आजीविका

Sunil Sagare
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भाग 1: ग्रामीण आजीविका (Rural Livelihoods)

भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपनी आजीविका कमाने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्य करते हैं। इसमें खेती और गैर-खेती दोनों कार्य शामिल हैं। यहाँ हम कलपट्टू गाँव के उदाहरण से भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समझेंगे।

1. केस स्टडी: कलपट्टू गाँव (तमिलनाडु)

  • स्थिति: यह गाँव तमिलनाडु में समुद्र तट के पास स्थित है।

  • मुख्य फसल: यहाँ की मुख्य फसल धान है। यहाँ के लोग साल के कई महीनों तक धान की बुवाई, निराई और कटाई में व्यस्त रहते हैं।

  • गैर-कृषि कार्य: यहाँ के लोग खेती के अलावा टोकरी बनाना, बर्तन बनाना, घड़े बनाना, ईंट बनाना और बैलगाड़ी चलाने जैसे काम करते हैं।

  • दुकानें और सेवाएँ: गाँव में चाय की दुकानें, नाई, धोबी, बुनकर, लोहार और साइकिल मरम्मत की दुकानें उपलब्ध हैं।

2. ग्रामीण कृषकों और मजदूरों की श्रेणियाँ

NCERT में ग्रामीण लोगों को तीन मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है, जो CTET के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

A. भूमिहीन खेतिहर मजदूर (जैसे: तुलसी)

भारत के ग्रामीण परिवारों में लगभग $40\%$ खेतिहर मजदूर हैं।

  • स्थिति: इनके पास अपनी कोई जमीन नहीं होती। ये दूसरों के खेतों पर काम करते हैं।

  • रोजगार की प्रकृति: इन्हें साल भर काम नहीं मिलता। काम केवल बुवाई और कटाई के समय मिलता है।

  • मजदूरी: इन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है। कभी-कभी मजदूरी के बदले अनाज या भोजन दिया जाता है।

  • आय के अन्य स्रोत: जब खेतों में काम नहीं होता, तो ये जंगल से लकड़ी बीनना, पानी लाना या पास के शहर में पत्थर तोड़ने या बालू ढोने का काम करते हैं।

  • उदाहरण (तुलसी): तुलसी रामलिंगम की जमीन पर काम करती है। वह सुबह $8:30$ से शाम $4:30$ तक काम करती है और उसे कम दैनिक मजदूरी मिलती है। इसके बावजूद वह वहाँ काम करती है क्योंकि रामलिंगम उसे उधार पैसे देने में आनाकानी नहीं करता।

B. छोटे किसान (जैसे: शेखर)

  • स्थिति: इनके पास बहुत कम जमीन होती है (जैसे $2$ एकड़)।

  • कार्य: ये अपने परिवार के साथ मिलकर अपने खेत पर काम करते हैं। इन्हें बाहर से मजदूर बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

  • बाजार से संबंध: ये अपनी फसल का एक बड़ा हिस्सा अपने परिवार के खाने के लिए रखते हैं और बचा हुआ हिस्सा बाजार में बेचते हैं।

  • ऋण की समस्या (उधारी): खेती के लिए बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के लिए इन्हें साहूकारों या व्यापारियों से उधार लेना पड़ता है।

  • बाध्यता: उधार लेते समय शर्त होती है कि फसल कटने के बाद उन्हें अपनी फसल उसी व्यापारी को कम दाम पर बेचनी होगी। इस कारण वे अपनी फसल को खुले बाजार में अच्छे दाम पर नहीं बेच पाते।

C. बड़े किसान (जैसे: रामलिंगम)

  • स्थिति: इनके पास बहुत अधिक जमीन होती है (जैसे $20$ एकड़ या उससे अधिक)।

  • कार्य: ये खुद खेती नहीं करते, बल्कि मजदूरों से काम करवाते हैं और निगरानी रखते हैं।

  • आय के स्रोत: खेती के अलावा इनके पास आय के अन्य साधन भी होते हैं, जैसे:

    • चावल की मिल (Rice Mill)

    • बीज और खाद की दुकानें

    • ब्याज पर पैसा देना

  • तकनीक: ये आधुनिक मशीनों (ट्रैक्टर, थ्रेशर) का उपयोग करते हैं और सरकारी बैंक से आसानी से ऋण प्राप्त कर लेते हैं।


3. भारत में कृषि की स्थिति (महत्वपूर्ण तथ्य)

  • आंकड़े: भारत में प्रत्येक $5$ ग्रामीण परिवारों में से लगभग $2$ परिवार खेतिहर मजदूरों के हैं।

  • छोटे vs बड़े किसान: भारत में $80\%$ किसान 'छोटे किसान' की श्रेणी में आते हैं (जिनके पास कम जमीन है)। केवल $20\%$ किसान ही 'बड़े किसान' हैं जो समृद्ध हैं।

  • ऋण का दुष्चक्र: छोटे किसान अक्सर 'ऋण चक्र' में फंस जाते हैं। यदि फसल बर्बाद हो जाए या बीमारी आ जाए, तो वे पुराना कर्ज नहीं चुका पाते और नया कर्ज ले लेते हैं। यही किसानों की आत्महत्या का एक प्रमुख कारण बन गया है।


4. नागालैंड की सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming)

CTET में अक्सर 'चिजामी' गाँव के बारे में पूछा जाता है।

  • स्थान: यह नागालैंड के फेक जिले में स्थित है।

  • समुदाय: यहाँ चखेसंग (Chakesang) समुदाय के लोग रहते हैं।

  • तकनीक: ये 'सीढ़ीदार खेती' करते हैं।

    • पहाड़ी ढलानों को समतल करके सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं।

    • प्रत्येक सीढ़ी (खेत) के किनारों को ऊपर उठा दिया जाता है ताकि पानी भरा रहे।

    • यह तरीका चावल (धान) की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है।

  • सामाजिक समरसता: यहाँ के लोग समूहों में काम करते हैं। एक समूह में $6$ से $8$ लोग होते हैं जो मिलकर एक पूरे पहाड़ की सफाई और बुवाई करते हैं। काम खत्म होने पर साथ में भोजन करते हैं।


5. तटीय आजीविका: अरुणा और पारिवेलन (मछली पकड़ना)

  • स्थान: पुदुपेट (कलपट्टू के पास तटीय गाँव)।

  • उपकरण: ये 'कैटामरैन' (लकड़ी का बना छोटा जहाज) और जाल का उपयोग करते हैं।

  • दैनिक चर्या:

    • मछुआरे सुबह $2$ बजे समुद्र में जाते हैं और $7$ बजे तक लौटते हैं।

    • महिलाएँ मछलियों की नीलामी करती हैं।

  • मानसून का प्रभाव: मानसून के दौरान ($4$ महीने), मछलियाँ प्रजनन करती हैं, इसलिए मछुआरे समुद्र में नहीं जाते। यह समय उनके लिए सबसे कठिन होता है और उन्हें जीवित रहने के लिए व्यापारियों से उधार लेना पड़ता है।


भाग 2: शहरी आजीविका (Urban Livelihoods)

भारत के शहरों में आजीविका के स्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों से भिन्न हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के बड़े शहरों में काम करने वाले कुल लोगों में से लगभग $12\%$ लोग सड़कों पर काम करते हैं।

1. सड़क पर काम करने वाले (Street Vendors)

  • उदाहरण: बच्चू मांझी (साइकिल रिक्शा चालक), वेंडर्स जो सब्जी, अखबार, या प्लास्टिक का सामान बेचते हैं।

  • रोजगार की प्रकृति: यह स्वरोजगार (Self-employed) है। वे किसी के अधीन काम नहीं करते।

  • असुरक्षा:

    • इनकी कोई पक्की दुकान नहीं होती।

    • ये कभी भी पुलिस द्वारा हटाए जा सकते हैं।

    • सड़क पर ठेला लगाने या पटरी पर दुकान लगाने को अक्सर यातायात बाधा माना जाता है।

  • कानूनी बदलाव: सरकार ने अब 'फेरीवालों' (Street Vendors) के अधिकार को आजीविका के अधिकार के रूप में मान्यता दी है। अब विशेष 'वेंडिंग जोन' (Hawking Zones) तय किए जा रहे हैं जहाँ वे बिना किसी रोक-टोक के अपना सामान बेच सकें।

2. बाजार और दुकानें (बाजार में व्यापारी)

  • उदाहरण: हरप्रीत और वंदना (रेडीमेड कपड़ों का शोरूम)।

  • बदलाव: पहले लोग कपड़ा खरीदकर सिलवाते थे, अब 'रेडीमेड' कपड़ों का चलन बढ़ा है।

  • व्यापार का तरीका: ये लोग अलग-अलग जगहों (जैसे मुंबई, लुधियाना, दिल्ली) से सामान मंगवाते हैं और कभी-कभी विदेशों से भी आयात करते हैं।

  • विज्ञापन: व्यापार बढ़ाने के लिए अखबार, सिनेमा और टेलीविजन में विज्ञापन दिए जाते हैं।

  • लाइसेंस: पक्की दुकानों के लिए नगर निगम से लाइसेंस लेना पड़ता है। नगर निगम यह भी तय करता है कि बाजार किस दिन बंद रहेगा।

3. फैक्ट्री और 'लेबर चौक' (अनियमित मजदूर)

  • लेबर चौक: यह वह स्थान है जहाँ दिहाड़ी मजदूर अपनी औजारों के साथ काम मिलने का इंतजार करते हैं (जैसे मिस्त्री, प्लंबर, रंगाई-पुताई वाले)।

  • उदाहरण: निर्मला (कपड़ा फैक्ट्री में दर्जी)।

  • कैजुअल लेबर (Casual Basis): निर्मला को 'अनियमित' रूप से काम पर रखा जाता है।

    • मतलब: जब मालिक को काम की जरूरत होती है, तभी उसे बुलाया जाता है।

    • कार्य घंटे: काम के घंटे बहुत लंबे होते हैं (सुबह $9$ बजे से रात $10$ बजे तक)।

    • छुट्टी: कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती। अगर वह बीमार पड़ती है या छुट्टी लेती है, तो उस दिन के पैसे काट लिए जाते हैं।

    • असुरक्षा: काम कम होने पर या मालिक को पसंद न आने पर उसे कभी भी निकाला जा सकता है।

4. दफ्तर में काम (नियमित और स्थायी कर्मचारी)

  • उदाहरण: सुधा (एक कंपनी में विपणन प्रबंधक/Marketing Manager)।

  • रोजगार की प्रकृति: यह एक नियमित और स्थायी (Regular and Permanent) नौकरी है।

  • लाभ (Benefits): स्थायी कर्मचारियों को वे सुविधाएँ मिलती हैं जो अनियमित मजदूरों को नहीं मिलतीं:

    1. भविष्य निधि (PF): वेतन का एक हिस्सा सरकार के पास जमा होता है, जिस पर ब्याज मिलता है और रिटायरमेंट पर प्राप्त होता है।

    2. छुट्टियाँ: रविवार और राष्ट्रीय त्योहारों की सवेतन (पैसे सहित) छुट्टी मिलती है।

    3. चिकित्सा सुविधा: कर्मचारी और उसके परिवार के इलाज का खर्च कंपनी उठाती है।

    4. नौकरी की सुरक्षा: काम कम होने पर उन्हें नौकरी से निकाला नहीं जाता।


भाग 3: तुलनात्मक अध्ययन (Comparison)

परीक्षा की दृष्टि से ग्रामीण और शहरी, तथा नियमित और अनियमित रोजगार के बीच का अंतर समझना आवश्यक है।

ग्रामीण vs शहरी आजीविका

विशेषताग्रामीण आजीविकाशहरी आजीविका
मुख्य आधारकृषि और पशुपालनसेवा क्षेत्र, उद्योग और व्यापार
मौसमी प्रकृतिकाम मौसमी होता है (बुवाई-कटाई के समय)काम अक्सर साल भर चलता है (कुछ अपवाद छोड़कर)
प्रवासकाम की तलाश में शहरों की ओर प्रवास (Migration)गाँवों से आए लोगों का बसाव
ऋण का कारणखेती के इनपुट (बीज, खाद) के लिएघर चलाने या बिजनेस शुरू करने के लिए

अनियमित vs स्थायी रोजगार

विशेषताअनियमित (Casual)स्थायी (Permanent)
सुरक्षाकोई सुरक्षा नहीं, कभी भी हटाया जा सकता हैनौकरी सुरक्षित होती है
वेतनकाम के अनुसार दिहाड़ीमासिक वेतन (Monthly Salary)
सुविधाएँकोई अतिरिक्त लाभ नहीं (No PF/Medical)पीएफ, मेडिकल, और छुट्टियाँ मिलती हैं
घंटेअनिश्चित और लंबे घंटेनिश्चित काम के घंटे

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts)

  1. कॉल सेंटर: यह शहरों में रोजगार का एक नया और बड़ा क्षेत्र है। यहाँ उपभोक्ता के प्रश्नों और समस्याओं का समाधान किया जाता है। यह एक केंद्रीकृत दफ्तर होता है जहाँ कंप्यूटर और टेलीफोन जुड़े होते हैं।

  2. जमींदारी प्रथा: स्वतंत्रता के बाद इसे समाप्त कर दिया गया था, लेकिन अभी भी बड़े किसानों का वर्चस्व बना हुआ है।

  3. मत्स्य पालन: तटीय क्षेत्रों में यह 'कृषि' के समान ही प्राथमिक व्यवसाय माना जाता है।

  4. स्वरोजगार: रेहड़ी-पटरी वाले और दुकानदार 'स्वरोजगार' की श्रेणी में आते हैं क्योंकि वे किसी अन्य के लिए काम नहीं करते।



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Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

Time Left: 20:00

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