1. वास्तुकला की तकनीकें और निर्माण शैलियाँ
भवनों के निर्माण में समय के साथ भारी तकनीकी बदलाव आए। 7वीं से 10वीं शताब्दी और उसके बाद 12वीं शताब्दी के बीच निर्माण शैलियों में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है।
क) अनुप्रस्थ टोडा निर्माण शैली (7वीं से 10वीं शताब्दी)
इस शैली का उपयोग 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मंदिरों, मस्जिदों, मकबरों और सीढ़ीदार कुओं (बावड़ी) के निर्माण में हुआ।
निर्माण विधि: इसमें छत, दरवाजे और खिड़कियां बनाने के लिए दो सीधे खड़े खंभों के आर-पार एक आड़ी शहतीर (Beam) रखी जाती थी।
पहचान: इसे 'अनुप्रस्थ टोडा' शैली कहा जाता है।
उदाहरण: कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद (दिल्ली) के मेहराब और उत्तर भारत के कई प्राचीन मंदिर।
ख) चापाकार शैली (12वीं शताब्दी के बाद)
12वीं शताब्दी में भवन निर्माण में दो मुख्य परिवर्तन आए, जिसे 'चापाकार' शैली के रूप में जाना जाता है।
मेहराब का उपयोग: दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर की अधिरचना का भार संभालने के लिए मेहराब (Arch) का निर्माण किया जाने लगा।
मेहराब के मध्य में एक 'डाट' (Keystone) होती थी, जो पत्थरों के भार को संतुलित रखती थी।
चूना-पत्थर सीमेंट: निर्माण में चूना-पत्थर सीमेंट का प्रयोग बढ़ गया।
यह उच्च श्रेणी की सीमेंट होती थी, जिसमें पत्थर के टुकड़ों को मिलाने से कंक्रीट बनती थी।
इससे विशाल ढांचों का निर्माण सरलता और तेजी से होने लगा।
2. मंदिर निर्माण और वास्तुकला
मध्यकाल में मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि वे शासक की शक्ति, धन और भक्ति का प्रदर्शन भी करते थे।
क) कंदरिया महादेव मंदिर
स्थान: खजुराहो (मध्य प्रदेश)।
देवता: शिव।
निर्माण काल: 999 ई.।
शासक: चंदेल राजवंश के राजा धंगदेव।
वास्तुकला की विशेषताएं:
इसमें एक अलंकृत प्रवेश द्वार है।
मुख्य सभा भवन को 'महामंडप' कहा जाता था, जहाँ नृत्य का आयोजन होता था।
मुख्य देवता की मूर्ति 'गर्भगृह' में रखी जाती थी, जहाँ केवल राजा और उसका परिवार ही जा सकता था।
ख) राजराजेश्वर मंदिर
स्थान: तंजावुर (तमिलनाडु)।
निर्माण काल: 11वीं सदी की शुरुआत।
शासक: चोल राजा राजराजदेव।
विशेषताएं:
उस समय के सभी मंदिरों में इसका शिखर सबसे ऊंचा था।
शिखर के शीर्ष पर 90 टन का पत्थर स्थापित किया गया था।
इतने भारी पत्थर को ऊपर ले जाने के लिए 4 किलोमीटर लंबी चढ़ाईदार एलीवेटर (रास्ता) बनाया गया था, जिसे बाद में हटा दिया गया।
इस रास्ते को आज भी पास के एक गाँव में 'चारूपल्लम' (चढ़ाईदार रास्ते का गाँव) कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य: मध्यकालीन शासक अपना नाम देवताओं के नाम पर रखते थे (जैसे राजराजदेव) ताकि वे खुद को ईश्वर का रूप दर्शा सकें। धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से मंदिर में एक देवता (राजा) दूसरे देवता (ईश्वर) का सम्मान करता था।
3. मंदिरों का विनाश और लूटपाट
मध्यकाल में जब राजा एक-दूसरे के राज्यों पर आक्रमण करते थे, तो वे अक्सर मंदिरों को निशाना बनाते थे क्योंकि मंदिर धन और शक्ति के केंद्र थे।
पांड्य राजा श्रीमर-श्रीवल्लभ: 9वीं सदी में श्रीलंका पर आक्रमण किया और राजा सेन प्रथम को हराया। उसने बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति और अन्य कीमती खजाने लूट लिए। बाद में सिंहली शासक सेन द्वितीय ने पांड्य राजधानी मदुरई पर आक्रमण कर बुद्ध की मूर्ति वापस प्राप्त की।
राजेंद्र प्रथम (चोल राजा): 11वीं सदी में अपनी राजधानी में शिव मंदिर बनवाया और उसे पराजित राजाओं से जब्त की गई मूर्तियों से भर दिया (जैसे- चालुक्यों से प्राप्त सूर्य पीठिका, उड़ीसा से गणेश मूर्ति, आदि)।
सुल्तान महमूद गजनवी: राजेंद्र प्रथम का समकालीन था। उसने भारत के कई मंदिरों (जैसे सोमनाथ) को लूटा और उन्हें नष्ट किया। ऐसा करके वह एक 'महान इस्लामी योद्धा' के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता था।
4. सल्तनत कालीन वास्तुकला
दिल्ली के सुल्तानों के समय में वास्तुकला में भारतीय और इस्लामी शैलियों का मिश्रण शुरू हुआ।
कुतुब मीनार
यह पांच मंजिला इमारत है।
पहली मंजिल: कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 ई. में बनवाई।
शेष मंजिलें: शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1229 ई. के आसपास पूरी करवाईं।
मरम्मत: आंधी और भूकंप के कारण इसे कई बार क्षति पहुंची। अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद तुगलक, फिरोज शाह तुगलक और इब्राहिम लोदी ने इसकी मरम्मत करवाई।
विशेषताएं:
पहली मंजिल पर छज्जे के नीचे अभिलेखों की पट्टियां हैं।
ये अभिलेख अरबी भाषा में हैं।
मीनार का बाहरी हिस्सा घुमावदार और कोणीय है, जो निर्माण की जटिलता को दर्शाता है।
5. मुगल वास्तुकला: चारबाग और मकबरे
मुगलों के अधीन वास्तुकला अधिक जटिल, भव्य और समरूप हो गई। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर और विशेष रूप से शाहजहां की इसमें गहरी रुचि थी।
क) चारबाग शैली
बाबर ने अपनी आत्मकथा (बाबरनामा) में बागों की योजना बनाने में अपनी रुचि का वर्णन किया है।
संरचना: ये बाग दीवारों से घिरे होते थे और कृत्रिम नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित होते थे।
नामकरण: चार समान हिस्सों में बंटे होने के कारण इन्हें 'चारबाग' कहा जाता था।
मुख्य उदाहरण:
कश्मीर के शालीमार बाग में सीढ़ीदार चारबाग।
हुमायूं के मकबरे का चारबाग (दिल्ली)।
आगरा के लाल महल का बाड़ी चारबाग।
ख) हुमायूं का मकबरा
अकबर के शासनकाल में निर्मित यह मकबरा मुगल वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
विशेषता: इसमें पहली बार 'केंद्रीय विशाल गुंबद' और ऊंचा मेहराबदार प्रवेश द्वार (पिश्ताक) का प्रयोग हुआ।
परंपरा: यह मकबरा 'हश्त-बिहिश्त' (आठ स्वर्ग) की परंपरा में बना था। इसमें एक केंद्रीय कक्ष आठ कमरों से घिरा होता है।
सामग्री: इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थर से हुआ है और किनारे सफेद संगमरमर के हैं।
6. शाहजहां: वास्तुकला का स्वर्ण काल
शाहजहां के काल में वास्तुकला के विभिन्न तत्वों का एक भव्य और सुसंगत संश्लेषण (Fusion) हुआ। उसके शासन में अनवरत निर्माण कार्य चलते रहे।
दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम
शाहजहां के दरबार में सार्वजनिक और व्यक्तिगत सभा भवनों की योजना बहुत सावधानी से बनाई गई थी।
इन दरबारों को 'चिहिल सुतुन' (चालीस खंभों के सभा भवन) के रूप में भी जाना जाता था।
किबला: शाहजहां का सिंहासन इस तरह रखा जाता था कि दरबार में उपस्थित सभी लोग उसकी ओर मुख करके खड़े हों, जैसे नमाज के दौरान मक्का की ओर (किबला) होता है। यह राजा को 'पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि' के रूप में दर्शाता था।
पितरा दूरा (Pietra Dura) तकनीक
परिभाषा: संगमरमर या बलुआ पत्थर पर रंगीन, ठोस पत्थरों को दबाकर बनाए गए सुंदर और अलंकृत नमूने।
प्रयोग: दिल्ली के लाल किले में शाहजहां के सिंहासन के पीछे 'पितरा दूरा' के जड़ाऊ काम की एक श्रृंखला बनाई गई थी।
चित्रण: इसमें पौराणिक यूनानी देवता 'ऑर्फियस' को वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया था। ऐसी मान्यता थी कि ऑर्फियस का संगीत आक्रामक जानवरों को भी शांत कर सकता है।
ताजमहल और नदी-तट बाग योजना
शाहजहां ने आगरा में यमुना नदी के तट पर ताजमहल का निर्माण करवाया।
नया प्रारूप: पहले के चारबागों में इमारतें बाग के बीच में होती थीं, लेकिन ताजमहल में मुख्य मकबरा नदी के तट पर एक चबूतरे पर बनाया गया और बाग इसके दक्षिण में था।
उद्देश्य: नदी तक पहुँच पर केवल बादशाह और उसके खास लोगों का नियंत्रण हो।
दिल्ली के शाहजहानाबाद में निर्मित लाल किले में भी यही योजना अपनाई गई, जहाँ केवल विशिष्ट लोग ही नदी के रास्ते किले तक आ सकते थे।
7. क्षेत्र और साम्राज्य (क्षेत्रीय प्रभाव)
8वीं से 18वीं शताब्दी के बीच, जैसे-जैसे बड़े साम्राज्यों का निर्माण हुआ, विभिन्न क्षेत्रों की वास्तुकला शैलियों का आदान-प्रदान (Cross-fertilization) बढ़ा।
विजयनगर: यहाँ की राजाओं की गजशालाओं (Elephant Stables) पर बीजापुर और गोलकुंडा जैसी सल्तनतों की वास्तुकला का गहरा प्रभाव पड़ा।
वृंदावन (मथुरा): यहाँ के मंदिरों (जैसे गोविंद देव मंदिर) की वास्तुकला शैली फतेहपुर सीकरी के मुगल महलों से बहुत मिलती-जुलती है।
बंगाल: यहाँ के स्थानीय शासकों ने छप्पर की झोपड़ी जैसी दिखने वाली छत बनाई। मुगलों को यह 'बांग्ला गुंबद' इतना पसंद आया कि उन्होंने अपनी वास्तुकला में इसका व्यापक प्रयोग किया।
अकबर की राजधानी (फतेहपुर सीकरी): यहाँ की कई इमारतों पर गुजरात और मालवा की वास्तुकला शैलियों का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।
जोधपुर और राजस्थान: यहाँ के महलों में भी मुगल और क्षेत्रीय शैलियों का मिश्रण (मेहराब, जाली, झरोखे) देखा जा सकता है।
महत्वपूर्ण शब्दावली (Quick Revision)
अधिरचना (Superstructure): इमारत का वह भाग जो ज़मीन (तल) के ऊपर होता है।
शिखर: मंदिर का सबसे ऊपरी और नुकीला हिस्सा (जैसे- राजराजेश्वर मंदिर का शिखर)।
गर्भगृह: मंदिर का मुख्य कक्ष जहाँ प्रमुख देवता की मूर्ति स्थापित होती है।
मंडप: मंदिर में वह हॉल जहाँ लोग इकट्ठा होते थे।
पिश्ताक: मेहराबदार मुख्य प्रवेश द्वार (मुगल वास्तुकला की विशेषता)।
शासक और इमारतें
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