जनजातियाँ, खानाबदोश और समुदाय

Sunil Sagare
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परिचय: मुख्यधारा से अलग एक दुनिया

मध्यकाल में जब बड़े-बड़े साम्राज्यों का उत्थान और पतन हो रहा था, उसी समय भारतीय उपमहाद्वीप में एक और तरह का समाज विकसित हो रहा था जो ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए 'वर्ण नियमों' को नहीं मानता था। इन समाजों में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं था। इन्हें हम आज 'जनजातियाँ' (Tribes) कहते हैं। 


1. जनजातीय समाज की प्रमुख विशेषताएँ

जनजातीय समाज की संरचना मुख्यधारा के हिंदू समाज से काफी अलग थी। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं जो कथन-आधारित प्रश्नों (Statement based questions) के लिए महत्वपूर्ण हैं:

  • समानता का भाव: ये समाज  जाति व्यवस्था और सामाजिक नियमों का पालन नहीं करते थे। इसलिए इनमें समाज के वर्गों के बीच असमानता बहुत कम थी।

  • नातेदारी पर आधारित: समाज के सदस्य 'नातेदारी' (Kinship) के बंधनों से जुड़े होते थे।

  • जीविका के साधन: इनकी आजीविका मुख्य रूप से शिकार, भोजन संग्रह (Food gathering), खेती और पशुपालन पर निर्भर थी।

  • प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग: ये अपने निवास स्थान के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के लिए इन सभी गतिविधियों का मिला-जुला रूप अपनाते थे।

  • खानाबदोश जीवन: कुछ जनजातियाँ खानाबदोश (Nomadic) थीं, जो एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहती थीं।

  • संयुक्त नियंत्रण: जनजातीय समूह जमीन और चरागाहों पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखते थे और अपने खुद के बनाए नियमों के आधार पर परिवारों के बीच इनका बँटवारा करते थे।


2. जनजातीय लोग कौन थे? (क्षेत्रवार वितरण)

समकालीन इतिहासकारों और मुसाफिरों ने जनजातियों के बारे में बहुत कम जानकारी दी है क्योंकि ये लोग लिखित दस्तावेज नहीं रखते थे। ये अपने रीति-रिवाजों और वाचिक (मौखिक) परंपराओं का संरक्षण करते थे।

भारत के लगभग हर क्षेत्र में जनजातियों का प्रभाव था। परीक्षा के लिए निम्नलिखित सूची को याद रखना अनिवार्य है:

उत्तर-पश्चिमी भारत (पंजाब और सिंध)

  • खोखर (Khokhar): पंजाब में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान यह जनजाति बहुत प्रभावशाली थी।

  • गक्खर (Gakkhar): खोखरों के बाद गक्खर लोग ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए।

    • महत्वपूर्ण तथ्य: मुगल बादशाह अकबर ने गक्खर जनजाति के मुखिया कमाल खान गक्खर को 'मनसबदार' बनाया था।

  • लंगा और अर्घून: मुगलों द्वारा जीते जाने से पहले मुल्तान और सिंध में इन जनजातियों का प्रभुत्व था।

  • बलोच: यह उत्तर-पश्चिम की एक और विशाल और शक्तिशाली जनजाति थी। ये अलग-अलग मुखियों वाले कई छोटे-छोटे कुलों (Clans) में बंटे हुए थे।

पश्चिमी और मध्य भारत

  • गड्डी: पश्चिमी हिमालय में गडरियों (Shepherd) की जनजाति रहती थी।

  • भील: यह जनजाति पश्चिमी और मध्य भारत में फैली हुई थी। 16वीं सदी के अंत तक इनमें से कई एक जगह बसकर खेती करने लगे थे और कुछ जमींदार भी बन गए थे। हालांकि, कई भील कुल अभी भी शिकारी-संग्राहक थे।

  • कोली: गुजरात और महाराष्ट्र के कई इलाकों में कोली जनजाति का निवास था।

पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत

  • नागा, अहोम और अन्य: भारत के सुदूर उत्तर-पूर्वी भाग पर नागा, अहोम और कई दूसरी जनजातियों का पूरी तरह प्रभुत्व था।

  • चेर: मौजूदा बिहार और झारखंड के कई इलाकों में 12वीं सदी तक चेर सरदारों का उदय हो चुका था।

    • महत्वपूर्ण तथ्य: बादशाह अकबर के प्रसिद्ध सेनापति राजा मान सिंह ने 1591 में चेर लोगों पर हमला किया और उन्हें परास्त किया। उनसे काफी धन लूटा गया लेकिन वे पूरी तरह अधीन नहीं बनाए गए।

    • औरंगजेब के समय में मुगल सेनाओं ने चेर लोगों के कई किलों पर कब्जा किया और इस जनजाति को अपना अधीनस्थ बना लिया।

  • मुंडा और संथाल: यह उड़ीसा और बंगाल में रहने वाली महत्वपूर्ण जनजातियाँ थीं (जो बिहार-झारखंड क्षेत्र में भी पाई जाती हैं)।

दक्षिण भारत

  • दक्षिण भारत के कर्नाटक और महाराष्ट्र की पहाड़ियों में कोली, बेराद और अन्य कई जनजातियाँ रहती थीं।

  • कोरागा, वेतर, मारवार और दूसरी जनजातियों की विशाल आबादी दक्षिण भारत में फैली थी।


3. खानाबदोश और घुमंतू लोग: बंजारा समुदाय

खानाबदोश चरवाहे अपने जानवरों के साथ दूर-दूर तक घूमते थे। वे दूध, घी और अन्य पशु उत्पादों का विनिमय (Barter) खेतिहर गृहस्थों से अनाज, कपड़े और बर्तनों के लिए करते थे।

बंजारा (Banjara)

CTET में बंजारों पर सबसे अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं।

  • महत्व: बंजारे लोग सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे।

  • टांडा (Tanda): बंजारों के कारवां (Caravan) को 'टांडा' कहा जाता था।

  • अलाउद्दीन खिलजी का काल: सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी बंजारों का इस्तेमाल नगर के बाजारों तक अनाज की ढुलाई के लिए करता था।

  • जहांगीर के संस्मरण: बादशाह जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि बंजारे विभिन्न इलाकों से अपने बैलों पर अनाज ले जाकर शहरों में बेचते थे।

  • मुगल सेना की सहायता: सैन्य अभियानों के दौरान वे मुगल सेना के लिए खाद्यान्न ढोने का काम करते थे। एक विशाल टांडा में 1,00,000 तक बैल हो सकते थे।

अन्य घुमंतू जातियाँ

  • कई पशुचारी जनजातियाँ मवेशी और घोड़ों जैसे जानवरों को पालने और अमीर लोगों को बेचने का काम करती थीं।

  • छोटे-मोटे फेरीवाले भी एक गाँव से दूसरे गाँव घूमते थे।

  • नर्तक, गायक और तमाशबीन भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए घूमते थे।


4. बदलता समाज: नई जातियाँ और श्रेणियाँ

जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और समाज की ज़रूरतें बढ़ीं, नए हुनर वाले लोगों की आवश्यकता पड़ी। वर्णों के भीतर छोटी-छोटी जातियाँ उभरने लगीं।

  • शिल्पकार: सुनार, लोहार, बढ़ई और राजमिस्त्री को ब्राह्मणों द्वारा जातियों के रूप में मान्यता दी गई।

  • जाति vs वर्ण: अब समाज के संगठन का आधार 'वर्ण' की बजाय 'जाति' बन गया।

  • क्षत्रिय और राजपूत: 11वीं और 12वीं सदी तक क्षत्रियों के बीच नए राजपूत गोत्रों (जैसे- हुण, चंदेल, चालुक्य) की ताकत में काफी इजाफा हुआ। इन्होंने पुराने शासकों की जगह ली और एक शक्तिशाली राज्य व्यवस्था का निर्माण किया।

  • जनजातियों का एकीकरण: कई जनजातियाँ जाति-आधारित समाज में शामिल हो गईं, लेकिन कईयों (विशेषकर पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिम की) ने जाति व्यवस्था को नकार दिया और इस्लाम को अपनाया।


5. नज़दीक से एक नज़र: गोंड (The Gonds)

गोंड जनजाति भारत की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है। CTET में गोंड प्रशासन और रानी दुर्गावती पर प्रश्न आते हैं।

निवास और कृषि

  • गोंडवाना: ये लोग 'गोंडवाना' नामक विशाल वन प्रदेश में रहते थे।

  • स्थानांतरी कृषि (Shifting Cultivation): ये 'स्थानांतरी कृषि' करते थे। इसमें किसी वन प्रांत के पेड़ों और झाड़ियों को पहले काटा और जलाया जाता है, फिर उसकी राख में फसल बोई जाती है। जब जमीन की उर्वरता खत्म हो जाती है, तो वे दूसरी जगह चले जाते हैं।

प्रशासनिक संरचना (Administrative Structure)

अकबर नामा (अबुल फज़ल द्वारा रचित) में उल्लेख है कि गढ़ कटंगा के गोंड राज्य में 70,000 गाँव थे। इनकी प्रशासनिक व्यवस्था केंद्रीकृत थी:

  1. राज्य (Kingdom): राज्य 'गढ़ों' में विभाजित थे।

  2. गढ़ (Garh): हर गढ़ पर किसी खास गोंड कुल का नियंत्रण होता था।

  3. चौरासी (Chaurasi): गढ़ों को आगे 84 गाँवों की इकाइयों में बांटा गया था, जिन्हें 'चौरासी' कहा जाता था।

  4. बरहोत (Barhot): चौरासी का उप-विभाजन 'बरहोत' में होता था, जो 12-12 गाँवों को मिलाकर बनते थे।

सामाजिक परिवर्तन

  • गोंड सरदारों की चाहत थी कि उन्हें राजपूत माना जाए।

  • अमन दास से संग्राम शाह: गढ़ कटंगा के गोंड राजा अमन दास ने 'संग्राम शाह' की उपाधि धारण की।

  • विवाह संबंध: उनके पुत्र दलपत ने महोबा के चंदेल राजपूत राजा सालबाहन की पुत्री राजकुमारी दुर्गावती से विवाह किया।

रानी दुर्गावती और मुगलों से युद्ध

  • दलपत की मृत्यु कम उम्र में हो गई। रानी दुर्गावती बहुत योग्य थीं।

  • उन्होंने अपने 5 साल के बेटे बीर नारायण के नाम पर शासन की कमान संभाली।

  • 1565 का युद्ध: आसिफ खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने गढ़ कटंगा पर हमला किया। रानी दुर्गावती ने डटकर सामना किया।

  • परिणाम: अपनी हार को निश्चित देखकर उन्होंने आत्मसमर्पण करने की बजाय मर जाना बेहतर समझा। उनका बेटा भी लड़ते हुए मारा गया।

गढ़ कटंगा की समृद्धि

  • यह राज्य हाथियों को पकड़ने और दूसरे राज्यों में उनका निर्यात करने के व्यापार से बहुत धन कमाता था।

  • मुगलों ने जब इसे हराया, तो उन्हें बेशकीमती सिक्के और हाथी हाथ लगे।

  • मुगलों ने राज्य का एक भाग अपने कब्जे में ले लिया और शेष बीर नारायण के चाचा चंद्र शाह को दे दिया।


6. नज़दीक से एक नज़र: अहोम (The Ahoms)

अहोम जनजाति का इतिहास उत्तर-पूर्वी भारत (असम) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उत्पत्ति और विस्तार

  • प्रवास: अहोम लोग मौजूदा म्यांमार से आकर 13वीं सदी में ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे।

  • भुइयां (Bhuiyans): उन्होंने 'भुइयां' (भूस्वामी) लोगों की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था का दमन करके नए राज्य का निर्माण किया।

  • साम्राज्य विस्तार: 16वीं सदी के दौरान उन्होंने चुटियों (1523) और कोच-हाजो (1581) के राज्यों को अपने में मिला लिया।

सैन्य तकनीक

  • अहोमों ने एक बड़ा राज्य बनाया और इसके लिए 1530 के दशक में ही आग्नेयास्त्रों (Firearms) का इस्तेमाल किया।

  • 1660 तक आते-आते वे उच्च स्तरीय बारूद और तोपों का निर्माण करने में सक्षम हो गए थे।

मुगलों से संघर्ष

  • 1662 का आक्रमण: मीर जुमला के नेतृत्व में मुगलों ने अहोम राज्य पर हमला किया।

  • अहोमों ने बहादुरी से मुकाबला किया लेकिन पराजित हुए।

  • नोट: उस क्षेत्र में मुगलों का प्रत्यक्ष नियंत्रण ज्यादा समय तक बना नहीं रह सका।

अहोम प्रशासनिक व्यवस्था: पाइक प्रणाली (Paik System)

अहोम राज्य 'बेगार' (Forced Labour) पर निर्भर था।

  • पाइक (Paiks): राज्य के लिए जिन लोगों से जबरन काम लिया जाता था, वे 'पाइक' कहलाते थे।

  • जनगणना: अहोम राज्य में एक जनगणना की गई थी। प्रत्येक गाँव को अपनी बारी आने पर निश्चित संख्या में पाइक भेजने होते थे।

  • जनसंख्या का स्थानांतरण: इसके लिए सघन आबादी वाले इलाकों से कम आबादी वाले इलाकों में लोगों को स्थानांतरित किया गया, जिससे अहोम कुल टूट गए।

  • खेल (Khel): 17वीं सदी का पूर्वार्द्ध पूरा होते-होते प्रशासन केंद्रीकृत हो गया। अहोम समाज कुलों में विभाजित था जिन्हें 'खेल' कहा जाता था। एक 'खेल' के नियंत्रण में प्रायः कई गाँव होते थे।

धर्म और संस्कृति

  • शुरुआत में अहोम लोग अपने जनजातीय देवताओं की उपासना करते थे।

  • 17वीं सदी में ब्राह्मणों के प्रभाव में बढ़ोतरी हुई। सिब सिंह (1714-1744) के काल में हिंदू धर्म प्रधान धर्म बन गया।

  • अहोम राजाओं ने हिंदू धर्म अपनाने के बाद भी अपनी पारंपरिक आस्थाओं को पूरी तरह नहीं छोड़ा।

साहित्य और कला

  • अहोम समाज बहुत परिष्कृत था। कवियों और विद्वानों को जमीन दान में दी जाती थी।

  • नाट्यकर्म को प्रोत्साहन दिया जाता था।

  • बुरंजी (Buranjis): यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति है। इन्हें पहले अहोम भाषा में और फिर असमिया भाषा में लिखा गया। यह इतिहास लेखन की एक परंपरा थी।


7. निष्कर्ष

मध्यकाल में जनजातीय समाज मुख्यधारा के समाज से अलग होते हुए भी उसके साथ लगातार संपर्क में था। गोंड और अहोम जैसी जनजातियों ने बड़े राज्यों का निर्माण किया और जटिल प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अपनाईं। हालांकि, इससे उन्हें मुगलों जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संघर्ष भी करना पड़ा। बंजारों ने मध्यकालीन अर्थव्यवस्था और व्यापार में एक सेतु का काम किया। यह काल सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण दौर था।



जनजातियाँ, खानाबदोश और समुदाय

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

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