1. गुप्त वंश का उदय और प्रशस्तियाँ
मौर्य साम्राज्य के पतन के कई सौ वर्षों बाद गुप्त वंश का उदय हुआ। इस काल के इतिहास की जानकारी हमें अभिलेखों, सिक्कों और साहित्यिक स्रोतों से मिलती है।
प्रशस्ति का अर्थ और महत्व
परिभाषा: 'प्रशस्ति' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है 'प्रशंसा में'। ये विशेष प्रकार के अभिलेख होते थे जो दरबारी कवियों द्वारा राजाओं की विजय और गुणों के बखान में लिखे जाते थे।
उदाहरण: सबसे प्रसिद्ध प्रशस्ति इलाहाबाद (प्रयागराज) के अशोक स्तंभ पर खुदी हुई है।
रचयिता: इसकी रचना हरिषेण ने की थी, जो समुद्रगुप्त के दरबार में कवि और मंत्री थे।
भाषा: यह काव्य रूप में संस्कृत भाषा में लिखी गई है।
इतिहास: यह अभिलेख लगभग 1700 साल पुराना है।
2. समुद्रगुप्त: एक महान योद्धा और शासक
हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति से हमें समुद्रगुप्त की विजय नीतियों और उनके साम्राज्य विस्तार के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। हरिषेण ने उन्हें 'ईश्वर के बराबर' बताया है।
समुद्रगुप्त की चार प्रमुख विजय नीतियाँ
इतिहासकारों ने समुद्रगुप्त की नीतियों को चार अलग-अलग क्षेत्रों के आधार पर विभाजित किया है:
1. आर्यावर्त (उत्तर भारत) के शासक:
क्षेत्र: यह गंगा-यमुना दोआब का क्षेत्र था।
शासक: यहाँ के 9 शासकों को समुद्रगुप्त ने हराया।
नीति: इन राज्यों को "जड़ से उखाड़ फेंका गया" और उन्हें सीधे गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया।
2. दक्षिणापथ (दक्षिण भारत) के शासक:
संख्या: इसमें 12 शासक शामिल थे।
राजधानियाँ: इनकी राजधानियाँ पूर्वी तट के साथ-साथ थीं (जैसे कांचीपुरम आदि)।
नीति: इन शासकों ने हारने के बाद समुद्रगुप्त के सामने समर्पण किया। समुद्रगुप्त ने उन्हें उनका राज्य वापस लौटा दिया और शासन करने की अनुमति दी (ग्रहण-मोक्षानुग्रह की नीति)।
3. आंतरिक घेरा (पड़ोसी राज्य):
क्षेत्र: असम, तटीय बंगाल, नेपाल और उत्तर-पश्चिम के कई गण/संघ।
नीति: ये शासक समुद्रगुप्त के लिए उपहार लाते थे, उनके आदेशों का पालन करते थे और दरबार में उपस्थित होते थे।
4. बाहरी इलाके के शासक:
क्षेत्र: संभवतः कुषाण और शक वंश के वंशज और श्रीलंका के शासक।
नीति: इन्होंने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की और अपनी पुत्रियों का विवाह उनसे किया।
समुद्रगुप्त के अन्य गुण
सिक्कों पर उन्हें वीणा बजाते हुए दिखाया गया है, जो उनके संगीत प्रेम को दर्शाता है।
उन्हें 'कविराज' की उपाधि भी दी गई थी।
वे एक विद्वान और योद्धा दोनों थे। उनके शरीर पर युद्ध के घावों के निशान उनकी वीरता का प्रतीक माने जाते थे।
3. गुप्त वंश की वंशावली (Genealogy)
प्रशस्तियों में शासकों के पूर्वजों की सूची भी मिलती है।
गुप्त वंश के संस्थापक: श्रीगुप्त (महाराज)।
घटोत्कच: श्रीगुप्त के पुत्र (महाराज)।
चंद्रगुप्त प्रथम:
ये घटोत्कच के पुत्र थे।
इन्होंने सबसे पहले 'महाराजाधिराज' जैसी बड़ी उपाधि धारण की।
इनका विवाह लिच्छवि गण की राजकुमारी कुमारदेवी से हुआ था।
समुद्रगुप्त ने भी 'महाराजाधिराज' की उपाधि का प्रयोग किया।
समुद्रगुप्त: चंद्रगुप्त प्रथम के पुत्र।
चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य):
ये समुद्रगुप्त के पुत्र थे।
इन्होंने शकों को हराकर 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की।
इन्होंने अपनी राजधानी उज्जैन को बनाया।
इनका दरबार विद्वानों से भरा था, जिसमें प्रसिद्ध कवि कालिदास और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट शामिल थे।
4. हर्षवर्धन और हर्षचरित
गुप्त वंश के पतन के बाद, लगभग 1400 साल पहले हर्षवर्धन ने शासन किया। उनके बारे में जानकारी हमें उनकी जीवनी और चीनी यात्रियों के विवरण से मिलती है।
राजधानी: कन्नौज।
जीवनी (हर्षचरित): उनके दरबारी कवि बाणभट्ट ने संस्कृत में उनकी जीवनी 'हर्षचरित' लिखी। इसमें हर्ष की वंशावली और उनके राजा बनने तक का वर्णन है।
चीनी यात्री: श्वेन त्सांग (ह्वेनसांग) हर्ष के दरबार में काफी समय तक रहे और उन्होंने वहां जो कुछ देखा उसका विस्तृत विवरण दिया।
हर्ष का अभियान
हर्ष अपने पिता के सबसे बड़े बेटे नहीं थे, लेकिन अपने पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद वे थानेसर के राजा बने।
उनके बहनोई कन्नौज के शासक थे, जिनकी बंगाल के शासक ने हत्या कर दी थी।
हर्ष ने कन्नौज को अपने अधीन कर लिया और बंगाल पर आक्रमण किया।
सफलता: उन्होंने मगध और बंगाल को जीतकर पूर्व में बड़ी सफलता हासिल की।
नर्मदा का युद्ध: जब उन्होंने नर्मदा नदी पार करके दक्कन (दक्षिण) की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने उन्हें रोक दिया। यह हर्ष की एकमात्र बड़ी पराजय थी।
5. दक्षिण भारत के राज्य: पल्लव और चालुक्य
इस काल में दक्षिण भारत में दो प्रमुख राजवंश उभरे - पल्लव और चालुक्य।
पल्लव वंश
विस्तार: उनका राज्य उनकी राजधानी कांचीपुरम से लेकर कावेरी नदी के डेल्टा तक फैला था।
महत्व: वे कला और वास्तुकला (मंदिर निर्माण) के लिए प्रसिद्ध थे।
चालुक्य वंश
विस्तार: इनका राज्य कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था (रायचूर दोआब)।
राजधानी: ऐहोल इनकी पहली राजधानी थी।
व्यापारिक केंद्र: ऐहोल एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था और बाद में एक धार्मिक केंद्र बन गया जहाँ कई मंदिर बने।
पुलकेशिन द्वितीय:
वे सबसे प्रसिद्ध चालुक्य राजा थे।
उनके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित प्रशस्ति से उनके बारे में जानकारी मिलती है।
प्रशस्ति के अनुसार, उन्होंने पूर्व और पश्चिम दोनों समुद्र तटों पर अपने अभियान चलाए।
उन्होंने हर्ष को आगे बढ़ने से रोका। रविकीर्ति ने शब्दों के खेल से लिखा है: "हर्ष अब हर्ष (आनंद) नहीं रहा।"
उन्होंने पल्लव राजा पर भी आक्रमण किया, जिसे कांचीपुरम की दीवारों के पीछे शरण लेनी पड़ी।
संघर्ष और अंत
पल्लव और चालुक्य एक-दूसरे के क्षेत्रों पर, विशेषकर राजधानियों पर (जो समृद्ध नगर थे), अक्सर आक्रमण करते थे।
अंततः राष्ट्रकूट और चोल वंशों ने इन दोनों राजवंशों को समाप्त कर दिया।
6. राज्यों का प्रशासन (Administration)
गुप्त और अन्य राजाओं ने प्रशासन में कुछ नई नीतियां अपनाईं। इनका मुख्य उद्देश्य शक्तिशाली लोगों (आर्थिक, सामाजिक या सैन्य रूप से) का समर्थन हासिल करना था।
प्रशासनिक महत्वपूर्ण पद
आनुवंशिक पद: कुछ महत्वपूर्ण पद पिता से पुत्र को मिलते थे। उदाहरण के लिए, कवि हरिषेण अपने पिता की तरह 'महादंडनायक' (मुख्य न्याय अधिकारी) थे।
एक व्यक्ति, कई पद: कभी-कभी एक ही व्यक्ति के पास कई पद होते थे। हरिषेण एक महादंडनायक होने के साथ-साथ 'कुमार-अमात्य' (महत्वपूर्ण मंत्री) और 'संधि-विग्रहिक' (युद्ध और शांति का मंत्री) भी थे।
स्थानीय प्रशासन में प्रभाव: नगर के प्रशासन में प्रभावशाली व्यक्तियों का बोलबाला था:
नगर-श्रेष्ठी: मुख्य बैंकर या शहर का व्यापारी।
सार्थवाह: व्यापारियों के काफिले का नेता।
प्रथम-कुलिक: मुख्य शिल्पकार।
कायस्थ: लिपिकों (लिखने वालों) का प्रधान।
नुकसान: ये नीतियां कुछ समय के लिए प्रभावी थीं, लेकिन बाद में ये शक्तिशाली लोग इतने मजबूत हो जाते थे कि वे अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लेते थे।
सेना
राजा एक सुसंगठित सेना रखते थे (हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सिपाही)।
सामंत: इनके अलावा कुछ सेनानायक होते थे जो आवश्यकता पड़ने पर राजा को सैनिक सहायता देते थे।
इन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता था।
बदले में इन्हें भूमिदान दिया जाता था।
इस भूमि से वे कर वसूलते थे और उससे सेना तथा घोड़ों की देखभाल करते थे।
इन्हें 'सामंत' कहा जाता था। जब राजा कमजोर होते थे, तो सामंत स्वतंत्र होने का प्रयास करते थे।
7. दक्षिण के राज्यों में सभाएँ (Assemblies)
पल्लवों के अभिलेखों में स्थानीय सभाओं की बहुत चर्चा मिलती है। ये सभाएँ दक्षिण भारत के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
1. सभा (Sabha):
यह ब्राह्मण भूस्वामियों का संगठन थी।
यह उप-समितियों के माध्यम से कार्य करती थी।
कार्य: सिंचाई, खेती-बाड़ी, सड़क निर्माण, और मंदिरों की देखरेख।
2. उर (Ur):
यह उन ग्रामों की सभा थी जहाँ के भूस्वामी ब्राह्मण नहीं थे।
3. नगरम (Nagaram):
यह व्यापारियों के एक संगठन का नाम था।
नोट: इन सभाओं पर धनी और शक्तिशाली भूस्वामियों और व्यापारियों का नियंत्रण होता था। ये स्थानीय व्यवस्थाएं सदियों तक काम करती रहीं।
8. आम लोग और उनका जीवन
राजाओं और अभिजात वर्ग के अलावा आम लोगों के जीवन की झलक हमें नाटकों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से मिलती है।
कालिदास और उनके नाटक
कालिदास अपने नाटकों में राजदरबार के जीवन के चित्रण के लिए प्रसिद्ध हैं।
भाषा का भेद: एक रोचक तथ्य यह है कि नाटकों में राजा और ब्राह्मणों को संस्कृत बोलते हुए दिखाया गया है, जबकि महिलाएं और अन्य आम लोग प्राकृत भाषा का प्रयोग करते हैं।
अभिज्ञान शाकुंतलम: यह उनका सबसे प्रसिद्ध नाटक है, जो राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी पर आधारित है।
इस नाटक में एक गरीब मछुआरे के साथ राजकर्मचारियों के दुर्व्यवहार की घटना यह दिखाती है कि पुलिस और अधिकारियों का रवैया आम जनता के प्रति कठोर हो सकता था।
चीनी तीर्थयात्रियों का विवरण
फा-शिएन (फाह्यान): इन्होंने अछूतों की स्थिति का वर्णन किया है।
इन्हें ऊंचे और शक्तिशाली लोग अछूत मानते थे।
इन्हें शहर के बाहर रहना पड़ता था।
जब वे शहर या बाजार में आते थे, तो उन्हें लकड़ी के टुकड़े पर चोट करके अपनी उपस्थिति जतानी पड़ती थी ताकि लोग उनसे दूर रहें और उन्हें छूकर 'अपवित्र' न हो जाएं।
बाणभट्ट की सेना का वर्णन:
जब राजा की सेना चलती थी, तो वह अपने पीछे धूल और शोर का गुबार छोड़ जाती थी।
ग्रामीणों को रसद और उपहार देने पड़ते थे, और अक्सर हाथियों द्वारा ग्रामीणों की झोपड़ियां कुचल दी जाती थीं।
बाणभट्ट लिखते हैं: "पूरी दुनिया धूल के गर्त में डूब जाती थी।"
9. अन्यत्र: अरब और इस्लाम (समकालीन घटनाक्रम)
जब भारत में ये साम्राज्य बन रहे थे, उसी समय (लगभग 1400 साल पहले) अरब में एक बड़ी घटना घटी।
पैगंबर मोहम्मद: इन्होंने अरब में इस्लाम धर्म की शुरुआत की।
शिक्षा: इस्लाम ने अल्लाह की सर्वोपरिता और समानता (भाईचारे) पर जोर दिया।
पवित्र ग्रंथ: कुरान।
अगले 100 सालों में इस्लाम उत्तरी अफ्रीका, स्पेन, ईरान और भारत तक फैल गया।
अरब नाविक जो भारत के पश्चिमी तट पर व्यापार करते थे, वे ही सबसे पहले इस धर्म को भारत लाए।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तिथियाँ (एक नज़र में):
गुप्त वंश की शुरुआत: लगभग 1700 साल पहले।
हर्षवर्धन का शासन: लगभग 1400 साल पहले।
पल्लव और चालुक्य: लगभग 1400-1500 साल पहले।
नए साम्राज्य और राज्य
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes