थापना की। उसका प्रशासन अलाउद्दीन खिलजी के तरीकों पर आधारित था जिसे बाद में अकबर ने भी अपनाया।
10. प्रमुख वास्तुकला शब्द
कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद: कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित।
अलाई दरवाजा: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित (कुतुब मीनार परिसर में)।
मोट की मस्जिद: सिकंदर लोदी के वजीर द्वारा निर्मित।
किबला: नमाज के दौरान मुसलमानों का मक्का की ओर मुँह करना। भारत में यह पश्चिम दिशा है।
दिल्ली के सुल्तान
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