प्रस्तावना
आज से लगभग दो सौ साल पहले भारत में महिलाओं और निचली जातियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवाओं का अपमान और जातिगत भेदभाव समाज की जड़ों में बसा हुआ था। 19वीं और 20वीं सदी में कई समाज सुधारकों ने इन कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई। यह अध्याय उन्हीं सुधार आंदोलनों और उनके नायकों की कहानी है।
1. महिलाओं की स्थिति और सुधार आंदोलन
19वीं सदी की शुरुआत में समाज में महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था और उन्हें कई क्रूर परंपराओं का पालन करना पड़ता था।
राजा राममोहन राय और सती प्रथा का अंत
राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की।
सती प्रथा का विरोध: उस समय पति की मृत्यु के बाद पत्नी को उसकी चिता पर ज़िंदा जला दिया जाता था। इसे 'सती' कहा जाता था। राजा राममोहन राय ने इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया।
सुधार का तरीका: राममोहन राय संस्कृत और अन्य भाषाओं के विद्वान थे। उन्होंने प्राचीन धर्मग्रंथों (जैसे उपनिषद) का हवाला देकर यह साबित किया कि सती प्रथा का धर्म में कोई स्थान नहीं है।
परिणाम: उनके प्रयासों और गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक के सहयोग से 1829 में सती प्रथा पर कानूनी रोक लगा दी गई।
उन्होंने पश्चिमी शिक्षा का समर्थन किया और महिलाओं के लिए स्वतंत्रता और समानता की वकालत की।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर और विधवा विवाह
सती प्रथा बंद होने के बाद भी विधवाओं का जीवन नरक जैसा था। उन्हें दोबारा शादी करने की अनुमति नहीं थी।
विधवा विवाह के लिए संघर्ष: बंगाल के प्रसिद्ध सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने भी प्राचीन ग्रंथों का उपयोग करके यह सुझाव दिया कि विधवाओं को फिर से विवाह करने का अधिकार है।
कानूनी मान्यता: उनके प्रयासों से 1856 में ब्रिटिश सरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया।
अन्य क्षेत्रों में प्रभाव:
मद्रास प्रेसीडेंसी के तेलुगु भाषी इलाकों में वीरेशलिंगम पंतुलु ने विधवा विवाह के लिए एक संगठन बनाया।
बंबई में प्रार्थना समाज ने भी इस मुद्दे का समर्थन किया।
स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज
स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की।
उन्होंने भी विधवा विवाह का पुरजोर समर्थन किया।
आर्य समाज ने पंजाब और उत्तर भारत में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. लड़कियों के लिए शिक्षा की शुरुआत
19वीं सदी में यह अंधविश्वास था कि अगर लड़की पढ़ेगी तो वह जल्दी विधवा हो जाएगी या घर का काम नहीं करेगी। सुधारकों ने इस सोच को बदला।
पहला कदम: विद्यासागर ने कलकत्ता में और अन्य सुधारकों ने बंबई में लड़कियों के लिए स्कूल खोले।
घर पर शिक्षा: रशसुन्दरी देवी जैसी महिलाओं ने दीये की रोशनी में चोरी-छिपे पढ़ना सीखा और 'आमार जीबोन' (मेरा जीवन) नामक आत्मकथा लिखी।
प्रमुख महिला सुधारक
मुस्लिम महिलाओं और उच्च जाति की महिलाओं ने शिक्षा के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।
बेगम रुकैया सखावत हुसैन:
इन्होंने पटना और कलकत्ता में मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले।
वह रूढ़िवादी विचारों की आलोचक थीं और उन्होंने तर्क दिया कि हर धर्म के नेताओं ने महिलाओं को निचले दर्जे में रखा है।
उन्होंने 'सुल्ताना का स्वप्न' (Sultana's Dream) जैसी कहानी लिखी जिसमें महिलाओं की स्वतंत्रता की कल्पना की गई थी।
पंडिता रमाबाई:
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ये संस्कृत की महान विदुषी थीं।
इन्होंने पुणे में विधवा गृह (मुक्ति मिशन) की स्थापना की, जहाँ ससुराल वालों द्वारा सतायी गई महिलाओं को पनाह दी जाती थी। यहाँ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए कौशल सिखाए जाते थे।
उन्होंने 'स्त्री धर्म नीति' नामक पुस्तक लिखी और उच्च जाति की महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन किया।
ताराबाई शिंदे:
इन्होंने पुणे में घर पर ही शिक्षा प्राप्त की।
इन्होंने स्त्रीपुरुषतुलना नामक किताब लिखी, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक अंतरों की कड़ी आलोचना की गई थी।
3. बाल विवाह के विरुद्ध कानून
20वीं सदी की शुरुआत में बाल विवाह एक बड़ी समस्या थी। बहुत छोटी उम्र में बच्चियों की शादी कर दी जाती थी।
शारदा अधिनियम (1929):
लंबे संघर्ष के बाद 1929 में बाल विवाह निषेध अधिनियम पारित किया गया।
इस कानून के अनुसार, विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और महिलाओं की 16 वर्ष तय की गई। (बाद में इसे बढ़ाकर क्रमशः 21 और 18 कर दिया गया)।
4. जाति और समाज सुधार
सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, समाज का एक बड़ा तबका जाति प्रथा के कारण शोषित था। अछूत मानी जाने वाली जातियों को मंदिरों, कुओं और स्कूलों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
प्रार्थना समाज और परमहंस मंडली
बंबई में 1840 में परमहंस मंडली का गठन हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य जाति प्रथा का उन्मूलन करना था।
1867 में स्थापित प्रार्थना समाज ने भक्ति परंपरा का सहारा लिया जो सभी जातियों की आध्यात्मिक समानता में विश्वास रखती थी।
मध्य भारत: सतनामी आंदोलन
मध्य भारत में घासीदास ने सतनामी आंदोलन की शुरुआत की।
उन्होंने चमड़े का काम करने वाले लोगों को संगठित किया और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए प्रयास किए।
पूर्वी बंगाल: हरिदास ठाकुर
हरिदास ठाकुर के मतुआ पंथ ने चांडाल काश्तकारों के बीच काम किया और ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती दी।
5. गुलामगिरी और सत्यशोधक समाज (ज्योतिराव फुले)
ज्योतिराव फुले निम्न जाति के नेताओं में सबसे मुखर थे। उन्होंने ईसाई मिशनरी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की थी।
ब्राह्मणों के दावे पर प्रहार: फुले ने तर्क दिया कि ब्राह्मण 'आर्य' थे जो बाहर से आए थे और उन्होंने यहाँ के मूल निवासियों (द्रविड़/शूद्र) को हराकर उन्हें गुलाम बना लिया। उन्होंने कहा कि धरती और सत्ता पर यहाँ के मूल निवासियों का अधिकार है।
सत्यशोधक समाज: 1873 में फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जातीय समानता का प्रचार करना था।
गुलामगिरी (1873):
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फुले ने अपनी किताब गुलामगिरी (जिसका अर्थ है गुलामी) लिखी।
उन्होंने यह किताब अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) में दास प्रथा को खत्म करने वाले अमेरिकियों को समर्पित की।
इस तरह उन्होंने भारत की 'निचली' जातियों और अमेरिका के काले दासों की स्थिति के बीच एक संबंध स्थापित किया।
6. मंदिर प्रवेश आंदोलन (डॉ. बी.आर. अंबेडकर)
डॉ. भीमराव अंबेडकर एक महार परिवार में पैदा हुए थे। बचपन में उन्हें स्कूल में कक्षा के बाहर बैठना पड़ता था और सवर्णों के नल से पानी पीने की मनाही थी।
आंदोलन की शुरुआत: 1927 में अंबेडकर ने मंदिर प्रवेश आंदोलन शुरू किया।
महार जाति के लोगों ने बड़ी संख्या में इसमें हिस्सा लिया।
उन्होंने मंदिर के टैंक से पानी पीकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी।
1927 से 1935 के बीच उन्होंने ऐसे तीन आंदोलन चलाए। उनका उद्देश्य समाज को यह दिखाना था कि जातीय पूर्वाग्रह कितना गहरा है।
7. गैर-ब्राह्मण आंदोलन और पेरियार
दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण आंदोलन उन लोगों ने शुरू किया जो गैर-ब्राह्मण जातियों से थे लेकिन शिक्षा और धन प्राप्त कर चुके थे।
ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार):
पेरियार पहले कांग्रेस में थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि राष्ट्रवादी दावतों में भी बैठने के लिए जातिगत भेदभाव किया जा रहा है, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी।
उन्होंने आत्म-सम्मान आंदोलन (Self Respect Movement) चलाया।
उनका मानना था कि अछूतों को अपनी मुक्ति के लिए खुद लड़ना होगा।
वे हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर मनुस्मृति और भगवद् गीता के कटु आलोचक थे। उनका कहना था कि इन ग्रंथों का उपयोग निचली जातियों पर ब्राह्मणों के वर्चस्व और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए किया गया है।
8. श्री नारायण गुरु
केरल के एझावा जाति (एक पिछड़ी जाति) के महान सुधारक श्री नारायण गुरु ने अपने लोगों के लिए एकता का उपदेश दिया।
प्रसिद्ध नारा: उनका एक प्रसिद्ध नारा था - "ओरु जाति, ओरु मतम, ओरु दैवम मनुष्यानु" (मानवता की एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर)।
उन्होंने जाति के आधार पर लोगों के बीच भेदभाव का विरोध किया।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts)
| सुधारक / संस्था | स्थापना / कार्य वर्ष | मुख्य उद्देश्य / कार्य |
| राजा राममोहन राय (ब्रह्म समाज) | 1828 (ब्रह्म समाज), 1829 (सती प्रथा अंत) | सती प्रथा रोक, पश्चिमी शिक्षा, एकेश्वरवाद |
| ईश्वर चंद्र विद्यासागर | 1856 (विधवा विवाह कानून) | विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा |
| ज्योतिराव फुले (सत्यशोधक समाज) | 1873 (संस्था और 'गुलामगिरी' पुस्तक) | जातीय समानता, सत्य की खोज, दलित उद्धार |
| दयानंद सरस्वती (आर्य समाज) | 1875 | वेदों की ओर लौटो, जाति सुधार, स्त्री शिक्षा |
| पंडिता रमाबाई | मुक्ति मिशन (पुणे) | विधवाओं के लिए आश्रय, स्त्री शिक्षा |
| घासीदास | सतनामी आंदोलन | चमड़े के कामगारों का उत्थान |
| पेरियार | आत्म-सम्मान आंदोलन | द्रविड़ अस्मिता, ब्राह्मणवाद का विरोध |
| डॉ. अंबेडकर | 1927 (मंदिर प्रवेश) | दलितों को समान अधिकार |
| बाल विवाह कानून | 1929 | विवाह की आयु तय करना |
निष्कर्ष
19वीं और 20वीं सदी के इन सुधार आंदोलनों ने आधुनिक भारत की नींव रखी। इन सुधारकों ने न केवल कानूनों में बदलाव करवाया बल्कि लोगों की सोच को भी बदलने का प्रयास किया। CTET की परीक्षा में अक्सर इन सुधारकों की किताबों, संस्थाओं और उनके द्वारा दिए गए तर्कों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
महिलाएँ, जाति और सुधार
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