1. व्यापार और व्यापारी (Trade and Traders)
प्राचीन काल में भारत का व्यापार रोम, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ बहुत उन्नत था। पुरातात्विक साक्ष्यों से हमें इस व्यापार की जानकारी मिलती है।
प्रमुख व्यापारिक वस्तुएं और साक्ष्य:
काली मिर्च (Black Gold): दक्षिण भारत मसाले, विशेषकर काली मिर्च के लिए प्रसिद्ध था। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च की इतनी मांग थी कि इसे 'काला सोना' कहा जाता था।
अन्य वस्तुएं: दक्षिण भारत से कीमती पत्थर, सोना और मसाले जहाजों के माध्यम से समुद्र पार भेजे जाते थे।
रोमन सिक्के: दक्षिण भारत के कई पुरातात्विक स्थलों (जैसे अरिकमेडु) से रोमन सोने के सिक्के मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि रोम के साथ व्यापार बहुत समृद्ध था।
व्यापारिक मार्ग:
व्यापारी सामान ले जाने के लिए समुद्री मार्गों और सड़क मार्गों का उपयोग करते थे।
समुद्री मार्ग: व्यापारी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होकर यात्रा करते थे। वे मानसून हवाओं का उपयोग करके अपनी यात्रा को तेज करते थे।
पूर्वी अफ्रीका या अरब से भारत के पश्चिमी तट पर आने के लिए 'दक्षिण-पश्चिमी मानसून' का सहारा लिया जाता था।
लंबी यात्राओं के लिए मजबूत जहाजों का निर्माण किया जाता था।
2. समुद्र तटों से लगे राज्य (New Kingdoms along the Coasts)
भारतीय उपमहाद्वीप का दक्षिणी भाग लंबी तटरेखा, पहाड़ियों और नदी घाटियों (जैसे कावेरी) से भरा है। इन क्षेत्रों पर नियंत्रण करने वाले सरदारों और राजाओं ने बहुत शक्ति और धन अर्जित किया।
संगम साहित्य और 'मुवेनदार' (Muvendar)
संगम कविताओं में एक तमिल शब्द 'मुवेनदार' का उल्लेख मिलता है। यह एक मुखिया या प्रधान के लिए प्रयुक्त शब्द है। इसका प्रयोग तीन शासक परिवारों के लिए किया गया है:
चोल (Cholas)
चेर (Cheras)
पांड्य (Pandyas)
यह तीनों राजवंश आज से लगभग 2300 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में बहुत शक्तिशाली थे।
शक्ति के केंद्र: इन तीनों मुखियाओं के पास अपने-अपने दो मुख्य सत्ता केंद्र थे:
एक तटीय हिस्से में।
एक अंदरूनी हिस्से में।
कुल 6 केंद्रों में से दो बहुत महत्वपूर्ण थे:
पुहार (या कावेरीपट्टिनम): चोलों का मुख्य पत्तन (Port)।
मदुरै: पांड्यों की राजधानी।
शासन व्यवस्था और कर (Tax):
ये शासक नियमित कर (Tax) नहीं वसूलते थे।
इसके बदले वे लोगों से उपहार (Gift) की मांग करते थे और प्राप्त करते थे।
सैन्य अभियानों के दौरान आसपास के इलाकों से शुल्क वसूला जाता था।
धन का वितरण: शासक धन का कुछ हिस्सा अपने पास रखते थे और बाकी अपने समर्थकों, परिवार, सैनिकों और कवियों में बांट देते थे।
संगम कवियों की भूमिका:
संगम कवियों ने उन सरदारों की प्रशंसा में कविताएं लिखीं जो उन्हें कीमती जवाहरात, सोना, घोड़े, हाथी और सुंदर कपड़े उपहार में देते थे।
3. सातवाहन राजवंश (The Satavahanas)
मुवेनदार के लगभग 200 वर्षों बाद पश्चिम भारत में सातवाहन राजवंश का प्रभाव बढ़ा।
प्रमुख शासक: गौतमीपुत्र श्रीसातकर्णि।
जानकारी के स्रोत: उसकी माता 'गौतमी बलश्री' द्वारा लिखवाए गए एक अभिलेख से हमें उसके बारे में जानकारी मिलती है।
उपाधि: सातवाहन शासकों को 'दक्षिणापथ के स्वामी' कहा जाता था। दक्षिणापथ का शाब्दिक अर्थ है 'दक्षिण की ओर जाने वाला रास्ता'।
गौतमीपुत्र श्रीसातकर्णि ने पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी तटों पर अपनी सेनाएं भेजीं।
4. रेशम मार्ग की कहानी (The Story of the Silk Route)
रेशम (Silk) प्राचीन काल में एक विलासिता और प्रतिष्ठा का प्रतीक था। इसकी निर्माण तकनीक और व्यापार ने इतिहास को बदल दिया।
रेशम का इतिहास:
रेशम बनाने की तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में लगभग 7000 वर्ष पहले हुआ था।
चीन ने हजारों वर्षों तक इस तकनीक को दुनिया से छुपाकर रखा।
चीन से पैदल, घोड़ों और ऊंटों पर कुछ लोग दूर-दूर की जगहों पर जाते थे और अपने साथ रेशम ले जाते थे। जिस रास्ते से ये लोग यात्रा करते थे, उसे 'सिल्क रूट' (Silk Route) के नाम से जाना गया।
शासकों द्वारा नियंत्रण: रास्ते में पड़ने वाले शासक इस मार्ग पर नियंत्रण करना चाहते थे। इसके कारण निम्नलिखित थे:
व्यापारियों से कर (Tax) प्राप्त करना।
व्यापारियों से शुल्क (Tribute) और उपहार प्राप्त करना।
बदले में शासक व्यापारियों को लुटेरों से सुरक्षा प्रदान करते थे।
कुषाण (The Kushanas): सिल्क रूट पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे।
समय: लगभग 2000 वर्ष पूर्व।
शक्ति के केंद्र: पेशावर और मथुरा। (तक्षशिला भी इनके राज्य का हिस्सा था)।
उपलब्धि: भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले सोने के सिक्के (Gold Coins) जारी करने वाले शासकों में कुषाण प्रमुख थे। इन सिक्कों का उपयोग सिल्क रूट के व्यापारियों द्वारा किया जाता था।
5. बौद्ध धर्म का प्रसार (The Spread of Buddhism)
कुषाणों के शासनकाल में बौद्ध धर्म में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए और इसका विस्तार हुआ।
कनिष्क (Kanishka):
कुषाणों का सबसे प्रसिद्ध राजा।
शासन काल: लगभग 1900 वर्ष पूर्व।
बौद्ध परिषद: कनिष्क ने एक बौद्ध परिषद का गठन किया जिसमें विद्वान एकत्र होकर महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करते थे।
अश्वघोष:
यह कनिष्क के दरबार में रहने वाले एक प्रसिद्ध कवि थे।
रचना: इन्होंने बुद्ध की जीवनी 'बुद्धचरित' की रचना की।
इस समय के बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत में लिखना शुरू कर दिया था।
बौद्ध धर्म का विभाजन: महायान का उदय
इस काल में बौद्ध धर्म की एक नई धारा का विकास हुआ जिसे महायान (Mahayana) कहा गया। इसकी दो मुख्य विशेषताएं थीं:
मूर्तियों में बुद्ध की उपस्थिति:
पहले की मूर्तियों में बुद्ध की उपस्थिति केवल कुछ संकेतों (जैसे पीपल का पेड़ या चरण चिह्न) के माध्यम से दर्शाई जाती थी।
महायान के आने के बाद बुद्ध की पूर्ण प्रतिमाएं बनाई जाने लगीं।
ये प्रतिमाएं मुख्य रूप से मथुरा और तक्षशिला में बनाई गईं।
बोधिसत्व (Bodhisattvas) में आस्था:
बोधिसत्व उन्हें कहते हैं जो ज्ञान प्राप्ति के बाद एकांत वास करने के बजाय दुनिया में रहकर लोगों को शिक्षा देने और मदद करने का मार्ग चुनते हैं।
धीरे-धीरे बोधिसत्व की पूजा बहुत लोकप्रिय हो गई और यह पूरे मध्य एशिया, चीन, और बाद में कोरिया तथा जापान तक फैल गई।
बौद्ध धर्म का अन्य क्षेत्रों में प्रसार:
थेरवाद (Theravada): यह बौद्ध धर्म का आरंभिक रूप था। यह श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य भागों में अधिक प्रचलित हुआ।
पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बौद्ध भिक्षुओं के लिए पहाड़ों को खोदकर गुफाएं (विहार) बनाई गईं। इनमें से कुछ गुफाएं राजा-रानियों के आदेश पर तो कुछ व्यापारियों और कृषकों द्वारा बनवाई गईं (जैसे कार्ले की गुफा, महाराष्ट्र)।
6. तीर्थयात्रियों की जिज्ञासा (The Quest of the Pilgrims)
व्यापारियों के साथ-साथ तीर्थयात्री भी धर्म के प्रति अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए दूर-दूर की यात्राएं करते थे। चीनी बौद्ध तीर्थयात्री भारत में बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थानों और प्रसिद्ध मठों को देखने आए थे।
प्रमुख चीनी तीर्थयात्री (कालक्रमानुसार):
फा शिएन (Fa Xian):
भारत आगमन: लगभग 1600 वर्ष पूर्व।
वापसी यात्रा: वह अपनी वापसी यात्रा में बंगाल से एक व्यापारी जहाज पर चढ़ा। रास्ते में भयंकर तूफान आया, लेकिन वह सुरक्षित जावा पहुंचा और वहां से चीन गया। वह अपने साथ कई पांडुलिपियां और बुद्ध की मूर्तियां ले गया था।
श्वैन त्सांग (Xuan Zang):
भारत आगमन: लगभग 1400 वर्ष पूर्व।
रास्ता: यह भू-मार्ग (उत्तर-पश्चिम और मध्य एशिया) से चीन वापस गया।
संग्रह: वह अपने साथ सोने, चांदी और चंदन की बनी बुद्ध की मूर्तियां तथा 600 से अधिक पांडुलिपियां ले गया।
दुर्घटना: सिंधु नदी पार करते समय उसकी नाव पलट गई जिससे लगभग 50 पांडुलिपियां खो गईं। उसने अपना शेष जीवन इन पांडुलिपियों का संस्कृत से चीनी अनुवाद करने में व्यतीत किया।
इ-त्सिंग (I-Qing):
भारत आगमन: श्वैन त्सांग के जाने के लगभग 50 वर्ष बाद।
नालंदा विश्वविद्यालय: श्वैन त्सांग और अन्य तीर्थयात्रियों ने उस समय के सबसे प्रसिद्ध बौद्ध विद्या केंद्र नालंदा (बिहार) में अध्ययन किया।
शिक्षक: यहाँ के शिक्षक अपनी योग्यता और बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ थे।
नियम: यहाँ के नियम बहुत सख्त थे।
प्रवेश परीक्षा: द्वारपाल ही नए प्रवेशार्थियों से कठिन प्रश्न पूछते थे। सही उत्तर देने पर ही अंदर जाने की अनुमति मिलती थी। 10 में से 7-8 छात्र असफल हो जाते थे।
7. भक्ति की शुरुआत (The Beginning of Bhakti)
जब देवी-देवताओं की पूजा का चलन बढ़ा, तब हिंदू धर्म में 'भक्ति' की अवधारणा का उदय हुआ।
मुख्य बिंदु:
प्रमुख देवता: शिव, विष्णु और दुर्गा जैसे देवी-देवताओं की पूजा लोकप्रिय हुई।
भक्ति मार्ग: किसी देवी या देवता के प्रति श्रद्धा को ही भक्ति कहा जाता है। भक्ति का पथ सबके लिए खुला था, चाहे वह अमीर हो या गरीब, ऊंची जाति का हो या नीची जाति का, स्त्री हो या पुरुष।
भगवत गीता: भक्ति मार्ग की चर्चा हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ भगवत गीता में विस्तार से की गई है। (महाभारत का हिस्सा)। इसमें श्री कृष्ण, अर्जुन को सभी सांसारिक धर्मों को छोड़कर उनकी शरण में आने का उपदेश देते हैं।
भक्ति की विशेषता:
भक्ति मार्ग अपनाने वाले लोग आडंबर और यज्ञों के बजाय ईश्वर के प्रति लगन और व्यक्तिगत पूजा पर जोर देते थे।
भक्तों का मानना था कि यदि सच्चे मन से आराध्य देव की पूजा की जाए, तो देवता उसी रूप में दर्शन देंगे जिस रूप में भक्त उन्हें देखना चाहता है (चाहे वह मानव हो, सिंह हो, या वृक्ष)।
इसी विचार के कारण कलाकारों ने देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां बनानी शुरू कीं।
हिंदू शब्द की उत्पत्ति: 'हिंदू' शब्द 'इंडिया' की तरह ही सिंधु या इंडस नदी से निकला है। यह शब्द अरबों और ईरानियों द्वारा उन लोगों के लिए उपयोग किया जाता था जो सिंधु नदी के पूर्व में रहते थे।
महत्वपूर्ण तिथियां (एक नज़र में)
रेशम बनाने की कला की खोज (चीन): लगभग 7000 वर्ष पूर्व।
चोल, चेर, पांड्य (मुवेनदार): लगभग 2300 वर्ष पूर्व।
रोमन साम्राज्य में रेशम की मांग बढ़ी: लगभग 2000 वर्ष पूर्व।
कुषाण शासक कनिष्क: लगभग 1900 वर्ष पूर्व।
फा शिएन का भारत आगमन: लगभग 1600 वर्ष पूर्व।
श्वैन त्सांग का भारत आगमन: लगभग 1400 वर्ष पूर्व।
CTET परीक्षा हेतु विशेष सुझाव
मैपिंग: सिल्क रूट के रास्ते और दक्षिण भारत के पत्तनों (पुहार, मदुरै) की स्थिति को मानचित्र पर समझें।
कथन और कारण: "राजा सिल्क रूट पर नियंत्रण क्यों करना चाहते थे?" - ऐसे तार्किक प्रश्नों के लिए तैयार रहें।
कला और संस्कृति: गांधार और मथुरा कला शैली में अंतर तथा महायान और हीनयान (थेरवाद) में अंतर स्पष्ट रखें।
व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes