प्रस्तावना
1857 का विद्रोह भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बड़ी और व्यापक सशस्त्र प्रतिक्रिया थी। इसे विनायक दामोदर सावरकर ने "भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" कहा था। यह विद्रोह केवल सैनिकों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें किसान, कारीगर और राजा-नवाब भी शामिल थे।
1. विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt)
विद्रोह किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ लंबे समय से पनप रहे असंतोष का विस्फोट था।
क. राजनीतिक कारण (Political Causes)
डलहौजी की हड़प नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी ने यह नियम बनाया कि यदि किसी राजा का अपना कोई पुत्र नहीं है, तो वह दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी नहीं बना सकता और उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाएगा।
इसके तहत सतारा, संबलपुर, उदयपुर, नागपुर और झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया गया।
अवध का विलय: 1856 में लॉर्ड डलहौजी ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर "कुशासन" का आरोप लगाकर अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। इससे सैनिकों में भारी रोष फैला क्योंकि अधिकांश सैनिक अवध के ही थे।
नाना साहेब की पेंशन बंद करना: पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन अंग्रेजों ने बंद कर दी और उन्हें कानपुर भेज दिया।
मुगल सम्राट का अपमान: लॉर्ड कैनिंग ने घोषणा की कि बहादुर शाह जफर अंतिम मुगल सम्राट होंगे और उनकी मृत्यु के बाद उनके वंशजों को 'राजा' की उपाधि नहीं मिलेगी और उन्हें लाल किला खाली करना होगा।
ख. आर्थिक कारण (Economic Causes)
भू-राजस्व नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रयतवाड़ी और महलवाड़ी व्यवस्थाओं ने किसानों का अत्यधिक शोषण किया। भारी करों के कारण किसान साहूकारों के कर्ज के जाल में फंस गए।
हस्तशिल्प उद्योगों का विनाश: इंग्लैंड में बनी मशीनी वस्तुओं ने भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग को बर्बाद कर दिया। बुनकर और कारीगर बेरोजगार हो गए।
जमींदारों की बदहाली: इनाम कमीशन (1852) द्वारा कई जागीरदारों की जमीनें छीन ली गईं, जिससे वे अंग्रेजों के विरोधी हो गए।
ग. सामाजिक और धार्मिक कारण (Social and Religious Causes)
धर्मांतरण का भय: 1813 के चार्टर एक्ट के बाद ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की छूट मिली। भारतीयों को लगा कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं।
सामाजिक सुधार: सती प्रथा का अंत (1829) और विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) जैसे कानूनों को रूढ़िवादी भारतीयों ने अपने धर्म और संस्कृति में हस्तक्षेप माना।
लेक्स लोकी कानून (1850): इस कानून के अनुसार, ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को ही अपने पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल सकता था। इसने हिंदुओं में भय पैदा किया।
घ. सैनिक कारण (Military Causes)
वेतन और भत्ते में भेदभाव: भारतीय सिपाहियों को यूरोपीय सैनिकों की तुलना में कम वेतन मिलता था और उन्हें पदोन्नति के अवसर नहीं दिए जाते थे। भारतीय सूबेदार से ऊपर नहीं उठ सकते थे।
सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856): लॉर्ड कैनिंग ने यह कानून बनाया कि भारतीय सैनिकों को जरूरत पड़ने पर समुद्र पार करके भी युद्ध के लिए जाना होगा। उस समय समुद्र पार करना भारतीय समाज में धर्म भ्रष्ट होना माना जाता था।
डाकघर अधिनियम (1854): सैनिकों को मिलने वाली मुफ्त डाक सेवा सुविधा समाप्त कर दी गई।
ङ. तात्कालिक कारण (Immediate Cause)
एनफील्ड राइफल और चर्बी वाले कारतूस: 1856 में पुरानी 'ब्राउन बैस' बंदूक की जगह नई 'एनफील्ड राइफल' का प्रयोग शुरू किया गया।
इसके कारतूस के ऊपरी भाग को मुंह से काटना पड़ता था।
सैनिकों में यह अफवाह फैल गई कि कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है।
गाय हिंदुओं के लिए पवित्र थी और सूअर मुसलमानों के लिए वर्जित था। इसने दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया।
2. विद्रोह का प्रारंभ और विस्तार (Outbreak and Spread)
बैरकपुर की घटना
29 मार्च 1857: बैरकपुर छावनी (बंगाल) में 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग करने से मना कर दिया।
मंगल पांडे ने अपने अधिकारियों (लेफ्टिनेंट बाग और ह्यूसन) पर गोली चलाई।
8 अप्रैल 1857: मंगल पांडे को फांसी दे दी गई। यह विद्रोह की पहली चिंगारी थी।
मेरठ और दिल्ली (विद्रोह की औपचारिक शुरुआत)
10 मई 1857: मेरठ छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने अपने साथियों को जेल से छुड़ाया, अधिकारियों को मारा और दिल्ली की ओर कूच किया।
11 मई 1857: विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंचे और लाल किले पर कब्जा कर लिया।
उन्होंने वृद्ध मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को 'भारत का सम्राट' घोषित कर दिया।
दिल्ली में वास्तविक नेतृत्व जनरल बख्त खान ने संभाला।
3. विद्रोह के प्रमुख केंद्र और नेतृत्व (Centers and Leaders)
CTET परीक्षा में यहाँ से 'मिलान करें' (Match the following) प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
| केंद्र (Center) | भारतीय नेतृत्व (Indian Leader) | ब्रिटिश दमनकर्ता (British Suppressor) | विशेष विवरण |
| दिल्ली | बहादुर शाह जफर, बख्त खान | निकलसन और हडसन | निकलसन मारा गया; बहादुर शाह को रंगून निर्वासित किया गया। |
| कानपुर | नाना साहेब, तात्या टोपे | कॉलिन कैंपबेल | नाना साहेब नेपाल भाग गए; तात्या टोपे को बाद में फांसी दी गई। |
| लखनऊ | बेगम हजरत महल, बिरजिस कादिर | कॉलिन कैंपबेल | बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र को नवाब घोषित किया था। |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई | ह्यूरोज | "यहाँ वह औरत सोई हुई है जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी" - ह्यूरोज का कथन। |
| बिहार (जगदीशपुर) | कुंवर सिंह, अमर सिंह | विलियम टेलर और विंसेंट आयर | कुंवर सिंह 80 वर्ष के थे, उन्होंने सबसे अधिक बार अंग्रेजों को हराया। |
| फैजाबाद | मौलवी अहमदुल्लाह | जनरल रेनार्ड | इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 'जिहाद' का नारा दिया था। |
| इलाहाबाद | लियाकत अली | कर्नल नील | - |
| बरेली | खान बहादुर खान | विंसेंट आयर | - |
| ग्वालियर | तात्या टोपे | ह्यूरोज | झाँसी के पतन के बाद तात्या टोपे ने ग्वालियर का नेतृत्व किया। |
4. विद्रोह का दमन (Suppression of the Revolt)
अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा दी। उन्होंने नए कानून बनाए और विद्रोहियों को बिना मुकदमे के गोली मारने का अधिकार अधिकारियों को दिया।
सितंबर 1857: अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया।
बहादुर शाह जफर को हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार किया गया। उनके बेटों की हत्या कर दी गई और उन्हें बर्मा (म्यांमार) की रंगून जेल भेज दिया गया, जहां 1862 में उनकी मृत्यु हो गई।
जून 1858: रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं।
तात्या टोपे को एक जमींदार मित्र ने धोखे से पकड़वा दिया और 1859 में उन्हें फांसी दे दी गई।
1859 के अंत तक अंग्रेजों ने भारत पर पूर्ण नियंत्रण पुनः स्थापित कर लिया।
5. विद्रोह की असफलता के कारण (Causes of Failure)
इतने बड़े पैमाने पर होने के बावजूद विद्रोह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
केंद्रीय संगठन का अभाव: विद्रोहियों के पास कोई केंद्रीय नेतृत्व या योजना नहीं थी। दिल्ली, कानपुर और लखनऊ के बीच कोई तालमेल नहीं था।
सीमित क्षेत्र: विद्रोह मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत तक ही सीमित रहा। दक्षिण भारत, पंजाब, और बंगाल का बड़ा हिस्सा इससे अछूता रहा।
देशी राजाओं का अंग्रेजों को सहयोग: ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर, हैदराबाद के निजाम और कई अन्य राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया। लॉर्ड कैनिंग ने कहा था, "इन शासकों ने तूफान के आगे बांध की तरह काम किया, वरना यह तूफान हमें एक झोंके में उड़ा ले जाता।"
साधनों की कमी: विद्रोहियों के पास पुराने हथियार (तलवार, भाले) थे, जबकि अंग्रेजों के पास आधुनिक एनफील्ड राइफलें और तोपें थीं।
शिक्षित वर्ग की उदासीनता: आधुनिक शिक्षित भारतीयों ने विद्रोह का समर्थन नहीं किया क्योंकि उन्हें लगता था कि अंग्रेज भारत का आधुनिकीकरण कर रहे हैं।
स्पष्ट लक्ष्य का अभाव: सभी विद्रोही अपने निजी स्वार्थों के लिए लड़ रहे थे। नाना साहेब को पेंशन चाहिए थी, तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी। 'राष्ट्रवाद' की भावना अभी शैशवावस्था में थी।
6. विद्रोह का परिणाम और महत्व (Consequences and Significance)
1857 का विद्रोह भले ही असफल रहा हो, लेकिन इसके परिणाम दूरगामी थे। इसने भारत में ब्रिटिश शासन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया।
क. भारत सरकार अधिनियम, 1858
कंपनी राज का अंत: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज (Crown) के हाथों में सौंप दिया गया।
वायसराय पद का सृजन: भारत के गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर 'वायसराय' कर दिया गया।
प्रथम वायसराय: लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने।
भारत सचिव: ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक नया पद 'भारत सचिव' (Secretary of State for India) बनाया गया, जो ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।
ख. महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1 नवंबर 1858)
इलाहाबाद में आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने महारानी का घोषणा पत्र पढ़ा:
भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार नहीं किया जाएगा।
देशी रियासतों के साथ की गई संधियों का सम्मान किया जाएगा।
दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को पुनः बहाल किया गया (हड़प नीति समाप्त)।
धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा किया गया।
सभी भारतीयों को बिना भेदभाव के सरकारी सेवाओं में अवसर दिया जाएगा।
ग. सैन्य पुनर्गठन (पील आयोग)
भविष्य में विद्रोह को रोकने के लिए सेना का पुनर्गठन किया गया।
यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई (अनुपात 1:2 या 2:5 कर दिया गया)।
तोपखाना पूर्ण रूप से यूरोपीय सैनिकों के हाथों में रखा गया।
जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर रेजीमेंट बनाई गईं ताकि सैनिकों में एकता न हो सके (फूट डालो और राज करो)।
7. विद्रोह का स्वरूप: इतिहासकारों के मत (Nature of Revolt)
CTET में अक्सर कथन देकर पूछा जाता है कि यह किसने कहा था।
सिपाही विद्रोह: सर जॉन लॉरेंस और सीली ने इसे केवल एक सैनिक विद्रोह माना।
भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: वी. डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'The Indian War of Independence 1857' में इसे यह नाम दिया।
राष्ट्रीय विद्रोह: बेंजामिन डिजरायली (ब्रिटिश संसद सदस्य) ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा।
न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम: आर. सी. मजूमदार का कथन।
बर्बरता और सभ्यता के बीच संघर्ष: टी. आर. होम्स।
हिंदू-मुस्लिम षड्यंत्र: जेम्स आउट्रम और डब्लू. टेलर।
8. महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts for Revision)
विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल: लॉर्ड कैनिंग।
विद्रोह के समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री: पामर्स्टन।
विद्रोह का प्रतीक: कमल और रोटी।
तात्या टोपे का वास्तविक नाम: रामचंद्र पांडुरंग।
नाना साहेब का वास्तविक नाम: धोंदू पंत।
अजीमुल्लाह खान: नाना साहेब के सलाहकार थे।
1857 के विद्रोह पर सरकारी इतिहासकार: एस. एन. सेन (पुस्तक: Eighteen Fifty Seven)।
निष्कर्ष
1857 की क्रांति ने भारतीय जनमानस में स्वतंत्रता की बीज बो दिए। यद्यपि यह असफल रही, लेकिन इसने अंग्रेजों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया और भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
CTET परीक्षार्थियों के लिए अध्ययन टिप:
इस अध्याय से मानचित्र आधारित प्रश्न और नेतृत्वकर्ताओं के मिलान वाले प्रश्न अधिक आते हैं। विशेष रूप से बिहार (कुंवर सिंह) और झाँसी (लक्ष्मीबाई) से संबंधित तथ्यों को गहराई से पढ़ें।
1857 का विद्रोह
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes