1. सोचना (Thinking) : एक परिचय
सोचना एक उच्च स्तरीय मानसिक प्रक्रिया है। यह हमारे व्यवहार और व्यक्तित्व का दर्पण है। जब भी हम किसी समस्या का सामना करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसका समाधान खोजने के लिए सक्रिय हो जाता है, इसे ही सोचना या चिंतन कहते हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
यह एक ज्ञानात्मक (Cognitive) गतिविधि है।
यह हमेशा किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर निर्देशित होती है।
इसमें वस्तुओं, घटनाओं और परिस्थितियों का मानसिक चित्रण शामिल होता है।
यह समस्या समाधान की आधारशिला है।
2. चिंतन के प्रकार (Types of Thinking)
CTET में चिंतन के प्रकारों पर अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं। इन्हें मुख्य रूप से निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है:
A. जिमबार्डो और रुक के अनुसार वर्गीकरण
1. स्वालीन चिंतन (Autistic Thinking):
इसमें व्यक्ति अपनी काल्पनिक दुनिया में खोया रहता है।
इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता।
उदाहरण: एक बच्चा कक्षा में बैठे-बैठे सोच रहा है कि वह सुपरमैन बनकर उड़ रहा है।
2. यथार्थवादी चिंतन (Realistic Thinking):
यह वास्तविकता पर आधारित होता है।
इसका प्रयोग समस्याओं को सुलझाने में किया जाता है।
इसे आगे तीन भागों में बाँटा गया है:
अभिसारी चिंतन: (नीचे विस्तृत विवरण देखें)
अपसारी चिंतन: (नीचे विस्तृत विवरण देखें)
आलोचनात्मक चिंतन: गुण-दोषों की परख करना।
B. गिलफोर्ड का वर्गीकरण (सबसे महत्त्वपूर्ण)
1. अभिसारी चिंतन (Convergent Thinking):
इसे 'बंद अंत वाला' (Closed-ended) चिंतन भी कहते हैं।
इसमें समस्या का केवल एक सही उत्तर होता है।
यह तथ्यों और रटने पर आधारित होता है।
यह बुद्धि से अधिक संबंधित है।
उदाहरण: "भारत की राजधानी क्या है?" (उत्तर केवल एक है - नई दिल्ली)।
2. अपसारी चिंतन (Divergent Thinking):
इसे 'मुक्त अंत वाला' (Open-ended) चिंतन या सृजनात्मक चिंतन भी कहते हैं।
इसमें एक ही समस्या के अनेक समाधान हो सकते हैं।
यह कल्पनाशीलता और नवीनता (Creativity) को बढ़ावा देता है।
उदाहरण: "यदि आपके पंख होते तो आप क्या करते?" (हर बच्चा अलग उत्तर देगा)।
3. बच्चों में सोचने की प्रक्रिया के चरण
बच्चे जन्म से ही सोचना शुरू नहीं करते, यह प्रक्रिया उम्र और अनुभव के साथ विकसित होती है।
1. प्रत्यक्षीकरण के आधार पर (Perceptual Thinking):
यह सबसे सरल स्तर है।
बच्चा उन चीजों के बारे में सोचता है जो उसके सामने (प्रत्यक्ष) मौजूद हैं।
उदाहरण: खिलौने को देखकर उसे पकड़ने की योजना बनाना।
2. कल्पना के आधार पर (Imaginative Thinking):
जब वस्तु सामने न हो, फिर भी उसके बारे में सोचना।
इसमें पूर्व अनुभवों के आधार पर मानसिक चित्र बनाए जाते हैं।
उदाहरण: नानी के घर की याद आने पर वहाँ के दृश्यों को सोचना।
3. प्रत्यय या अवधारणा के आधार पर (Conceptual Thinking):
यह अधिक जटिल है। इसमें बच्चे वस्तुओं के गुणों को समझकर एक 'कन्सेप्ट' बना लेते हैं।
उदाहरण: 'कुत्ता' शब्द सुनते ही एक चार पैर वाले, भौंकने वाले जानवर की छवि दिमाग में आना।
4. तर्क के आधार पर (Logical Thinking):
यह सबसे उच्च स्तर का चिंतन है।
इसमें भाषा और संप्रेषण का महत्त्व होता है।
बच्चा कारण और प्रभाव (Cause and Effect) के संबंधों को समझता है।
4. तर्कणा (Reasoning) के प्रकार
तर्क करना चिंतन का एक अनुशासित रूप है। इसके दो प्रमुख प्रकार हैं:
A. निगमनात्मक तर्कणा (Deductive Reasoning):
नियम से उदाहरण की ओर।
सामान्य से विशिष्ट की ओर।
इसमें पहले से ज्ञात नियमों या सिद्धांतों के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
उदाहरण:
नियम: सभी मनुष्य नश्वर हैं।
तर्क: मोहन एक मनुष्य है।
निष्कर्ष: अतः मोहन नश्वर है।
B. आगमनात्मक तर्कणा (Inductive Reasoning):
उदाहरण से नियम की ओर।
विशिष्ट से सामान्य की ओर।
इसमें कई उदाहरणों को देखकर एक नया नियम बनाया जाता है।
उदाहरण: राम मर गया, श्याम मर गया (विशिष्ट घटनाएँ) $\rightarrow$ अतः सभी मनुष्य मरेंगे (सामान्य नियम)।
5. अधिसंज्ञान (Metacognition) - महत्त्वपूर्ण अवधारणा
हाल के वर्षों में CTET में इस विषय से प्रश्न बढ़े हैं।
परिभाषा:
आसान भाषा में इसे "सोचने के बारे में सोचना" या "जानने के बारे में जानना" कहते हैं। यह अपनी ही सोचने की प्रक्रिया और सीखने के तरीकों पर नियंत्रण रखने की क्षमता है।
अधिसंज्ञान के मुख्य घटक:
योजना बनाना (Planning): किसी कार्य को शुरू करने से पहले रणनीति तय करना। (जैसे- मुझे यह पाठ कैसे याद करना है?)
निगरानी करना (Monitoring): कार्य करते समय यह देखना कि क्या मेरी रणनीति काम कर रही है? क्या मुझे समझ आ रहा है?
मूल्यांकन करना (Evaluating): कार्य समाप्त होने पर यह जाँचना कि क्या लक्ष्य पूरा हुआ? यदि नहीं, तो क्या गलती हुई?
शिक्षा में महत्त्व:
जिस छात्र में अधिसंज्ञान क्षमता अच्छी होती है, वह रटने की बजाय अपनी सीखने की प्रक्रिया को खुद सुधार सकता है। वह एक 'स्व-निर्देशित' शिक्षार्थी बनता है।
6. सीखना (Learning/Adhigam)
सीखना एक जीवन-पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। व्यवहार में अनुभव और अभ्यास के कारण आने वाले अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन को सीखना कहते हैं।
सीखने के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत (थार्नडाइक के नियम):
एडवर्ड एल. थार्नडाइक ने सीखने के तीन मुख्य नियम दिए हैं, जो आज भी कक्षा-कक्ष में उपयोगी हैं:
1. तत्परता का नियम (Law of Readiness):
यदि बच्चा सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार (इच्छुक) है, तो वह जल्दी सीखेगा।
यदि उसे जबरदस्ती सिखाया जाए, तो वह झुंझला जाएगा।
शिक्षक का कार्य: पाठ शुरू करने से पहले बच्चों में जिज्ञासा और रुचि जगाना।
2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise):
"करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।"
किसी कार्य को बार-बार दोहराने से सीखना पक्का होता है।
उपयोग न करने पर हम सीखी हुई चीजें भूलने लगते हैं (अनुपयोग का नियम)।
3. प्रभाव का नियम (Law of Effect):
इसे संतोष/असंतोष का नियम भी कहते हैं।
जिस कार्य को करने से बच्चे को खुशी या संतोष मिलता है, वह उसे बार-बार करना चाहता है।
जिस कार्य में दंड या कष्ट मिलता है, बच्चा उसे नहीं सीखता।
निहितार्थ: बच्चों को सही कार्य पर पुरस्कार और प्रशंसा देनी चाहिए।
7. सूचना प्रसंस्करण मॉडल (Information Processing Model)
यह सिद्धांत मानव मस्तिष्क की तुलना कंप्यूटर से करता है। इसमें सीखने के चरण इस प्रकार हैं:
संवेदी स्मृति (Sensory Memory): वातावरण से सूचना आँखों या कानों द्वारा ग्रहण करना। यह कुछ सेकंड के लिए होती है।
अल्पकालिक स्मृति (Short Term Memory): यदि हम सूचना पर 'ध्यान' देते हैं, तो वह यहाँ आती है। यहाँ कार्यकारी स्मृति (Working Memory) सक्रिय होती है।
दीर्घकालिक स्मृति (Long Term Memory): रिहर्सल और अर्थपूर्ण जुड़ाव के बाद ज्ञान यहाँ हमेशा के लिए स्टोर हो जाता है।
8. बच्चे असफल क्यों होते हैं? (Why Children Fail)
स्कूल में बच्चों की असफलता केवल बच्चे की गलती नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की असफलता है। इसके प्रमुख कारण हैं:
तत्परता की कमी: बच्चे का मानसिक रूप से तैयार न होना।
अनुचित शिक्षण विधि: शिक्षक द्वारा रटने पर जोर देना या बच्चे के स्तर के अनुसार न पढ़ाना।
वातावरण: घर या स्कूल का माहौल भयमुक्त न होना।
व्यक्तिगत भिन्नता की अनदेखी: सभी बच्चों को एक ही लाठी से हाँकना।
अभिप्रेरणा का अभाव: बच्चों में जिज्ञासा और जोश की कमी।
असफलता से निपटने की रणनीतियाँ:
त्रुटियों को सीखने का हिस्सा मानना (Errors are windows to thinking)।
रटने की जगह 'अर्थपूर्ण अधिगम' (Meaningful Learning) को बढ़ावा देना।
बच्चे के पूर्व-ज्ञान को नए ज्ञान से जोड़ना।
मूर्त (Concrete) से अमूर्त (Abstract) की ओर पढ़ाना।
9. परीक्षा उपयोगी महत्त्वपूर्ण बिंदु (One-Liners)
त्रुटियाँ: बच्चों की गलतियाँ यह बताती हैं कि वे कैसे सोचते हैं। यह अधिगम प्रक्रिया का एक प्राकृतिक हिस्सा है।
रचनावाद (Constructivism): बच्चे ज्ञान के सक्रिय निर्माता हैं (पियाजे)। वे निष्क्रिय बर्तन नहीं हैं जिन्हें भरा जाना है।
सामाजिक अधिगम: वाइगोत्स्की के अनुसार, बच्चे वयस्कों और समवयस्कों के साथ अंतःक्रिया करके सबसे बेहतर सीखते हैं।
समालोचनात्मक सोच: बच्चों को "क्यों" और "कैसे" वाले प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, न कि केवल "क्या" वाले प्रश्न।
पुनर्बलन (Reinforcement): हल (Hull) के अनुसार सीखने का आधार आवश्यकता की पूर्ति है।
10. निष्कर्ष
एक शिक्षक के रूप में, हमारा उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों में "कैसे सोचा जाए" (How to think) का कौशल विकसित करना होना चाहिए। अधिसंज्ञान, अपसारी चिंतन और अर्थपूर्ण अधिगम को कक्षा में स्थान देकर हम बच्चों को जीवन भर सीखने के लिए तैयार कर सकते हैं।
बच्चों में सोचना, सीखना और अधिसंज्ञान
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