उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी समुदाय तरह-तरह की गतिविधियों में सक्रिय थे। ब्रिटिश शासन के आगमन और उनके द्वारा लागू किए गए नए कानूनों ने इन समुदायों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। यह अध्याय आदिवासियों की जीवन शैली, औपनिवेशिक शासन के प्रभाव और बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए आंदोलन का विस्तृत अध्ययन है।
1. उन्नीसवीं सदी में आदिवासियों का जीवन
आदिवासी समाज एक जैसा नहीं था। विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी अलग-अलग तरह की गतिविधियों में संलग्न थे। मुख्य रूप से उन्हें चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
क) झूम खेती (घुमंतू खेती) करने वाले
यह खेती मुख्य रूप से पूर्वोत्तर और मध्य भारत की पर्वतीय व जंगली पट्टियों में की जाती थी।
प्रक्रिया:
वे जंगलों में जमीन के छोटे टुकड़ों के लिए पेड़ों के ऊपरी हिस्सों को काट देते थे ताकि धूप जमीन तक आ सके।
जमीन पर उगी घास-फूस को जलाकर साफ कर दिया जाता था।
घास जलाने के बाद बची हुई राख को जमीन पर छिड़क दिया जाता था क्योंकि इसमें पोटाश होती थी, जो मिट्टी को उपजाऊ बनाती थी।
कुदाल से जमीन को हल्का खुरच कर बीज बिखेर दिए जाते थे (हलों का प्रयोग नहीं होता था)।
फसल तैयार होने पर उसे काटकर वे दूसरी जगह चले जाते थे।
परती भूमि: जिस खेत पर एक बार फसल उगाई जा चुकी हो, उसे कई सालों तक खाली छोड़ दिया जाता था ताकि मिट्टी अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त कर सके। इसे 'परती' कहा जाता है।
ख) शिकारी और संग्राहक
कई इलाकों में आदिवासी समूह पशुओं का शिकार करके और वन-उत्पादों को इकट्ठा करके अपना काम चलाते थे।
खोंड समुदाय: उड़ीसा के जंगलों में रहने वाला यह समुदाय इसका प्रमुख उदाहरण है।
वे टोलियां बनाकर शिकार पर निकलते थे।
जंगलों से मिले फल और जड़ें खाते थे।
खाना पकाने के लिए साल और महुआ के बीजों के तेल का इस्तेमाल करते थे।
महुआ: एक फूल जिसे खाया जाता है और शराब बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
स्थानीय लेन-देन: स्थानीय बुनकर और चमड़ा कारीगर कपड़ों व चमड़े की रंगाई के लिए कुसुम और पलाश के फूलों की जरूरत पड़ने पर इन्हीं आदिवासियों पर निर्भर रहते थे।
बैगा समुदाय: मध्य भारत के बैगा समुदाय के लोग स्वयं को 'जंगल की संतान' मानते थे। वे केवल जंगल की उपज पर ही जिंदा रहना चाहते थे। उनके लिए मजदूरी करना अपमान की बात थी।
ग) जानवर पालने वाले (पशुपालक)
ये आदिवासी मौसम के हिसाब से मवेशियों या भेड़ों के रेवड़ लेकर एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।
वन गुर्जर: पंजाब के पहाड़ों में रहने वाले (गाय-भैंस पालते थे)।
लबाड़िया: आंध्र प्रदेश के (गाय-भैंस पालते थे)।
गद्दी: कुल्लू के (गड़रिये/भेड़ पालते थे)।
बकरवाल: कश्मीर के (बकरियां पालते थे)।
घ) एक जगह बसकर खेती करने वाले
उन्नीसवीं सदी से पहले ही बहुत से जनजातीय कबीले एक जगह टिक कर खेती करने लगे थे।
मुंडा, गोंड और संथाल: ये समुदाय बार-बार जगह बदलने के बजाय साल-दर-साल एक ही जगह खेती करते थे।
इन समुदायों में जमीन पूरे कबीले की संपत्ति मानी जाती थी।
ब्रिटिश अफसरों को गोंड और संथाल जैसे एक जगह ठहरकर रहने वाले आदिवासी, शिकारी-संग्राहक या घुमंतू खेती करने वालों के मुकाबले ज्यादा सभ्य दिखाई देते थे।
2. औपनिवेशिक शासन (अंग्रेजों) का आदिवासियों पर प्रभाव
अंग्रेजों के आने से आदिवासियों के जीवन में भारी उथल-पुथल मची। उनके पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए और नई व्यवस्थाएं थोप दी गईं।
आदिवासी मुखियाओं का पतन
अंग्रेजों के आने से पहले आदिवासी मुखियाओं के पास आर्थिक ताकत और प्रशासनिक अधिकार थे।
अंग्रेजों के राज में मुखियाओं के प्रशासनिक अधिकार खत्म कर दिए गए।
उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया।
उन्हें अंग्रेजों को नजराना देना पड़ता था और अपने समूहों को अनुशासित रखना पड़ता था।
उनकी पारंपरिक ताकत छीन ली गई और वे केवल कठपुतली बनकर रह गए।
घुमंतू काश्तकारों पर रोक
अंग्रेज चाहते थे कि आदिवासी एक जगह टिक कर रहें और खेती करें।
स्थायी रूप से बसने वाले किसानों को नियंत्रित करना और उनसे राजस्व (टैक्स) वसूलना आसान था।
अंग्रेजों ने भूमि बंदोबस्त लागू किया, जिसके तहत जमीन की माप की गई और प्रत्येक व्यक्ति का हिस्सा तय किया गया।
पूर्वोत्तर भारत में अंग्रेजों ने झूम काश्तकारों को स्थायी रूप से बसाने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रही क्योंकि वहां पानी की कमी और सूखी मिट्टी के कारण हल चलाना मुश्किल था। भारी विरोध के बाद अंग्रेजों को उन्हें जंगल में खेती करने की छूट देनी पड़ी।
3. वन कानून और उनके प्रभाव
आदिवासियों का जीवन जंगलों से जुड़ा था, इसलिए वन कानूनों में आए बदलावों का उन पर गहरा असर पड़ा।
राज्य की संपत्ति: अंग्रेजों ने सारे जंगलों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और उन्हें राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया।
आरक्षित वन (Reserved Forests): ऐसे जंगल जहां अंग्रेजों की जरूरतों के लिए इमारती लकड़ी पैदा होती थी, उन्हें 'आरक्षित' घोषित कर दिया गया। इन जंगलों में लोगों को स्वतंत्र रूप से घूमने, झूम खेती करने, फल इकट्ठा करने या शिकार करने की मनाही थी।
समस्या: जब आदिवासियों को जंगलों से बाहर निकाल दिया गया, तो अंग्रेजों के सामने स्लीपर (रेल की पटरी के नीचे बिछाए जाने वाले लकड़ी के तख्ते) काटने और पेड़ों को ढोने के लिए मजदूरों की कमी हो गई।
वन ग्राम: इसका समाधान निकालने के लिए औपनिवेशिक अधिकारियों ने तय किया कि झूम काश्तकारों को जंगल में जमीन के छोटे टुकड़े दिए जाएंगे, लेकिन शर्त यह होगी कि उन्हें वन विभाग के लिए मजदूरी करनी होगी और जंगलों की देखभाल करनी होगी।
4. व्यापार और कर्ज का जाल (द महाजन और व्यापारी)
उन्नीसवीं सदी के दौरान व्यापारियों और महाजनों ने जंगलों में आना शुरू कर दिया। वे वन उपज खरीदने, नकद कर्जा देने और आदिवासियों को मजदूरी पर रखने के लिए आते थे।
रेशम उत्पादक: अठारहवीं सदी में भारतीय रेशम की यूरोपीय बाजारों में भारी मांग थी। हजारीबाग (वर्तमान झारखंड) के आसपास रहने वाले संथाल रेशम के कीड़े पालते थे।
शोषण: व्यापारी अपने एजेंटों को भेजकर आदिवासियों को कर्जा देते थे और उनके कृमि-कोशों को इकट्ठा कर लेते थे। 3-4 रुपये प्रति हजार कृमि-कोश देकर उन्हें बर्दवान या गया भेजकर 5 गुना कीमत पर बेचा जाता था।
आदिवासियों को बहुत कम मुनाफा होता था, जबकि बिचौलिए मालामाल हो रहे थे। इस कारण आदिवासी बाजारों और व्यापारियों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगे।
5. दिकु कौन थे?
आदिवासी लोग बाहरी लोगों (जैसे - व्यापारी, महाजन, ब्रिटिश अधिकारी, और जमींदार) को 'दिकु' कहते थे। वे अपनी गरीबी और दयनीय अवस्था का मुख्य कारण इन्हीं दिकुओं को मानते थे।
6. काम की तलाश और दुर्दशा
जिन आदिवासियों को काम के लिए अपने घरों से दूर जाना पड़ता था, उनकी दशा और भी खराब थी।
उन्नीसवीं सदी के आखिर में चाय बागान फैलने लगे थे।
खनन उद्योग एक महत्वपूर्ण उद्योग बन गया था।
असम के चाय बागानों और झारखंड की कोयला खदानों में काम करने के लिए आदिवासियों को बड़ी संख्या में भर्ती किया गया।
उन्हें ठेकेदारों के माध्यम से भर्ती किया जाता था जो न केवल उन्हें बहुत कम वेतन देते थे बल्कि उन्हें वापस घर भी नहीं लौटने देते थे।
7. प्रमुख आदिवासी विद्रोह
अंग्रेजों के कानूनों और शोषण के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासियों ने बगावत की:
कोल विद्रोह: 1831-32 में।
संथाल विद्रोह: 1855 में।
बस्तर विद्रोह: 1910 में (मध्य भारत में)।
वर्ली विद्रोह: 1940 में (महाराष्ट्र में)।
8. बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन
यह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। बिरसा मुंडा का आंदोलन झारखंड क्षेत्र में हुआ एक सशक्त विद्रोह था।
प्रारंभिक जीवन
बिरसा का जन्म 1870 के दशक के मध्य में हुआ।
उनके पिता गरीब थे और वे भेड़-बकरियां चराते हुए बड़े हुए।
उन्होंने मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई की और वहां उपदेश सुना कि मुंडा समुदाय स्वर्ग का साम्राज्य हासिल कर सकता है अगर वे अच्छे ईसाई बन जाएं।
बाद में उन्होंने एक जाने-माने वैष्णव धर्म प्रचारक के साथ भी समय बिताया और जनेऊ धारण किया।
विचारधारा और सुधार
बिरसा का उद्देश्य आदिवासी समाज में सुधार लाना था। उन्होंने मुंडाओं से आह्वान किया कि:
शराब पीना छोड़ दें।
गांव को साफ रखें।
डायन और जादू-टोने में विश्वास न करें।
वे मिशनरियों और हिंदू जमींदारों का भी विरोध करते थे क्योंकि वे उन्हें बाहरी मानते थे जो मुंडा जीवन शैली को नष्ट कर रहे थे।
स्वर्ण युग की कल्पना (सतयुग)
बिरसा अपने अनुयायियों को अपने गौरवपूर्ण अतीत (स्वर्ण युग) की याद दिलाते थे।
जब मुंडा लोग अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते थे, और कुदरती झरनों को नियंत्रित करते थे।
वे पेड़ और बाग लगाते थे और पेट पालने के लिए खेती करते थे।
उस युग में मुंडा अपने बिरादरों और रिश्तेदारों का खून नहीं बहाते थे और ईमानदारी से जीते थे।
बिरसा चाहते थे कि लोग फिर से अपनी जमीन पर खेती करें और एक जगह टिक कर रहें।
आंदोलन का प्रसार (उलगुलान)
अंग्रेज बिरसा के राजनीतिक उद्देश्यों से बहुत डरते थे। बिरसा का उद्देश्य था - मिशनरियों, महाजनों, हिंदू भूस्वामियों और सरकार को बाहर निकालकर बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज की स्थापना करना।
1895: बिरसा को गिरफ्तार किया गया और दंगे-फसाद के आरोप में 2 साल की सजा सुनाई गई।
1897: जेल से लौटने के बाद बिरसा ने भूमिगत होकर समर्थन जुटाना शुरू किया।
उन्होंने लोगों को उकसाने के लिए परंपरागत प्रतीकों और भाषा का इस्तेमाल किया।
उनका आह्वान था कि "रावणों (दिकु और यूरोपियों) को तबाह कर दें"।
बिरसा के अनुयायियों ने सफेद झंडा फहराया जो बिरसा राज का प्रतीक था।
उन्होंने थाने और चर्चों पर हमले किए और महाजनों की संपत्तियों पर धावा बोला।
अंत और परिणाम
1900: बिरसा मुंडा की हैजे से मृत्यु हो गई और आंदोलन ठंडा पड़ गया।
महत्व:
इसने औपनिवेशिक सरकार को ऐसे कानून बनाने पर मजबूर किया जिससे दिकु लोग आदिवासियों की जमीन आसानी से न छीन सकें। (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908)
इसने साबित कर दिया कि आदिवासी अन्याय का विरोध करने में सक्षम हैं।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts)
झूम खेती: इसे 'घुमंतू खेती' (Shifting Cultivation) भी कहते हैं। इसमें पेड़ों को काटा और जलाया जाता है।
स्लीपर: लकड़ी के क्षैतिज तख्ते जिन पर रेल की पटरियां बिछाई जाती हैं।
महुआ: एक फूल जिससे शराब बनाई जाती है।
वैष्णव: विष्णु की पूजा करने वाले।
सोनग्राम संगमा विद्रोह: 1906 में असम में हुआ।
वन सत्याग्रह: 1930 के दशक में मध्य प्रांत में हुआ।
कुसुम और पलाश: इन फूलों का इस्तेमाल रंगाई (Dyeing) के लिए होता था।
बेवड़: मध्य प्रदेश में घुमंतू खेती के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द।
आदिवासी, दिकु और स्वर्ण युग
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