विविध पृष्ठभूमि के बालक

Sunil Sagare
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CTET और अन्य शिक्षण परीक्षाओं में 'समावेशी शिक्षा' और 'विविध पृष्ठभूमि के बालक' एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। एक शिक्षक के रूप में, यह समझना आवश्यक है कि कक्षा में आने वाला प्रत्येक बच्चा एक अलग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश से आता है। आज के इस लेख में हम विविध पृष्ठभूमि के बालकों की पहचान, उनकी समस्याएँ और उनके समावेशन के लिए प्रभावी रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

1. समावेशी शिक्षा: एक परिचय

समावेशी शिक्षा का मूल अर्थ समाज के सभी वर्गों के बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा में शामिल करना है। यह केवल विशेष आवश्यकता वाले (दिव्यांग) बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बहुत व्यापक है।

  • मूल अवधारणा: समावेशन का अर्थ है कि किसी भी बच्चे को उसकी शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, भाषायी या अन्य स्थितियों के आधार पर भेदभाव किए बिना सामान्य विद्यालय में प्रवेश देना।

  • व्यापक अर्थ: अक्सर लोग समावेशन को केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा मानते हैं, जो कि एक संकुचित दृष्टिकोण है। वास्तविकता में, इसका अर्थ किसी भी बच्चे का शिक्षा से वंचित न होना है, चाहे वह गरीब हो, दलित हो, आदिवासी हो या अल्पसंख्यक समुदाय से हो।

  • अवसर की समानता: भारत विविधताओं का देश है। यहाँ जाति, संप्रदाय, रीति-रिवाज और आर्थिक स्थिति में भारी अंतर है। समावेशी शिक्षा यह सुनिश्चित करती है कि इन विभिन्नताओं के बावजूद सभी को सीखने के समान अवसर मिलें।

2. विविध पृष्ठभूमि के बालकों से तात्पर्य

जब हम 'विविध पृष्ठभूमि' की बात करते हैं, तो हमारा इशारा उन बच्चों की ओर होता है जो ऐतिहासिक, सामाजिक या आर्थिक कारणों से सुविधाओं से वंचित रहे हैं।

शिक्षण प्रक्रिया में हमें मुख्य रूप से निम्नलिखित वर्गों के बच्चों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है:

  1. अनुसूचित जाति (SC) के बालक: जिन्हें ऐतिहासिक रूप से जातीय भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा है।

  2. अनुसूचित जनजाति (ST) के बालक: जो भौगोलिक रूप से अलग-थलग क्षेत्रों में रहते हैं और जिनकी संस्कृति व भाषा मुख्य धारा से भिन्न है।

  3. आर्थिक रूप से पिछड़े बालक: निर्धन परिवारों के बच्चे जो मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में शिक्षा पूरी नहीं कर पाते।

  4. प्रवासी मजदूरों के बच्चे: जिनके माता-पिता काम की तलाश में जगह बदलते रहते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है।

  5. विशेष आवश्यकता वाले बच्चे: जो शारीरिक या मानसिक रूप से चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

3. समावेशी शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ

एक सफल समावेशी कक्षा की पहचान निम्नलिखित बिंदुओं से की जा सकती है:

  • विविधता का उत्सव: समावेशी शिक्षा कक्षा में मौजूद विविधता को एक समस्या नहीं, बल्कि एक संसाधन मानती है। यह सभी संस्कृतियों को साथ मिलकर आगे बढ़ने का अवसर देती है।

  • प्रवेश में कोई बाधा नहीं: किसी भी विशेष शैक्षिक आवश्यकता वाले विद्यार्थी को विद्यालय में प्रवेश देने से रोका नहीं जा सकता। "अस्वीकृति के लिए शून्य नीति" (Zero Rejection Policy) इसका आधार है।

  • व्यवस्था में बदलाव: समावेशन में बच्चे को स्कूल के अनुसार नहीं बदलना होता, बल्कि स्कूल और शिक्षा व्यवस्था को बच्चे की जरूरतों के अनुसार बदलना होता है।

  • भागीदारी सुनिश्चित करना: केवल स्कूल में प्रवेश देना ही काफी नहीं है। सफल समावेशन के लिए यह जरूरी है कि बच्चा स्कूल की हर गतिविधि (खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पढ़ाई) में सक्रिय रूप से भाग ले।

4. शिक्षक की भूमिका और आवश्यक गुण

विविध पृष्ठभूमि के बच्चों के सफल समावेशन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शिक्षक की होती है। शिक्षक का सामाजिक-आर्थिक स्तर मायने नहीं रखता, बल्कि उसका रवैया (Attitude) सबसे महत्वपूर्ण है।

शिक्षक में निम्नलिखित गुण अनिवार्य रूप से होने चाहिए:

  • संवेदनशीलता: शिक्षक को बच्चों की पृष्ठभूमि और उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

  • धैर्य और लगाव: वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को सीखने में समय लग सकता है। शिक्षक को धैर्य रखना चाहिए और उनके प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

  • उच्च अपेक्षाएँ: शोध बताते हैं कि शिक्षक की अपेक्षाएँ बच्चे के प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। शिक्षक को वंचित वर्ग के बच्चों से भी उतनी ही उच्च अपेक्षाएँ रखनी चाहिए जितनी अन्य बच्चों से। कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि "यह गरीब है तो नहीं सीख पाएगा"।

  • अक्षमताओं का ज्ञान: शिक्षक को यह पता होना चाहिए कि बच्चे को सीखने में कहाँ और क्यों कठिनाई हो रही है।

5. निर्धन एवं पिछड़े वर्ग के बच्चे और उनकी शिक्षा

निर्धनता का सीधा प्रभाव बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है।

  • मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव: भोजन, वस्त्र और आवास की कमी के कारण निर्धन परिवार शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दे पाते।

  • बाल श्रम: गरीबी के कारण अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजना पसंद करते हैं।

  • अभावजन्य जीवन: पिछड़े और वंचित वर्ग के बच्चे संसाधनों की कमी के कारण स्वतंत्र अध्ययन (Self-study) में कठिनाई महसूस करते हैं। उनके घर पर पढ़ाई का माहौल नहीं होता।

समाधान और सरकारी प्रयास: इन बच्चों को मुख्य धारा में लाने के लिए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं:

  1. मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal): ताकि भूख शिक्षा में बाधा न बने और बच्चों का नामांकन बढ़े।

  2. निःशुल्क सामग्री: मुफ्त किताबें, ड्रेस और स्टेशनरी उपलब्ध कराना।

  3. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009: यह 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है।

6. अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के बच्चों की चुनौतियाँ

आंकड़े बताते हैं कि SC और ST समुदायों में साक्षरता दर सामान्य वर्ग की तुलना में काफी कम है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:

  • सामाजिक भेदभाव: कई बार स्कूलों में सवर्ण और दलित बच्चों के बीच भेदभाव देखा जाता है, जिससे बच्चे हतोत्साहित होकर स्कूल छोड़ देते हैं।

  • सांस्कृतिक अलगाव: आदिवासी (ST) बच्चों की भाषा और संस्कृति पाठ्यपुस्तकों की भाषा से बिल्कुल अलग होती है। उन्हें स्कूल का वातावरण "पराया" लगता है।

  • शिक्षकों का रवैया: कई बार शिक्षकों का इन बच्चों के प्रति उदासीन या नकारात्मक रवैया होता है, जो उनकी सीखने की प्रक्रिया को बाधित करता है।

  • भौगोलिक दूरी: आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालयों की कमी एक बड़ी समस्या है।

7. संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)

भारतीय संविधान में वंचित वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, जो हर शिक्षक को पता होने चाहिए:

  • अनुच्छेद 15(4): राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या SC/ST के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है।

  • अनुच्छेद 46: राज्य कमजोर वर्गों, विशेषकर SC और ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा और उन्हें सामाजिक अन्याय से बचाएगा।

  • अनुच्छेद 45: 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल और शिक्षा (ECCE) का प्रावधान।

8. समावेशन के लिए संस्थागत और पाठ्यचर्या सुधार

विविध पृष्ठभूमि के बच्चों को केवल कक्षा में बैठा लेना ही समावेशन नहीं है। इसके लिए शिक्षा शास्त्र और पाठ्यक्रम में गहरे बदलाव की जरूरत है।

8.1 पाठ्यचर्या में सुधार

  • लचीलापन: पाठ्यक्रम कठोर नहीं होना चाहिए। यह भारतीय समाज और संस्कृति की विविधता को दर्शाने वाला होना चाहिए।

  • स्थानीय संदर्भ: पाठ्यपुस्तकों में दिए गए उदाहरण केवल शहरी जीवन के नहीं होने चाहिए। उसमें आदिवासी, ग्रामीण और श्रमिक वर्ग के जीवन के उदाहरण भी शामिल होने चाहिए ताकि बच्चा खुद को उससे जोड़ सके।

  • श्रम का सम्मान: पाठ्यक्रम ऐसा हो जो श्रम के प्रति आदर भाव पैदा करे और सामाजिक न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को बढ़ावा दे।

8.2 शिक्षण विधियों (Pedagogy) में सुधार

  • सहयोगात्मक अधिगम: समावेशी कक्षा में प्रतिस्पर्धा (Competition) के बजाय सहयोग (Collaboration) पर जोर देना चाहिए। बच्चों को समूहों में काम करने के अवसर दिए जाने चाहिए।

  • विभेदित अनुदेशन (Differentiated Instruction): सभी बच्चों को एक ही तरीके से नहीं पढ़ाया जा सकता। शिक्षक को बच्चे की जरूरत के अनुसार अपनी शिक्षण विधि में बदलाव करना चाहिए।

  • रचनात्मकता: रटने की बजाय ज्ञान के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए।

8.3 भाषा के संदर्भ में सुधार

भाषा एक बहुत बड़ा अवरोध भी हो सकती है और संसाधन भी।

  • मातृभाषा का सम्मान: जहाँ तक संभव हो, शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा होनी चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो कक्षा में संवाद और व्याख्या के लिए बच्चे की मातृभाषा का उपयोग किया जाना चाहिए।

  • बहुभाषिकता: कक्षा में उपस्थित अलग-अलग भाषाओं को एक "संसाधन" के रूप में देखना चाहिए, न कि बाधा के रूप में। बच्चों को कक्षा में अपनी भाषा में बोलने की अनुमति होनी चाहिए।

9. वंचित बालकों के प्रकार और उनकी विशिष्ट समस्याएँ

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से वंचित बालकों को तीन मुख्य श्रेणियों में समझा जा सकता है:

  1. सामाजिक रूप से वंचित: जैसे SC/ST बालक। समस्या: अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, अवसरों की कमी।

  2. आर्थिक रूप से वंचित: गरीब और निर्धन बालक। समस्या: पोषण की कमी, शैक्षिक सामग्री का अभाव।

  3. अधिगम अक्षमता वाले बालक: वे बच्चे जो सामान्य बुद्धि के बावजूद पढ़ने, लिखने या गणित में कठिनाई महसूस करते हैं (जैसे डिस्लेक्सिया, डिस्ग्राफिया)।

10. एक शिक्षक के लिए व्यावहारिक सुझाव (Practical Tips for Teachers)

यदि आप CTET पास करके एक सरकारी शिक्षक बनते हैं, तो विविध पृष्ठभूमि के बच्चों के साथ काम करते समय आपको निम्नलिखित बातें ध्यान रखनी चाहिए:

  • भेदभाव रहित वातावरण: यह सुनिश्चित करें कि कक्षा में कोई भी बच्चा जाति, धर्म या लिंग के आधार पर अलग-थलग महसूस न करे।

  • व्यक्तिगत ध्यान: जो बच्चे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं, उनके लिए उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) की व्यवस्था करें।

  • अभिभावकों से संपर्क: वंचित वर्ग के अभिभावक अक्सर अशिक्षित होते हैं और स्कूल आने से हिचकिचाते हैं। शिक्षक को स्वयं पहल करके उनसे संपर्क करना चाहिए और उन्हें बच्चे की शिक्षा का महत्व समझाना चाहिए।

  • स्थानीय उदाहरण: पढ़ाते समय किताबी उदाहरणों के साथ-साथ बच्चों के दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों का प्रयोग करें।

  • सकारात्मक पुनर्बलन: छोटे-छोटे प्रयासों के लिए भी बच्चों की प्रशंसा करें। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

निष्कर्ष

विविध पृष्ठभूमि के बालकों की पहचान और उनका समावेशन केवल एक कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है। एक समावेशी विद्यालय वह है जहाँ हर बच्चे की आवाज सुनी जाती है और हर बच्चे की क्षमता को विकसित होने का पूरा मौका मिलता है। शिक्षक के रूप में, हमें "कमी" बच्चे में नहीं, बल्कि अपनी "व्यवस्था" में ढूंढनी चाहिए और उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए। जब हम विविधता को स्वीकार करते हैं, तभी हम एक सशक्त और संवेदनशील समाज का निर्माण कर पाते हैं। 



बाल विकास के सिद्धान्त

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