इस अध्याय में हम जानेंगे कि कैसे मानव ने शिकार और संग्रहण (Hunting-gathering) को छोड़कर खेती और पशुपालन की शुरुआत की और एक स्थायी जीवन की ओर कदम बढ़ाया। यह "नवपाषाण काल" (Neolithic Age) की शुरुआत थी।
1. खेती और पशुपालन की शुरुआत
लगभग $12,000$ साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आए और गर्मी बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बनने लगे। इससे घास खाने वाले जानवरों (हिरण, बारहसिंगा, भीड़, बकरी) की संख्या में वृद्धि हुई।
खेती की शुरुआत: लोगों ने ध्यान दिया कि खाद्य वनस्पतियां कहाँ उगती हैं और बीज कैसे डंठल से टूटकर गिरते हैं। इस प्रकार उन्होंने पौधों की देखभाल करना शुरू किया और धीरे-धीरे वे कृषक बन गए।
सबसे पहली फसलें: मानव द्वारा सबसे पहले उगाई गई फसलों में गेहूँ और जौ शामिल हैं।
पशुपालन की शुरुआत: लोगों ने अपने घरों के आसपास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित किया।
प्रथम पालतू पशु: सबसे पहले जिस जंगली जानवर को पालतू बनाया गया, वह कुत्ता था। इसके बाद भेड़, बकरी और सूअर को पाला गया।
2. बसने की प्रक्रिया
लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को बसने की प्रक्रिया का नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही और लगभग $12,000$ साल पहले शुरू हुई।
चयन प्रक्रिया: लोग उन्हीं पौधों और जानवरों का चयन करते थे जो बीमार न हों। वे अहिंसक जानवरों को चुनते थे ताकि प्रजनन (Breeding) सुरक्षित रहे।
परिवर्तन: इस प्रक्रिया के कारण पालतू जानवर और उगाए गए पौधे जंगली जानवरों और पौधों से भिन्न हो गए। उदाहरण के लिए, जंगली जानवरों के दाँत और सींग पालतू जानवरों की तुलना में बड़े होते हैं।
3. एक नवीन जीवन-शैली
जब लोगों ने पौधे उगाना शुरू किया, तो उनकी देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा।
स्थायी निवास: बीज बोने से लेकर फसलों के पकने तक, सिंचाई करने, और खरपतवार हटाने के लिए लोगों ने एक जगह बसना शुरू किया।
भण्डारण: अनाज का उपयोग भोजन और बीज दोनों रूपों में करने के लिए उसे बचाकर रखना आवश्यक था। इसलिए लोगों ने बड़े-बड़े मिट्टी के बर्तन (Mridbhand) बनाए, टोकरियाँ बुनीं या जमीन में गड्ढे खोदे।
4. नवपाषाण युग के प्रमुख पुरास्थल और साक्ष्य
भारतीय उपमहाद्वीप में कई जगहों पर शुरुआती कृषकों और पशुपालकों के साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्वविदों को यहाँ से अनाज और जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं। यह CTET के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाग है।
प्रमुख स्थल और वहां मिली वस्तुएं:
| पुरास्थल | वर्तमान राज्य/स्थान | प्राप्त साक्ष्य (अनाज और हड्डियाँ) |
| मेहरगढ़ | आधुनिक पाकिस्तान | गेहूँ, जौ, भेड़, बकरी, मवेशी |
| कोल्डिहवा | उत्तर प्रदेश | चावल, जानवरों की हड्डियों के टुकड़े |
| महगड़ा | उत्तर प्रदेश | चावल, मवेशी (मिट्टी पर खुरों के निशान) |
| गुफक्राल | कश्मीर | गेहूँ और दलहन |
| बुर्ज़होम | कश्मीर | गेहूँ, दलहन, कुत्ते, मवेशी, भेड़, बकरी |
| चिरान्द | बिहार | गेहूँ, हरे चने, जौ, भैंस, बैल |
| हल्लूर | आन्ध्र प्रदेश | ज्वार-बाजरा, मवेशी, भेड़, सूअर |
| पैय्यमपल्ली | तमिलनाडु | काला चना, ज्वार-बाजरा, मवेशी, भेड़ |
5. महत्वपूर्ण स्थलों का विस्तृत विवरण
A. मेहरगढ़ (Mehrgarh)
यह ईरान जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते 'बोलन दर्रे' के पास एक हरा-भरा समतल स्थान है।
यहाँ स्त्री-पुरुषों ने सबसे पहले जौ-गेहूँ उगाना और भेड़-बकरी पालना सीखा।
घर: यहाँ चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक घर में चार या उससे अधिक कमरे थे, जिनमें से कुछ भण्डारण के काम आते होंगे।
कब्रें: मेहरगढ़ में कब्रों में मृतकों के साथ कुछ सामान भी रखे जाते थे। एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को दफनाया गया था, जिसे शायद परलोक में खाने के लिए रखा गया होगा।
B. बुर्ज़होम (Burzahom)
वर्तमान कश्मीर में स्थित इस स्थल पर लोग अनोखे प्रकार के घर बनाते थे।
गर्तवास: यहाँ के लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें गर्तवास कहा जाता है। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं। ये ठंड के मौसम में सुरक्षा प्रदान करते थे।
आग के साक्ष्य: झोपड़ियों के अंदर और बाहर दोनों जगह आग जलाने की जगहें मिली हैं, जिससे पता चलता है कि लोग मौसम के अनुसार खाना पकाते थे।
C. दाओजली हेडिंग (Daojali Hading)
यह स्थल चीन और म्यांमार जाने वाले रास्ते पर ब्रह्मपुत्र की घाटी की एक पहाड़ी पर है (असम)।
यहाँ से खरल और मूसल जैसे पत्थरों के उपकरण मिले हैं, जिससे पता चलता है कि लोग भोजन के लिए अनाज कूटते थे।
यहाँ से जेडाइट (Jadeite) पत्थर भी मिला है, जो संभवतः चीन से लाया गया होगा।
काष्ठाश्म (प्राचीन लकड़ी जो सख्त होकर पत्थर बन गई है) के औजार और बर्तन भी यहाँ मिले हैं।
6. औजार और तकनीक
नवपाषाण युग में पत्थर के औजारों में महत्वपूर्ण बदलाव आए।
पॉलिश: औजारों की धार को और अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी।
ओखली और मूसल: इनका प्रयोग अनाज और वनस्पतियों को पीसने के लिए किया जाता था। आज हजारों साल बाद भी इनका प्रयोग होता है।
ध्यान दें कि इस काल में भी कुछ औजार हड्डियों से बनाए जाते थे।
7. रीति-रिवाज और जनजातीय जीवन
पुरातत्वविदों ने पशुपालक समूहों को 'जनजाति' का नाम दिया है।
सामुदायिक जीवन: जनजाति के लोग छोटी-छोटी बस्तियों में रहते थे और अधिकतर परिवार एक-दूसरे से संबंधित होते थे।
कार्य विभाजन: महिलाएँ खेती का अधिकांश काम (जमीन तैयार करना, बीज बोना, फसल काटना) करती थीं। पुरुष आमतौर पर पशुओं के बड़े झुंड चराते थे।
समानता: जनजातीय समाज में अमीर-गरीब का भेद नहीं होता था। सभी मिलकर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते थे।
8. परीक्षा उपयोगी सारांश (Quick Recap)
कृषि और स्थायी जीवन की शुरुआत नवपाषाण काल में हुई।
सबसे प्राचीन फसलें गेहूँ और जौ हैं।
चावल के प्राचीनतम साक्ष्य कोल्डिहवा (उत्तर प्रदेश) से मिले हैं।
बुर्ज़होम (कश्मीर) गर्तवास के लिए प्रसिद्ध है।
मेहरगढ़ में मृतक के साथ बकरी दफनाने के साक्ष्य मिले हैं।
चिरान्द बिहार में स्थित एक महत्वपूर्ण नवपाषाण स्थल है जहाँ हड्डी के उपकरण मिले हैं।
नवपाषाण युग
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