निदानात्मक और उपचारात्मक शिक्षण

Sunil Sagare
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शिक्षण प्रक्रिया केवल पाठ पढ़ा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी शिक्षक का दायित्व है कि बच्चे ने कितना सीखा है और यदि वह नहीं सीख पा रहा है, तो उसके पीछे के कारण क्या हैं। आज के इस आर्टिकल में हम निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test) और उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) को विस्तार से समझेंगे। यह नोट्स "Point-to-Point" फॉर्मेट में हैं ताकि आप कम समय में बेहतरीन रिव्यु कर सकें।


1. निदानात्मक शिक्षण (Diagnostic Teaching)

'निदान' (Diagnosis) शब्द मूलतः चिकित्सा क्षेत्र से लिया गया है। जिस प्रकार एक डॉक्टर इलाज करने से पहले बीमारी के कारणों का पता लगाता है, ठीक उसी प्रकार शिक्षण में शिक्षक छात्र की कठिनाइयों का पता लगाता है।

  • परिभाषा: शिक्षण की वह प्रक्रिया जिसके द्वारा छात्रों की सीखने सम्बन्धी कठिनाइयों, कमियों और रिक्तियों (Learning Gaps) का पता लगाया जाता है, निदानात्मक शिक्षण कहलाता है।

  • मुख्य उद्देश्य:

    • छात्र की विषय-विशेष में पिछड़ेपन के कारणों को खोजना।

    • त्रुटियों के प्रकार (Types of errors) की पहचान करना।

    • छात्र की मानसिक और बौद्धिक क्षमता का आकलन करना।

    • उपचारात्मक शिक्षण के लिए आधार तैयार करना।

याद रखें: निदानात्मक परीक्षण का कार्य केवल "कमियों की पहचान करना" है, उन्हें दूर करना नहीं। दूर करने का कार्य उपचारात्मक शिक्षण में होता है।


2. उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)

निदान के पश्चात जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे उपचारात्मक शिक्षण कहते हैं। इसे 'शैक्षणिक उपचार' भी कहा जाता है।

  • परिभाषा: निदानात्मक परीक्षण द्वारा पहचानी गई छात्रों की अधिगम सम्बन्धी कठिनाइयों और दोषों को दूर करने के लिए जो शिक्षण विधियां अपनाई जाती हैं, उन्हें उपचारात्मक शिक्षण कहते हैं।

  • उदाहरण: यदि निदान में पता चलता है कि बच्चा 'क' और 'फ' में अंतर नहीं कर पा रहा है, तो शिक्षक उसे चित्रों या फ्लैश कार्ड्स के माध्यम से इन दोनों अक्षरों का विशेष अभ्यास कराएगा। यह प्रक्रिया उपचारात्मक शिक्षण है।

उपचारात्मक शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य

  • विद्यार्थियों की ज्ञानपरक अशुद्धियों को जड़ से समाप्त करना।

  • भाषायी कौशलों (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) में आने वाली बाधाओं को दूर करना।

  • छात्रों को हीन भावना (Inferiority Complex) से बचाना और आत्मविश्वास जगाना।

  • छात्रों को अपनी क्षमता के अनुसार प्रगति करने का अवसर देना।

  • गलत आदतों को सुधारकर सही आदतों का निर्माण करना।


3. निदानात्मक और उपचारात्मक शिक्षण में अंतर

यह समझना आवश्यक है कि ये दोनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे की पूरक हैं, लेकिन समान नहीं हैं।

  • निदानात्मक परीक्षण: इसका केंद्र बिंदु "समस्या का कारण" खोजना है। यह 'क्यों' (Why) पर केंद्रित है। (बच्चा क्यों नहीं सीख पा रहा?)

  • उपचारात्मक शिक्षण: इसका केंद्र बिंदु "समस्या का समाधान" है। यह 'कैसे' (How) पर केंद्रित है। (समस्या को कैसे दूर किया जाए?)

  • क्रम: शिक्षण प्रक्रिया में पहले निदानात्मक परीक्षण होता है, उसके बाद ही उपचारात्मक शिक्षण संभव है।


4. भाषा दोष और उच्चारण सम्बन्धी विकार (Common Language Defects)

हिंदी पेडागोजी में उच्चारण दोषों से जुड़े प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। बच्चे अक्सर क्षेत्रीय प्रभाव या अज्ञानता के कारण अशुद्ध उच्चारण करते हैं।

प्रमुख उच्चारण दोष और उनके उदाहरण

  • स्वर-लोप (Deletion of Vowel):

    • जब बच्चा शब्द बोलते समय किसी स्वर को खा जाता है या छोड़ देता है।

    • उदाहरण: 'क्षत्रिय' को 'छत्री' बोलना, 'परमात्मा' को 'प्रमात्मा' बोलना, 'ईश्वर' को 'इस्सर' बोलना।

  • स्वर-भक्ति (Insertion of Vowel / Vowel Svarabhakti):

    • जब बच्चा आधे अक्षर को पूरा बोलने के लिए अनावश्यक स्वर जोड़ देता है।

    • उदाहरण: 'बृजेन्द्र' को 'बरजेन्दर' बोलना, 'श्री' को 'सिरी' बोलना, 'शक्ति' को 'सकती' बोलना, 'प्रताप' को 'परताप' बोलना।

  • स्वरागम (Prothesis):

    • शब्द के आरंभ में अनावश्यक स्वर जोड़ देना।

    • उदाहरण: 'स्नान' को 'अस्नान' बोलना, 'स्कूल' को 'इस्कूल' बोलना, 'स्टेशन' को 'इस्टेशन' बोलना।

  • इकार-उकार भ्रम:

    • मात्राओं को छोटा या बड़ा कर देना।

    • उदाहरण: 'कवि' को 'कवी', 'हिंदू' को 'हिन्दु' बोलना।

  • हड़बड़ाहट या तुतलाहट:

    • जल्दी बोलने के चक्कर में अक्षरों का स्पष्ट न होना।

    • उदाहरण: 'तुम्हारा घर कहाँ है' को 'ततत.. तुम्मामारा घघरर...' बोलना।

  • क्षेत्रीय प्रभाव:

    • अलग-अलग राज्यों की बोलियों का हिंदी उच्चारण पर प्रभाव।

    • उदाहरण: बिहार/यूपी के कुछ क्षेत्रों में 'ड़' और 'ड' में भ्रम (सड़क को सडक), या पंजाब के प्रभाव से 'श' को 'स' बोलना।

  • शब्द विपर्यय (Metathesis):

    • शब्द के अक्षरों को आगे-पीछे कर देना।

    • उदाहरण: 'मतलब' को 'मतबल' बोलना, 'जानवर' को 'जनावर' बोलना, 'लिफाफा' को 'लिलाफा' बोलना।


5. प्रमुख अधिगम अक्षमताएं (Learning Disabilities)

CTET में यह सबसे महत्वपूर्ण खंड है। ये विकार बच्चों में भाषायी और गणितीय कौशल में बाधा बनते हैं।

1. डिस्लेक्सिया (Dyslexia) - पठन विकार

  • लक्षण: पढ़ने में कठिनाई होना।

  • पहचान: बच्चा 'b' को 'd', 'saw' को 'was' या '6' को '9' पढ़ता है।

  • शब्दों के अक्षरों के क्रम को पहचानने में दिक्कत होती है।

  • इसे 'शब्द अंधता' भी कहा जाता है।

2. डिस्ग्राफिया (Dysgraphia) - लेखन विकार

  • लक्षण: लिखने में कठिनाई, खराब हस्तलेख (Handwriting)।

  • कारण: यह सूक्ष्म गतिक कौशल (Fine Motor Skills) में कमी या उंगलियों/हथेली के समन्वय में दिक्कत के कारण होता है।

  • बच्चा सीधी रेखा में नहीं लिख पाता या शब्द ऊपर-नीचे होते हैं।

3. डिस्कैलकुलिया (Dyscalculia) - गणितीय विकार

  • लक्षण: गणितीय गणनाओं (Calculations) में कठिनाई।

  • बच्चा जोड़, घटाव, गुणा, भाग के चिन्हों को समझने में असमर्थ होता है।

  • समय देखने या पैसों का हिसाब रखने में दिक्कत होती है।

4. अफेज्या / डिस्फेजिया (Aphasia / Dysphasia) - भाषा एवं सम्प्रेषण विकार

  • लक्षण: मौखिक रूप से विचारों को व्यक्त करने या दूसरों की बातों को समझने में कठिनाई।

  • यह मस्तिष्क में किसी क्षति के कारण होता है। बच्चा अपनी बात ठीक से बोल नहीं पाता।

5. डिस्प्रेक्सिया (Dyspraxia) - गतिक कौशल विकार

  • यह एक शारीरिक विकार है।

  • बच्चा अपनी मांसपेशियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता।

  • प्रभाव: लिखने, चलने, टहलने, बटन लगाने या जूते के फीते बांधने में कठिनाई। (यह हाथ और आँखों के समन्वय को प्रभावित करता है)।

6. अलेक्सिया (Alexia)

  • मस्तिष्क में चोट लगने के कारण पढ़ने की क्षमता का पूरी तरह चले जाना। इसे 'अर्जित डिस्लेक्सिया' (Acquired Dyslexia) भी कहते हैं।


6. उपचारात्मक शिक्षण की विधियां और रणनीतियां

एक शिक्षक के रूप में, जब आप समस्या (निदान) जान लेते हैं, तो आप निम्नलिखित विधियों का प्रयोग कर सकते हैं:

1. व्यक्तिगत शिक्षण (Individualized Teaching)

  • जब कक्षा में केवल एक या दो बच्चों को विशिष्ट समस्या हो।

  • शिक्षक उस छात्र के पास जाकर व्यक्तिगत रूप से उसकी त्रुटि सुधरवाता है।

  • लाभ: छात्र का संकोच दूर होता है।

2. सामूहिक शिक्षण (Group Teaching)

  • जब कक्षा के अधिकांश छात्रों में एक जैसी समस्या हो (जैसे 'स्कूल' को 'इस्कूल' बोलना)।

  • शिक्षक पूरी कक्षा को एक साथ अभ्यास कराता है।

  • लाभ: समय की बचत होती है और बच्चे एक-दूसरे से सीखते हैं।

3. प्रत्यक्ष विधि और अभ्यास (Direct Method & Drill)

  • उच्चारण सुधारने के लिए बार-बार अभ्यास (Drill) कराना सबसे प्रभावी है।

  • कठिन शब्दों को श्यामपट्ट (Blackboard) पर लिखकर बार-बार बुलवाना।

4. दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग (Use of Audio-Visual Aids)

  • टेपरिकॉर्डर: बच्चा अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके सुन सकता है और सुधार कर सकता है।

  • लिंग्वाफोन: शुद्ध उच्चारण सुनने के लिए।

  • दर्पण (Mirror): उच्चारण करते समय होठों और जीभ की स्थिति देखने के लिए दर्पण का प्रयोग किया जाता है।

5. चिकित्सा विधि

  • यदि उच्चारण दोष शारीरिक है (जैसे जीभ का तालु से चिपकना, कटे हुए होंठ), तो शिक्षक को अभिभावकों को चिकित्सकीय परामर्श (Doctor's advice) लेने का सुझाव देना चाहिए।


7. उपचारात्मक शिक्षण के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

शिक्षक को उपचारात्मक कार्य करते समय मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए:

  • प्रोत्साहन: बच्चों की छोटी-छोटी सफलताओं पर भी उनकी प्रशंसा करें। डांटने या फट्कारने से बच्चा और अधिक अंतर्मुखी (Introvert) हो सकता है।

  • रोचकता: उपचारात्मक कक्षाएं बोझिल नहीं होनी चाहिए। खेल-खेल में शिक्षा (Play-way method) का प्रयोग करें।

  • सहानुभूति: मंदबुद्धि या पिछड़े बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखें।

  • लचीलापन: यदि एक विधि काम नहीं कर रही है, तो शिक्षक को अपनी शिक्षण विधि बदल लेनी चाहिए।


8. त्रुटि विश्लेषण: सीखने का एक हिस्सा

CTET का एक बहुत ही सकारात्मक दृष्टिकोण है जिसे हर अभ्यर्थी को समझना चाहिए: "त्रुटियां सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का एक स्वाभाविक और अभिन्न अंग हैं।"

  • त्रुटियां यह बताती हैं कि बच्चे कैसे सोच रहे हैं।

  • त्रुटियां पाप नहीं हैं, बल्कि ये शिक्षक को अंतर्दृष्टि (Insight) प्रदान करती हैं कि उसे कैसे पढ़ाना है।

  • कक्षा में गलत वर्तनी या गलत उच्चारण को तुरंत लाल पेन से काटने की बजाय, बच्चों को सही रूप के प्रयोग के अधिकाधिक अवसर देने चाहिए।


निष्कर्ष

निदानात्मक और उपचारात्मक शिक्षण केवल कमजोर छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है। एक कुशल शिक्षक वही है जो न केवल पाठ्यक्रम पूरा कराए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि उसकी कक्षा का प्रत्येक विद्यार्थी - चाहे वह प्रतिभाशाली हो या धीमी गति से सीखने वाला - अपनी पूरी क्षमता के साथ विकसित हो सके।



निदानात्मक और उपचारात्मक शिक्षण

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

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