1. बाज़ार का परिचय
बाज़ार वह स्थान है जहाँ खरीदार और विक्रेता वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए मिलते हैं। बाज़ार केवल एक निश्चित स्थान नहीं होता, बल्कि यह कई प्रकार का हो सकता है।
हम बाज़ार से अनाज, मसाले, दांत का मंजन, साबुन, कपड़े, ब्रेड, आदि खरीदते हैं।
बाज़ार कई प्रकार के होते हैं: साप्ताहिक बाज़ार, मोहल्ले की दुकानें, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और शॉपिंग मॉल।
2. साप्ताहिक बाज़ार (Weekly Markets)
साप्ताहिक बाज़ार वह बाज़ार है जो सप्ताह के किसी एक निश्चित दिन लगता है। इस बाज़ार की अपनी कोई स्थायी दुकानें नहीं होती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
अस्थायी संरचना: व्यापारी दिन में दुकान लगाते हैं और शाम होने पर उन्हें समेट लेते हैं। अगले दिन वे अपनी दुकानें किसी और जगह लगाते हैं।
बचत और सस्ती वस्तुएँ: यहाँ मिलने वाला सामान पक्की दुकानों की अपेक्षा सस्ता होता है।
कारण: पक्की दुकानों को किराया, बिजली का बिल, और सरकारी शुल्क देना पड़ता है, जबकि साप्ताहिक बाज़ार के व्यापारियों को यह खर्च नहीं करना पड़ता।
पारिवारिक श्रम: दुकानदार अपना सामान अपने घर में ही रखते हैं। अक्सर उनके घर के लोग ही उनकी सहायता करते हैं, इसलिए उन्हें अलग से कर्मचारी नहीं रखने पड़ते।
मोल-भाव: एक ही तरह के सामान के लिए कई दुकानें होती हैं, जिससे प्रतियोगिता होती है। यदि एक दुकानदार अधिक कीमत मांगता है, तो ग्राहक दूसरी दुकान पर जा सकता है, जिससे कीमतों में मोल-भाव (Bargaining) की संभावना रहती है।
विविधता: यहाँ ज़रूरत का लगभग सभी सामान एक ही जगह मिल जाता है—सब्ज़ियाँ, कपड़े, किराना सामान से लेकर बर्तन तक।
3. मोहल्ले की दुकानें (Shops in the Neighborhood)
ये वे दुकानें हैं जो हमारे घर के पास स्थित होती हैं और स्थायी होती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
प्रकार: इसमें पक्की दुकानें (जैसे डेयरी, किराना स्टोर, स्टेशनरी) और सड़क किनारे के अस्थायी स्टॉल (जैसे सब्ज़ी वाला, फल वाला, मैकेनिक) दोनों शामिल हैं।
विश्वास और संबंध: दुकानदार और खरीददार अक्सर एक-दूसरे को जानते हैं।
उधारी (Credit) की सुविधा: क्योंकि दुकानदार ग्राहक को पहचानता है, इसलिए वे अक्सर सामान 'उधारी' पर भी देते हैं। इसका मतलब है कि ग्राहक सामान अभी ले जाता है और भुगतान बाद में करता है।
उदाहरण (NCERT): सुजाता और कविता अपनी मोहल्ले की दुकान से सामान लेती हैं। दुकानदार ने $3000$ रुपये की राशि रजिस्टर में नोट कर ली, जिसका भुगतान वे अगले महीने करेंगी।
4. शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मॉल (Shopping Complexes and Malls)
शहरी क्षेत्रों में एक अन्य प्रकार का बाज़ार होता है जहाँ एक साथ कई तरह की दुकानें होती हैं।
शॉपिंग कॉम्प्लेक्स: इन्हें आमतौर पर अनेक दुकानों वाली बहुमंजिला इमारतें कहा जाता है।
मॉल: ये वातानुकूलित (Air-conditioned), बहुमंजिला इमारतें होती हैं जहाँ अलग-अलग मंजिलों पर दुकानें होती हैं।
ब्रांडेड सामान: यहाँ ब्रांडेड और नॉन-ब्रांडेड दोनों तरह का सामान मिलता है। ब्रांडेड सामान महंगा होता है क्योंकि कंपनियाँ इसे बड़े शोरूम में बेचती हैं और विज्ञापन पर खर्च करती हैं।
ग्राहक वर्ग: यहाँ मिलने वाला सामान महंगा होता है, इसलिए केवल अमीर लोग ही यहाँ से खरीदारी कर पाते हैं।
5. बाज़ारों की श्रृंखला (Chain of Markets)
सामान उत्पादक (Producer) से लेकर उपभोक्ता (Consumer) तक कैसे पहुँचता है, यह प्रक्रिया एक श्रृंखला बनाती है।
श्रृंखला के चरण:
उत्पादक (Producer): सामान का उत्पादन कारखानों, खेतों या घरों में होता है।
थोक व्यापारी (Wholesale Trader): उत्पादक सीधे उपभोक्ता को कम मात्रा में सामान नहीं बेचता (जैसे 1 किलो सब्ज़ी या 1 प्लास्टिक कप)। थोक व्यापारी बड़ी मात्रा में सामान खरीदता है।
उदाहरण: सब्ज़ी का थोक व्यापारी $100$ किलो सब्ज़ी खरीदेगा।
खुदरा व्यापारी (Retailer): वह व्यापारी जो अंततः वस्तु उपभोक्ता को बेचता है। यह साप्ताहिक बाज़ार का दुकानदार, फेरीवाला या मोहल्ले का दुकानदार हो सकता है।
उपभोक्ता (Consumer): जो व्यक्ति अंतिम रूप से वस्तु का उपभोग करता है।
दिल्ली का आज़ादपुर मंडी उदाहरण (NCERT):
दिल्ली में सब्ज़ियों के थोक बाज़ार हैं।
बड़ा थोक व्यापारी सुबह $2$ बजे मंडी पहुँचता है जहाँ सब्ज़ियों की बोली लगती है।
वह बड़ी मात्रा में (जैसे $5$ क्विंटल फूलगोभी) खरीदता है और अपने गोदाम में रखता है।
वहाँ से छोटे खुदरा व्यापारी (रेहड़ी वाले) सुबह-सुबह सामान खरीदते हैं और कॉलोनी में बेचने जाते हैं।
6. बाज़ार और समानता (Markets and Equality)
क्या बाज़ार में सबको समान लाभ मिलता है? नहीं।
लाभ में अंतर:
दुकानदार: साप्ताहिक बाज़ार का छोटा दुकानदार बहुत कम लाभ कमाता है, जबकि शॉपिंग मॉल का दुकानदार बहुत अधिक लाभ कमाता है।
खरीददार: एक तरफ वे लोग हैं जो सबसे सस्ता सामान भी नहीं खरीद सकते, और दूसरी तरफ वे हैं जो मॉल्स में महंगी खरीदारी करते हैं।
7. एक कमीज़ की कहानी: कपास से कमीज़ तक (A Shirt in the Market)
यह विषय CTET के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बाज़ार की पूरी प्रक्रिया और उसमें छिपी असमानता को दर्शाता है। हम कुरनूल (आंध्र प्रदेश) में कपास उगाने वाली एक किसान 'स्वप्ना' और इरोड (तमिलनाडु) के कपड़ा बाज़ार का उदाहरण लेंगे।
चरण 1: कपास का उत्पादन (Swapna's Story)
स्थान: कुरनूल, आंध्र प्रदेश।
प्रक्रिया: स्वप्ना अपने छोटे से खेत में कपास उगाती है। कपास के डोडे (Bolls) पकने पर उन्हें चुना जाता है।
ऋण का जाल: खेती शुरू करने के लिए स्वप्ना ने स्थानीय व्यापारी से $2500$ रुपये कर्ज़ लिया था (बीज और खाद के लिए)।
शर्त: व्यापारी ने शर्त रखी थी कि स्वप्ना को अपनी सारी रूई उसी को बेचनी होगी।
परिणाम: बाज़ार में कपास का भाव $1800$ रुपये प्रति क्विंटल था, लेकिन व्यापारी ने उसे केवल $1500$ रुपये प्रति क्विंटल दिया।
स्वप्ना उससे बहस नहीं कर सकती क्योंकि मुश्किल समय में (बीमारी, बच्चों की फीस) वही व्यापारी उसे कर्ज़ देता है।
निष्कर्ष: किसान कड़ी मेहनत के बाद भी बहुत कम कमाता है।
चरण 2: ईरोड का कपड़ा बाज़ार (Erode Cloth Market)
स्थान: तमिलनाडु।
महत्व: यह दुनिया के सबसे बड़े कपड़ा बाज़ारों में से एक है। यहाँ सप्ताह में दो बार बाज़ार लगता है।
प्रक्रिया: गाँव के बुनकर (Weavers) यहाँ कपड़ा बनाकर लाते हैं। कपड़े के व्यापारी इस कपड़े को खरीदते हैं और उसे गार्मेंट निर्माताओं को बेचते हैं।
8. दादन व्यवस्था (Putting-out System)
यह व्यापारियों और बुनकरों के बीच की एक व्यवस्था है जो भारत के कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
व्यवस्था कैसे काम करती है?
कच्चा माल: व्यापारी बुनकर को सूत (Yarn) देता है।
तैयार माल: बुनकर उस सूत से कपड़ा (Cloth) तैयार करके व्यापारी को वापस देता है।
बुनकरों के लिए लाभ:
उन्हें सूत खरीदने के लिए अपना पैसा नहीं लगाना पड़ता।
उन्हें तैयार कपड़े को बेचने की चिंता नहीं करनी पड़ती, क्योंकि व्यापारी पहले ही ऑर्डर दे चुका होता है।
बुनकरों के लिए नुकसान (महत्वपूर्ण):
निर्भरता: बुनकर पूरी तरह व्यापारी पर निर्भर हो जाते हैं। उन्हें यह नहीं पता होता कि वे किसके लिए कपड़ा बना रहे हैं या वह किस कीमत पर बेचा जाएगा।
कम मजदूरी: बाज़ार में कपड़े का दाम चाहे जो हो, व्यापारी बुनकरों को बहुत कम पैसा देते हैं।
पूंजी निवेश: बुनकरों को करघे (Looms) खरीदने के लिए अपनी जमा पूंजी लगानी पड़ती है या कर्ज़ लेना पड़ता है। एक करघे की कीमत लगभग $20,000$ रुपये होती है। अगर किसी के पास दो करघे हैं, तो $40,000$ रुपये का निवेश होता है।
श्रम: बुनकर और उसका पूरा परिवार दिन में $12$ घंटे तक काम करता है।
निष्कर्ष: दादन व्यवस्था में व्यापारी का वर्चस्व होता है और बुनकरों का शोषण होता है।
9. सहकारी संस्थाएँ (Cooperatives) - एक समाधान
दादन व्यवस्था में व्यापारियों के शोषण से बचने के लिए बुनकर 'सहकारी संस्था' बना सकते हैं।
कार्यप्रणाली: समान हित वाले लोग इकट्ठे होते हैं। बुनकर मिल-जुलकर सूत खरीदते हैं और उसे आपस में बांट लेते हैं। वे विपणन (Marketing) का काम भी खुद करते हैं।
लाभ: इससे बिचौलिये (व्यापारी) की भूमिका समाप्त हो जाती है और बुनकरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलता है।
उदाहरण: तमिलनाडु सरकार स्कूल यूनिफॉर्म के लिए 'फ्री स्कूल यूनिफॉर्म योजना' चलाती है और इसके लिए कपड़ा सहकारी संस्थाओं से खरीदती है। 'को-ऑपटेक्स' (Co-optex) भी इसका एक उदाहरण है।
10. विदेश में बाज़ार (Garment Exporting Factory)
इरोड का व्यापारी वह कपड़ा दिल्ली के पास स्थित एक 'वस्त्र निर्यातक फैक्ट्री' (Garment Exporter) को बेचता है।
निर्यातक का काम:
निर्यातक उस कपड़े से कमीज़ें बनाता है।
इन कमीज़ों को विदेशी खरीदारों (जैसे अमेरिका और यूरोप के व्यवसायी) को निर्यात किया जाता है।
विदेशी खरीदारों की शर्तें:
विदेशी खरीदार (जैसे बड़ी चेन स्टोर्स) बहुत शक्तिशाली होते हैं। वे निम्नलिखित शर्तें रखते हैं:
न्यूनतम कीमत पर माल चाहिए।
सामान की गुणवत्ता (Quality) सर्वोत्तम होनी चाहिए।
सामान समय पर मिलना चाहिए।
ज़रा सी भी कमी होने पर वे माल रिजेक्ट कर देते हैं। इसलिए निर्यातक अपनी लागत कम करने की पूरी कोशिश करते हैं।
11. कारखाने में मज़दूरों की स्थिति
लागत कम करने के लिए निर्यातक मज़दूरों पर दबाव डालते हैं।
अस्थायी रोज़गार: इम्पेक्स गार्मेंट फैक्ट्री (उदाहरण) में $70$ मज़दूर हैं, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं। इन्हें 'अस्थायी' रूप से रखा जाता है, यानी जब काम न हो तो उन्हें हटाया जा सकता है।
वेतन: दर्जी (Tailor) को सबसे ज्यादा वेतन मिलता है, जो लगभग $3000$ रुपये प्रतिमाह है।
सहायक: औरतों को धागा काटने, बटन टांकने, प्रेस करने के काम के लिए रखा जाता है, जिसके लिए उन्हें बहुत कम मज़दूरी मिलती है।
प्रेस करने का: $1.50$ रुपये प्रति पीस।
12. लाभ का वितरण: किसे क्या मिला?
एक कमीज़ जो अमेरिका में $26$ डॉलर (लगभग $1800$ रुपये) में बेची जाती है, उसकी यात्रा में किसको कितना लाभ मिला?
विदेशी व्यवसायी (US Buyer): सबसे अधिक लाभ कमाता है। वह $300$ रुपये में कमीज़ खरीदता है और $1800$ रुपये में बेचता है। (विज्ञापन और स्टोर खर्च हटाने के बाद भी भारी मुनाफा)।
वस्त्र निर्यातक (Garment Exporter): मध्यम लाभ कमाता है।
फैक्ट्री का मज़दूर: केवल अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने लायक कमा पाता है।
बुनकर (Weaver/Merchant): व्यापारी कम लाभ कमाता है, लेकिन बुनकर की स्थिति मज़दूर से भी खराब हो सकती है।
किसान (Farmer): सबसे अधिक मेहनत करता है (कपास उगाना), लेकिन उसे सबसे कम लाभ मिलता है।
13. बाज़ार और लोकतंत्र (Market and Democracy)
CTET परीक्षा में अक्सर बाज़ार को सामाजिक न्याय और लोकतंत्र से जोड़कर प्रश्न पूछे जाते हैं।
लोकतंत्र का उद्देश्य है कि सबको समान अवसर मिले और किसी का शोषण न हो।
बाज़ार की श्रृंखला में, जो लोग शक्तिशाली हैं (पैसे वाले, जिनके पास कारखाने और बड़ी दुकानें हैं), वे सबसे ज्यादा कमाते हैं।
गरीब लोग (किसान, बुनकर, मज़दूर) बाज़ार पर निर्भर हैं क्योंकि उनके पास पूंजी नहीं है। इसी निर्भरता के कारण बाज़ार में उनका शोषण होता है।
सहकारी संस्थाएँ (Cooperatives) और कानूनों का सख्त पालन इस असमानता को कम करने के उपाय हैं।
14. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts)
जीनिंग मिल (Ginning Mill): वह फैक्ट्री जहाँ कपास के फूलों से बीज अलग किए जाते हैं और रूई को दबाकर गट्ठर बनाए जाते हैं।
थोक मंडी: शहरों का वह क्षेत्र जहाँ सामान सबसे पहले पहुंचता है और वहां से अन्य व्यापारियों को बेचा जाता है।
ब्रांडिंग (Branding): किसी उत्पाद पर विशेष नाम या चिन्ह लगाना ताकि वह दूसरों से अलग दिखे। ब्रांडिंग के कारण अक्सर लोगों को लगता है कि डिब्बाबंद सामान खुले सामान से बेहतर है, जो हमेशा सच नहीं होता।
विज्ञापन: बाज़ार में वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन का प्रयोग किया जाता है, जो उपभोक्ता के मन को प्रभावित करता है।
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