1. सामाजिक न्याय और कानूनों की आवश्यकता
सामाजिक न्याय का अर्थ है समाज के सभी वर्गों के साथ समान व्यवहार करना और शोषण को रोकना। बाजार में अक्सर मुनाफे की होड़ में मानवाधिकारों और न्याय की अनदेखी की जाती है। इसी को रोकने के लिए सरकार कानून बनाती है, उन्हें लागू करती है और उनकी निगरानी करती है।
बाजार में शोषण के रूप:
मजदूरों का शोषण: कम वेतन देना, काम के घंटे अधिक होना, और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम न होना।
उपभोक्ताओं का शोषण: मिलावटी चीजें बेचना, कम तोलना, या एमआरपी (MRP) से अधिक दाम वसूलना।
उत्पादकों का शोषण: किसानों या छोटे बुनकरों से बहुत कम दाम पर कच्चा माल खरीदना।
2. न्यूनतम मेहनताना कानून (Minimum Wages Act)
मजदूरों को उनके काम का उचित पैसा मिले और उनका शोषण न हो, इसके लिए सरकार ने 'न्यूनतम मेहनताना कानून' बनाया है।
प्रमुख प्रावधान:
एक निश्चित राशि से कम मजदूरी देना गैर-कानूनी है।
न्यूनतम वेतन की दर सरकार तय करती है।
यह दर समय-समय पर (हर कुछ वर्षों में) संशोधित की जाती है ताकि महंगाई के अनुसार जीवन-यापन हो सके।
लाभ:
मजदूरों को गरीबी रेखा से ऊपर उठने में मदद मिलती है।
नियोक्ता (Employer) मनमानी नहीं कर सकते।
श्रम शक्ति का सम्मान सुनिश्चित होता है।
संविधान के अनुसार शोषण के विरुद्ध अधिकार:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार का वर्णन है:
अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और बेगार (बिना वेतन के काम कराना) पर प्रतिबंध।
अनुच्छेद 24: 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खदानों या किसी भी खतरनाक काम में लगाने पर प्रतिबंध।
3. कानूनों का क्रियान्वयन (Enforcement of Laws)
केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, उनका सही ढंग से लागू होना सबसे महत्वपूर्ण है।
सरकार की जिम्मेदारी: यह सुनिश्चित करना कि कानूनों का पालन हो रहा है या नहीं।
निरीक्षण (Inspection): सरकारी अधिकारी कार्यस्थलों का दौरा करते हैं और जांचते हैं कि सुरक्षा नियमों और वेतन नियमों का पालन हो रहा है।
कमजोर वर्गों की सुरक्षा: गरीब और बेसहारा लोग अक्सर डर के कारण शिकायत नहीं करते। इसलिए सरकार को सक्रिय रूप से निरीक्षण करना चाहिए।
लापरवाही का परिणाम: जब कानूनों का क्रियान्वयन ढीला होता है, तो भोपाल गैस त्रासदी जैसी भयानक दुर्घटनाएँ होती हैं।
4. भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy)
दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदियों में से एक, भोपाल गैस त्रासदी, भारत में कानूनों की कमजोरी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का एक ज्वलंत उदाहरण है।
दिनांक और समय: 2 दिसंबर 1984 की आधी रात।
स्थान: भोपाल, मध्य प्रदेश।
कंपनी: यूनियन कार्बाइड (Union Carbide - UC), एक अमेरिकी कंपनी।
उत्पाद: यह कंपनी कीटनाशक (Pesticide) बनाती थी।
मुख्य आरोपी: वारेन एंडरसन (कंपनी का अध्यक्ष)।
रसायनिक दुर्घटना का विवरण:
कारखाने से निकली जहरीली गैस का नाम मिथाइल आइसोसाइनेट (Methyl Isocyanate) था।
इसका रासायनिक सूत्र है:
दुर्घटना के कारण (सुरक्षा में चूक):
लागत में कटौती: कंपनी ने मुनाफे के लिए सुरक्षा उपायों पर खर्च कम कर दिया था।
खतरनाक तकनीक: अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया प्लांट में सुरक्षा के लिए कंप्यूटरकृत चेतावनी प्रणाली थी, जबकि भोपाल में सब कुछ मैनुअल (हाथ से संचालित) था।
कर्मचारियों की कमी: रात की पाली में सुरक्षा के लिए पर्याप्त कर्मचारी मौजूद नहीं थे।
गैस रिसाव: टैंक नंबर 610 में भारी मात्रा में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस जमा थी, जो रिसाव के कारण वायुमंडल में फैल गई।
त्रासदी के प्रभाव:
तत्काल प्रभाव: तीन दिनों के भीतर 8,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई।
दीर्घकालिक प्रभाव: लाखों लोग आज भी सांस की बीमारियों, आंखों की समस्याओं और अन्य शारीरिक विकृतियों से जूझ रहे हैं। दूषित पानी के कारण जन्मजात विकलांगता बढ़ गई है।
कानूनी लड़ाई: पीड़ितों को न्याय मिलने में दशकों लग गए। यूनियन कार्बाइड ने बहुत कम मुआवजा दिया और मुख्य आरोपी कभी भी भारतीय अदालत में पेश नहीं हुआ।
5. सुरक्षा मानक: भारत बनाम विकसित देश
भोपाल गैस त्रासदी ने यह सवाल खड़ा किया कि विदेशी कंपनियाँ भारत में ऐसे खतरनाक कारखाने क्यों लगाती हैं।
भारत में विदेशी कंपनियों के आने के कारण:
सस्ता श्रम: भारत में मजदूरों की मजदूरी विकसित देशों (जैसे अमेरिका, जापान) की तुलना में बहुत कम है।
काम के घंटे: यहाँ मजदूरों से अधिक घंटे काम कराया जा सकता है।
आवास और सुविधाएं: मजदूरों के लिए आवास और अन्य सुविधाओं पर कम खर्च करना पड़ता है।
सुरक्षा नियमों की ढील: भारत में 1984 के समय सुरक्षा कानून बहुत कमजोर थे और उनका पालन भी सख्ती से नहीं होता था।
कीमत और सुरक्षा का गणित:
कंपनियां 'लागत कटौती' (Cost Cutting) के नाम पर सबसे पहले सुरक्षा उपायों को हटाती हैं। चूँकि भारत में बेरोजगारी अधिक है, मजदूर असुरक्षित परिस्थितियों में भी कम वेतन पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। इसे 'मजबूरी का फायदा उठाना' कहा जाता है।
6. पर्यावरण और नए कानून (Environment and New Laws)
1984 से पहले, भारत में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए बहुत कम कानून थे। पर्यावरण को एक 'मुफ्त इकाई' (Free Entity) माना जाता था। कोई भी उद्योग हवा और पानी को प्रदूषित कर सकता था बिना किसी रोक-टोक के।
भोपाल गैस त्रासदी के बाद बदलाव:
इस त्रासदी ने पर्यावरण के मुद्दों को केंद्र में ला दिया। हजारों ऐसे लोग भी प्रभावित हुए जो कारखाने से जुड़े नहीं थे। इसके बाद जनहित याचिकाओं (PIL) और अदालती फैसलों ने पर्यावरण कानूनों को सख्त किया।
जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21):
सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए 'जीवन के अधिकार' में 'प्रदूषण मुक्त हवा और पानी का अधिकार' भी शामिल है।
अतः, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्रदूषण को रोकने और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कानून बनाए और उन पर जुर्माना लगाए।
7. जनहित याचिका (PIL) और पर्यावरण सक्रियता
न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एमसी मेहता (M.C. Mehta) एक प्रमुख पर्यावरण वकील हैं जिन्होंने कई महत्वपूर्ण जनहित याचिकाएं दायर कीं।
प्रमुख अदालती आदेश और मामले:
दिल्ली में वाहनों का प्रदूषण:
वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों (जैसे बस, ऑटो) को सीएनजी (CNG - Compressed Natural Gas) का उपयोग करना अनिवार्य होगा।
CNG का रासायनिक घटक: मुख्य रूप से मीथेन।
$$\mathrm{CH_4}$$इस फैसले से दिल्ली की हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ।
ताजमहल संरक्षण (ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन):
आगरा के आसपास के उद्योगों से निकलने वाले धुएं (सल्फर डाइऑक्साइड) के कारण ताजमहल का संगमरमर पीला पड़ रहा था। इसे 'मार्बल कैंसर' कहा जाता है।
सल्फ्यूरिक एसिड बनने की रासायनिक प्रतिक्रिया जो पत्थर को खराब करती है:
$$\mathrm{SO_2 + H_2O \rightarrow H_2SO_3}$$(अम्लीय वर्षा के संदर्भ में)
अदालत ने आसपास के कारखानों को बंद करने या गैस-आधारित ईंधन का उपयोग करने का आदेश दिया।
नदियों का प्रदूषण:
कारखानों द्वारा जहरीले रसायनों को नदियों में बहाने पर रोक लगाई गई। 'प्रदूषण फैलाने वाला ही भुगतान करेगा' (Polluter Pays Principle) का सिद्धांत लागू किया गया।
8. रोजगार बनाम पर्यावरण
यह एक जटिल मुद्दा है। अक्सर प्रदूषण के कारण कारखानों को बंद करने का आदेश दिया जाता है।
सकारात्मक पक्ष: पर्यावरण साफ होता है और लोगों की सेहत सुधरती है।
नकारात्मक पक्ष: कारखाने बंद होने से हजारों मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं और उनकी आजीविका छिन जाती है।
समाधान:
सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो 'सतत विकास' (Sustainable Development) को बढ़ावा दें। यानी विकास ऐसा हो जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे और रोजगार भी बना रहे। जैसे - क्लीनर टेक्नोलॉजी का उपयोग करना और कारखानों को रिहायशी इलाकों से दूर स्थापित करना।
9. अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक कानून
सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण कानून भी हैं:
क. बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986:
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी काम में नियोजित करने पर प्रतिबंध।
2016 में इसमें संशोधन किया गया, जिसके तहत अब 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी व्यवसाय में और 14-18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों में काम करने पर पूर्ण प्रतिबंध है।
ख. कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013:
कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना।
विशाखा गाइडलाइंस (Vishakha Guidelines) के आधार पर यह कानून बना।
ग. हाथ से मैला ढोने वालों का नियोजन निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013:
यह कानून 'मैनुअल स्कैवेंजिंग' (सीवर या सूखे शौचालयों की हाथ से सफाई) को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। यह मानवीय गरिमा के खिलाफ है।
10. सरकार की भूमिका: एक नियामक के रूप में
सरकार कानून और सामाजिक न्याय के संदर्भ में केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि एक नियामक (Regulator) भी है।
निजी कंपनियों पर नियंत्रण: निजी कंपनियां अधिक लाभ के लिए अनुचित हथकंडे अपना सकती हैं। सरकार को कानूनों के जरिए उन पर अंकुश लगाना होता है।
संसाधनों का वितरण: सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि देश के संसाधनों (बिजली, पानी, जमीन) का बंटवारा न्यायपूर्ण हो।
जवाबदेही तय करना: जब कोई दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदारी तय करना सरकार का काम है।
11. सारांश और निष्कर्ष (Revision Summary)
CTET परीक्षा के लिए याद रखने योग्य मुख्य बिंदु:
न्यूनतम वेतन: जीवन यापन के लिए आवश्यक, सरकार द्वारा निर्धारित।
अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार = स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार।
भोपाल गैस त्रासदी (1984): यूनियन कार्बाइड, मिक गैस ($\mathrm{CH_3NCO}$), सुरक्षा चूक।
पर्यावरण कानून: एमसी मेहता केस, सीएनजी का उपयोग, उद्योगों का स्थानांतरण।
क्रियान्वयन: कानून बनाना आसान है, लेकिन उसे लागू करना कठिन और महत्वपूर्ण है।
सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज में समानता लाना है, जहाँ न तो बाजार की तानाशाही हो और न ही सरकार की निष्क्रियता। एक जागरूक नागरिक के रूप में कानूनों को जानना और उनका पालन करना आवश्यक है।
कानून और सामाजिक न्याय
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