आदिमानव: आखेटक से खाद्य संग्राहक तक (Hunter-Gatherers)

Sunil Sagare
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यह अध्याय मानव इतिहास के उस कालखंड का वर्णन करता है जब मनुष्य ने अपनी यात्रा एक 'आखेटक-खाद्य संग्राहक' (Hunter-Gatherer) के रूप में शुरू की और धीरे-धीरे एक स्थायी कृषक समाज का निर्माण किया। CTET की परीक्षा में इस अध्याय से पाषाण काल, प्रमुख पुरास्थल और मानव विकास के चरणों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।

1. आरम्भिक मानव: आखेटक-खाद्य संग्राहक (Hunter-Gatherers)

भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 20 लाख वर्ष (2 Million Years) पहले जो लोग रहते थे, उन्हें हम आखेटक-खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं। यह नाम उनके भोजन जुटाने की विधि पर आधारित है।

जीवन शैली और विशेषताएँ

  • भोजन: वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे, मछलियाँ और चिड़ियाँ पकड़ते थे। इसके अलावा वे फल-मूल, दाने, पौधे, पत्तियाँ और अंडे इकट्ठा किया करते थे।

  • खानाबदोश जीवन: ये लोग एक जगह पर स्थायी रूप से नहीं रहते थे। भोजन और पानी की तलाश में उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमना पड़ता था।

  • ज्ञान और कौशल: शिकार करने के लिए जानवरों की आदतों और पेड़-पौधों के बारे में जानकारी होना आवश्यक था। सतर्कता और तेज गति उनकी दिनचर्या का हिस्सा थी।

एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने के 4 मुख्य कारण

NCERT और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के अनुसार, आरम्भिक मानव के घूमने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  1. संसाधनों की समाप्ति: यदि वे एक ही जगह पर ज्यादा दिनों तक रहते, तो वहाँ के फल-फूल और जानवरों को खाकर समाप्त कर देते थे।

  2. जानवरों का पीछा करना: जानवर अपने चारे की तलाश में (हिरण, मवेशी) एक जगह से दूसरी जगह जाते थे, इसलिए शिकारी भी उनके पीछे-पीछे जाते थे।

  3. मौसमी फल-फूल: अलग-अलग पेड़ों और पौधों में फल-फूल अलग-अलग मौसम में आते हैं। इसलिए लोग उनकी तलाश में मौसम के अनुसार स्थानों में परिवर्तन करते थे।

  4. जल संकट: पानी जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। कई नदियाँ और झीलें मौसमी होती हैं (सूख जाती हैं), इसलिए सूखे मौसम में पानी की तलाश में उन्हें अन्य स्थानों पर जाना पड़ता था।


2. पाषाण काल का वर्गीकरण (Classification of Stone Age)

पुरातत्वविदों ने पत्थरों के औजारों के आकार और जलवायु परिवर्तन के आधार पर इतिहास को तीन मुख्य भागों में विभाजित किया है।

क. पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)

यह शब्द दो यूनानी शब्दों 'पेलियो' (पुराना) और 'लिथिक' (पत्थर) से बना है।

  • समय सीमा: 20 लाख वर्ष पूर्व से 12,000 वर्ष पूर्व तक।

  • महत्व: यह मानव इतिहास की 99% कहानी को समेटे हुए है।

  • उप-विभाजन: इसे तीन भागों में बांटा गया है:

    1. आरम्भिक पुरापाषाण काल

    2. मध्य पुरापाषाण काल

    3. उत्तर पुरापाषाण काल

  • औजार: इस काल के औजार बड़े और बेडौल होते थे।

  • शुतुरमुर्ग के साक्ष्य: भारत में पुरापाषाण काल के दौरान शुतुरमुर्ग होते थे। महाराष्ट्र के पटने नामक पुरास्थल से शुतुरमुर्ग के अंडों के अवशेष मिले हैं। इनके कुछ छिलकों पर चित्रांकन भी मिलता है।

ख. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

यह वह समय है जब हमें पर्यावरणीय बदलाव (Environmental Changes) देखने को मिलते हैं।

  • समय सीमा: लगभग 12,000 वर्ष पूर्व से 10,000 वर्ष पूर्व तक।

  • जलवायु परिवर्तन: लगभग 12,000 साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आए और गर्मी बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप घास के मैदान बनने लगे।

  • घास के मैदानों का प्रभाव: घास खाने वाले जानवरों (हिरण, बारहसिंगा, भेड़, बकरी) की संख्या बढ़ी। मानव ने इन जानवरों की आदतों को सीखा और उन्हें पालतू बनाने की ओर कदम बढ़ाया।

  • माइक्रोलिथ (Microliths): इस काल के पत्थर के औजार बहुत छोटे होते थे। इन्हें 'लघु पाषाण' या माइक्रोलिथ कहा जाता है।

    • अक्सर इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे (Handles) लगे होते थे।

    • हंसिया और आरी जैसे औजार इसी समय बनने शुरू हुए।

    • पुराने प्रकार के औजार भी उपयोग में आते रहे।

ग. नवपाषाण काल (Neolithic Age)

यह मानव सभ्यता में क्रांतिकारी बदलाव का दौर था।

  • समय सीमा: 10,000 वर्ष पूर्व से आरम्भ।

  • विशेषताएँ: कृषि की शुरुआत, स्थायी निवास, पहिए का आविष्कार और बर्तनों का निर्माण।

  • औजार: इस काल के औजारों की धार को और अधिक पैना करने के लिए उन पर 'पॉलिश' चढ़ाई जाती थी। ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज पीसने के लिए किया जाने लगा (जो आज भी होता है)।


3. औजार निर्माण की तकनीकें (Tool Making Techniques)

आरम्भिक मानव ने अपनी जरूरतों के लिए पत्थरों, लकड़ियों और हड्डियों के औजार बनाए। पत्थर के औजार बनाने की दो मुख्य तकनीकें थीं:

  1. पत्थर से पत्थर टकराना (Stone on Stone):

    • जिस पत्थर से औजार बनाना होता था (Core), उसे एक हाथ में पकड़ा जाता था।

    • दूसरे हाथ में एक और पत्थर (Hammer) लेकर उस पर चोट मारी जाती थी।

    • यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती थी जब तक वांछित आकार न मिल जाए।

  2. दबाव शल्क तकनीक (Pressure Flaking):

    • इसमें क्रोड (जिस पत्थर को तराशना है) को एक स्थिर सतह पर टिकाया जाता था।

    • इस क्रोड पर हड्डी या पत्थर रखकर उस पर हथौड़ीनुमा पत्थर से चोट मारकर शल्क (Flakes) निकाले जाते थे।

    • इससे बहुत ही बारीक और तीखे औजार बनाए जाते थे।


4. प्रमुख पुरास्थल और उनकी विशेषताएँ (Major Sites & Features)

CTET परीक्षा में मानचित्र आधारित प्रश्न या मिलान वाले प्रश्न अक्सर इन स्थलों से पूछे जाते हैं।

पुरास्थल का नामराज्य (वर्तमान)काल (Period)मुख्य विशेषता/प्राप्त अवशेष
भीमबेटका (Bhimbetka)मध्य प्रदेशपुरापाषाणगुफाएँ और कन्दराएँ, शैल चित्रकला (Rock Paintings)। मानव यहाँ बारिश, धूप और हवा से बचने के लिए रहता था। ये गुफाएँ नर्मदा घाटी के पास हैं।
हुंस्गी (Hunsgi)कर्नाटकपुरापाषाणयहाँ औजार बनाने के कारखाने (Factory sites) मिले हैं। यहाँ के औजार अक्सर चूना पत्थर (Limestone) से बनाए जाते थे।
कुरनूल गुफाएँ (Kurnool)आंध्र प्रदेशपुरापाषाणयहाँ राख के अवशेष मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि आरम्भिक मानव आग जलाना सीख गया था। आग का प्रयोग प्रकाश, मांस पकाने और जानवरों को भगाने के लिए होता था।
बुर्जहोम (Burzahom)कश्मीरनवपाषाणयहाँ लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें गर्तावास (Pit-houses) कहा जाता है। इनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं।
मेहरगढ़ (Mehrgarh)पाकिस्ताननवपाषाणबोलन दर्रे के पास स्थित। यहाँ सबसे पहले गेहूँ-जौ उगाने और भेड़-बकरी पालने के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ चौकोर या आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं।
कोल्डिहवा (Koldihwa)उत्तर प्रदेशनवपाषाणचावल की खेती के प्राचीनतम प्रमाण।
महागढ़ा (Mahagara)उत्तर प्रदेशनवपाषाणचावल और मवेशियों (खुरों के निशान) के मिट्टी पर साक्ष्य।
दाओजली हेडिंगअसमनवपाषाणयहाँ से खरल और मूसल जैसे पत्थर के उपकरण मिले हैं। यहाँ से जेडाइट (Jadeite) पत्थर भी मिला है जो संभवतः चीन से आया होगा।

5. शैल चित्रकला (Rock Paintings)

आरम्भिक मानव केवल शिकार ही नहीं करता था, बल्कि उसने अपनी कलात्मक क्षमता का भी प्रदर्शन किया।

  • स्थान: मध्य प्रदेश (भीमबेटका) और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की गुफाएँ।

  • विषय: इन चित्रों में जंगली जानवरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है।

  • रंग: इन चित्रों को बनाने के लिए गेरू, लोह अयस्क और चारकोल जैसे खनिजों का उपयोग किया जाता था।

  • उद्देश्य: संभवतः ये चित्र किसी अनुष्ठान का हिस्सा थे या शिकार की योजना बनाने के लिए बनाए जाते थे।


6. कृषि और पशुपालन की शुरुआत (Beginning of Farming & Herding)

लगभग 12,000 साल पहले जलवायु परिवर्तन के बाद दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गेहूँ, जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे।

  • प्रथम कृषक: महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने इन अनाजों को भोजन के लिए बटोरना शुरू किया और धीरे-धीरे उन्हें उगाना सीखा। इस प्रकार वे कृषक बने।

  • पशुपालन (Domestication): लोगों ने अपने घरों के आसपास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित कर उन्हें पालतू बनाया।

    • सबसे पहले पालतू बनाया गया जानवर: कुत्ता (जंगली पूर्वज)।

    • बाद में भेड़, बकरी और मवेशी पाले गए। ये जानवर झुंड में रहते थे और घास खाते थे।

    • मानव इन जानवरों की जंगली हिंसक जानवरों से रक्षा करता था, जिससे वे पशुपालक बने।


7. 'बसने की प्रक्रिया' (Process of Settlement)

लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को 'बसने की प्रक्रिया' का नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही (लगभग 12,000 साल पहले शुरू हुई)।

  • कृषि और स्थिरता: कृषि के लिए एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ता था (बीज बोने से लेकर फसल पकने तक)। इसने घुमक्कड़ जीवन को समाप्त कर स्थायी जीवन को जन्म दिया।

  • भंडारण (Storage): अनाज का उपयोग भोजन और बीज दोनों रूपों में करना था, इसलिए इसके भंडारण की आवश्यकता हुई। इसके लिए मिट्टी के बड़े बर्तन, टोकरियाँ बनाई गईं या जमीन में गड्ढे खोदे गए।


8. नवपाषाण युगीन सामाजिक जीवन और मृत्यु संस्कार

जनजाति (Tribes)

नवपाषाण काल के कृषक और पशुपालक समूह में रहते थे जिन्हें 'जनजाति' कहते हैं।

  • इनके रीति-रिवाज और परंपराएँ भिन्न थीं।

  • संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर पूरे समुदाय का अधिकार होता था। अमीर-गरीब का खास अंतर नहीं था।

मृत्यु और परलोक (Burial Practices)

  • मेहरगढ़ में कब्रें: मेहरगढ़ में कई ऐसी कब्रें मिली हैं जहाँ मृतक के साथ सामान रखा जाता था।

  • एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था।

  • लोगों की आस्था थी कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है, इसलिए यह बकरी संभवतः परलोक में मृतक के खाने के लिए रखी गई होगी।


9. महत्वपूर्ण शब्दावली (Key Terminology)

  • पुरास्थल (Sites): वह स्थान जहाँ औजार, बर्तन और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं। ये जमीन के ऊपर, अंदर, या कभी-कभी पानी के नीचे भी पाए जा सकते हैं।

  • उद्योग स्थल (Factory Sites): वे स्थान जहाँ अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर मिलते थे और लोग वहाँ औजार बनाते थे।

  • आवासीय-उद्योग स्थल (Habitation-cum-factory sites): जब लोग औजार बनाने वाले स्थानों पर अधिक समय तक रहते थे, तो उन्हें आवासीय-उद्योग स्थल कहा जाता है।


परीक्षा उपयोगी त्वरित तथ्य (Quick Facts for Revision)

  • भीमबेटका: मध्य प्रदेश (आवासीय पुरास्थल)।

  • राख के अवशेष: कुरनूल गुफाएँ (आग की खोज)।

  • शुतुरमुर्ग के अंडे: पटने, महाराष्ट्र (पुरापाषाण काल)।

  • सूक्ष्म पाषाण (Microliths): मध्यपाषाण काल (12,000 - 10,000 वर्ष पूर्व)।

  • पॉलिशदार औजार: नवपाषाण काल।

  • गर्तावास: बुर्जहोम (कश्मीर)।

  • मृतक के साथ बकरी: मेहरगढ़।



आदिमानव: आखेटक से खाद्य संग्राहक तक

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