गाँव के मुकाबले शहर का आकार बहुत बड़ा होता है और वहाँ की सुविधाएँ और समस्याएँ भी जटिल होती हैं। बिजली, पानी, यातायात, स्कूल और अस्पताल जैसी सेवाओं का प्रबंधन करने के लिए एक विस्तृत व्यवस्था की आवश्यकता होती है, जिसे हम 'नगर प्रशासन' कहते हैं।
शहरी प्रशासन का संवैधानिक ढांचा
भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को मजबूत करने के लिए स्थानीय सरकारों को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। CTET के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह व्यवस्था संविधान में कैसे जुड़ी।
74वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992): इस अधिनियम के द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
भाग IX-A: संविधान में एक नया भाग 'IX-A' जोड़ा गया जिसे 'नगर पालिकाएँ' नाम दिया गया।
अनुसूची 12: इसमें शहरी निकायों के लिए 18 कार्यों की सूची दी गई है जिन पर उन्हें कानून बनाने और प्रशासन करने का अधिकार है।
अनुच्छेद: $243\mathrm{P}$ से $243\mathrm{ZG}$ तक शहरी प्रशासन के प्रावधान शामिल हैं।
शहरी स्थानीय निकायों के प्रकार
शहरों के आकार और जनसंख्या के आधार पर प्रशासन को तीन मुख्य स्तरों में विभाजित किया गया है:
1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat)
यह उन क्षेत्रों के लिए होती है जो ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे हैं।
इसे संक्रमणशील क्षेत्र भी कहा जाता है।
यहाँ जनसंख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
2. नगर परिषद / नगर पालिका (Municipal Council)
यह छोटे शहरों के लिए स्थापित की जाती है।
जहाँ जनसंख्या एक निश्चित सीमा (जैसे 20,000 से 3 लाख के बीच, राज्य अनुसार भिन्न) होती है।
3. नगर निगम (Municipal Corporation)
यह बड़े महानगरों (जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पुणे) के लिए होती है।
जहाँ जनसंख्या बहुत अधिक होती है और क्षेत्र विस्तृत होता है।
संसाधन और अधिकार क्षेत्र अन्य दो की तुलना में अधिक होते हैं।
नगर निगम और उसकी संरचना
NCERT कक्षा 6 के अनुसार, नगर निगम सबसे महत्वपूर्ण इकाई है जिस पर विस्तृत चर्चा की गई है।
1. वार्ड और पार्षद (Councillor)
पूरे शहर को जनसंख्या के आधार पर छोटे-छोटे क्षेत्रों में बांटा जाता है, जिन्हें वार्ड कहते हैं।
प्रत्येक वार्ड से जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, जिसे पार्षद कहते हैं।
पार्षद का चुनाव 5 वर्ष के लिए होता है।
मुख्य कार्य: अपने वार्ड की समस्याओं (जैसे टूटी सड़क, पानी की समस्या, पार्क की सफाई) को निगम की बैठकों में उठाना और समाधान करवाना।
2. समितियाँ (Committees)
शहर के बड़े निर्णय लेने के लिए पार्षदों के समूह मिलकर समितियाँ बनाते हैं।
उदाहरण: जल विभाग समिति, कचरा निस्तारण समिति, शिक्षा समिति।
ये समितियाँ नीतियों पर चर्चा करती हैं और निर्णय लेती हैं कि कहाँ नया अस्पताल बनेगा या कहाँ नाले की सफाई होगी।
3. प्रशासनिक कर्मचारी बनाम निर्वाचित प्रतिनिधि
यह CTET का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणात्मक बिंदु है। छात्रों को इसमें अक्सर भ्रम होता है।
पार्षद (Councillor): यह जनता द्वारा चुने जाते हैं। इनका काम निर्णय लेना (Decision Making) और नीतियां बनाना है।
आयुक्त (Commissioner) और प्रशासनिक स्टाफ: इनकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है। इनका काम पार्षदों द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू (Implement) करना है।
पार्षद जनता के प्रति जवाबदेह हैं, जबकि आयुक्त सरकार के प्रति जवाबदेह होते हैं।
4. मेयर (Mayor) / महापौर
नगर निगम के निर्वाचित सदस्यों (पार्षदों) के मुखिया को मेयर कहा जाता है।
यह निगम की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
छोटे शहरों (नगर पालिका) में इसे 'नगर पालिका अध्यक्ष' कहा जाता है।
नगर निगम के कार्य (Functions)
संविधान की 12वीं अनुसूची के अनुसार इनके कार्य व्यापक हैं, जिन्हें दो भागों में समझा जा सकता है:
अनिवार्य कार्य:
पीने के शुद्ध पानी की आपूर्ति।
सार्वजनिक सड़कों की सफाई और कचरा प्रबंधन।
नालियों का निर्माण और रखरखाव।
सड़कों पर रोशनी (Street lights) की व्यवस्था।
जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (Registration)।
संक्रामक रोगों की रोकथाम।
स्वैच्छिक कार्य:
पार्क, खेल के मैदान और बगीचे बनवाना।
पुस्तकालय और वाचनालय खोलना।
मेलों और प्रदर्शनियों का आयोजन।
वृद्धाश्रम या रैन बसेरों का निर्माण।
नगर निगम की आय के स्रोत
इतने विशाल शहर को चलाने के लिए भारी धनराशि की आवश्यकता होती है। नगर निगम यह धन विभिन्न करों (Taxes) और अनुदानों से प्राप्त करता है।
संपत्ति कर (Property Tax):
यह आय का एक बड़ा स्रोत है।
जिन लोगों के पास शहर में अपने घर होते हैं, उन्हें यह कर देना पड़ता है।
घर जितना बड़ा होगा, कर उतना ही अधिक होगा।
NCERT के अनुसार, कुल कर आय का केवल $25-30\%$ ही संपत्ति कर से आता है।
अन्य कर:
पानी और सीवेज पर कर।
शिक्षा कर।
मनोरंजन कर (सिनेमा, पार्क आदि पर)।
दुकानों और होटेलों पर कर।
सरकारी अनुदान:
राज्य और केंद्र सरकार से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता।
सामुदायिक विरोध और जनता की भागीदारी
लोकतंत्र में केवल वोट देना ही काफी नहीं है, प्रशासन पर निगरानी रखना भी आवश्यक है। NCERT में गंगाबाई का उदाहरण दिया गया है जो इस विषय को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
गंगाबाई की कहानी (सारांश):
मोहल्ले में कचरा न उठने के कारण गंदगी फैल रही थी।
गंगाबाई ने महिलाओं को इकट्ठा किया और अपने वार्ड पार्षद के घर के बाहर प्रदर्शन किया।
पार्षद ने सफाई इंजीनियर के साथ जाकर आयुक्त (Commissioner) से मिलने का वादा किया।
आयुक्त ने बहाना बनाया कि ट्रक कम हैं।
गंगाबाई ने तर्क दिया कि "अमीर इलाकों से कचरा उठाने के लिए ट्रक हैं, लेकिन गरीब बस्तियों के लिए नहीं?"
अंततः, जन-दबाव के कारण निगम को नियमित सफाई करनी पड़ी।
शिक्षण बिंदु (Pedagogy Point): यह कहानी दर्शाती है कि आम नागरिक अपनी आवाज़ कैसे उठा सकते हैं और प्रशासन को कैसे जवाबदेह बना सकते हैं।
उप-अनुबंध (Sub-Contracting) और निजीकरण
हाल के वर्षों में नगर प्रशासन में एक बड़ा बदलाव आया है जिसे 'उप-अनुबंध' कहते हैं।
अर्थ: खर्च कम करने के लिए, नगर निगम अपने कुछ काम (जैसे कचरा उठाना और ठिकाने लगाना) सरकारी कर्मचारियों के बजाय निजी कंपनियों (Private Companies) को सौंप देता है।
प्रभाव:
निगम के लिए यह सस्ता पड़ता है।
निजी कंपनियों द्वारा रखे गए मजदूरों को अक्सर कम वेतन मिलता है।
इन मजदूरों की नौकरी अस्थायी होती है।
उन्हें सुरक्षा उपकरण नहीं मिलते, जिससे कचरा उठाते समय घायल होने या बीमार पड़ने का खतरा रहता है।
सूरत प्लेग (1994) - एक केस स्टडी
नगर प्रशासन की विफलता और सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण सूरत शहर है।
स्थिति (1994 से पहले): सूरत भारत के सबसे गंदे शहरों में से एक था। लोग नालियों और सड़कों पर ही कूड़ा फेंक देते थे।
घटना: 1994 में वहां प्लेग (Plague) की महामारी फैली। यह हवा के जरिए फैलने वाली बीमारी है।
कारण: गंदगी के कारण चूहों की संख्या बढ़ी और उनसे यह बीमारी फैली।
परिणाम: कई लोगों की जान गई और लगभग 3 लाख लोगों को शहर छोड़ना पड़ा।
प्रशासनिक बदलाव: इस घटना के बाद नगर निगम ने मुस्तैदी से काम किया। शहर की पूर्ण सफाई अभियान चलाया गया।
वर्तमान स्थिति: आज सूरत भारत के सबसे साफ शहरों (चंडीगढ़ और इंदौर के साथ) में गिना जाता है।
सीख: यह दर्शाता है कि यदि प्रशासन दृढ़ संकल्प ले, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।
स्वच्छ भारत मिशन
शहरी प्रशासन के संदर्भ में भारत सरकार का सबसे बड़ा अभियान।
आरंभ: 2 अक्टूबर 2014।
उद्देश्य: खुले में शौच से मुक्ति (ODF), घर-घर से कचरा उठाना, और वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निस्तारण।
CTET परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण स्मरणीय बिंदु
तीसरा स्तर: 73वें और 74वें संशोधन के बाद स्थानीय सरकार भारत में शासन का तीसरा स्तर बन गई है (केंद्र -> राज्य -> स्थानीय)।
आरक्षण: महिलाओं के लिए स्थानीय निकायों में कम से कम $1/3$ (33%) सीटें आरक्षित हैं। कई राज्यों (जैसे बिहार, मध्य प्रदेश) में यह $50\%$ है।
SC/ST आरक्षण: जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं।
राज्य चुनाव आयोग: स्थानीय निकायों का चुनाव कराने की जिम्मेदारी 'भारत के चुनाव आयोग' की नहीं, बल्कि संबंधित राज्य के 'राज्य चुनाव आयोग' की होती है।
जिला योजना समिति (DPC): यह जिले के विकास की योजना बनाती है और शहरी और ग्रामीण निकायों के बीच समन्वय करती है (अनुच्छेद $243\mathrm{ZD}$)।
अध्यापन शास्त्र (Pedagogy): इस विषय को कक्षा में कैसे पढ़ाएं?
CTET पेपर 2 में अक्सर प्रश्न आता है कि "नगर प्रशासन पढ़ाते समय शिक्षक को क्या तरीका अपनाना चाहिए?"
भूमिका निर्वाह (Role Play): बच्चों को पार्षद, मेयर और आयुक्त की भूमिका देकर एक नकली 'निगम बैठक' आयोजित करना।
क्षेत्र भ्रमण (Field Trip): स्थानीय नगर पालिका कार्यालय या जल उपचार संयंत्र का दौरा करवाना।
केस स्टडी: अपने शहर की किसी स्थानीय समस्या (जैसे जल भराव) पर चर्चा करना और यह पूछना कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
अनुभव साझा करना: छात्रों से पूछना कि क्या उन्होंने कभी सफाई कर्मचारी को काम करते देखा है? उनके जीवन की चुनौतियाँ क्या हैं? (संवेदनशीलता विकसित करने के लिए)।
नगर प्रशासन
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes