देशी जनता को सभ्य बनाना

Sunil Sagare
0

 

1. ब्रिटिश शासन और शिक्षा का दृष्टिकोण

अंग्रेज भारत में केवल भू-क्षेत्र जीतने और राजस्व नियंत्रण के लिए नहीं आए थे। उनका मानना था कि उनका एक सांस्कृतिक मिशन भी है। वे खुद को 'सभ्य' मानते थे और उनका उद्देश्य 'देशी जनता' (भारतीयों) को 'सभ्य' बनाना था। इसके लिए उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति और शिक्षा को बदलने का प्रयास किया।

इस प्रक्रिया में अंग्रेजों के बीच दो मुख्य विचारधाराएं उभरीं:

  1. प्राच्यवादी (Orientalists)

  2. आंग्लवादी (Anglicists)


2. प्राच्यवाद की परंपरा (The Tradition of Orientalism)

प्राच्यवादी वे विद्वान थे जो एशिया की भाषा और संस्कृति का गहरा ज्ञान रखते थे और भारतीय प्राचीन परंपराओं के प्रति आदर का भाव रखते थे।

प्रमुख व्यक्तित्व:

  • विलियम जोन्स: 1783 में भारत आए। वे एक भाषाविद (Linguist) थे। उन्होंने ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच और अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया था। भारत आकर उन्होंने संस्कृत, फारसी और अरबी सीखी।

  • हेनरी थॉमस कोलब्रुक और नधैनियल हॉलहेड: ये भी भारतीय भाषाओं और कानूनों का अध्ययन कर रहे थे।

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल:

  • विलियम जोन्स ने कोलब्रुक और हॉलहेड के साथ मिलकर 1784 में 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल' का गठन किया।

  • उन्होंने एशियाटिक रिसर्चेज़ नामक शोध पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया।

प्राच्यवादियों की विचारधारा:

  • इनका मानना था कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में अपने वैभव के शिखर पर थी, लेकिन बाद में उसका पतन हो गया।

  • भारत को समझने के लिए प्राचीन पवित्र और कानूनी ग्रंथों (वेदों, उपनिषदों, स्मृति) को खोजना और समझना आवश्यक है।

  • शिक्षा का उद्देश्य केवल पश्चिमी ज्ञान देना नहीं, बल्कि भारतीयों को उनकी अपनी संस्कृति से पुनः परिचित कराना होना चाहिए।

  • वे चाहते थे कि शिक्षण का माध्यम संस्कृत और फारसी हो।

प्राच्यवादी संस्थान:

  • कलकत्ता मदरसा (1781): वारेन हेस्टिंग्स द्वारा स्थापित। उद्देश्य: अरबी, फारसी और इस्लामी कानून का अध्ययन।

  • बनारस हिंदू कॉलेज (1791): जोनाथन डंकन द्वारा स्थापित। उद्देश्य: प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की शिक्षा ताकि देश का शासन चलाने में मदद मिले।


3. 'पूर्व की जघन्य त्रुटियां' और आंग्लवादी आलोचना

19वीं सदी की शुरुआत से ही कई ब्रिटिश अधिकारियों ने प्राच्यवादियों की आलोचना शुरू कर दी। इन आलोचकों को आंग्लवादी कहा गया। इनका मानना था कि पूर्वी ज्ञान अवैज्ञानिक, अतार्किक और अंधविश्वास से भरा है।

प्रमुख आंग्लवादी विचारक:

1. जेम्स मिल (James Mill):

  • वे प्राच्यवादियों के सख्त विरोधी थे।

  • उनका तर्क था कि शिक्षा का लक्ष्य 'उपयोगी' और 'व्यावहारिक' होना चाहिए।

  • भारतीयों को काव्य या धार्मिक साहित्य पढ़ाने के बजाय पश्चिमी विज्ञान और तकनीकी शिक्षा दी जानी चाहिए।

2. थॉमस बैबिंगटन मैकाले (Thomas Babington Macaulay):

  • इन्होंने भारत को एक 'असभ्य देश' माना जिसे सभ्यता का पाठ पढ़ाना आवश्यक था।

  • मैकाले का प्रसिद्ध कथन: "एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का केवल एक खाना (Shelf) ही भारत और अरब के समूचे देशी साहित्य के बराबर है।"

  • उन्होंने तर्क दिया कि ब्रिटिश सरकार को प्राच्यवादी ज्ञान पर सरकारी पैसा बर्बाद नहीं करना चाहिए।

  • उन्होंने अंग्रेजी भाषा सिखाने पर जोर दिया ताकि भारतीय पश्चिमी विज्ञान, दर्शन और कानून को पढ़ सकें।


4. अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835)

मैकाले के विवरण पत्र (Minute) के आधार पर 1835 का अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम पारित किया गया।

मुख्य बिंदु:

  • शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाया गया।

  • उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया।

  • कलकत्ता मदरसा और बनारस संस्कृत कॉलेज जैसे प्राच्यवादी संस्थानों को हतोत्साहित किया गया। इन्हें "अंधेरे के मंदिर" कहा गया जो अपने आप क्षय हो रहे थे।

  • अब स्कूलों के लिए भी अंग्रेजी पाठ्यपुस्तकें छपने लगीं।


5. व्यवसाय के लिए शिक्षा: वुड का डिस्पैच (1854)

1854 में ईस्ट इंडिया कंपनी के लंदन स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने भारतीय गवर्नर-जनरल को शिक्षा के विषय पर एक नीति पत्र भेजा। इसे कंपनी के बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड के नाम पर वुड का डिस्पैच (Wood's Dispatch) कहा जाता है।

वुड डिस्पैच की विशेषताएं:

  • इसने प्राच्यवादी ज्ञान का खंडन किया और यूरोपीय शिक्षा के व्यावहारिक लाभों पर जोर दिया।

  • आर्थिक तर्क: यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों को व्यापार और वाणिज्य के विस्तार के महत्व को समझने में मदद मिलेगी। इससे देश के संसाधनों का विकास होगा।

  • नैतिक तर्क: इससे भारतीयों का नैतिक चरित्र सुधरेगा, वे अधिक सत्यवादी और ईमानदार बनेंगे, जिससे कंपनी को भरोसेमंद कर्मचारी मिलेंगे।

  • डिस्पैच में यह तर्क दिया गया कि पूर्व का साहित्य न तो रोजगार के लिए उपयुक्त है और न ही कर्तव्य की भावना जगा सकता है।

1854 के बाद के कदम:

  • सरकारी शिक्षा विभागों का गठन किया गया।

  • 1857 (सिपाही विद्रोह के वर्ष) में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।

  • स्कूली शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव का प्रयास किया गया।


6. स्थानीय पाठशालाओं का क्या हुआ? (एडम की रिपोर्ट)

1830 के दशक में स्कॉटलैंड के प्रचारक विलियम एडम ने बंगाल और बिहार के जिलों का दौरा किया। उन्हें कंपनी ने स्थानीय स्कूलों की प्रगति पर रिपोर्ट देने का कार्य सौंपा था।

एडम की रिपोर्ट के मुख्य तथ्य:

  • बंगाल और बिहार में 1 लाख से अधिक पाठशालाएं थीं।

  • ये छोटे केंद्र थे, जिनमें आमतौर पर 20 से अधिक छात्र नहीं होते थे, लेकिन कुल छात्रों की संख्या 20 लाख से भी ज्यादा थी।

  • ये पाठशालाएं संपन्न लोगों या स्थानीय समुदाय द्वारा चलाई जाती थीं।

लचीली शिक्षा प्रणाली:

  • कोई निश्चित फीस नहीं थी (अमीर से ज्यादा, गरीब से कम)।

  • कोई छपी हुई किताबें नहीं थीं।

  • स्कूल की कोई अलग इमारत नहीं होती थी (कभी मंदिर, कभी पेड़ के नीचे)।

  • बेंच या कुर्सियां नहीं होती थीं, ब्लैकबोर्ड नहीं थे।

  • अलग से कक्षाएं नहीं लगती थीं, हाजिरी नहीं ली जाती थी।

  • सालाना परीक्षा नहीं होती थी।

  • फसल कटाई के समय: पाठशालाएं बंद हो जाती थीं क्योंकि ग्रामीण बच्चे खेतों में काम करते थे। यह व्यवस्था स्थानीय आवश्यकताओं के अनुकूल थी।

नई दिनचर्या, नए नियम (1854 के बाद):

  • कंपनी ने पंडितों को सरकारी नौकरी दी और प्रत्येक पंडित को 4-5 स्कूलों की निगरानी का जिम्मा दिया।

  • पाठशालाओं में नियमित समय सारिणी लागू की गई।

  • बच्चों को नियमित रूप से स्कूल आना अनिवार्य किया गया।

  • अध्यापन पाठ्यपुस्तकों पर आधारित हो गया।

  • विद्यार्थियों की प्रगति मापने के लिए वार्षिक परीक्षा शुरू की गई।

  • नियमित शुल्क देना अनिवार्य किया गया।

  • जो पाठशालाएं इन नियमों को नहीं मानती थीं, उन्हें सरकारी अनुदान मिलना बंद हो गया।

  • इसका नकारात्मक प्रभाव: गरीब किसान के बच्चे अब स्कूल नहीं जा पाते थे क्योंकि कटाई के समय स्कूल जाना उनके लिए असंभव था।


7. राष्ट्रीय शिक्षा की कार्यसूची

केवल अंग्रेज ही नहीं, बल्कि कई भारतीय विचारक भी शिक्षा के बारे में सोच रहे थे। इनमें महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के विचार सबसे प्रमुख हैं।

A. महात्मा गांधी और 'नई तालीम'

महात्मा गांधी अंग्रेजी शिक्षा के घोर विरोधी थे। उनका कहना था कि "औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मस्तिष्क में हीनता का बोध पैदा कर दिया है।"

गांधी जी के मुख्य विचार:

  • पश्चिमी सभ्यता का विरोध: अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को अपनी संस्कृति से नफरत करना सिखाया है। वे इसे 'गुलामी की शिक्षा' मानते थे।

  • मातृभाषा पर जोर: शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं होनी चाहिए। अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को अपनी ही भूमि पर अजनबी बना दिया है।

  • साक्षरता ही शिक्षा नहीं है: केवल पढ़ना-लिखना जानना शिक्षा नहीं है।

  • हाथ का हुनर (Craft): शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति कोई हुनर सीखे। बच्चों को दस्तकारी (जैसे कताई, बुनाई) सिखाई जानी चाहिए ताकि वे उत्पादन प्रक्रिया को समझ सकें।

  • मस्तिष्क और आत्मा का विकास: शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना चाहिए।

B. टैगोर का 'शांतिनिकेतन'

रवींद्रनाथ टैगोर ने 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की।

टैगोर के विचार:

  • बचपन और स्वतंत्रता: स्कूल ऐसा होना चाहिए जहां बच्चा खुश रह सके, मुक्त और रचनाशील हो।

  • प्राकृतिक परिवेश: शिक्षा बंद दीवारों (कक्षाओं) के बजाय खुले आसमान और पेड़ों के नीचे दी जानी चाहिए।

  • सृजनात्मकता: कठोर अनुशासन और रटने की विद्या बच्चे की सृजनात्मकता को मार देती है।

  • शिक्षक को बच्चे को समझना चाहिए और उसमें जिज्ञासा जगानी चाहिए।


8. गांधी और टैगोर के विचारों में तुलना

यद्यपि दोनों शिक्षा के राष्ट्रीय स्वरूप के समर्थक थे, फिर भी उनके दृष्टिकोण में कुछ बुनियादी अंतर थे:

विशेषतामहात्मा गांधीरवींद्रनाथ टैगोर
पश्चिमी सभ्यतापूर्णतः आलोचक। मशीनों और प्रौद्योगिकी की पूजा के विरोधी।पश्चिमी और भारतीय ज्ञान का मिश्रण चाहते थे।
विज्ञान और तकनीकहस्तकला और पारंपरिक ज्ञान पर अधिक जोर।विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ कला, संगीत और नृत्य का मेल चाहते थे।
शिक्षण स्थानजीवन के व्यावहारिक अनुभवों के बीच।शांतिनिकेतन (प्रकृति की गोद में)।

महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Facts for Revision)

  • 1781: कलकत्ता मदरसा की स्थापना (वारेन हेस्टिंग्स)।

  • 1784: एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना (विलियम जोन्स)।

  • 1791: बनारस हिंदू कॉलेज की स्थापना (जोनाथन डंकन)।

  • 1835: अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (मैकाले के सुझाव पर)।

  • 1854: वुड का डिस्पैच (भारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा)।

  • 1857: कलकत्ता, मद्रास, बंबई विश्वविद्यालयों की स्थापना।

  • 1901: शांतिनिकेतन की शुरुआत (टैगोर)।

  • एडम की रिपोर्ट: बंगाल-बिहार की देशी पाठशालाओं पर।

  • प्राच्यवादी: जोन्स, कोलब्रुक (पूर्व के ज्ञान के समर्थक)।

  • आंग्लवादी: जेम्स मिल, मैकाले (पश्चिमी ज्ञान के समर्थक)।


निष्कर्ष

अंग्रेजों ने शिक्षा का उपयोग औपनिवेशिक हितों को साधने और 'बाबू वर्ग' तैयार करने के लिए किया। वहीं, भारतीय राष्ट्रवादियों ने शिक्षा को आजादी और आत्म-सम्मान का हथियार बनाया। CTET परीक्षा के लिए इन तिथियों, व्यक्तियों और सिद्धांतों को याद रखना अत्यंत आवश्यक है।



देशी जनता को सभ्य बनाना

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

Time Left: 20:00

टिप्पणी पोस्ट करा

0 टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top