गणित शिक्षण में मूल्यांकन: एक व्यापक दृष्टिकोण
गणित शिक्षा में मूल्यांकन केवल छात्रों को अंक देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-2005) और कोठारी आयोग के अनुसार, मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है जो शिक्षक को यह जानने में मदद करती है कि शिक्षण उद्देश्य किस सीमा तक प्राप्त हुए हैं।
इस लेख में हम गणित में मूल्यांकन के अर्थ, उद्देश्य, CCE (सतत और व्यापक मूल्यांकन), अच्छे परीक्षण की विशेषताओं और विभिन्न मूल्यांकन तकनीकों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1. मूल्यांकन का अर्थ और अवधारणा (Concept of Evaluation)
मूल्यांकन (Evaluation) दो शब्दों से मिलकर बना है- 'मूल्य + अंकन', अर्थात किसी वस्तु या प्रक्रिया के मूल्य का निर्धारण करना। शिक्षा में, यह एक ऐसी तकनीकी प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम यह निर्धारित करते हैं कि बच्चे ने उद्देश्यों को किस हद तक प्राप्त किया है।
कोठारी आयोग के अनुसार: "मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है और शिक्षा की संपूर्ण प्रणाली का अभिन्न अंग है। यह शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ रूप से संबंधित है।"
क्विलेन और हन्ना के अनुसार: "छात्रों के व्यवहार में स्कूल द्वारा लाए गए परिवर्तनों के विषय में प्रमाणों को एकत्रित करना और उनकी व्याख्या करना ही मूल्यांकन है।"
मूल्यांकन प्रक्रिया त्रि-ध्रुवीय (Triangular Process) है जिसमें तीन प्रमुख घटक शामिल हैं:
शिक्षण उद्देश्य (Teaching Objectives)
अधिगम अनुभव (Learning Experiences)
मूल्यांकन (Evaluation)
2. मापन और मूल्यांकन में अंतर (Measurement vs Evaluation)
अक्सर मापन और मूल्यांकन को एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन इनमें सूक्ष्म अंतर है। मापन मूल्यांकन का ही एक हिस्सा है।
| आधार | मापन (Measurement) | मूल्यांकन (Evaluation) |
| प्रकृति | यह मात्रात्मक (Quantitative) होता है। (जैसे- अंक, प्रतिशत) | यह मात्रात्मक और गुणात्मक (Qualitative) दोनों होता है। |
| क्षेत्र | इसका क्षेत्र संकुचित और सीमित होता है। | इसका क्षेत्र व्यापक और विस्तृत होता है। |
| उद्देश्य | यह केवल 'कितना' (How much) का उत्तर देता है। | यह 'कितना अच्छा' (How good) का उत्तर देता है। |
| समय | यह एक निश्चित समय पर किया जाता है। | यह एक निरंतर चलने वाली (Continuous) प्रक्रिया है। |
| उदाहरण | गणित की परीक्षा में $80$ अंक प्राप्त करना। | $80$ अंक प्राप्त करना यह दर्शाता है कि छात्र की गणितीय समझ उत्तम है। |
3. गणित शिक्षण में मूल्यांकन के उद्देश्य
गणित में मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य केवल पास या फेल करना नहीं है, बल्कि छात्र की गणितीय सोच का विकास करना है।
पाठ्यक्रम में सुधार: प्रचलित शिक्षण विधियों और पाठ्यपुस्तकों की उपयोगिता की जाँच करना और उनमें आवश्यक संशोधन करना।
बालकों के व्यवहार परिवर्तन की जाँच: यह देखना कि छात्र ने ज्ञान, अवबोध और कौशल को किस सीमा तक ग्रहण किया है।
निदानात्मक कार्य (Diagnosis): छात्रों की अधिगम संबंधी कठिनाइयों और कमजोरियों (Learning Gaps) का पता लगाना।
उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching): कमजोरियों का पता लगाने के बाद उन्हें दूर करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण की योजना बनाना।
भविष्यवाणी करना: छात्र की वर्तमान प्रगति के आधार पर भविष्य की सफलता का अनुमान लगाना।
4. सतत और व्यापक मूल्यांकन (CCE - Continuous and Comprehensive Evaluation)
गणित में CCE का उद्देश्य बच्चों के तनाव को कम करना और उनके सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना है। इसमें दो प्रकार के मूल्यांकन शामिल हैं:
A. रचनात्मक/निर्माणात्मक मूल्यांकन (Formative Assessment - FA)
यह शिक्षण प्रक्रिया के दौरान किया जाता है।
इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को प्रतिपुष्टि (Feedback) देना और शिक्षण में सुधार करना है।
यह 'अधिगम के लिए आकलन' (Assessment for Learning) है।
इसमें प्रश्नोत्तरी, चर्चा, मौखिक प्रश्न, और गृहकार्य शामिल हैं।
यह उपचारात्मक शिक्षण का आधार बनता है।
B. योगात्मक/संकलनात्मक मूल्यांकन (Summative Assessment - SA)
यह सत्र या इकाई के अंत में किया जाता है।
इसका उद्देश्य छात्रों को ग्रेड देना या अगली कक्षा में प्रोन्नत करना है।
यह 'अधिगम का आकलन' (Assessment of Learning) है।
वार्षिक और अर्धवार्षिक परीक्षाएँ इसका उदाहरण हैं।
5. एक अच्छे परीक्षण/परीक्षा की विशेषताएँ
एक मानकीकृत (Standardized) गणितीय परीक्षण में निम्नलिखित तकनीकी गुण होने अनिवार्य हैं:
1. विश्वसनीयता (Reliability):
यदि एक ही परीक्षा को बार-बार आयोजित करने पर भी छात्र के अंक समान रहें, तो वह परीक्षा विश्वसनीय कहलाती है। यह अंकों की स्थिरता (Consistency) को दर्शाती है।
2. वैधता (Validity):
एक परीक्षण वैध तब कहलाता है जब वह उसी उद्देश्य का मापन करे जिसके लिए उसे बनाया गया है। उदाहरण के लिए, यदि प्रश्नपत्र गणित के कौशल का परीक्षण करने के लिए है, तो उसमें भाषा की क्लिष्टता के कारण छात्र के अंक नहीं कटने चाहिए।
3. वस्तुनिष्ठता (Objectivity):
परीक्षा परिणामों पर परीक्षक की व्यक्तिगत राय या मूड का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। सही उत्तर केवल एक होना चाहिए, चाहे कॉपी कोई भी जाँचे। (जैसे- बहुविकल्पीय प्रश्न)।
4. विभेदीकरण (Discrimination):
एक अच्छा परीक्षण प्रतिभाशाली, औसत और कमजोर छात्रों के बीच अंतर स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए।
5. कठिनाई स्तर (Difficulty Level):
प्रश्नपत्र न तो बहुत आसान होना चाहिए और न ही बहुत कठिन। कठिनाई स्तर ($D$) ज्ञात करने का सूत्र है:
जहाँ, $X$ = प्रश्न सही हल करने वाले छात्रों के औसत अंक, और $A$ = कुल निर्धारित अंक।
6. मूल्यांकन की प्रमुख प्रविधियाँ और उपकरण (Techniques and Tools)
गणित में छात्रों की उपलब्धि जाँचने के लिए विभिन्न उपकरणों का प्रयोग किया जाता है:
1. निरीक्षण/अवलोकन (Observation)
यह छोटे बच्चों के लिए सर्वोत्तम विधि है।
शिक्षक कक्षा में छात्रों को गणितीय गतिविधियाँ करते हुए देखते हैं।
इससे छात्रों की रुचि, अभिवृत्ति और समस्या समाधान के तरीके का पता चलता है।
2. साक्षात्कार (Interview)
यह मौखिक परीक्षा का एक रूप है।
इससे छात्र के विचारों की स्पष्टता और तार्किक शक्ति का पता चलता है।
3. पोर्टफोलियो (Portfolio)
यह एक निश्चित अवधि में छात्र द्वारा किए गए कार्यों का एक व्यवस्थित संग्रह (Collection) है।
इसमें वर्कशीट्स, प्रोजेक्ट्स, चित्रकला, और अन्य उपलब्धियाँ शामिल होती हैं।
यह छात्र की प्रगति का क्रमिक और संचयी रिकॉर्ड रखता है।
4. रूब्रिक्स (Rubrics)
यह मूल्यांकन के लिए एक स्कोरिंग गाइड है।
इसमें प्रदर्शन के विभिन्न स्तरों (जैसे- उत्कृष्ट, अच्छा, औसत) के लिए विशिष्ट मानदंड (Criteria) निर्धारित होते हैं।
5. उपाख्यानात्मक अभिलेख (Anecdotal Records)
इसमें शिक्षक छात्र के जीवन की किसी विशिष्ट घटना या व्यवहार का वर्णन करता है।
यह छात्र के व्यवहार पैटर्न को समझने में मदद करता है।
6. जाँच सूची (Checklist)
इसमें प्रश्नों या कथनों की एक सूची होती है जहाँ छात्र या शिक्षक को केवल 'हाँ' या 'नहीं' में उत्तर देना होता है।
7. गणित में प्रश्नों के प्रकार: मुक्त अंत vs बंद अंत
गणित में बच्चों की चिंतन प्रक्रिया को समझने के लिए प्रश्नों का सही चयन आवश्यक है।
A. मुक्त अंत वाले प्रश्न (Open-Ended Questions)
इन प्रश्नों के एक से अधिक सही उत्तर या समाधान की विधियाँ हो सकती हैं।
यह अपसारी चिंतन (Divergent Thinking) और सृजनात्मकता को बढ़ावा देते हैं।
उदाहरण:
"ऐसी दो संख्याएँ बताओ जिनका योग $10$ हो।" (उत्तर: $5+5, 6+4, 1+9$ आदि हो सकते हैं)।
"एक आयत बनाओ जिसका क्षेत्रफल $24 \text{ cm}^2$ हो।"
B. बंद अंत वाले प्रश्न (Close-Ended Questions)
इनका केवल एक निश्चित सही उत्तर होता है।
यह अभिसारी चिंतन (Convergent Thinking) पर आधारित होते हैं।
उदाहरण:
"$6$ और $4$ का योग क्या है?" (उत्तर: केवल $10$ होगा)।
"वर्ग का क्षेत्रफल ज्ञात करो जिसकी भुजा $5$ सेमी है।"
8. निदानात्मक और उपचारात्मक शिक्षण
मूल्यांकन का चक्र तब तक पूरा नहीं होता जब तक छात्र की कमियों को दूर न किया जाए।
निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test):
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि बच्चा गणित में कहाँ और क्यों गलती कर रहा है।
यह अधिगम रिक्तियों (Learning Gaps) की पहचान करता है।
उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching):
निदान के बाद, उन कमियों को दूर करने के लिए जो विशेष शिक्षण दिया जाता है, उसे उपचारात्मक शिक्षण कहते हैं।
यह निदानात्मक परीक्षण के परिणामों पर आधारित होता है।
9. वेन हीले का ज्यामितीय चिंतन (Van Hiele Model of Geometric Thinking)
मूल्यांकन करते समय यह समझना जरूरी है कि बच्चा ज्यामिति के किस स्तर पर है। वेन हीले ने 5 स्तर बताए हैं:
स्तर 0 - चाक्षुषीकरण (Visualization): बच्चा आकृतियों को उनकी दिखावट के आधार पर पहचानता है (जैसे- समोसे को देखकर त्रिभुज कहना)।
स्तर 1 - विश्लेषण (Analysis): बच्चा आकृतियों के गुणों को समझना शुरू करता है (जैसे- आयत की आमने-सामने की भुजाएँ बराबर होती हैं)।
स्तर 2 - अनौपचारिक निगमन (Informal Deduction): आकृतियों के बीच संबंध समझना (जैसे- सभी वर्ग आयत होते हैं)।
स्तर 3 - औपचारिक निगमन (Formal Deduction): प्रमेयों (Theorems) को सिद्ध करना।
स्तर 4 - दृढ़ता (Rigour): अमूर्त गणितीय चिंतन।
10. पियाजे और गणितीय मूल्यांकन
जीन पियाजे के अनुसार बच्चों में गणितीय अवधारणाओं का विकास उम्र के साथ होता है:
संरक्षण (Conservation): पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष) में बच्चों में संरक्षण का अभाव होता है। वे यह नहीं समझ पाते कि भौतिक रूप बदलने पर भी मात्रा समान रहती है।
क्रमबद्धता और वर्गीकरण: मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) में बच्चे वस्तुओं को क्रम में लगाना और वर्गीकृत करना सीख जाते हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु: पियाजे के अनुसार, संख्या (Number) वस्तुओं के बीच बनाए गए दो प्रकार के संबंधों का संश्लेषण है: पंक्तिबद्धता (Seriation) और पदानुक्रम समावेशन (Hierarchical Inclusion)।
11. महत्वपूर्ण शब्दावली (Quick Revision)
Abacus (गिनतारा): स्थानीय मान (Place Value) और प्रारंभिक गणना सिखाने के लिए उपयोगी।
Geo-board (जियो-बोर्ड): ज्यामितीय आकृतियों (विशेषकर 2D) और उनके गुणों को समझाने के लिए। दृष्टिबाधित छात्रों के लिए बहुत उपयोगी।
Graph Paper: दशमलव संख्याओं के योग और गुणा (जैसे $0.2 \times 0.3$) को दर्शाने के लिए सर्वोत्तम।
Dienes Blocks: स्थानीय मान, जोड़, घटाव और भाग की संक्रियाओं को मूर्त रूप में समझाने के लिए।
Tessellation (चौपड़/टाइलिंग): आकृतियों द्वारा समतल को बिना खाली जगह छोड़े भरना।
निष्कर्ष और अध्यापक के लिए सुझाव
गणित में मूल्यांकन भयमुक्त होना चाहिए। अध्यापक को चाहिए कि वह:
बच्चों की त्रुटियों को अधिगम का हिस्सा माने, न कि असफलता।
गणितीय संचार (Mathematical Communication) को प्रोत्साहित करे।
केवल उत्तर पर ध्यान न देकर समस्या समाधान की प्रक्रिया (Process) का मूल्यांकन करे।
गणित शिक्षण में मूल्यांकन
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