1. वेद और उनका महत्व
भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन साहित्यों में से एक 'वेद' हैं। 'वेद' शब्द का अर्थ है 'ज्ञान'। वेदों की संख्या चार है। इनका अध्ययन प्राचीन भारत की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति को समझने के लिए अनिवार्य है।
चार वेद:
ऋग्वेद: यह सबसे पुराना वेद है। इसकी रचना लगभग 3500 वर्ष पूर्व हुई थी।
सामवेद: इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है। इसमें गाए जाने वाले मंत्रों का संकलन है।
यजुर्वेद: इसमें यज्ञ की विधियों और कर्मकांडों का वर्णन है। यह गद्य और पद्य दोनों में है।
अथर्ववेद: इसमें जादू-टोना, वशीकरण, औषधियों और रोग निवारण के मंत्र हैं। इसे सबसे बाद का वेद माना जाता है।
2. ऋग्वेद: विस्तृत अध्ययन
CTET की दृष्टि से ऋग्वेद सबसे महत्वपूर्ण है।
रचना काल: लगभग 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच।
सूक्त: ऋग्वेद में 1000 से अधिक प्रार्थनाएं हैं, जिन्हें 'सूक्त' कहा जाता है। सूक्त का शाब्दिक अर्थ है "अच्छी तरह से बोला गया"।
रचयिता: ये सूक्त विभिन्न ऋषियों द्वारा रचे गए थे। इनमें कुछ प्रार्थनाओं की रचना महिलाओं (ऋषिकाओं) ने भी की थी, जैसे लोपामुद्रा, घोषा और अपाला।
महत्वपूर्ण देवता: ऋग्वेद में तीन देवता सबसे प्रमुख हैं:
अग्नि: आग के देवता। इनका कार्य मनुष्यों की आहुति (यज्ञ सामग्री) देवताओं तक पहुँचाना था।
इंद्र: युद्ध के देवता। इन्हें 'पुरंदर' (किलों को तोड़ने वाला) भी कहा गया है।
सोम: यह एक विशेष पौधा था जिससे एक खास नशीला पेय पदार्थ बनाया जाता था।
भाषा: ऋग्वेद की भाषा 'प्राक-संस्कृत' या 'वैदिक संस्कृत' कहलाती है। यह आज स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली संस्कृत से थोड़ी भिन्न और जटिल थी।
पांडुलिपि: ऋग्वेद की सबसे पुरानी पांडुलिपि (Manuscript) भुर्ज वृक्ष की छाल पर लिखी हुई मिली है। यह कश्मीर में पाई गई थी और अब पुणे (महाराष्ट्र) के एक पुस्तकालय में सुरक्षित है।
3. भाषा परिवार (Language Families)
भारत और विश्व की भाषाएं अलग-अलग परिवारों से जुड़ी हैं। CTET में अक्सर भाषाओं के वर्गीकरण पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार: संस्कृत इसी परिवार का हिस्सा है। इस परिवार में निम्नलिखित भाषाएं शामिल हैं:
भारतीय भाषाएं: असमिया, गुजराती, हिंदी, कश्मीरी, सिंधी।
एशियाई भाषाएं: फारसी।
यूरोपीय भाषाएं: अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, यूनानी (Greek), इतालवी, स्पेनिश।
तर्क: इन्हें एक परिवार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके कई शब्द मूल रूप से एक जैसे हैं। उदाहरण के लिए: 'मात्र' (संस्कृत), 'माँ' (हिंदी), और 'Mother' (अंग्रेजी)।
तिब्बत-बर्मा परिवार:
पूर्वोत्तर भारत (North-East India) में बोली जाने वाली भाषाएं इसी परिवार की हैं।
द्रविड़ भाषा परिवार:
दक्षिण भारत की प्रमुख भाषाएं: तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम।
ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार:
झारखंड और मध्य भारत के कई हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाएं।
4. ऋग्वेद में वर्णित नदियाँ और भूगोल
ऋग्वेद के अध्ययन से हमें उस समय के भौगोलिक विस्तार का पता चलता है।
सरस्वती, सिंधु और उसकी सहायक नदियाँ: इनका वर्णन ऋग्वेद में सबसे अधिक बार किया गया है। सिंधु नदी को 'हिरण्यनी' भी कहा गया है।
गंगा और यमुना: इनका उल्लेख ऋग्वेद में केवल एक बार हुआ है। यह दर्शाता है कि ऋग्वैदिक लोग मुख्य रूप से सप्त-सिंधु क्षेत्र (पंजाब और आसपास) में रहते थे और गंगा के मैदानों की ओर कम बढ़े थे।
संवाद: ऋग्वेद में ऋषि विश्वामित्र और दो देवियों के रूप में पूजी जाने वाली नदियों (व्यास और सतलुज) के बीच एक संवाद है। यह संवाद नदियों की शक्ति और महत्व को दर्शाता है।
5. सामाजिक और राजनीतिक जीवन (वैदिक काल)
वैदिक समाज 'कबीलाई' था और राजा की अवधारणा बाद के समय जैसी नहीं थी।
राजा (Rajan):
ऋग्वैदिक राजा के पास न तो बड़ी राजधानियां थीं, न महल थे और न ही उनके पास कोई स्थाई सेना थी।
वे कर (Tax) नहीं वसूलते थे।
राजा का पद वंशानुगत नहीं था। यानी राजा की मृत्यु के बाद उसका बेटा अपने आप शासक नहीं बनता था।
राजा का मुख्य काम युद्ध में कबीले का नेतृत्व करना और सुरक्षा करना था।
जनता और समुदाय: जनता या पूरे समुदाय के लिए दो शब्दों का प्रयोग होता था:
जन: इसका प्रयोग आज भी हिंदी में होता है।
विश: जिससे 'वैश्य' शब्द निकला है।
ऋग्वेद में 'पुरु जन', 'भरत जन', और 'यदु जन' जैसे नाम मिलते हैं।
दास और दस्यु:
जो लोग आर्यों के विरोधी थे या यज्ञ नहीं करते थे, उन्हें 'दस्यु' कहा जाता था।
दस्युओं की भाषा अलग थी।
बाद में 'दास' शब्द का अर्थ 'गुलाम' हो गया। दासों को युद्ध में जीता जाता था और उन्हें मालिक की जायदाद माना जाता था। वे मालिक के लिए कोई भी काम करने को बाध्य थे।
युद्ध के कारण: युद्ध मुख्य रूप से तीन चीजों के लिए लड़े जाते थे:
मवेशी (खासकर गाय): जिसके पास जितनी गायें, वह उतना अमीर।
जमीन: खेती और चारागाह के लिए।
पानी: जल स्रोतों पर कब्जे के लिए।
युद्ध में लूटे गए धन का बंटवारा होता था: कुछ भाग राजा रखता था, कुछ पुरोहित को दिया जाता था, और शेष आम लोगों में बांट दिया जाता था।
6. महापाषाण संस्कृति (The Story of Megaliths)
लगभग 3000 साल पहले (1000 ई.पू. के आसपास) एक नई प्रथा शुरू हुई जिसे 'महापाषाण' कहा जाता है।
अर्थ और पहचान:
'महा' = बड़ा, 'पाषाण' = पत्थर।
यह प्रथा मृतकों को दफनाने की जगह पर बड़े-बड़े पत्थर लगाने की थी।
इन पत्थरों को लोगों द्वारा बहुत करीने से लगाया जाता था ताकि कब्र की जगह को आसानी से पहचाना जा सके।
क्षेत्र (Location): यह प्रथा मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में प्रचलित थी:
दक्कन (Deccan)
दक्षिण भारत
उत्तर-पूर्वी भारत
कश्मीर
कब्रों की विशेषताएं:
गोलाकार सजावट: कभी-कभी कब्र के चारों ओर बड़े पत्थरों को घेरे में लगाया जाता था।
अकेला खड़ा पत्थर: कभी-कभी केवल एक बड़ा पत्थर जमीन में सीधा गाड़ा जाता था।
सिस्ट (Cist): कुछ महापाषाण जमीन के नीचे बक्से जैसी आकृति के होते थे, जिन्हें सिस्ट कहा जाता है। इनमें शव को रखने के लिए एक 'पोर्ट-होल' (Port-hole) या प्रवेश द्वार होता था, जिससे बाद में भी अन्य शवों को दफनाया जा सके।
मृतकों के साथ रखी जाने वाली वस्तुएं: पुरातत्वविदों को कब्रों में शवों के साथ कई चीजें मिली हैं, जो मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास को दर्शाती हैं:
काले-लाल मिट्टी के बर्तन (Black and Red Ware): यह महापाषाण संस्कृति की मुख्य पहचान है।
लोहे के औजार और हथियार: दक्षिण भारत में महापाषाण काल से ही लोहे का प्रचुर उपयोग शुरू हुआ। कब्रों में लोहे की कुल्हाड़ियाँ और कटार मिले हैं।
घोड़े के कंकाल और सामान: घोड़ों की हड्डियाँ और उनसे जुड़ा सामान भी मिला है।
पत्थर और सोने के गहने: संपन्नता दर्शाने के लिए।
7. इनामगांव: एक विशेष अध्ययन (Case Study: Inamgaon)
इनामगांव महापाषाण काल और आरंभिक गाँवों का एक महत्वपूर्ण पुरास्थल है।
स्थिति:
यह महाराष्ट्र में स्थित है।
यह 'घोड़' नदी (भीमा की सहायक नदी) के किनारे बसा है।
यहाँ लोग लगभग 3600 से 2700 साल पहले (1600-700 ई.पू.) रहते थे।
दफनाने के तरीके:
वयस्कों को प्रायः सीधा लिटाकर दफनाया जाता था।
दिशा: सिर उत्तर की ओर होता था।
कई बार लोगों को घर के अंदर ही दफनाया जाता था।
शव के साथ बर्तन रखे जाते थे, जिनमें शायद खाना और पानी होता था।
एक विशिष्ट खोज: इनामगांव में एक बहुत बड़े घर के आँगन में एक आदमी को दफनाया गया मिला है।
यह घर बस्ती के बीच में था और इसमें 5 कमरे थे (बस्ती के सबसे बड़े घरों में से एक)।
शव को चार पैरों वाले मिट्टी के एक बड़े संदूक (जार) में दफनाया गया था।
शव के पैर मुड़े हुए थे।
यह संभवतः किसी मुखिया या राजा का शव हो सकता है, क्योंकि घर के पास अनाज का गोदाम भी मिला है।
इनामगांव का भोजन और व्यवसाय:
पुरातत्वविदों को गेहूँ, जौ, चावल, दाल, बाजरा, मटर और तिल के बीज मिले हैं।
जानवरों की हड्डियों पर कटने के निशान मिले हैं, जिससे पता चलता है कि लोग मांस खाते थे।
जानवर: गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, कुत्ता, घोड़ा, गधा, सूअर, सांभर, चितकबरा हिरण, और नेवला।
फल: बेर, आंवला, जामुन और खजूर।
8. सामाजिक असमानता के प्रमाण
पुरातत्वविद कब्रों में मिली वस्तुओं के आधार पर समाज में अमीर-गरीब के भेद का पता लगाते हैं।
ब्रह्मगिरि (Brahmagiri): यहाँ एक कब्र में 33 सोने के मनके और शंख पाए गए।
अन्य कब्रें: उसी क्षेत्र में दूसरी कब्रों में केवल कुछ मिट्टी के बर्तन मिले।
यह दर्शाता है कि उस समय के समाज में लोगों की आर्थिक स्थिति में अंतर था। कुछ लोग अमीर थे (सोना-चाँदी वाले) और कुछ गरीब।
कभी-कभी एक ही 'महापाषाण' में एक ही परिवार के कई लोगों को अलग-अलग समय पर दफनाया जाता था। 'पोर्ट-होल' का इस्तेमाल करके बाद में मरने वालों को उसी कब्र में लाया जाता था।
9. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Liners)
चरक: लगभग 2000 साल पहले 'चरक' नाम के प्रसिद्ध वैद्य हुए। उन्होंने चिकित्सा शास्त्र पर 'चरक संहिता' नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने बताया कि मनुष्य के शरीर में 360 हड्डियाँ होती हैं (आधुनिक विज्ञान 206 मानता है, लेकिन चरक ने शायद दाँत और कार्टिलेज को भी गिना था)।
सूक्तों का उच्चारण: ऋग्वेद के श्लोकों को पढ़ा नहीं जाता था, बल्कि इनका उच्चारण और श्रवण (सुनना) किया जाता था। बाद में इन्हें लिखा गया।
युद्ध और सेना: वैदिक काल में कोई स्थाई सेना नहीं थी, लेकिन 'सभा' नामक बैठकों में लोग युद्ध और शांति पर चर्चा करते थे।
उत्तर वैदिक काल (Later Vedic Period): ऋग्वेद के बाद रचे गए ग्रंथों (सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद) को उत्तर वैदिक ग्रंथ कहते हैं। इस काल में समाज में 'वर्ण व्यवस्था' कठोर होने लगी और कर्मकांड बढ़ गए।
10. निष्कर्ष (सारांश)
वैदिक काल ने हमें भाषा, साहित्य और दार्शनिक विचार दिए, जबकि महापाषाण संस्कृति ने हमें दक्षिण भारत के लौह युग और मृत्यु के बाद के जीवन की मान्यताओं से परिचित कराया। CTET परीक्षा में ऋग्वेद की देवताओं, नदियों के संवाद, इनामगांव की कब्रों और महापाषाण के प्रकारों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
वैदिक काल और महापाषाण संस्कृति
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