मानव और जंतुओं में पाचन (Digestion)

Sunil Sagare
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भोजन: घटक, पोषण और प्राणियों में पाचन तंत्र (विस्तृत अध्ययन)

यह लेख CTET विज्ञान और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षाओं के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है। इसमें पोषण की विधियों, मानव पाचन तंत्र के प्रत्येक अंग की कार्यप्रणाली, और जंतुओं में पाचन की प्रक्रियाओं को बिंदुवार और विस्तार से समझाया गया है।

1. पोषण: परिचय और प्रकार

पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव भोजन ग्रहण करते हैं और शरीर उसका उपयोग करता है। ऊर्जा उत्पादन, शारीरिक वृद्धि और टूट-फूट की मरम्मत के लिए पोषण अनिवार्य है।

पोषण की मुख्य विधियाँ:

  • स्वपोषी पोषण:

    • वे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

    • उदाहरण: हरे पौधे (प्रकाश संश्लेषण द्वारा)।

  • विषमपोषी पोषण:

    • वे जीव जो भोजन के लिए पौधों या अन्य जंतुओं पर निर्भर रहते हैं।

    • प्राणिसमभोजी: जटिल ठोस भोजन ग्रहण करना (जैसे: मानव, अमीबा, शेर)।

    • मृतजीवी: सड़े-गले पदार्थों से पोषण लेना (जैसे: कवक, मशरूम)।

    • परजीवी: दूसरे जीवित जीव के शरीर के अंदर या बाहर रहकर पोषण लेना (जैसे: अमरबेल, जूँ, फीताकृमि)।


2. जंतुओं में पोषण के चरण

जंतुओं (विशेषकर मनुष्य) में पोषण की प्रक्रिया पाँच मुख्य चरणों में पूरी होती है। CTET में इनका सही क्रम अक्सर पूछा जाता है।

  1. अंतर्ग्रहण: भोजन को शरीर के अंदर लेने की प्रक्रिया।

  2. पाचन: जटिल अघुलनशील खाद्य पदार्थों को सरल घुलनशील पदार्थों में तोड़ना।

  3. अवशोषण: पचे हुए भोजन का रक्त में मिलना।

  4. स्वांगीकरण: अवशोषित भोजन का उपयोग ऊर्जा प्राप्ति और वृद्धि के लिए करना।

  5. बहिर्क्षेपण: अपचित और व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना।


3. मानव पाचन तंत्र: एक विस्तृत विश्लेषण

मानव पाचन तंत्र एक लंबी नली है जो मुख गुहा से शुरू होकर गुदा पर समाप्त होती है। इसे आहार नाल कहा जाता है। इसकी लंबाई लगभग 9 मीटर होती है। इसके साथ कई पाचक ग्रंथियाँ जुड़ी होती हैं।

क) मुख गुहा (Buccal Cavity)

पाचन की शुरुआत मुख से ही हो जाती है। मुख गुहा में दाँत, जीभ और लार ग्रंथियाँ होती हैं।

1. दाँत (Teeth):

दाँत भोजन को भौतिक रूप से छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं। मानव में दाँत जबड़े की हड्डी के खांचों में धंसे होते हैं (इस व्यवस्था को गर्तदंती कहते हैं)। मनुष्य के जीवन में दाँत दो बार आते हैं (द्विबारदंती)।

  • अस्थायी दाँत: इन्हें दूध के दाँत कहते हैं। इनकी संख्या 20 होती है। ये लगभग 6-8 वर्ष की आयु तक गिर जाते हैं।

  • स्थायी दाँत: ये वयस्कों में होते हैं। इनकी अधिकतम संख्या 32 होती है।

दाँतों के प्रकार और कार्य:

  • कृंतक:

    • ये सबसे आगे के चपटे दाँत होते हैं।

    • प्रत्येक जबड़े में 4 (कुल 8)।

    • कार्य: भोजन को काटना और कुतरना।

  • रदनक:

    • ये नुकीले दाँत होते हैं जो कृंतक के बगल में होते हैं।

    • प्रत्येक जबड़े में 2 (कुल 4)।

    • कार्य: भोजन को चीरना और फाड़ना (मांसाहारियों में अधिक विकसित)।

  • अग्रचवर्णक:

    • ये रदनक के पीछे होते हैं।

    • प्रत्येक जबड़े में 4 (कुल 8)।

    • कार्य: भोजन को चबाना और पीसना।

  • चवर्णक:

    • ये सबसे पीछे के बड़े दाँत होते हैं।

    • प्रत्येक जबड़े में 6 (कुल 12)।

    • कार्य: भोजन को बारीक पीसना।

दाँत की संरचना:

  • इनेमल: यह दाँत की सबसे बाहरी परत है। यह शरीर का सबसे कठोर पदार्थ है। यह कैल्शियम फॉस्फेट ($\mathrm{Ca_3(PO_4)_2}$) से बना होता है।

  • दंतक्षय: यदि दाँतों की सफाई न की जाए, तो जीवाणु शर्करा को अम्ल में बदल देते हैं, जिससे इनेमल क्षतिग्रस्त होने लगता है।

2. जीभ (Tongue):

जीभ एक मांसल अंग है जो पीछे की ओर मुख गुहा के तल से जुड़ी होती है।

  • कार्य: भोजन में लार मिलाना, निगलने में सहायता करना और बोलने में मदद करना।

  • स्वाद कलिकाएं: जीभ पर छोटे-छोटे उभार होते हैं जो स्वाद का पता लगाते हैं।

    • अग्र भाग: मीठा।

    • पार्श्व (किनारे) भाग: खट्टा और नमकीन।

    • पश्च (पीछे का) भाग: कड़वा।

3. लार ग्रंथियाँ (Salivary Glands):

मनुष्य में तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ होती हैं।

  • ये लार स्रावित करती हैं।

  • लार में एमिलेज (या टायलिन) नामक एंजाइम होता है।

  • रासायनिक क्रिया: एमिलेज एंजाइम मंड (स्टार्च) को शर्करा (माल्टोस) में तोड़ देता है।

  • यही कारण है कि रोटी को ज्यादा देर चबाने पर वह मीठी लगने लगती है।

  • लार भोजन को चिकना बनाती है ताकि उसे आसानी से निगला जा सके।


ख) भोजन नली या ग्रसिका (Oesophagus)

  • मुख गुहा से निगला हुआ भोजन ग्रसिका में जाता है।

  • यह एक लंबी पेशीय नली है जो गले से वक्ष तक जाती है।

  • विशेषता: ग्रसिका में पाचन की कोई क्रिया नहीं होती है।

  • क्रमाकुंचन गति: ग्रसिका की दीवारों की पेशियों में निरंतर संकुचन और फैलाव होता है। इस लहरदार गति को क्रमाकुंचन कहते हैं। यह भोजन को नीचे आमाशय की ओर धकेलती है।

  • यदि आमाशय भोजन स्वीकार न करे, तो यह उल्टी के रूप में बाहर आ जाता है (विपरीत क्रमाकुंचन)।


ग) आमाशय (Stomach)

आमाशय आहार नाल का सबसे चौड़ा भाग है। यह एक मोटी भित्ति वाली, 'U' या 'J' आकार की थैली है। यह बाईं ओर स्थित होता है।

संरचना और स्राव:

आमाशय की आंतरिक परत (श्लेष्मल झिल्ली) तीन प्रमुख पदार्थ स्रावित करती है, जिसे सम्मिलित रूप से जठर रस कहते हैं:

  1. श्लेष्मल:

    • यह आमाशय की आंतरिक परत को स्वयं के द्वारा स्रावित अम्ल और एंजाइमों से सुरक्षित रखता है।

    • यदि श्लेष्मल का स्राव कम हो जाए, तो अल्सर (छाले) हो सकते हैं।

  2. हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ($\mathrm{HCl}$):

    • माध्यम तैयार करना: यह भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाता है, जो प्रोटीन पाचक एंजाइमों की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।

    • सुरक्षा: भोजन के साथ आए हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।

    • यह भोजन को गलाने में भी मदद करता है।

  3. पाचक एंजाइम (पेप्सिन):

    • पेप्सिन केवल अम्लीय माध्यम में ही सक्रिय होता है।

    • कार्य: यह प्रोटीन को सरल पदार्थों (पेप्टोन्स) में तोड़ता है।

    • बच्चों में रेनिन नामक एंजाइम भी पाया जाता है जो दूध के प्रोटीन (केसीन) को पचाने में मदद करता है।

आमाशय में पाचन:

आमाशय में भोजन लगभग 3 से 4 घंटे तक रहता है। यहाँ भोजन मथकर एक गाढ़े लेई जैसे पदार्थ में बदल जाता है जिसे काइम कहते हैं।


घ) क्षुद्रांत्र (Small Intestine)

यह आहार नाल का सबसे लंबा भाग है। नाम 'छोटी आँत' है, लेकिन लंबाई में यह लगभग 7.5 मीटर होती है। यह अत्यधिक कुंडलित होती है।

महत्वपूर्ण: भोजन का सर्वाधिक पाचन और अवशोषण इसी भाग में होता है।

क्षुद्रांत्र दो मुख्य ग्रंथियों से स्राव प्राप्त करती है:

1. यकृत (Liver):

  • यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है।

  • इसका रंग गहरा लाल-भूरा होता है और यह पेट के ऊपरी भाग में दाईं ओर स्थित होती है।

  • पित्त रस: यकृत पित्त रस का निर्माण करता है।

  • पित्ताशय: पित्त रस एक थैली में संग्रहित होता है जिसे पित्ताशय कहते हैं।

  • कार्य: पित्त रस में कोई पाचक एंजाइम नहीं होता, फिर भी यह पाचन में महत्वपूर्ण है। यह वसा के बड़े कणों को छोटी बूंदों में तोड़ देता है। इस प्रक्रिया को इमलसीकरण कहते हैं। यह माध्यम को क्षारीय भी बनाता है।

2. अग्न्याशय (Pancreas):

  • यह आमाशय के ठीक नीचे स्थित क्रीम रंग की एक पत्ती जैसी ग्रंथि है।

  • यह अग्न्याशयी रस स्रावित करती है जिसे 'पूर्ण पाचक रस' भी कहा जाता है।

  • इसमें तीन प्रमुख एंजाइम होते हैं:

    • एमाइलेज: बचे हुए कार्बोहाइड्रेट को पचाता है।

    • ट्रिप्सिन: प्रोटीन को पचाता है।

    • लाइपेज: इमलसीकृत वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में तोड़ता है।

आंत्र रस और पूर्ण पाचन:

क्षुद्रांत्र के निचले भाग में आंत्र रस स्रावित होता है जो पाचन क्रिया को पूरा करता है:

  • कार्बोहाइड्रेट $\rightarrow$ ग्लूकोज (सरल शर्करा)।

  • वसा $\rightarrow$ वसा अम्ल + ग्लिसरॉल।

  • प्रोटीन $\rightarrow$ अमीनो अम्ल।

क्षुद्रांत्र में अवशोषण:

  • पचे हुए भोजन का अवशोषण क्षुद्रांत्र की भित्ति में स्थित रक्त वाहिकाओं द्वारा होता है।

  • दीर्घरोम (Villi): क्षुद्रांत्र की भीतरी दीवार पर हजारों उंगली जैसी संरचनाएँ होती हैं जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं।

  • दीर्घरोम का कार्य:

    • ये अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल को कई गुना बढ़ा देते हैं।

    • प्रत्येक दीर्घरोम में सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं का जाल होता है।

    • अवशोषित भोजन रक्त के माध्यम से शरीर के सभी अंगों तक पहुँचाया जाता है (स्वांगीकरण), जहाँ इसका उपयोग ऊर्जा और नई कोशिकाओं के निर्माण में होता है।


ङ) बृहदांत्र (Large Intestine)

  • यह क्षुद्रांत्र की तुलना में चौड़ी और छोटी होती है।

  • इसकी लंबाई लगभग 1.5 मीटर होती है।

  • यहाँ पाचन की क्रिया नहीं होती।

कार्य:

  1. अपचित भोजन से जल और कुछ लवणों का अवशोषण करना।

  2. शेष बचा हुआ अपशिष्ट पदार्थ अर्ध-ठोस मल के रूप में मलाशय में चला जाता है।

  3. समय-समय पर यह मल गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया को बहिर्क्षेपण कहते हैं।


4. घास खाने वाले जंतुओं में पाचन (Digestion in Ruminants)

गाय, भैंस, हिरण, ऊंट और बकरी जैसे शाकाहारी जंतुओं का पाचन तंत्र मनुष्यों से भिन्न होता है। इन्हें रोमन्थी या जुगाली करने वाले जंतु कहा जाता है।

विशिष्ट संरचना:

इनके आमाशय चार भागों में बंटे होते हैं:

  1. रुमेन (Rumen): सबसे बड़ा भाग।

  2. रेटिकुलम (Reticulum): जालिकावत भाग।

  3. ओमेसम (Omasum): जल अवशोषण करने वाला भाग।

  4. एबोमेसम (Abomasum): इसे 'वास्तविक आमाशय' भी कहते हैं क्योंकि यहीं पाचक रस स्रावित होते हैं।

पाचन प्रक्रिया:

  • प्रथम चरण: जब ये जंतु घास चरते हैं, तो वे उसे बिना चबाए जल्दी-जल्दी निगल लेते हैं और 'रुमेन' में जमा कर लेते हैं।

  • सेल्यूलोज का पाचन: घास में सेल्यूलोज (एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट) प्रचुर मात्रा में होता है। रुमेन में विशेष प्रकार के जीवाणु और प्रोटोजोआ पाए जाते हैं जो सेल्यूलोज को पचाने में सक्षम होते हैं। मनुष्य और कई अन्य जानवर सेल्यूलोज का पाचन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास ये जीवाणु नहीं होते।

  • जुगाल (Cud): रुमेन में भोजन का आंशिक पाचन होता है, जिसे जुगाल कहते हैं।

  • रोमन्थन: जब जंतु आराम करता है, तो यह जुगाल छोटे-छोटे पिंडकों के रूप में वापस मुख में आता है। जंतु इसे धीरे-धीरे चबाता है। इस प्रक्रिया को जुगाली करना या रोमन्थन कहते हैं।

  • पुनः चबाया गया भोजन निगलने पर सीधे ओमेसम और फिर एबोमेसम में जाता है, जहाँ सामान्य पाचन क्रिया होती है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • घोड़े और खरगोश जैसे जंतुओं में क्षुद्रांत्र और बृहदांत्र के बीच एक बड़ी थैलीनुमा संरचना होती है जिसे अंधनाल (Caecum) कहते हैं। यहाँ भोजन के सेल्यूलोज का पाचन कुछ जीवाणुओं द्वारा किया जाता है।


5. सूक्ष्मजीवों में पाचन: अमीबा (Amoeba)

अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एककोशिकीय जीव है। इसकी कोशिका में एक कोशिका झिल्ली, एक गोल सघन केंद्रक और कोशिका द्रव्य में बुलबुले के समान कई धानियाँ होती हैं।

पाचन की विधि (Endocytosis):

  1. अंतर्ग्रहण:

    • अमीबा निरंतर अपनी आकृति और स्थिति बदलता रहता है।

    • यह अपनी कोशिका से एक या अधिक उंगली के समान प्रवर्ध निकालता है, जिन्हें पादाभ (Pseudopodia) या 'कृत्रिम पाँव' कहते हैं।

    • पादाभ के दो कार्य हैं: अमीबा को गति देना और भोजन पकड़ना।

    • जब अमीबा को भोजन का आभास होता है, तो वह पादाभों को खाद्य कण के चारों ओर फैलाकर उसे पूरी तरह घेर लेता है और निगल लेता है।

  2. खाद्य धानी का निर्माण:

    • निगला हुआ भोजन एक बुलबुले जैसी संरचना में फंस जाता है, जिसे खाद्य धानी कहते हैं। यह अमीबा का अस्थायी आमाशय है।

  3. पाचन:

    • खाद्य धानी के अंदर ही पाचक रस (एंजाइम) स्रावित होते हैं।

    • ये खाद्य पदार्थ पर क्रिया करके उसे सरल पदार्थों में बदल देते हैं।

  4. अवशोषण और स्वांगीकरण:

    • पचा हुआ भोजन धीरे-धीरे खाद्य धानी से निकलकर कोशिका द्रव्य में अवशोषित हो जाता है।

    • अमीबा इस ऊर्जा का उपयोग अपनी वृद्धि, रखरखाव और गुणन (प्रजनन) के लिए करता है।

  5. बहिर्क्षेपण:

    • भोजन का पचने के बाद, बचा हुआ अपशिष्ट पदार्थ खाद्य धानी द्वारा ही कोशिका की सतह की ओर धकेला जाता है और बाहर निकाल दिया जाता है।


6. अन्य जंतुओं में पोषण की विधियाँ (संक्षिप्त अवलोकन)

CTET परीक्षाओं में अक्सर मिलान करने वाले प्रश्नों में विभिन्न जीवों के भोजन ग्रहण करने के तरीकों के बारे में पूछा जाता है।

  • मधुमक्खी और मर्मर पक्षी (Hummingbird): ये पौधों का मकरंद (Nectar) चूसते हैं।

  • मानव और अन्य जंतु: शिशु माँ का दूध पीते हैं।

  • अजगर (Python): ये अपने शिकार को समूचा निगल लेते हैं।

  • हाइड्रा (Hydra): यह एक जलीय जीव है। यह अपने स्पर्शकों (Tentacles) का उपयोग करके शिकार को पकड़ता है और मुख में डालता है। स्पर्शकों में दंश कोशिकाएं होती हैं जो शिकार को बेहोश करती हैं।

  • मेंढक: यह अपनी लंबी, चिपचिपी और द्विशाखित जीभ का प्रयोग करके कीड़ों को पकड़ता है।

  • तारा मछली (Starfish):

    • यह उन जंतुओं का आहार करती है जिनके शरीर कैल्शियम कार्बोनेट ($\mathrm{CaCO_3}$) के कठोर कवच से ढके होते हैं।

    • कवच खोलने के बाद, यह अपने मुख से अपना आमाशय बाहर निकालती है और जंतु के कोमल भागों को खाती है।

    • फिर आमाशय शरीर में वापस चला जाता है और पाचन धीरे-धीरे होता है।


7. पाचन तंत्र से संबंधित सामान्य विकार

असंतुलित भोजन या दूषित भोजन/जल ग्रहण करने से पाचन तंत्र में विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

  • उल्टी (Vomiting): यह आमाशय में हानिकारक पदार्थों के प्रवेश के विरुद्ध एक रक्षात्मक क्रिया है। इसमें मस्तिष्क का 'मेडुला' भाग नियंत्रण रखता है।

  • दस्त (Diarrhoea): इसमें मल अत्यंत पतला हो जाता है और बार-बार आता है। यह संक्रमण, खाद्य विषाक्तता या अपच के कारण होता है। इसमें शरीर से जल और लवण की अत्यधिक कमी (निर्जलीकरण) हो जाती है।

    • उपचार: जीवन रक्षक घोल (ORS - Oral Rehydration Solution) का सेवन।

  • पीलिया (Jaundice): यह यकृत का संक्रमण है। इसमें त्वचा और आँखें पीली हो जाती हैं क्योंकि रक्त में बिलीरुबिन (पित्त वर्णक) की मात्रा बढ़ जाती है।

  • कब्ज (Constipation): इसमें मल मलाशय में रुक जाता है और त्यागने में कठिनाई होती है। इसका मुख्य कारण भोजन में रेशों (Fiber) की कमी और जल कम पीना है।

  • अपच (Indigestion): अधिक खाने या मसालेदार भोजन से आमाशय में अधिक अम्ल बनता है, जिससे जलन और दर्द होता है। उपचार के लिए प्रति-अम्ल (Antacid) जैसे मिल्क ऑफ मैग्नीशिया ($\mathrm{Mg(OH)_2}$) का उपयोग किया जाता है।


8. निष्कर्ष

पाचन एक जटिल भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया है। इसमें भोजन का यांत्रिक विखंडन (दाँतों द्वारा) और रासायनिक अपघटन (एंजाइमों द्वारा) दोनों शामिल हैं। यह प्रक्रिया ऊर्जा प्राप्ति के लिए अनिवार्य है। मानव, रोमन्थी जंतु और सूक्ष्मजीवों में पाचन तंत्र की संरचना अलग-अलग होती है, लेकिन मूल सिद्धांत समान है: जटिल पदार्थों को सरल, घुलनशील और अवशोषण योग्य पदार्थों में बदलना। शिक्षकों के लिए यह आवश्यक है कि वे छात्रों को इन प्रक्रियाओं को उदाहरणों और दैनिक जीवन के अनुभवों से जोड़कर समझाएं।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Recap for CTET):

  • कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुख से शुरू होता है।

  • प्रोटीन का पाचन आमाशय से शुरू होता है।

  • वसा का पाचन मुख्य रूप से क्षुद्रांत्र में होता है।

  • पाचन की प्रक्रिया क्षुद्रांत्र में पूर्ण होती है।

  • जल का अवशोषण बृहदांत्र में होता है।

  • यकृत पित्त रस बनाता है, लेकिन पित्ताशय उसे जमा करता है।

  • अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रंथि (अंतःस्रावी और बहिःस्रावी) है।



मानव और जंतुओं में पाचन

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