सिंधु घाटी सभ्यता

Sunil Sagare
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 सिंधु घाटी सभ्यता भारत के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह न केवल भारत की बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यताओं में से एक है। CTET और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षाओं के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नोट्स NCERT (कक्षा 6 और 12) के तथ्यों पर आधारित हैं।

1. परिचय और नामकरण

  • कांस्य युगीन सभ्यता: यह एक कांस्य युगीन (Bronze Age) सभ्यता थी। इस समय मनुष्य ने तांबे और टिन को मिलाकर कांसा बनाना सीख लिया था।

  • प्रथम नगरीकरण: भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार नगरों का उदय इसी सभ्यता के दौरान हुआ, इसलिए इसे 'प्रथम नगरीकरण' कहा जाता है।

  • नामकरण:

    • सिंधु घाटी सभ्यता: प्रारंभिक स्थल सिंधु नदी के किनारे मिले थे, इसलिए इसे यह नाम दिया गया।

    • हड़प्पा सभ्यता: पुरातत्वविदों की परंपरा के अनुसार, किसी सभ्यता का नामकरण उसके सबसे पहले खोजे गए स्थल के नाम पर किया जाता है। 1921 में दयाराम साहनी द्वारा खोजा गया पहला स्थल 'हड़प्पा' था।

2. कालक्रम (Timeline)

रेडियो-कार्बन डेटिंग ($\text{C}^{14}$) जैसी वैज्ञानिक विधियों के आधार पर इसका सर्वमान्य कालक्रम निम्नलिखित माना जाता है:

  • परिपक्व हड़प्पा चरण: 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व।

  • यह सभ्यता लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व तक अपने चरम पर थी।

3. भौगोलिक विस्तार

यह सभ्यता केवल सिंधु नदी तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका विस्तार बहुत व्यापक था।

  • क्षेत्रफल: लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर।

  • आकार: त्रिभुजाकार।

  • विस्तार की सीमाएँ:

    • उत्तर: मांडा (जम्मू-कश्मीर) - चिनाब नदी के तट पर।

    • दक्षिण: दायमाबाद (महाराष्ट्र) - प्रवरा नदी के तट पर।

    • पूर्व: आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) - हिंडन नदी के तट पर।

    • पश्चिम: सुत्कागेंडोर (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) - दासक नदी के तट पर।

4. नगर नियोजन (Town Planning) - सबसे महत्वपूर्ण विशेषता

सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसका अद्वितीय नगर नियोजन था, जो समकालीन मेसोपोटामिया या मिस्र की सभ्यताओं में भी नहीं दिखता।

ग्रिड पद्धति (Grid System):

  • नगरों की सड़कें एक-दूसरे को समकोण ($90^\circ$) पर काटती थीं।

  • इससे नगर कई आयताकार खंडों में विभाजित हो जाता था।

  • गलियां सीधी और चौड़ी होती थीं। मुख्य सड़क को 'राजपथ' कहा जाता था।

नगर का विभाजन:

अधिकांश नगर दो भागों में विभाजित थे:

  1. दुर्ग (Citadel): यह पश्चिमी भाग में होता था और ऊंचाई पर बना होता था। यहाँ संभवतः शासक वर्ग या महत्वपूर्ण इमारतें (जैसे अन्नागार) स्थित थीं। इसे कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनाया जाता था।

  2. निचला नगर (Lower Town): यह पूर्वी भाग में होता था और बड़ा होता था। यहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी और शिल्पकार रहते थे।

ईंटों का प्रयोग:

  • मकान बनाने के लिए पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था।

  • ईंटों का एक निश्चित अनुपात होता था - लंबाई : चौड़ाई : मोटाई = $4:2:1$

जल निकासी प्रणाली (Drainage System):

  • यह इस सभ्यता की सबसे अद्भुत उपलब्धि थी।

  • हर घर से गंदा पानी छोटी नालियों में जाता था, जो गली की बड़ी नाली से मिलती थीं।

  • नालियां ईंटों या पत्थर की पट्टियों से ढकी होती थीं।

  • सफाई के लिए थोड़ी-थोड़ी दूर पर 'मैनहोल' (Soak pits) बनाए गए थे।

5. प्रमुख स्थल और उनकी विशेषताएँ (Exam Specific Facts)

CTET में अक्सर स्थलों और वहां से मिली वस्तुओं का मिलान करने को कहा जाता है।

क. हड़प्पा (Harappa)

  • स्थिति: पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में, रावी नदी के बाएं तट पर।

  • खोजकर्ता: दयाराम साहनी (1921)।

  • प्रमुख खोजें:

    • 6-6 की कतार में 12 अन्नागार (Anaj Godown)।

    • कब्रिस्तान R-37।

    • स्त्री के गर्भ से निकलता हुआ पौधा (उर्वरता की देवी की मुहर)।

    • पत्थर की नटराज जैसी मूर्ति।

ख. मोहनजोदड़ो (Mohenjodaro)

  • अर्थ: सिंधी भाषा में इसका अर्थ है 'मृतकों का टीला'।

  • स्थिति: पाकिस्तान के सिंध प्रांत में, सिंधु नदी के दाहिने तट पर।

  • खोजकर्ता: राखलदास बनर्जी (1922)।

  • प्रमुख खोजें:

    • विशाल स्नानागार (Great Bath): यह धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयोग किया जाता था। इसका फर्श पक्की ईंटों का था और उस पर जिप्सम का लेप लगाया गया था ताकि पानी न रिसे।

    • विशाल अन्नागार: यह मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत थी।

    • कांस्य नर्तकी: धातु की बनी एक नग्न स्त्री की मूर्ति।

    • पशुपति मुहर: एक योगी की मुद्रा में बैठा व्यक्ति जिसके चारों ओर जानवर हैं।

    • सूती कपड़े का टुकड़ा।

ग. लोथल (Lothal)

  • स्थिति: गुजरात, भोगवा नदी के तट पर।

  • महत्व: यह इस सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह (Dockyard) था।

  • प्रमुख खोजें:

    • गोदीवाड़ा (जहाज रुकने का स्थान)।

    • चावल के साक्ष्य (धान की भूसी)।

    • अग्निकुंड (यज्ञ वेदी)।

    • युगल शवाधान (स्त्री और पुरुष को एक साथ दफनाना)।

    • मनके बनाने का कारखाना।

घ. कालीबंगा (Kalibangan)

  • अर्थ: काले रंग की चूड़ियां।

  • स्थिति: राजस्थान (हनुमानगढ़ जिला), घग्घर नदी के किनारे।

  • प्रमुख खोजें:

    • जुते हुए खेत के साक्ष्य (एक साथ दो फसलें उगाने के प्रमाण)।

    • अग्निकुंड।

    • भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य।

    • लकड़ी की नाली।

ङ. धोलावीरा (Dholavira)

  • स्थिति: गुजरात (कच्छ का रण)।

  • विशेषता:

    • अन्य नगरों के विपरीत, यह नगर तीन भागों में विभाजित था: दुर्ग, मध्यम नगर और निचला नगर।

    • जल प्रबंधन: यहाँ उन्नत जल संचयन प्रणाली (Water Harvesting) मिली है। वर्षा के पानी को इकट्ठा करने के लिए बड़े जलाशय बनाए गए थे।

    • हड़प्पा लिपि के बड़े अक्षरों वाला एक साइनबोर्ड।

च. राखीगढ़ी (Rakhigarhi)

  • स्थिति: हरियाणा।

  • महत्व: यह भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है।

छ. चन्हूदड़ो (Chanhudaro)

  • स्थिति: पाकिस्तान (सिंध)।

  • विशेषता: यह एक औद्योगिक केंद्र था।

  • खोजें: मनके बनाना, मुहर बनाना, लिपस्टिक के साक्ष्य, बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पंजों के निशान। यह एकमात्र ऐसा नगर था जहाँ दुर्ग नहीं था।

6. आर्थिक जीवन

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन और व्यापार पर आधारित थी।

कृषि:

  • ये लोग गेहूं और जौ मुख्य रूप से उगाते थे।

  • इन्होंने ही सबसे पहले कपास की खेती शुरू की थी। यूनानी लोग कपास को 'सिंडन' कहते थे।

  • कालीबंगा से हल से जुते हुए खेत मिले हैं, जबकि बनावली (हरियाणा) से मिट्टी का बना हुआ हल (खिलौना) मिला है।

  • सिंचाई के लिए नहरों के प्रमाण कम मिले हैं (सिर्फ शोरतुघई, अफगानिस्तान में), संभवतः कुओं और वर्षा जल का प्रयोग होता था।

पशुपालन:

  • बैल, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर पाले जाते थे।

  • कूबड़ वाला सांड विशेष प्रिय था।

  • घोड़े के अस्तित्व पर संदेह है। सुरकोटदा (गुजरात) से घोड़े की हड्डियाँ मिलने का दावा किया गया है, लेकिन समाज घोड़ों पर केंद्रित नहीं था (जैसा कि बाद में वैदिक काल में हुआ)।

व्यापार और वाणिज्य:

  • व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) पर आधारित था, क्योंकि सिक्कों का प्रचलन नहीं था।

  • माप-तौल के लिए $16$ के गुणज (multiples of 16) वाले बाटों का प्रयोग होता था।

  • विदेशी व्यापार: मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) के साथ गहरे व्यापारिक संबंध थे।

    • मेसोपोटामिया के अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र को 'मेलुहा' कहा गया है।

    • दिलमुन (बहरीन) और मगन (ओमान) मध्यस्थ बंदरगाह थे।

आयात की जाने वाली वस्तुएं:

  • सोना: कर्नाटक (कोलार खान) और अफगानिस्तान।

  • चांदी: अफगानिस्तान और ईरान।

  • तांबा: खेतड़ी (राजस्थान) और ओमान।

  • टिन: अफगानिस्तान।

  • लाजवर्द (Lapis Lazuli): शोरतुघई (अफगानिस्तान)।

7. सामाजिक जीवन

  • समाज संभवतः मातृसत्तात्मक था, क्योंकि बहुत सी नारी मृण्मूर्तियां (मिट्टी की मूर्तियां) मिली हैं।

  • समाज चार वर्गों में बंटा हो सकता था: विद्वान (पुरोहित), योद्धा, व्यापारी और श्रमिक।

  • लोग शांतिप्रिय थे, बहुत कम हथियार मिले हैं।

  • भोजन: शाकाहारी और मांसाहारी दोनों।

  • वस्त्र: सूती और ऊनी वस्त्रों का प्रयोग। पुरुष और महिलाएं दोनों आभूषण पहनते थे।

  • मनोरंजन: पासा (Dice) खेलना, शिकार करना और नृत्य।

8. कला और शिल्प

मुहरें (Seals):

  • इस सभ्यता की सबसे विशिष्ट कलाकृति मुहरें हैं।

  • ये आमतौर पर सेलखड़ी (Steatite - एक प्रकार का नरम पत्थर) की बनी होती थीं।

  • मुहरों पर जानवरों (एक सींग वाला गैंडा, सांड, हाथी) और लिपि के चित्र मिलते हैं।

मृदभांड (Pottery):

  • ये लाल रंग के बर्तन बनाते थे जिन पर काले रंग से चित्रकारी की जाती थी (Red and Black Pottery)।

  • चित्रों में ज्यामितीय आकृतियां और पेड़-पौधे होते थे।

धातु कला:

  • लॉस्ट वैक्स तकनीक (Lost Wax Technique) का प्रयोग करके कांस्य की मूर्तियां बनाई जाती थीं (जैसे - नर्तकी की मूर्ति)।

9. धार्मिक मान्यताएँ

हमें कोई मंदिर या पूजा स्थल नहीं मिला है, लेकिन मूर्तियों और मुहरों से धर्म का अनुमान लगाया जाता है।

  • मातृदेवी की पूजा: उर्वरता की देवी के रूप में।

  • पशुपति महादेव: मोहनजोदड़ो से मिली मुहर पर एक योगी बैठा है, जिसे 'आद्य-शिव' (Proto-Shiva) माना गया है।

  • प्रकृति पूजा: पीपल के पेड़ और जानवरों (विशेषकर एक सींग वाला जानवर और कूबड़ वाला सांड) की पूजा।

  • लिंग और योनि पूजा: पत्थर के प्रतीकों की पूजा के साक्ष्य मिले हैं।

  • अंतिम संस्कार: मृतकों को उत्तर-दक्षिण दिशा में दफनाया जाता था। कुछ स्थानों पर शव के साथ सामान (जैसे आभूषण, बर्तन) भी रखे जाते थे।

10. लिपि (Script)

  • हड़प्पा लिपि भावचित्रात्मक (Pictographic) थी। इसमें अक्षरों की जगह चिन्हों का प्रयोग होता था।

  • यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

  • लिखने का तरीका: यह संभवतः दाईं से बाईं ओर (Right to Left) लिखी जाती थी। इसे 'बूस्ट्रोफीडन' शैली कहा जाता है।

11. पतन के कारण (Decline)

1900 ईसा पूर्व के आसपास यह सभ्यता कमजोर पड़ने लगी। इसके पतन का कोई एक कारण नहीं था, बल्कि कई कारणों का मिश्रण था:

  • बाढ़: मोहनजोदड़ो और चन्हूदड़ो जैसे नगर बार-बार बाढ़ से नष्ट हुए।

  • नदियों का मार्ग बदलना: सिंधु नदी ने अपना मार्ग बदल लिया जिससे बस्तियां पानी से दूर हो गईं।

  • सरस्वती नदी का सूखना: घग्घर-हकरा (प्राचीन सरस्वती) नदी के सूखने से कृषि और जीवन असंभव हो गया।

  • जलवायु परिवर्तन: वनों की अत्यधिक कटाई के कारण वर्षा कम होने लगी।

  • बाहरी आक्रमण: कुछ इतिहासकार (जैसे व्हीलर) आर्यों के आक्रमण को कारण मानते हैं, लेकिन अब इसे अधिक स्वीकार नहीं किया जाता।

महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts for Revision)

  • हड़प्पा के लोग लोहे (Iron) से परिचित नहीं थे।

  • सिंधु सभ्यता में शेर (Lion) के साक्ष्य नहीं मिले हैं।

  • स्वतंत्रता के बाद सबसे अधिक स्थल गुजरात में खोजे गए हैं।

  • यह एक नगरीय (Urban) सभ्यता थी, जबकि बाद की वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी।



सिंधु घाटी सभ्यता

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