तंतु से वस्त्र तक: पूर्ण अध्ययन (Fibre to Fabric)

Sunil Sagare
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1. वस्त्रों का इतिहास और विकास

वस्त्रों का इतिहास मानव सभ्यता के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में वस्त्रों की अवधारणा आज से बिल्कुल भिन्न थी।

  • प्रारंभिक अवस्था: प्राचीन काल में (पाषाण युग), मनुष्यों के पास वस्त्र बनाने की तकनीक नहीं थी। वे अपने शरीर को ढकने और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने के लिए निम्नलिखित प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करते थे:

    • वृक्षों की बड़ी पत्तियां।

    • वृक्षों की छाल (Bark)।

    • जंतुओं की खाल (Skin) और फर।

  • कृषि का आरंभ: जब मानव ने घुमंतू जीवन त्यागकर कृषि समुदायों में एक जगह बसना शुरू किया, तो उसने प्राकृतिक वस्तुओं को गूंथकर नई चीजें बनाना सीखा।

    • उन्होंने पतली टहनियों और घास को बुनकर चटाइयां और टोकरियां बनाईं।

    • लताओं और जंतुओं की ऊन या बालों को आपस में ऐंठकर लंबी लड़ियाँ बनाई गईं और उनसे वस्त्र बुने गए।

  • प्राचीन भारत: भारत में प्राचीन काल में लोग रूई से बने वस्त्र पहनते थे। यह कपास गंगा नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में उगाई जाती थी।

  • प्राचीन मिस्र: प्राचीन मिस्र में वस्त्र बनाने के लिए रूई तथा 'फ्लैक्स' (Flax) नामक पौधे का उपयोग किया जाता था। इसकी खेती नील नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में की जाती थी।

  • सिलाई का आविष्कार: प्रारंभ में लोग केवल कपड़ों को शरीर पर लपेटते थे (जैसे धोती, साड़ी, पगड़ी)। सुई के आविष्कार के बाद, लोगों ने कपड़ों को काटकर और सिलकर पहनना शुरू किया। हालांकि, आज भी साड़ी, धोती और लुंगी जैसे बिना सिले वस्त्रों का प्रचलन भारत में व्यापक है।


2. तंतु (Fibre) की अवधारणा

वस्त्र निर्माण की आधारशिला तंतु है।

  • परिभाषा: किसी भी वस्त्र के धागे को यदि हम खोलें, तो वह और अधिक पतली लड़ियों से बना होता है। ये सबसे पतली लड़ियाँ ही तंतु कहलाती हैं।

  • पदानुक्रम (Hierarchy):

    $$\mathrm{Fibre} \rightarrow \mathrm{Yarn} \rightarrow \mathrm{Fabric}$$

    (तंतु $\rightarrow$ धागा $\rightarrow$ वस्त्र)


3. तंतुओं का वर्गीकरण

तंतुओं को उनके स्रोत के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

A. प्राकृतिक तंतु (Natural Fibres)

ये तंतु हमें सीधे प्रकृति (पादप या जंतु) से प्राप्त होते हैं। इन्हें आगे दो उप-श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. पादप तंतु (Plant Fibres):

    • कपास (Cotton): कपास के पौधे के फल से प्राप्त होता है।

    • पटसन/जूट (Jute): पौधे के तने से प्राप्त होता है।

    • फ्लैक्स (Flax): यह एक प्राकृतिक तंतु है जिससे 'लिनेन' (Linen) वस्त्र बनता है।

    • नारियल जटा (Coir): नारियल के बाहरी आवरण से प्राप्त होता है।

  2. जांतव तंतु (Animal Fibres):

    • ऊन (Wool): भेड़, बकरी, याक आदि के बालों से।

    • रेशम (Silk): रेशम कीट के कोकून से।

B. संश्लिष्ट तंतु (Synthetic Fibres)

ये तंतु रसायनों का उपयोग करके मानव द्वारा कारखानों में निर्मित किए जाते हैं। इनका कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं होता।

  • उदाहरण: नायलॉन, पॉलिएस्टर, ऐक्रिलिक, रेयॉन (अर्ध-संश्लिष्ट)।


4. पादप तंतु: विस्तृत प्रक्रिया

(i) कपास (Cotton)

कपास भारत की एक प्रमुख औद्योगिक फसल है।

  • भौगोलिक परिस्थितियाँ:

    • मृदा: काली मृदा (Black Soil) सर्वोत्तम होती है क्योंकि यह नमी को लंबे समय तक बनाए रखती है।

    • जलवायु: उष्ण जलवायु (Warm Climate) आवश्यक है।

    • क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु आदि।

  • कपास गोलक (Cotton Bolls): कपास के पौधे के फल नींबू के आकार के होते हैं। पूर्ण परिपक्व होने पर ये फट जाते हैं और सफेद रूई (तंतु) से ढके बीज दिखाई देते हैं।

वस्त्र निर्माण के चरण:

  1. हस्त चयन: खेतों से कपास को साधारणतया हाथ से चुना जाता है।

  2. ओटना (Ginning):

    • कपास के गोलकों से बीजों (बिनौलों) को अलग करने की प्रक्रिया 'ओटना' कहलाती है।

    • पारंपरिक विधि: कंघतन (Combing) द्वारा हाथों से।

    • आधुनिक विधि: मशीनों द्वारा।

  3. कताई (Spinning):

    • रेशों से धागा (Yarn) बनाने की प्रक्रिया।

    • विधि: कपास के एक पुंज से रेशों को खींचकर ऐंठा जाता है। इससे रेशे पास-पास आ जाते हैं और मजबूत धागा बन जाता है।

    • उपकरण: तकली (Hand Spindle) और चरखा। (स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की मिलों में बने कपड़ों का बहिष्कार कर चरखे से बने खादी के कपड़ों को लोकप्रिय बनाया था)।

  4. धागे से वस्त्र बनाना:

    • बुनाई (Weaving): इसमें धागों के दो सेटों को आपस में व्यवस्थित करके वस्त्र बनाया जाता है। यह कार्य करघों (Looms) पर किया जाता है।

    • बंधाई (Knitting): इसमें धागे के केवल एक सेट का उपयोग होता है (जैसे स्वेटर, मोजे)। यदि आप स्वेटर का एक धागा खींचें तो पूरा वस्त्र उधड़ता चला जाता है, जो यह दर्शाता है कि यह एक ही धागे से बना है।

(ii) पटसन/जूट (Jute)

  • स्रोत: पटसन पादप का तना (Stem)

  • प्रमुख उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल, बिहार और असम।

  • खेती का समय: वर्षा ऋतु।

  • कटाई: सामान्यतः पुष्पन अवस्था (Flowering stage) में फसल को काट लिया जाता है। यदि इसे पकने दिया जाए, तो रेशे सख्त हो जाते हैं।

  • प्रसंस्करण (Retting):

    • कटाई के बाद तनों को कुछ दिनों तक पानी में डुबोकर रखा जाता है।

    • जीवाणुओं की क्रिया से तने गल जाते हैं।

    • गले हुए तनों से पटसन के रेशों को हाथों द्वारा खींचकर अलग (Stripping) कर लिया जाता है।

    • इसके बाद इन्हें धोकर सुखाया जाता है।


5. जांतव तंतु: ऊन (Wool)

ऊन जंतुओं के बालों (Fleece) से प्राप्त होती है। बाल हवा को फंसाकर रखते हैं और हवा ऊष्मा की कुचालक होती है, जिससे जंतु गर्म रहते हैं।

ऊन प्रदान करने वाले जंतु:

  1. भेड़: सबसे सामान्य स्रोत।

  2. याक: तिब्बत और लद्दाख क्षेत्रों में प्रचलित।

  3. अंगोरा बकरी: इससे 'मोहेयर' (Mohair) प्राप्त होती है (जम्मू-कश्मीर)।

  4. कश्मीरी बकरी: इसके बाल बहुत मुलायम होते हैं, जिनसे विश्व प्रसिद्ध पश्मीना शॉल बुनी जाती है।

  5. ऊंट: ऊंट के बालों का उपयोग भी किया जाता है।

  6. लामा और ऐल्पेका: दक्षिण अमेरिका में पाए जाते हैं।

भारतीय भेड़ों की कुछ नस्लें:

  • लोही: अच्छी गुणवत्ता की ऊन (राजस्थान, पंजाब)।

  • रामपुर बुशायर: भूरी ऊन (उत्तर प्रदेश, हिमाचल)।

  • नाली: गलीचे की ऊन (राजस्थान, हरियाणा)।

  • पाटनवाड़ी: होजरी के लिए (गुजरात)।

ऊन निर्माण प्रक्रिया (Processing of Wool):

यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया है:

  1. कर्तन (Shearing):

    • भेड़ के बालों को त्वचा की पतली परत के साथ शरीर से उतारना।

    • यह सामान्यतः गर्मियों में किया जाता है।

    • इससे भेड़ को दर्द नहीं होता क्योंकि त्वचा की सबसे ऊपरी परत मृत कोशिकाओं से बनी होती है।

  2. अभिमार्जन (Scouring):

    • कटाई किए गए बालों को टंकियों में धोना ताकि चिकनाई (Grease), धूल और गर्त निकल जाए।

  3. छँटाई (Sorting):

    • रोएं‌दार बालों को कारखानों में भेजा जाता है जहाँ विभिन्न गठन (Texture) वाले बालों को अलग किया जाता है।

  4. बर की सफाई (Cleaning of Burrs):

    • बालों में से छोटे-छोटे कोमल फूले हुए रेशों (बर) को छाँटना।

  5. रंगाई (Dyeing):

    • रेशों को विभिन्न रंगों में रंगा जाता है (प्राकृतिक रंग केवल काला, भूरा या सफेद होता है)।

  6. रीलिंग (Rolling):

    • रेशों को सुलझाकर सीधा किया जाता है और लपेटकर धागा बनाया जाता है।

व्यवसायिक संकट (Occupational Hazard): ऊन उद्योग में छँटाई का काम करने वाले लोग कभी-कभी 'एन्थ्रेक्स' (Anthrax) नामक जीवाणु से संक्रमित हो जाते हैं। यह एक घातक रक्त रोग है जिसे सोर्टर्स रोग (Sorter's Disease) कहते हैं।


6. जांतव तंतु: रेशम (Silk)

रेशम (सिल्क) के रेशे भी जान्तव रेशे हैं। रेशम के रेशे प्रोटीन से बने होते हैं।

  • सेरीकल्चर (Sericulture): रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम कीटों का पालन।

रेशम कीट का जीवन चक्र:

  1. अंडे: मादा रेशम कीट शहतूत की पत्तियों पर अंडे देती है।

  2. लार्वा: अंडों से लार्वा निकलते हैं जिन्हें कैटरपिलर या रेशम कीट कहते हैं। ये दिन-रात शहतूत की पत्तियां खाते हैं और वृद्धि करते हैं।

  3. प्यूपा और कोकून:

    • जब कैटरपिलर प्यूपा अवस्था में जाने को तैयार होता है, तो वह अपने सिर को '8' के आकार में घुमाता है।

    • इस दौरान वह एक प्रोटीन स्रावित करता है जो हवा के संपर्क में आकर कठोर होकर रेशम का रेशा बन जाता है।

    • वह स्वयं को पूरी तरह इस रेशे से ढक लेता है। इस आवरण को कोकून (Cocoon) कहते हैं।

  4. वयस्क: कोकून के भीतर कीट का विकास होता रहता है और वह वयस्क कीट (Moth) बन जाता है।

रेशम का प्रसंस्करण:

  • कोकूनों को इकट्ठा करके धूप में रखा जाता है या पानी में उबाला जाता है।

  • गर्मी से रेशम के रेशे अलग हो जाते हैं।

  • कोकून से रेशे निकालने की प्रक्रिया रेशम की रीलिंग (Reeling) कहलाती है।

रेशम के प्रकार:

टसर रेशम, मूगा रेशम, कोसा रेशम, शहतूत रेशम (सबसे सामान्य)। शहतूत रेशम का रेशा स्टील के तार जितना मजबूत हो सकता है।


7. संश्लिष्ट तंतु (Synthetic Fibres)

संश्लिष्ट तंतु छोटी इकाइयों को जोड़कर बनाई गई एक जंजीर है।

  • बहुलक (Polymer): अनेक छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी एकल इकाई बनाती हैं जिसे बहुलक कहते हैं। ($\mathrm{Poly}$ = अनेक, $\mathrm{Mer}$ = भाग)।

  • प्राकृतिक बहुलक का उदाहरण: कपास ($\mathrm{Cellulose}$), जो ग्लूकोज इकाइयों का बहुलक है।

प्रमुख संश्लिष्ट तंतु:

  1. रेयॉन (Rayon):

    • इसे कृत्रिम रेशम कहा जाता है।

    • यह लकड़ी की लुगदी (Wood Pulp) के रासायनिक उपचार से प्राप्त होता है।

    • यह पूरी तरह संश्लिष्ट नहीं है, लेकिन यह रेशम से सस्ता है और इसे रेशम के समान बुना जा सकता है।

  2. नायलॉन (Nylon):

    • वर्ष 1931 में बिना किसी प्राकृतिक कच्चे माल (पौधे/जंतु) के बनाया गया।

    • कच्चा माल: कोयला, जल और वायु।

    • गुण: प्रबल, प्रत्यास्थ (Elastic), हल्का, चमकीला और धुलने में आसान।

    • इसका रेशा इस्पात (Steel) के तार से भी अधिक प्रबल होता है।

    • उपयोग: पैराशूट, चट्टानों पर चढ़ने के रस्से, जुराबें, तंबू, सीट बेल्ट।

  3. पॉलिएस्टर (Polyester):

    • इसमें सिलवटें नहीं पड़तीं।

    • टेरीलीन: एक लोकप्रिय पॉलिएस्टर।

    • PET ($\mathrm{Polyethylene\ Terephthalate}$): इसका उपयोग बोतलें, बर्तन, तार और फिल्म बनाने में होता है।

    • रसायन: यह एस्टर ($\mathrm{Ester}$) नामक रसायनों की पुनरावृत्ति से बनता है। फलों की गंध एस्टर के कारण ही होती है।

    • मिश्रित कपड़े:

      • पॉलीकोट = पॉलिएस्टर + कपास

      • पॉलीवूल = पॉलिएस्टर + ऊन

  4. ऐक्रिलिक (Acrylic):

    • यह प्राकृतिक ऊन के समान होता है। इसे कृत्रिम ऊन भी कहते हैं।

    • सर्दियों में हम जो स्वेटर या शॉल (सस्ती वाली) ओढ़ते हैं, वे अक्सर ऐक्रिलिक के बने होते हैं।

    • यह ऊन से सस्ता और अधिक टिकाऊ है।

संश्लिष्ट तंतुओं के नुकसान:

ये गर्म करने पर पिघल जाते हैं। आग लगने पर कपड़ा पिघलकर शरीर से चिपक जाता है, जिससे गंभीर जलन हो सकती है। इसलिए रसोई में काम करते समय संश्लिष्ट वस्त्र नहीं पहनने चाहिए।


8. प्लास्टिक (Plastics)

प्लास्टिक भी एक बहुलक है।

  • व्यवस्था:

    1. रेखीय (Linear)

    2. तिर्यक बद्ध (Cross-linked)

प्लास्टिक के प्रकार:

  1. थर्मोप्लास्टिक (Thermoplastics):

    • वह प्लास्टिक जो गर्म करने पर आसानी से विकृत (Deformed) हो जाता है और मुड़ जाता है।

    • उदाहरण: पॉलिथीन ($\mathrm{Polythene}$), पीवीसी ($\mathrm{PVC}$).

    • उपयोग: खिलौने, कंघियाँ, प्लास्टिक के पात्र।

  2. थर्मोसेटिंग प्लास्टिक (Thermosetting Plastics):

    • इन्हें एक बार सांचे में ढाल दिया जाए, तो इन्हें ऊष्मा देकर नरम नहीं किया जा सकता।

    • बैकेलाइट (Bakelite): ऊष्मा और विद्युत का कुचालक। बिजली के स्विच, बर्तनों के हत्थे बनाने में प्रयुक्त।

    • मेलामाइन (Melamine): यह आग का प्रतिरोधक है और अन्य प्लास्टिक की अपेक्षा ऊष्मा सहने की क्षमता अधिक रखता है। उपयोग: फर्श की टाइलें, रसोइ के बर्तन, अग्निरोधक कपड़े (Fireman uniform).

टेफ्लॉन (Teflon):

यह एक विशिष्ट प्लास्टिक है जिस पर तेल और जल नहीं चिपकता। इसका उपयोग भोजन पकाने के पात्रों पर न चिपकने वाली परत (Non-stick coating) लगाने में किया जाता है।


9. प्लास्टिक और पर्यावरण

प्लास्टिक का निस्तारण एक प्रधान समस्या है।

  • जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable): पदार्थ जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं (जीवाणु) द्वारा अपघटित हो जाते हैं।

    • उदाहरण: सब्जियों के छिलके (1-2 सप्ताह), कागज (10-30 दिन), सूती कपड़ा (2-5 महीने), ऊनी वस्त्र (लगभग 1 वर्ष)।

  • जैव अनिम्नीकरणीय (Non-biodegradable): पदार्थ जो आसानी से अपघटित नहीं होते।

    • उदाहरण: टिन, एल्युमीनियम (100-500 वर्ष), प्लास्टिक थैलियां (कई वर्ष)।

दुष्प्रभाव:

  • प्लास्टिक जलने पर विषैली गैसें उत्सर्जित करता है।

  • जमीन में दबाने पर मृदा प्रदूषण होता है।

  • पशु (जैसे गाय) कचरे के साथ पॉलिथीन थैलियां खा लेते हैं, जिससे उनकी श्वसन प्रणाली रुक सकती है और मृत्यु हो सकती है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए 5R सिद्धांत:

  1. Refuse (उपयोग से इनकार): अनावश्यक प्लास्टिक न लें।

  2. Reduce (कम उपयोग): प्लास्टिक का उपयोग घटाएं।

  3. Reuse (पुनः उपयोग): बार-बार इस्तेमाल करें।

  4. Recycle (पुनः चक्रण): थर्मोप्लास्टिक को रिसाइकिल करें।

  5. Recover (पुनः प्राप्त): ऊर्जा रिकवरी।


10. तंतुओं का ज्वलन परीक्षण (Burning Test)

प्रयोगशाला में तंतुओं की पहचान उन्हें जलाकर की जा सकती है:

  • कपास: यह तेजी से जलता है, पीली लौ देता है और जलते हुए कागज जैसी गंध आती है (क्योंकि दोनों पादप/सेल्युलोज हैं)। राख भूरी और हल्की होती है।

  • रेयॉन: यह भी जलते कागज जैसी गंध देता है (लकड़ी की लुगदी से बना होने के कारण), लेकिन पिघलता नहीं है।

  • ऊन: यह धीरे जलता है, बुझ जाता है, और जलते हुए बालों जैसी तीव्र गंध देता है। इसकी राख काली और भुरभुरी होती है।

  • रेशम: जलते हुए पंख या मांस जैसी गंध आती है।

  • नायलॉन/पॉलिएस्टर: ये आग के पास सिकुड़ जाते हैं, पिघलते हैं और टपकते हैं। इनमें से जलते हुए प्लास्टिक या रसायनों जैसी गंध आती है। ये पिघलकर कठोर मनके (Beads) बनाते हैं जिन्हें तोड़ना मुश्किल होता है।


प्रमुख रासायनिक सूत्र और अभिक्रियाएं

  1. ग्लूकोज (Glucose): $\mathrm{C_6H_{12}O_6}$

  2. सेल्युलोज का निर्माण:

    $$n(\mathrm{C_6H_{12}O_6}) \rightarrow (\mathrm{C_6H_{10}O_5})_n + n\mathrm{H_2O}$$

    (यहाँ $n$ ग्लूकोज की इकाइयों की संख्या है जो पानी के अणु को खोकर जुड़ती हैं)

  3. एस्टर समूह (Ester Group): $\mathrm{-COO-}$

  4. पॉलिएस्टर निर्माण (सरलीकृत):

    $$\mathrm{Alcohol} + \mathrm{Carboxylic\ Acid} \rightarrow \mathrm{Ester} + \mathrm{Water}$$

निष्कर्ष

वस्त्र विज्ञान का ज्ञान न केवल परीक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक है, बल्कि यह हमें कपड़ों के चयन, उनके रखरखाव और पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को समझने में भी मदद करता है। CTET के लिए प्राकृतिक और संश्लिष्ट तंतुओं के स्रोत और गुणों में अंतर को समझना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।



तंतु से वस्त्र तक: पूर्ण अध्ययन

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