ईश्वर से अनुराग

Sunil Sagare
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1. परमेश्वर का विचार (पृष्ठभूमि)

सातवीं शताब्दी से पहले, विभिन्न समूहों के लोग अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा करते थे। जैसे-जैसे नगरों और व्यापार का विकास हुआ, विचार बदलने लगे।

  • पुनर्जन्म का चक्र: यह विचार व्यापक रूप से स्वीकार किया गया कि सभी जीवित प्राणी अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर जीवन-मरण और पुनर्जन्म के अंतहीन चक्र से गुजरते हैं।

  • जातिगत असमानता: यह धारणा कि जन्म से ही सभी मनुष्य समान नहीं हैं, कई धार्मिक ग्रंथों का हिस्सा थी।

  • भक्ति का उदय: इन विचारों से असंतुष्ट होकर, कई लोग बुद्ध और जैनों के उपदेशों की ओर मुड़े, जो व्यक्तिगत प्रयास से इन बंधनों को तोड़ने की बात करते थे।

  • भगवद्गीता का संदेश: कुछ लोग परमेश्वर (शिव, विष्णु या दुर्गा) के प्रति पूर्ण समर्पण (भक्ति) के विचार से आकर्षित हुए। इसमें कहा गया कि यदि भक्त सच्चे मन से ईश्वर की शरण में जाए, तो ईश्वर उसे कर्म के बंधन से मुक्त कर सकता है।


2. दक्षिण भारत में भक्ति: नयनार और अलवार (7वीं से 9वीं शताब्दी)

दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से नयनारों और अलवारों ने किया।

मुख्य विशेषताएँ:

  • इन्होंने बौद्ध और जैन धर्म की कठोरता का विरोध किया।

  • इन्होंने शिव और विष्णु के प्रति प्रेम को ही मुक्ति का मार्ग बताया।

  • ये संत संगम साहित्य (तमिल साहित्य का प्राचीनतम उदाहरण) में वर्णित प्रेम और वीरता के आदर्शों को भक्ति के साथ जोड़ते थे।

  • ये घुमक्कड़ साधु-संत थे जो गाँव-गाँव जाकर देवी-देवताओं की प्रशंसा में कविताएँ गाते थे।

नयनार (शैव संत)

  • संख्या: कुल 63 नयनार संत थे।

  • सामाजिक पृष्ठभूमि: ये विभिन्न जाति पृष्ठभूमियों से थे, जिनमें कुम्हार, 'अस्पृश्य' कामगार, किसान, शिकारी, सैनिक, ब्राह्मण और मुखिया शामिल थे।

  • प्रमुख संत: अप्पार, सबंदर, सुंदरार और मणिक्कसागर।

  • गीतों का संकलन: इनके गीतों के दो प्रमुख संकलन हैं - तेवरम और तिरुवाचकम

अलवार (वैष्णव संत)

  • संख्या: कुल 12 अलवार संत थे।

  • प्रमुख संत: पेरियालवार, उनकी पुत्री आंडाल, तोंडरडिप्पोडि और नम्माल्वार।

  • आंडाल: एकमात्र महिला अलवार संत, जिनके भक्ति गीत आज भी बहुत लोकप्रिय हैं।

  • गीतों का संकलन: इनके गीतों को दिव्य प्रबंधम में संकलित किया गया है।

महत्वपूर्ण तथ्य: 10वीं और 12वीं सदी के बीच चोल और पांड्य राजाओं ने उन अनेक धार्मिक स्थलों पर विशाल मंदिर बनवाए जहाँ इन संतों ने यात्रा की थी। इससे भक्ति परंपरा और मंदिर पूजा के बीच गहरा संबंध स्थापित हो गया।


3. दर्शन और भक्ति (शंकराचार्य और रामानुज)

भक्ति आंदोलन को दार्शनिक आधार देने में दो महान विचारकों का योगदान रहा।

शंकराचार्य

  • जन्म: 8वीं शताब्दी, केरल।

  • दर्शन: अद्वैतवाद (Advaita)।

  • सिद्धांत: जीवात्मा और परमात्मा (जो परम सत्य है) दोनों एक ही हैं।

  • माया: उन्होंने संसार को 'माया' या मिथ्या माना।

  • मार्ग: उन्होंने मोक्ष प्राप्त करने के लिए संसार का त्याग (संन्यास) और ज्ञान के मार्ग को अपनाने का उपदेश दिया। उन्होंने निराकार ब्रह्म की उपासना पर जोर दिया।

रामानुज

  • जन्म: 11वीं शताब्दी, तमिलनाडु।

  • प्रभाव: वे अलवार संतों से बहुत प्रभावित थे।

  • दर्शन: विशिष्टाद्वैत (Vishishtadvaita)।

  • सिद्धांत: आत्मा परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है।

  • मार्ग: उन्होंने विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति भाव को मोक्ष का सर्वोत्तम उपाय बताया। उनके अनुसार, भगवान की कृपा से भक्त उनके साथ एकाकार होने का आनंद ले सकता है।

  • रामानुज के सिद्धांत ने उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के विकास को बहुत प्रभावित किया।


4. वीरशैव आंदोलन (कर्नाटक)

तमिल भक्ति आंदोलन और मंदिर पूजा के परिणामस्वरूप जो प्रतिक्रिया हुई, वह वीरशैव आंदोलन के रूप में सामने आई।

  • समय: 12वीं शताब्दी का मध्य।

  • संस्थापक: बसवन्ना और उनके साथी (अल्लमा प्रभु और अक्कमहादेवी)।

  • मुख्य शिक्षाएँ:

    • समानता: सभी मनुष्यों की समानता के पक्ष में दृढ़ तर्क दिए।

    • जाति विरोध: ब्राह्मणवादी विचारधारा और जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया।

    • मूर्ति पूजा का विरोध: उन्होंने मूर्ति पूजा और कर्मकांडों की निंदा की।

  • वचन: इनके साहित्य को 'वचन' कहा जाता है (कन्नड़ भाषा में)।


5. महाराष्ट्र के संत (13वीं से 17वीं शताब्दी)

महाराष्ट्र में भक्ति परंपरा का केंद्र पंढरपुर था और आराध्य देव विट्ठल (विष्णु का एक रूप) थे। इस संप्रदाय को वारकरी संप्रदाय कहा जाता है।

प्रमुख संत:

  • ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी की रचना की)।

  • नामदेव।

  • एकनाथ।

  • तुकाराम।

  • सक्कूबाई (महिला संत)।

  • चोखामेला (महार जाति के संत, जो उस समय 'अस्पृश्य' मानी जाती थी)।

मुख्य शिक्षाएँ:

  • कर्मकांड का विरोध: सभी प्रकार के कर्मकांडों, पवित्रता के ढोंग और जन्म आधारित सामाजिक अंतरों का विरोध किया।

  • संन्यास का विरोध: उन्होंने संन्यास के विचार को ठुकरा दिया और कहा कि परिवार के साथ रहते हुए, विनम्रतापूर्वक जरूरतमंदों की सेवा करना ही असली भक्ति है।

  • प्रसिद्ध कथन: "तू कांदा मूला भाजी, अवघी विठाई माझी" (सावित्रीबाई फुले द्वारा उद्धृत एक प्रसिद्ध अभंग पंक्ति जो इस परंपरा की सरलता दर्शाती है)।

  • मानवतावाद: उन्होंने इस बात पर बल दिया कि 'असली भक्ति दूसरों के दुखों को बाँट लेना है।' (नरसी मेहता का प्रसिद्ध भजन 'वैष्णव जन तो...' इसी विचार को दर्शाता है)।


6. नाथपंथी, सिद्ध और योगी

ये ऐसे धार्मिक समूह थे जिन्होंने पारंपरिक धर्म के कर्मकांडों की आलोचना की और मोक्ष के लिए योग और ध्यान का मार्ग अपनाया।

  • मान्यता: संसार का त्याग करना।

  • मार्ग: मोक्ष के लिए निराकार परम सत्य का चिंतन और उसके साथ एक हो जाने की साधना।

  • क्रियाएँ: योगासन, प्राणायाम और चिंतन-मनन के माध्यम से मन और शरीर को कठोर प्रशिक्षण देना।

  • सामाजिक आधार: ये समूह 'नीची' कही जाने वाली जातियों में बहुत लोकप्रिय हुए।

  • इन्होंने उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के लिए आधार तैयार किया।


7. इस्लाम और सूफी मत

संतों और सूफियों में बहुत समानता थी। उन्होंने एक-दूसरे के विचारों को अपनाया।

सूफी कौन थे? सूफी मुस्लिम रहस्यवादी थे। वे बाहरी आडंबरों को नहीं मानते थे।

मुख्य शिक्षाएँ:

  • प्रेम और समर्पण: ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम और सभी मनुष्यों के प्रति दयाभाव।

  • शरियत और सूफीवाद: इस्लाम ने 'शरियत' (धार्मिक कानून) का कड़ा ढांचा बनाया था, लेकिन सूफियों ने ईश्वर के साथ ठीक उसी तरह जुड़े रहने की बात की जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ जुड़ा रहना चाहता है।

  • ज़िक्र: नाम का जाप करना।

  • समा: गाना।

  • रक्स: नृत्य।

मध्य एशिया के महान सूफी:

  • गज्जाली, रूमी और सादी।

  • इन्होंने भी नाथपंथियों की तरह माना कि दुनिया को देखने का नजरिया बदलने के लिए दिल को सिखाया-पढ़ाया जा सकता है।

भारत में सूफीवाद:

  • चिश्ती सिलसिला: यह भारत में सबसे प्रभावशाली रहा।

  • प्रमुख सूफी संत:

    1. ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर)

    2. कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली)

    3. बाबा फरीद (पंजाब)

    4. ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली)

    5. बंदानवाज़ गेसूदराज़ (गुलबर्गा)

शब्दावली:

  • खानकाह: सूफी संतों का निवास स्थान जहाँ वे अपनी सभाएं आयोजित करते थे। यहाँ सभी धर्मों और जातियों के लोग आध्यात्मिक चर्चा के लिए आते थे।


8. उत्तर भारत में नई धार्मिक लहर (13वीं सदी के बाद)

इस काल में इस्लाम, ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म, सूफी मत और भक्ति की विभिन्न धाराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित किया।

तुलसीदास:

  • इन्होंने ईश्वर को राम के रूप में माना।

  • रचना: रामचरितमानस (अवधी भाषा में)। यह साहित्य और भक्ति दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

सूरदास:

  • ये श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे।

  • रचनाएँ: सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी।

शंकरदेव (असम):

  • समय: 15वीं शताब्दी के अंत में।

  • इन्होंने विष्णु की भक्ति पर बल दिया।

  • इन्होंने असमिया भाषा में कविताएँ और नाटक लिखे।

  • नामघर: इन्होंने कविता पाठ और प्रार्थना गृह (नामघर) स्थापित करने की पद्धति चलाई जो आज भी प्रचलित है।

दादू दयाल, रविदास और मीराबाई:

  • रविदास: ये चर्मकार (अस्पृश्य) जाति से थे।

  • मीराबाई: एक राजपूत राजकुमारी थीं जिनका विवाह मेवाड़ के राजघराने में हुआ था।

    • वे रविदास की शिष्या बनीं।

    • वे कृष्ण के प्रति समर्पित थीं।

    • उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से 'उच्च जातियों' के नियमों को खुली चुनौती दी।

    • उनके गीत राजस्थान और गुजरात के जनसाधारण में बहुत लोकप्रिय हुए।


9. कबीर - एक अद्वितीय व्यक्तित्व

कबीर संभवतः 15वीं-16वीं सदी में हुए थे। उनके विचार हमें उनके 'सखियों' और 'पदों' से मिलते हैं।

प्रमुख शिक्षाएँ:

  • निराकार परमेश्वर: उन्होंने निराकार ईश्वर में विश्वास किया।

  • खंडन: उन्होंने प्रमुख धार्मिक परंपराओं (हिंदू और इस्लाम दोनों) के बाहरी आडंबरों और पूजा के रूपों का खुलकर मज़ाक उड़ाया और खंडन किया।

  • भाषा: उनकी काव्य भाषा बोलचाल की हिंदी थी जो आम आदमी आसानी से समझ सकता था। कभी-कभी उन्होंने रहस्यमयी भाषा का भी प्रयोग किया।

  • भक्ति: उन्होंने उपदेश दिया कि भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

  • संग्रह: उनकी रचनाएँ 'बीजक', 'पंचवाणी' और 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संग्रहित हैं।

  • उनके अनुयायी हिंदू और मुसलमान दोनों थे।


10. बाबा गुरु नानक और सिख धर्म

जीवन:

  • जन्म: 1469, तलवंडी (ननकाना साहिब, पाकिस्तान)।

  • करतारपुर: उन्होंने रावी नदी के तट पर करतारपुर में एक केंद्र (डेरा बाबा नानक) स्थापित किया।

  • लंगर: उनके अनुयायी जाति-धर्म के भेद के बिना एक साथ भोजन करते थे, जिसे 'लंगर' कहा जाता है।

  • धर्मसाल: उनके उपासना स्थल को 'धर्मसाल' कहा गया (जिसे अब गुरुद्वारा कहते हैं)।

  • मृत्यु: 1539 में।

उत्तराधिकार और विस्तार:

  • गुरु नानक ने लहणा को अपना उत्तराधिकारी चुना, जो बाद में गुरु अंगद के नाम से जाने गए।

  • गुरु अंगद ने गुरु नानक की रचनाओं का संग्रह किया और अपनी रचनाएँ भी जोड़ीं। इसके लिए एक नई लिपि गुरुमुखी का विकास किया गया।

  • तीनों उत्तराधिकारियों ने अपनी रचनाएँ 'नानक' नाम से लिखीं।

  • पाँचवें गुरु, गुरु अर्जन ने 1604 में इन सभी का संग्रह किया। इसमें शेख फरीद, संत कबीर, भगत नामदेव और गुरु तेगबहादुर जैसी सूचियों की वाणी भी जोड़ी गई।

  • दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने 1706 में इस संग्रह को प्रामाणिक माना, जिसे आज गुरु ग्रंथ साहिब कहा जाता है।

गुरु नानक की शिक्षाएँ:

  • एक ओंकार: एक ईश्वर की उपासना का महत्व।

  • जाति, धर्म और लिंग भेद का मोक्ष प्राप्ति में कोई स्थान नहीं है।

  • सक्रिय जीवन: उनके लिए मुक्ति का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन जीते हुए सामाजिक प्रतिबद्धता को निभाना था।

  • तीन मूल मंत्र:

    1. नाम: ईश्वर का नाम जपना (नाम-जपना)।

    2. दान: दूसरों का भला करना (कीरत-करना)।

    3. इसनान: पवित्रता और आचार-विचार की शुद्धता (वंड-छकना)।

खालसा पंथ:

  • 17वीं शताब्दी तक सिख समुदाय एक राजनीतिक सत्ता बन गया था।

  • 1699 में गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा संस्था का निर्माण किया।

  • सिखों के समुदाय को 'खालसा पंथ' कहा जाने लगा।


महत्वपूर्ण शब्दावली और तथ्य (Revision Summary)

  1. हैगियोग्राफी (Hagiography): संतों की जीवनियाँ लिखना। इतिहासकार इन जीवनियों का उपयोग भक्ति परंपरा को समझने के लिए करते हैं।

  2. अभंग: मराठी भक्ति गीतों को अभंग कहा जाता है।

  3. मणिप्रवालम: यह एक भाषा शैली थी जिसमें संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा का मिश्रण होता था। (लीलातिलकम ग्रंथ इसी शैली में है)।

  4. शैव और वैष्णव: शिव के उपासक शैव और विष्णु के उपासक वैष्णव कहलाते हैं।

  5. विठ्ठल: विष्णु का रूप, जिसकी पूजा महाराष्ट्र (पंढरपुर) में होती है।

  6. सिलसिला: सूफी वंशावली या आध्यात्मिक कड़ी।


CTET अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा टिप्स

  • मिलान करें: अक्सर संतों और उनके क्षेत्रों/रचनाओं का मिलान करने वाले प्रश्न आते हैं (जैसे: शंकरदेव - असम, रामानुज - तमिलनाडु)।

  • कथन-कारण: शंकराचार्य (अद्वैत) और रामानुज (विशिष्टाद्वैत) के दर्शन में अंतर स्पष्ट रखें।

  • कालक्रम: नयनार/अलवार पहले आए, फिर बसवन्ना, और बाद में उत्तर भारत के संत (कबीर, नानक)।

  • सामाजिक सुधार: संतों का जाति प्रथा के प्रति क्या दृष्टिकोण था, इस पर विशेष ध्यान दें।

नीचे दी गई सारणी में मध्यकालीन भारत के प्रमुख भक्ति संतों, उनके कार्यक्षेत्र और उनकी प्रमुख रचनाओं/सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण है।

संत / विचारकसमय (अनुमानित)क्षेत्र (वर्तमान राज्य)प्रमुख रचनाएँ / दर्शनमुख्य विशेषता / तथ्य
नयनार (कुल 63)7वीं - 9वीं सदीतमिलनाडुतेवरम, तिरुवाचकमशैव संत। अप्पार, सबंदर प्रमुख थे।
अलवार (कुल 12)7वीं - 9वीं सदीतमिलनाडुदिव्य प्रबंधमवैष्णव संत। आंडाल (महिला संत) प्रसिद्ध थीं।
शंकराचार्य8वीं सदीकेरलअद्वैतवाद (Advaita)ज्ञान मार्ग। आत्मा-परमात्मा की एकता।
रामानुज11वीं सदीतमिलनाडुविशिष्टाद्वैतभक्ति मार्ग। अलवारों से प्रभावित।
बसवन्ना12वीं सदीकर्नाटकवचन (साहित्य)वीरशैव आंदोलन। जाति और मूर्तिपूजा का विरोध।
ज्ञानेश्वर13वीं सदीमहाराष्ट्रज्ञानेश्वरी (गीता पर टीका)मराठी संत। वारकरी संप्रदाय।
नामदेव, तुकाराम14वीं-17वीं सदीमहाराष्ट्रअभंग (भक्ति गीत)विट्ठल (विष्णु) के भक्त। पंढरपुर केंद्र।
नरसी मेहता15वीं सदीगुजरात"वैष्णव जन तो..."प्रसिद्ध कृष्ण भक्त।
शंकरदेव15वीं सदीअसमकीर्तन-घोषनामघर (प्रार्थना गृह) की स्थापना की।
कबीर15वीं-16वीं सदीउत्तर प्रदेश (काशी)बीजक, पंचवाणीनिर्गुण भक्ति। हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर।
गुरु नानक1469-1539पंजाब (तलवंडी)गुरु ग्रंथ साहिब (वाणी)सिख धर्म के संस्थापक। लंगर प्रथा।
तुलसीदास16वीं-17वीं सदीउत्तर प्रदेशरामचरितमानस (अवधी)सगुण राम भक्ति।
सूरदास16वीं सदीउत्तर प्रदेशसूरसागर, साहित्य लहरीकृष्ण भक्ति। नेत्रहीन कवि।
मीराबाई16वीं सदीराजस्थान / गुजरातभजनकृष्ण भक्त। राजघराने का त्याग किया।
दादू दयाल16वीं सदीराजस्थानदादू वाणीनिर्गुण संत। कबीर से प्रभावित।

🔑 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण शब्द (Key Terms)

  1. नयनार: शिव के भक्त।

  2. अलवार: विष्णु के भक्त।

  3. हठयोग: शरीर को कष्ट देकर/साधकर मन को नियंत्रित करने की विधि (नाथपंथियों द्वारा प्रयुक्त)।

  4. खानकाह: सूफी संतों का निवास स्थान।

  5. सिलसिला: सूफी गुरु-शिष्य परंपरा की कड़ी।

  6. लंगर: सामुदायिक रसोई (सिख धर्म)।

  7. धर्मसाल: गुरुद्वारा का प्रारंभिक नाम।

  8. खालसा: गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्थापित सिखों का पवित्र समूह।


💡 CTET विशेष सुझाव (Pro Tip)

अक्सर परीक्षा में "निर्गुण" (निराकार ईश्वर) और "सगुण" (साकार/मूर्ति रूप) संतों के बीच अंतर पूछा जाता है:

  • निर्गुण संत: कबीर, गुरु नानक, दादू दयाल।

  • सगुण संत: तुलसीदास (राम), सूरदास (कृष्ण), मीराबाई (कृष्ण), चैतन्य महाप्रभु।



ईश्वर से अनुराग

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

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