भारतीय कपड़ा और विश्व बाजार: एक ऐतिहासिक परिचय
1750 के आसपास, भारत पूरी दुनिया में कपड़ा उत्पादन के क्षेत्र में सबसे आगे था। बंगाल कपड़ा बुनाई का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था। भारतीय कपड़े अपनी बारीक गुणवत्ता और उत्कृष्ट कारीगरी के लिए पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया (जावा, सुमात्रा, पेनांग) तथा पश्चिमी और मध्य एशिया में प्रसिद्ध थे।
शब्दों में छिपा इतिहास: कपड़ों के नाम और उत्पत्ति
इतिहास में शब्दों का बहुत महत्व होता है क्योंकि वे हमें बताते हैं कि कोई वस्तु कहाँ से आई और उसका नामकरण कैसे हुआ। यूरोपीय व्यापारियों और भारतीय कपड़ों का संबंध निम्नलिखित शब्दों से समझा जा सकता है:
मसलिन (Muslin - मलमल): यूरोपीय व्यापारियों ने भारत से आया बारीक सूती कपड़ा सबसे पहले इराक के मोसुल शहर में अरब व्यापारियों के पास देखा था। इसी आधार पर वे हर बारीक बुनाई वाले कपड़े को 'मसलिन' कहने लगे। यह शब्द बाद में बहुत प्रचलित हो गया।
कैलिको (Calico): जब पुर्तगाली पहली बार भारत आए, तो वे मसालों की तलाश में केरल के कालीकट तट पर उतरे। वे यहाँ से मसालों के साथ-साथ सूती कपड़ा भी अपने साथ ले गए। कालीकट से निकले इस कपड़े को 'कैलिको' कहा जाने लगा। बाद में हर तरह के सूती कपड़े को कैलिको ही कहा जाने लगा।
छींट (Chintz): यह शब्द हिंदी के 'छींट' शब्द से निकला है। हमारे यहाँ छींट रंगीन फूल-पत्तियों वाले छोटे छापे के कपड़े को कहा जाता है। 1680 के दशक तक इंग्लैंड और यूरोप में भारतीय 'छींट' की जबरदस्त मांग थी। इंग्लैंड के रईस ही नहीं, बल्कि खुद महारानी भी भारतीय कपड़ों से बने परिधान पहनती थीं।
बंडाना (Bandanna): यह शब्द हिंदी के 'बांधना' शब्द से निकला है। इस श्रेणी में चटक रंगों वाले और छापेदार गुलूबंद (गले में पहनने वाले स्कार्फ) आते थे। इसे सिर या गले में बांधा जाता था।
जामदानी (Jamdani): यह एक तरह का बारीक मलमल होता है जिस पर करघे में सजावटी चिन्ह बुने जाते हैं। इसका रंग अक्सर सलेटी और सफेद होता था। इसमें आमतौर पर सूती और सोने के धागों का इस्तेमाल किया जाता था। बंगाल में ढाका और संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में लखनऊ जामदानी बुनाई के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र थे।
यूरोपीय बाजारों में भारतीय कपड़े का विरोध और कैलिको अधिनियम
18वीं सदी की शुरुआत तक, भारतीय कपड़े की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि इंग्लैंड के ऊन और रेशम निर्माता इससे परेशान हो गए थे। उन्होंने भारतीय कपड़ों के आयात का विरोध करना शुरू कर दिया।
कैलिको अधिनियम (1720): इंग्लैंड की सरकार ने दबाव में आकर 1720 में एक कानून पारित किया। इस कानून के तहत इंग्लैंड में भारतीय 'छींट' (Chintz) के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई। इस कानून को 'कैलिको अधिनियम' कहा गया।
तकनीकी प्रतिस्पर्धा: उस समय इंग्लैंड में कपड़ा उद्योग अभी शुरू ही हुआ था। वे भारतीय कपड़ों की बराबरी नहीं कर सकते थे, इसलिए वे अपने देश में भारतीय कपड़ों का आना बंद करके अपना बाजार सुरक्षित करना चाहते थे।
स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): कपड़ा उत्पादन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए 1764 में जॉन के (John Kay) ने 'स्पिनिंग जेनी' का आविष्कार किया। इससे एक ही मजदूर एक साथ कई तकलियों पर काम कर सकता था, जिससे सूत कातने की गति बढ़ गई।
वाष्प इंजन (Steam Engine): 1786 में रिचर्ड आर्कराइट ने वाष्प इंजन का आविष्कार किया। इसने सूती कपड़ा बुनाई में क्रांतिकारी बदलाव लाया। अब कपड़ा बहुत कम कीमत पर और भारी मात्रा में तैयार होने लगा।
भारतीय बुनकर और उनकी आजीविका
बुनकर आमतौर पर ऐसे समुदायों से आते थे जो पीढ़ियों से बुनाई का काम करते आ रहे थे। उनके कौशल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते थे। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बुनकर समुदायों के अलग-अलग नाम थे:
बंगाल: तांती
उत्तर भारत: जुलाहे या मोमिन
दक्षिण भारत: साले, कैक्कोलार और देवांग
बुनाई की प्रक्रिया:
कातना: यह काम ज्यादातर महिलाएं करती थीं। 'चरखा' और 'तकली' घर-घर में पाए जाते थे। धागे को चरखे पर कातकर तकली पर लपेटा जाता था।
रंगाई: रंगीन कपड़ा बनाने के लिए रंगरेज धागे को रंगते थे।
छपाई: छपाईदार कपड़ा बनाने के लिए बुनकरों को 'चिप्पीगर' नामक माहिर कारीगरों की मदद लेनी पड़ती थी, जो लकड़ी के ब्लॉकों (ठप्पों) से छपाई करते थे।
भारतीय कपड़ा उद्योग का पतन
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति और मशीनी उत्पादन ने भारतीय कपड़ा उद्योग को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
प्रतिस्पर्धा: अब भारतीय कपड़े को यूरोप और अमेरिका के बाजारों में ब्रिटिश उद्योगों में बने सस्ते कपड़ों से मुकाबला करना पड़ता था।
भारी शुल्क: ब्रिटेन ने भारत से आने वाले कपड़े पर भारी सीमा शुल्क (Tax) लगा दिया, जिससे इंग्लैंड में भारतीय कपड़ा बेचना मुश्किल हो गया।
बाजार का हाथ से जाना: 19वीं सदी की शुरुआत तक, ब्रिटेन के सूती कपड़े ने अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के बाजारों से भारतीय कपड़े को बाहर कर दिया।
भारत में ब्रिटिश कपड़े की बाढ़: 1830 के दशक तक भारतीय बाजार ब्रिटिश सूती कपड़ों से भर गए। 1880 के दशक तक स्थिति यह हो गई थी कि भारत के लोग जितना सूती कपड़ा पहनते थे, उसमें से लगभग दो-तिहाई ब्रिटेन का बना होता था।
बुनकरों की दुर्दशा: इसका सबसे बुरा असर बंगाल के बुनकरों पर पड़ा। लाखों बुनकर और कातने वाली ग्रामीण महिलाएं बेरोजगार हो गईं। हालांकि, हथकरघा बुनाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई क्योंकि कुछ विशेष प्रकार की साड़ियाँ या जटिल बॉर्डर वाली बुनाई मशीनों पर नहीं हो सकती थी।
भारत में सूती कपड़ा मिलों का उदय
जब भारतीय हथकरघा उद्योग संकट में था, तब भारत में मशीनी मिलों की स्थापना शुरू हुई।
पहली सूती मिल: भारत में पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई (मुंबई) में स्थापित हुई। यह एक कताई मिल थी।
बंबई का महत्व: 19वीं सदी की शुरुआत से ही भारत से इंग्लैंड और चीन को कच्ची कपास का निर्यात बंबई बंदरगाह से होता था। बंबई पश्चिमी भारत की काली मिट्टी वाली उस पट्टी के बहुत पास था जहाँ कपास की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी।
अन्य मिलें:
अहमदाबाद में पहली मिल 1861 में खुली।
कानपुर में पहली मिल 1862 में खुली।
प्रारंभिक समस्याएं: शुरू में भारतीय कपड़ा मिलों को ब्रिटेन के सस्ते कपड़े से कड़ा मुकाबला करना पड़ा। औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय उद्योगों को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था (जैसे आयात शुल्क लगाकर), जो उस समय औद्योगीकरण के लिए जरूरी था।
टीपू सुल्तान की तलवार और वूल्ड्स स्टील (Wootz Steel)
भारतीय धातु कर्म की गुणवत्ता का अंदाजा टीपू सुल्तान की तलवार से लगाया जा सकता है। 1799 में अंग्रेजों से लड़ते हुए टीपू सुल्तान की मृत्यु हुई थी। उनकी तलवार आज भी इंग्लैंड के संग्रहालयों की बहुमूल्य संपत्ति है।
तलवार की विशेषताएं:
यह तलवार इतनी सख्त और पैनी थी कि वह दुश्मन के लौह कवच को भी आसानी से चीर सकती थी।
इस तलवार में यह गुण कार्बन की अधिक मात्रा वाली एक विशेष प्रकार की स्टील से पैदा हुआ था जिसे पूरे दक्षिण भारत में बनाया जाता था।
इस स्टील को 'वूल्ड्स' (Wootz) कहा जाता था। वूल्ड्स स्टील की तलवारों में पानी की लहरों जैसा पैनी धार वाला पैटर्न होता था। यह पैटर्न स्टील के भीतर कार्बन के बहुत छोटे क्रिस्टल जमने से बनता था।
शब्द की उत्पत्ति: 'वूल्ड्स' शब्द दक्षिण भारतीय भाषाओं के 'स्टील' शब्द का बिगड़ा हुआ अंग्रेजी रूप है।
कन्नड़: उक्कु
तेलुगु: हुक्कु
तमिल और मलयालम: उरुक्कु
फ्रांसिस बुकानन का विवरण: 1800 में फ्रांसिस बुकानन ने मैसूर की यात्रा की थी। उन्होंने वूल्ड्स स्टील बनाने की तकनीक का विस्तृत विवरण दिया है।
लोहे को काठकोयला (Charcoal) के साथ मिलाकर मिट्टी की छोटी-छोटी क्रूसिबल (बर्तनों) में रखा जाता था।
तापमान को नियंत्रित करके प्रगालक (Smelters) स्टील की सिल्लियां तैयार करते थे।
इन सिल्लियों का इस्तेमाल न केवल भारत में बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया में भी तलवारें बनाने के लिए किया जाता था।
माइकल फैराडे, जिन्होंने बिजली और चुंबकत्व का आविष्कार किया था, ने भारतीय वूल्ड्स स्टील की विशेषताओं का चार साल (1818-1822) तक अध्ययन किया था।
गांवों की भट्ठियां क्यों बुझ गईं? (लौह प्रगलन का पतन)
19वीं सदी के अंत तक आते-आते भारत में लोहा गलाने का हुनर खत्म होने लगा। इसके कई कारण थे:
वन कानून: औपनिवेशिक सरकार ने नए वन कानून लागू किए। लोगों के आरक्षित वनों में जाने पर पाबंदी लगा दी गई। लोहा गलाने वालों को भट्ठी के लिए काठकोयला (Charcoal) बनाने हेतु लकड़ी मिलना मुश्किल हो गया। साथ ही लौह अयस्क (Iron Ore) इकट्ठा करना भी गैरकानूनी हो गया।
भारी कर: कुछ क्षेत्रों में सरकार ने जंगलों में जाने की अनुमति दी, लेकिन इसके बदले में प्रगालकों को अपनी प्रत्येक भट्ठी के लिए वन विभाग को बहुत भारी कर चुकाना पड़ता था। इससे उनकी आय गिर गई।
ब्रिटेन से आयात: 19वीं सदी के अंत तक भारत में ब्रिटेन से लोहे और इस्पात का आयात होने लगा था। भारतीय लोहार अब बर्तन और औजार बनाने के लिए आयातित लोहे का इस्तेमाल करने लगे थे। इससे स्थानीय प्रगालकों द्वारा बनाए गए लोहे की मांग कम हो गई।
अगरिया समुदाय: मध्य भारत के अगरिया समुदाय के लोग लोहा गलाने की कला में निपुण थे। अकाल और वन कानूनों की सख्ती के कारण उन्हें अपना काम छोड़कर दूसरे काम धंधे तलाशने पड़े।
भारत में लोहे और इस्पात के कारखानों का उदय (TISCO)
1904 में जमशेदजी टाटा के सबसे बड़े बेटे दोराबजी टाटा और अमेरिकी भू-वैज्ञानिक चार्ल्स वेल्ड (Charles Weld) छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क के भंडारों की खोज कर रहे थे। वे भारत में एक आधुनिक लौह और इस्पात संयंत्र लगाना चाहते थे।
खोज और अगरिया समुदाय: काफी समय तक भटकने के बाद उन्हें कुछ लोग टोकरियों में लौह अयस्क ले जाते हुए मिले। ये 'अगरिया' समुदाय के लोग थे। जब उनसे पूछा गया कि वे अयस्क कहाँ से लाए हैं, तो उन्होंने दूर स्थित एक पहाड़ी की तरफ इशारा किया। वह 'रजहारा पहाड़ियाँ' (Rajhara Hills) थीं, जहाँ दुनिया का बेहतरीन लौह अयस्क भंडार था।
समस्या और समाधान: रजहारा पहाड़ियों के पास पानी का कोई स्रोत नहीं था, इसलिए वहां फैक्ट्री नहीं लगाई जा सकती थी। टाटा को भिलाई इस्पात संयंत्र (जो बाद में बना) के लिए अयस्क इन्हीं खदानों से मिला। लेकिन फैक्ट्री के लिए सही जगह की तलाश जारी रही।
साकची और सुवर्णरेखा नदी: अंततः, झारखंड में सुवर्णरेखा नदी के तट पर 'साकची' नामक स्थान को फैक्ट्री के लिए चुना गया। यहाँ पानी की उपलब्धता थी और यह रेलवे स्टेशन (कालीमाटी) के पास था।
जंगलों को साफ करके फैक्ट्री और एक औद्योगिक शहर बसाया गया, जिसे 'जमशेदपुर' नाम दिया गया।
यहाँ 'टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी' (टिस्को - TISCO) की स्थापना हुई।
1912 में टिस्को में स्टील का उत्पादन शुरू हुआ।
टिस्को: एक उचित समय पर शुरुआत
टिस्को की स्थापना एक बहुत ही भाग्यशाली समय पर हुई थी।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918): 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ। ब्रिटेन में बनने वाला इस्पात यूरोप में युद्ध की जरूरतों को पूरा करने में लग गया। इस कारण भारत में ब्रिटेन से आने वाले स्टील की मात्रा में भारी गिरावट आई।
रेलवे की मांग: भारतीय रेलवे को पटरियों के लिए स्टील की सख्त जरूरत थी। ब्रिटेन से आपूर्ति रुकने के कारण रेलवे ने टिस्को की ओर रुख किया।
शेल और गाड़ियां: युद्ध लंबा खिंचने पर टिस्को को युद्ध के लिए गोलों के खोल (Shells) और गाड़ियों के पहिए बनाने का काम भी दिया गया।
ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा कारखाना: 1919 तक स्थिति यह हो गई थी कि टिस्को में बनने वाले 90 प्रतिशत स्टील को औपनिवेशिक सरकार ही खरीद लेती थी। कुछ ही समय में टिस्को ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना बन गया।
निष्कर्ष: भारत में कपड़ा और लौह-इस्पात उद्योगों का विकास औपनिवेशिक शासन के दौरान हुआ, लेकिन दोनों के अनुभव अलग थे। जहाँ कपड़ा उद्योग को ब्रिटिश प्रतिस्पर्धा के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा, वहीं लौह उद्योग (विशेषकर टिस्को) को विश्व युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण पनपने और मजबूत होने का मौका मिला। प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय पूंजीपतियों को घरेलू बाजार पर कब्जा करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान किया।
बुनकर, लोहा और फैक्ट्री मालिक
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