खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर

Sunil Sagare
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यह अध्याय भारतीय इतिहास के उस दौर की चर्चा करता है जिसे द्वितीय नगरीकरण (Second Urbanization) कहा जाता है। इसमें लोहे के प्रयोग, कृषि उत्पादन में वृद्धि, और नए शहरों के उदय के बीच के गहरे संबंध को समझाया गया है।

1. लोहे का प्रयोग और कृषि में परिवर्तन

उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 3000 साल पहले शुरू हुआ। महापाषाण कब्रों (Megalithic Burials) में लोहे के औजार और हथियार बड़ी संख्या में मिले हैं।

लोहे का बढ़ता उपयोग (2500 साल पहले)

लगभग 2500 वर्ष पूर्व, लोहे के औजारों के उपयोग में तेजी आई, जिसने कृषि और जीवनशैली को बदल दिया।

  • कुल्हाड़ियाँ (Axes):

    • इनका उपयोग घने जंगलों को साफ करने के लिए किया जाता था।

    • जंगलों की सफाई से कृषि के लिए अधिक भूमि उपलब्ध हुई।

  • लोहे का फाल (Iron Ploughshare):

    • लकड़ी के फाल की तुलना में लोहे का फाल कठोर जमीन को आसानी से जोत सकता था।

    • इससे फसलों की उपज में भारी वृद्धि हुई क्योंकि मिट्टी को गहराई तक पलटना संभव हुआ।

    • धान (Paddy) की रोपाई की तकनीक का विस्तार हुआ।

कृषि उत्पादन बढ़ाने के अन्य कदम: सिंचाई

सिर्फ औजार ही काफी नहीं थे, उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई की व्यवस्था भी जरूरी थी। समृद्ध गाँवों के बिना राजाओं और उनके राज्यों का बने रहना मुश्किल था।

  • सिंचाई के साधन:

    • नहरें

    • कुएँ

    • तालाब

    • कृत्रिम जलाशय (Artificial Lakes)

महत्वपूर्ण बिंदु: इस काल में सिंचाई के निर्माण कार्य प्रायः राजाओं द्वारा योजनाबद्ध तरीके से और किसानों के श्रम द्वारा किए जाते थे।


2. गाँवों की सामाजिक संरचना (Social Structure)

उपमहाद्वीप के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में गाँवों की बनावट और वहां रहने वाले लोगों के पदों में अंतर था। यह CTET का सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक है।

(A) दक्षिण भारत (तमिल क्षेत्र)

तमिल क्षेत्र में तीन तरह के लोग रहते थे। इनकी जानकारी हमें संगम साहित्य से मिलती है।

पद का नामकौन थे? (विवरण)
वेल्लालर (Vellalar)बड़े भूस्वामी (Large Landowners)। ये समाज के प्रभावशाली लोग थे।
उझवर (Uzhavar)साधारण हलवाहे (Ordinary Ploughmen)। जो खेतों में जुताई का काम करते थे।
कदमिसियार (Kadaisiyar)भूमिहीन मजदूर (Landless Labourers)। इनके पास अपनी जमीन नहीं होती थी।
अडिनई (Adimai)दास (Slaves)। ये भी भूमिहीन वर्ग का हिस्सा थे और दूसरों के खेतों में काम करते थे।

(B) उत्तर भारत (Northern India)

उत्तर भारत के गाँवों में सामाजिक पदानुक्रम थोड़ा अलग था।

1. ग्राम भोजक (Grama Bhojaka)

  • यह गाँव का प्रधान व्यक्ति (Headman) होता था।

  • आनुवंशिक पद: यह पद अक्सर एक ही परिवार के लोगों के पास पीढ़ियों तक रहता था।

  • शक्ति और कार्य:

    • यह गाँव का सबसे बड़ा भूस्वामी होता था।

    • इसके पास बहुत जमीन होती थी, जिस पर दास और मजदूर काम करते थे।

    • राजा इसे कर वसूलने (Tax Collection) का काम सौंपते थे।

    • यह कभी-कभी न्यायाधीश (Judge) और पुलिस का काम भी करता था।

2. गृहपति (Grihapatis)

  • ये स्वतंत्र कृषक (Independent Farmers) होते थे।

  • ज्यादातर छोटे किसान होते थे जिनके पास अपनी थोड़ी जमीन होती थी।

3. दास-कर्मकार (Dasa Karmakara)

  • ये वे लोग थे जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती थी

  • इन्हें दूसरों की जमीन पर काम करके अपनी आजीविका चलानी पड़ती थी।


3. संगम साहित्य (Sangam Literature)

  • रचना काल: लगभग 2300 साल पहले

  • भाषा: तमिल।

  • नामकरण: इन्हें 'संगम' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनकी रचना और संकलन मदुरै (Madurai) के कवियों के सम्मेलनों (जिन्हें संगम कहा जाता था) में किया गया था।

  • महत्व: गाँवों में रहने वालों के लिए जिन तमिल शब्दों (जैसे वेल्लालर, उझवर) का प्रयोग किया गया है, वे संगम साहित्य में ही मिलते हैं।


4. नगर और उनकी विशेषताएँ

नगरों का विकास अक्सर कई कारणों से होता था। जैसे - धार्मिक केंद्र, व्यापारिक केंद्र या प्रशासनिक केंद्र।

प्राचीन नगरों के साक्ष्य

पुरातत्वविदों को खुदाई में कई महत्वपूर्ण चीजें मिली हैं:

  • वलयकूप (Ring Wells):

    • ये गुसलखाने, नाली या कूड़ेदान के रूप में प्रयुक्त होते थे।

    • ये प्रायः लोगों के घरों में मिले हैं।

मथुरा (Mathura): एक महत्वपूर्ण नगर

मथुरा 2500 साल से भी ज्यादा समय से एक महत्वपूर्ण नगर रहा है। यह एक बहु-कार्यात्मक (Multi-functional) शहर था।

  1. भौगोलिक स्थिति:

    • यह यातायात और व्यापार के दो मुख्य रास्तों पर स्थित था।

      • उत्तर-पश्चिम से पूरब की ओर जाने वाला रास्ता।

      • उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाला रास्ता।

  2. किलेबंदी: शहर के चारों ओर किलेबंदी थी और इसमें अनेक मंदिर थे।

  3. आर्थिक आधार: आसपास के किसान और पशुपालक शहर के लोगों के लिए भोजन उपलब्ध कराते थे।

  4. मूर्तिकला केंद्र: मथुरा बेहतरीन मूर्तियाँ बनाने का एक प्रमुख केंद्र था।

  5. राजनीतिक महत्व: लगभग 2000 साल पहले मथुरा कुषाणों (Kushanas) की दूसरी राजधानी बनी।

  6. धार्मिक केंद्र:

    • यहाँ बौद्ध विहार और जैन मंदिर मिले हैं।

    • यह भगवान कृष्ण की भक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

  7. अभिलेख (Inscriptions):

    • मथुरा से प्रस्तर खंडों और मूर्तियों पर अनेक अभिलेख मिले हैं।

    • ये अभिलेख संक्षिप्त हैं और प्रायः दान का उल्लेख करते हैं।

    • दान देने वालों में राजा, रानी, अधिकारी, व्यापारी और शिल्पकार शामिल थे।

    • अभिलेखों में सुनारों, लोहारों, बुनकरों, टोकरी बुनने वालों, माला बनाने वालों और इत्र बनाने वालों का उल्लेख मिलता है।


5. शिल्प और शिल्पकार (Crafts and Craftsmen)

उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW - Northern Black Polished Ware)

यह इस काल के बर्तनों की सबसे खास विशेषता है।

  • नाम का अर्थ: ये प्रायः उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में मिले हैं, इसलिए इन्हें उत्तरी काले चमकीले पात्र कहा जाता है।

  • निर्माण तकनीक:

    • ये कठोर, चाक पर बनाए गए (Wheel-made) पात्र हैं।

    • इनकी सतह चमकदार काली होती थी।

    • कुम्हार मिट्टी के बर्तनों को भट्टों पर बहुत उच्च तापमान पर रखते थे, जिससे बर्तन की बाहरी सतह काली हो जाती थी।

    • इस पर एक काली लेप (Slip) लगाई जाती थी जो इसे शीशे जैसी चमक देती थी।

वस्त्र निर्माण

  • कपड़ा बुनना एक महत्वपूर्ण उद्योग था।

  • वाराणसी (उत्तर में) और मदुरै (दक्षिण में) इसके प्रमुख केंद्र थे।

  • यहाँ स्त्री और पुरुष दोनों काम करते थे।

  • अर्थशास्त्र के नियम: अर्थशास्त्र में कताई और बुनाई के लिए विस्तृत नियम दिए गए हैं कि कैसे विशेष अधिकारियों की देखरेख में कारखानों में काम किया जाता था।


6. श्रेणी (Shrenis) - शिल्पकारों का संगठन

जैसे-जैसे व्यापार और शिल्प बढ़ा, शिल्पकारों और व्यापारियों ने अपने संगठन बनाए जिन्हें श्रेणी कहा जाता था।

शिल्पकारों की श्रेणियों का कार्य:

  1. प्रशिक्षण देना: नए लोगों को काम सिखाना।

  2. कच्चा माल उपलब्ध कराना: दूर-दराज से कच्चा माल लाना और शिल्पकारों को देना।

  3. तैयार माल का वितरण: बनी हुई वस्तुओं को बाजार में बेचना।

व्यापारियों की श्रेणियों का कार्य:

  1. मुख्य रूप से व्यापार का संचालन करना।

बैंकों के रूप में श्रेणियाँ:

  • श्रेणियाँ बैंक (Bank) के रूप में भी काम करती थीं।

  • अमीर लोग और राजा यहाँ पैसा जमा कराते थे।

  • इस जमा राशि का निवेश व्यापार बढ़ाने में किया जाता था।

  • मिले लाभ का कुछ हिस्सा जमाकर्ता को लौटाया जाता था या मठों/मंदिरों को दान दिया जाता था।


7. व्यापार और सिक्के (Trade and Coins)

सिक्के

पुरातत्वविदों को इस काल के हजारों सिक्के मिले हैं। सबसे पुराने सिक्के आहत सिक्के (Punch-Marked Coins) थे।

  • समय: ये लगभग 500 वर्षों तक चलन में रहे।

  • बनावट:

    • ये चाँदी या ताँबे के बने होते थे।

    • इन्हें ढाला नहीं जाता था, बल्कि धातु की चादर को काटकर या धातु के चपटे गोलिकाओं पर ठप्पा (Punch) लगाकर बनाया जाता था।

    • इसीलिए इन्हें 'आहत' सिक्का कहा जाता है।

    • इन पर कोई लेख नहीं होता था, केवल आकृतियाँ (प्रतीक) होती थीं।

व्यापारिक रास्ते

  • व्यापारी सामान ले जाने के लिए काफिलों (Caravans) और जहाजों का उपयोग करते थे।

  • दक्षिण भारत का महत्व: सोना, मसाले (विशेषकर काली मिर्च), और कीमती पत्थरों के लिए प्रसिद्ध था।

  • काली मिर्च (Black Pepper): रोमन साम्राज्य में इसकी इतनी मांग थी कि इसे 'काला सोना' (Black Gold) कहा जाता था।

  • समुद्री मार्ग:

    • व्यापारी समुद्र के रास्ते रोम तक सामान ले जाते थे।

    • वे मानसूनी हवाओं (Monsoon winds) का ज्ञान रखते थे।

    • अफ्रीका या अरब के पूर्वी तट से भारत के पश्चिमी तट पर पहुँचने के लिए वे दक्षिण-पश्चिमी मानसून (South-West Monsoon) का सहारा लेते थे।


8. अरिकमेडु (Arikamedu) - एक सूक्ष्म निरीक्षण

स्थिति: यह पुदुच्चेरी (Puducherry) में स्थित एक पुरास्थल है।

समय: लगभग 2200 से 1900 साल पहले।

प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Finds):

  1. ईंटों का ढांचा: यहाँ एक बड़ा ढांचा मिला है जो संभवतः गोदाम (Warehouse) रहा होगा।

  2. भूमध्यसागरीय पात्र (Mediterranean Amphorae):

    • यहाँ एमफोरा जैसे पात्र मिले हैं।

    • ये लंबे, दोनों तरफ हत्थे वाले जार होते थे।

    • इनमें शराब या तेल जैसे तरल पदार्थ रखे जाते थे।

  3. एरेटाइन पात्र (Arretine Ware):

    • ये लाल चमकदार बर्तन थे।

    • इनका नाम इटली के एक शहर 'एरेटजो' (Arezzo) के नाम पर पड़ा।

    • इन्हें गीली चिकनी मिट्टी को सांचे में दबाकर बनाया जाता था।

  4. रोमन लैंप और कांच: यहाँ रोमन लैंप, शीशे के बर्तन और रत्न भी मिले हैं।

  5. छोटे कुंड (Tanks): संभवतः इनका प्रयोग कपड़ों की रंगाई (Dyeing vats) के लिए किया जाता था।

  6. ब्राह्मी लिपि: कई बर्तनों पर ब्राह्मी लिपि में अभिलेख मिले हैं। शुरू में तमिल भाषा के लिए इसी लिपि का प्रयोग होता था, इसलिए इसे तमिल-ब्राह्मी अभिलेख भी कहते हैं।


9. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Points for CTET)

  • जातक कथाएँ (Jataka Tales): ये आम लोगों द्वारा रची गई कहानियाँ थीं, जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने लिखा और संकलित किया। साँची के स्तूप की रेलिंग पर जातक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं।

  • बेरीगाजा (Bharuch): यह नर्मदा नदी के मुहाने पर स्थित एक प्राचीन बंदरगाह था।

    • यहाँ शराब, ताँबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, कपड़े, सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात होता था।

    • हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, हाथीदांत, गोमेद, कार्नीलियन, सूती कपड़ा, रेशम और इत्र यहाँ से निर्यात किए जाते थे।

  • मुवेनदार (Muvendar): यह एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है 'तीन मुखिया'। इसका प्रयोग संगम कविताओं में तीन शासक परिवारों - चोल, चेर और पांड्य के लिए किया गया है (लगभग 2300 साल पहले)।

  • रेशम मार्ग (Silk Route): कुषाणों ने सिल्क रूट के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया था, जिससे उन्हें कर के रूप में भारी लाभ मिलता था।


10. तिथियों का सारांश (Timeline Summary)

  • उपमहाद्वीप में लोहे के प्रयोग की शुरुआत: $\approx 3000$ साल पहले।

  • लोहे के प्रयोग में बढ़ोतरी, नगर, आहत सिक्के: $\approx 2500$ साल पहले।

  • संगम साहित्य की रचना की शुरुआत: $\approx 2300$ साल पहले।

  • अरिकमेडु का पत्तन (Port): $\approx 2200$ से $1900$ साल पहले।

  • मथुरा (कुषाण राजधानी): $\approx 2000$ साल पहले।



खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर

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