1. मध्यकालीन नगरों का वर्गीकरण
मध्यकाल में नगरों का विकास अलग-अलग कार्यों के आधार पर हुआ। एक ही नगर एक साथ कई भूमिकाएँ निभा सकता था। मुख्य रूप से नगरों को तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है:
प्रशासनिक नगर (Administrative Centres): जहाँ राजा और उनका दरबार स्थित होता था (जैसे: चोलों की राजधानी तंजावुर)।
मंदिर नगर और तीर्थ केंद्र (Temple Towns): जो धर्म और पूजा-पाठ के कारण विकसित हुए।
वाणिज्यिक और शिल्प नगर: जहाँ व्यापार और कारीगरी मुख्य गतिविधियाँ थीं।
2. तंजावुर: एक प्रशासनिक केंद्र (केस स्टडी)
तंजावुर चोल राजवंश की राजधानी थी और यह प्रशासनिक नगर का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
भौगोलिक स्थिति: यह नगर कावेरी नदी के तट पर स्थित था। यह नदी वर्ष भर बहती थी, जिससे जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती थी।
प्रमुख मंदिर: यहाँ का प्रसिद्ध राजराजेश्वर मंदिर स्थित है।
निर्माणकर्ता: राजा राजराज चोल।
वास्तुकार (Architect): कुंजरमल्लन राजराज पेरुंथच्चन। (इनका नाम मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण है, जो वास्तुकला पर उनके गर्व को दर्शाता है)।
विशेषता: मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। यह उस समय के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक था।
नगरीय व्यवस्था:
नगर में अनेक राजमहल और मंडप बने हुए थे।
राजा इन मंडपों में अपना दरबार लगाते थे और वहीं से मातहतों के लिए आदेश जारी करते थे।
नगर में सैन्य शिविर (बैरेक) भी बने हुए थे।
आर्थिक गतिविधियाँ:
मंदिरों के उत्सवों के लिए, राजा और सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनाज, मसाले, कपड़े और आभूषणों का व्यापार होता था।
सलिया (Saliyar) समुदाय: तंजावुर और उसके निकटवर्ती नगर उरैयूर के सलिया बुनकर मंदिर के उत्सवों के लिए झंडे, और राजाओं/अभिजात वर्ग के लिए बढ़िया सूती वस्त्र व जनसाधारण के लिए मोटा सूती वस्त्र तैयार करते थे।
स्वामीमलाई: यहाँ के स्थपति (मूर्तिकार) उत्तम कांस्य मूर्तियाँ और लंबे-चौड़े दीपदान बनाने के लिए प्रसिद्ध थे।
3. लुप्त मोम तकनीक (Lost Wax Technique) - महत्वपूर्ण
चोल काल की कांस्य मूर्तियाँ (Bronze Idols) विश्व प्रसिद्ध हैं। इनके निर्माण में 'लुप्त मोम तकनीक' का प्रयोग होता था। यह प्रक्रिया CTET के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रक्रिया के चरण:
सबसे पहले मोम की एक प्रतिमा बनाई जाती थी।
इसे चिकनी मिट्टी से पूरी तरह लीप कर सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था।
सूखने पर, मिट्टी के लेप में एक छोटा सा छेद किया जाता था।
प्रतिमा को आग में गर्म किया जाता था, जिससे मोम पिघलकर छेद के रास्ते बाहर निकल जाता था (इसीलिए इसे 'लुप्त मोम' कहते हैं)।
बचे हुए खाली मिट्टी के साँचे में उसी छेद के रास्ते पिघली हुई धातु (कांसा) भर दी जाती थी।
धातु के ठंडे और ठोस होने पर मिट्टी के आवरण को सावधानी से हटा दिया जाता था।
अंत में, मूर्ति को साफ करके चमकाया जाता था।
कांसा (Bronze): यह तांबा (Copper) और रांगा/टिन (Tin) के मेल से बनी एक मिश्र धातु है।
घंटा धातु (Bell Metal): इसमें रांगे का अनुपात किसी भी अन्य कांस्य से अधिक होता है, जिससे चोट करने पर गूंजने वाली ध्वनि उत्पन्न होती है।
4. मंदिर नगर और नगरीकरण
मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि वे अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र भी थे। इसे 'नगरीकरण' (Urbanization) की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।
मंदिर नगर क्यों विकसित हुए?
शासक देवी-देवताओं के प्रति भक्ति भाव दर्शाने के लिए मंदिर बनवाते थे।
वे मंदिरों को भूमि और धन अनुदान में देते थे।
तीर्थयात्री और भक्त भी मंदिरों में दान-दक्षिणा देते थे।
मंदिरों का धन: मंदिर के पुजारी इस धन का प्रयोग व्यापार और साहूकारी (Banking) में करते थे।
धीरे-धीरे मंदिर के आसपास पुरोहित, पुजारी, कामगार, शिल्पी, व्यापारी आदि बसने लगे, जिससे एक नगर का रूप बन गया।
प्रमुख मंदिर नगरों के उदाहरण:
भीलस्वामिन (विदिशा): मध्य प्रदेश।
सोमनाथ: गुजरात।
कांचीपुरम और मदुरै: तमिलनाडु।
तिलुपति: आंध्र प्रदेश।
तीर्थ केंद्र जो नगर बन गए:
वृंदावन: उत्तर प्रदेश।
तिरुवण्णामलई: तमिलनाडु।
अजमेर (राजस्थान): यह 12वीं सदी में चौहान राजाओं की राजधानी था और बाद में मुगलों के अधीन सूबा मुख्यालय बना।
यहाँ प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है (12वीं सदी में यहाँ बसे), जो सभी धर्मों के लोगों को आकर्षित करती है।
अजमेर के पास ही पुष्कर सरोवर है, जहाँ प्राचीन काल से तीर्थयात्री आते रहे हैं।
5. छोटे नगरों का संजाल
8वीं शताब्दी से उपमहाद्वीप में छोटे-छोटे नगरों का जाल बिछने लगा। इनका विकास संभवतः बड़े गाँवों से हुआ था।
मंडपिका (मंडी): जहाँ आसपास के गाँव वाले अपनी उपज बेचने आते थे। इसे बाद में 'मंडी' कहा जाने लगा।
हट्ट (हाट): यह बाजार वाली गलियाँ थीं जहाँ दुकानें होती थीं। इसे बाद में 'हाट' कहा गया।
शिल्पकार: कुम्हार, तेलिया, शक्कर बनाने वाले, ताड़ी बनाने वाले, लोहार और पत्थर तोड़ने वालों के अलग-अलग मोहल्ले होते थे।
सामंत और कर (Tax):
जमींदार या सामंत इन नगरों में किलेबंदी कर महल बना लेते थे।
वे व्यापारियों, शिल्पकारों और वस्तुओं पर कर लगाते थे।
कभी-कभी वे कर वसूलने का अधिकार स्थानीय मंदिरों को प्रदान कर देते थे।
इन अधिकारों का उल्लेख 10वीं शताब्दी के राजस्थान के अभिलेखों में मिलता है।
6. बड़े और छोटे व्यापारी
व्यापार स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ था।
बंजारे: यह एक विशेष व्यापारी समूह था जो एक जगह से दूसरी जगह सामान पहुँचाते थे।
घोड़ों का व्यापार: घोड़ों के व्यापारी अपने संघ बनाते थे। मुखिया उनकी ओर से घोड़ों को खरीदने के इच्छुक योद्धाओं से बातचीत करता था।
व्यापारी संघ (Guilds):
व्यापारी अक्सर काफिलों (Caravans) में यात्रा करते थे क्योंकि उन्हें घने जंगलों और लूटमार वाले रास्तों से गुजरना पड़ता था।
अपने हितों की रक्षा के लिए वे 'गिल्ड' या संघ बनाते थे।
दक्षिण भारत (8वीं सदी) के प्रसिद्ध संघ: मनिग्रामम और नानादेशी।
ये संघ दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ भी व्यापार करते थे।
प्रमुख समुदाय:
चेट्टियार और मारवाड़ी ओसवाल: ये आगे चलकर देश के प्रधान व्यापारी समूह बने।
गुजराती व्यापारी: इसमें हिंदू बनिया और मुस्लिम बोहरा शामिल थे। वे लाल सागर, फारस की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन से व्यापार करते थे।
निर्यात: कपड़े और मसाले।
आयात: अफ्रीका से सोना और हाथी दाँत; चीन से नीले मिट्टी के बर्तन और चांदी।
7. नगरों में शिल्प
भारत के शिल्पकार अपनी उत्कृष्ट कला के लिए विश्वविख्यात थे।
बीदर और बिदरी शिल्प: बीदर के शिल्पकार तांबे और चांदी में जड़ाऊ काम (Inlay work) के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि इस शिल्प का नाम ही 'बिदरी' पड़ गया।
पांचाल या विश्वकर्मा समुदाय: इसमें सुनार, कसरे, लोहार, राजमिस्त्री और बढ़ई शामिल थे। ये मंदिरों, महलों, तालाबों और जलाशयों के निर्माण के लिए आवश्यक थे।
बुनकर समुदाय: सालियार और कैक्कोलार जैसे बुनकर समुदाय अत्यंत समृद्ध हो गए थे। वे मंदिरों को भारी दान-दक्षिणा देते थे।
कपास को साफ करने, कातने और रंगने का काम स्वतंत्र व्यवसाय बन गया था।
8. हंपी: वास्तुकला और सौंदर्य (केस स्टडी)
हंपी विजयनगर साम्राज्य (स्थापना 1336) की राजधानी थी। यह कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों की घाटी में स्थित है।
किलेबंदी (Fortification):
हंपी की दीवारों के निर्माण में किसी भी तरह के गारे या चूने (Cementing agent) का प्रयोग नहीं किया गया था।
पत्थरों को आपस में फंसाकर (Interlocking) गूंथा गया था।
वास्तुकला:
शाही भवनों में भव्य मेहराब और गुंबद थे।
वहाँ स्तंभों वाले कई विशाल कक्ष थे, जिनमें मूर्तियों को रखने के लिए आले (Niches) बने थे।
बगीचे, कमल और टोडों की आकृतियों वाली मूर्तिकला के नमूने थे।
व्यापारिक महत्व:
15वीं-16वीं शताब्दी में हंपी वाणिज्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था।
यहाँ मूरों (मुस्लिम सौदागर), चेट्टियों और पुर्तगालियों जैसे यूरोपीय व्यापारियों के एजेंटों का जमघट लगा रहता था।
महानवमी उत्सव: आज जिसे हम नवरात्रि कहते हैं, वह हंपी में 'महानवमी' के रूप में मनाया जाता था। यह दक्षिण में सबसे महत्वपूर्ण पर्व था। पुरातत्वविदों को 'महानवमी मंच' मिला है जहाँ राजा अतिथियों का स्वागत करता था और कुश्ती/नृत्य देखता था।
पतन: 1565 में दक्कनी सुल्तानों (गोलकुंडा, बीजापुर, अहमदनगर, बरार और बीदर) के शासकों के हाथों विजयनगर की पराजय के बाद हंपी का विनाश हो गया।
9. सूरत: पश्चिम का प्रवेश द्वार (केस स्टडी)
मुगल काल में सूरत (गुजरात) व्यापार का सर्वप्रमुख केंद्र बन गया।
स्थिति: यह कैम्बे (खंभात की खाड़ी) और कुछ समय बाद अहमदाबाद के साथ-साथ व्यापार का मुख्य केंद्र बना।
प्रवेश द्वार: इसे 'मक्का का प्रस्थान द्वार' भी कहा जाता था क्योंकि बहुत से हज यात्री जहाज से यहीं से रवाना होते थे।
सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan): यहाँ सभी जातियों और धर्मों के लोग रहते थे। 17वीं सदी में यहाँ पुर्तगालियों, डच और अंग्रेजों के कारखाने और मालगोदाम थे।
वस्त्र उद्योग: सूरत अपने 'जरी' (सोने के गोटे) वाले वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था। इनका व्यापार पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक होता था।
हुंडी (Hundi): सूरत की हुंडियाँ दूर-दूर तक मान्य थीं (मिस्र में काहिरा, इराक में बसरा और बेल्जियम में एंटवर्प तक)।
हुंडी की परिभाषा: यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें एक व्यक्ति द्वारा जमा की गई रकम दर्ज रहती है। इसे कहीं और प्रस्तुत करके वह राशि प्राप्त की जा सकती है।
पतन (17वीं सदी के अंत में):
मुगल साम्राज्य के पतन के कारण बाजारों और उत्पादकता में कमी।
समुद्री मार्गों पर पुर्तगालियों का नियंत्रण।
बंबई (अब मुंबई) से प्रतिस्पर्धा, जहाँ 1668 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुख्यालय बनाया।
10. मसूलीपट्टनम: जोखिम भरा दौर (केस स्टडी)
मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम) नगर कृष्णा नदी के डेल्टा पर स्थित है। 17वीं शताब्दी में यह विभिन्न गतिविधियों का केंद्र था।
किलेबंदी: हॉलैंडवासियों (डच) ने यहाँ एक किला बनवाया था।
विवरण: अंग्रेज यात्री विलियम मेथवोल्ड (1620) ने इसे "छोटा, लेकिन घना बसा हुआ, बिना चारदीवारी का और खराब तरीके से बना नगर" बताया था।
गोलकुंडा का नियंत्रण:
गोलकुंडा के कुतुबशाही शासकों ने कपड़ों, मसालों और अन्य चीजों की बिक्री पर शाही एकाधिकार (Monopoly) लागू किया ताकि यह पूरी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में न चला जाए।
परिणामस्वरूप, गोलकुंडा के रईसों, तेलुगु कोमटी चेट्टियों और यूरोपीय व्यापारियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने नगर को समृद्ध बनाया।
मुगलों का आगमन: जब औरंगजेब ने गोलकुंडा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया (1686-87), तो यूरोपीय कंपनियों ने नए विकल्प तलाशे।
पतन: कंपनियाँ बंबई, कलकत्ता और मद्रास चली गईं, जिससे 18वीं सदी में मसूलीपट्टनम का वैभव खो गया।
11. नए नगर और व्यापारी (आधुनिक काल की ओर)
16वीं और 17वीं शताब्दी में यूरोपीय देश (अंग्रेज, डच, फ्रांसीसी) पूर्व में मसालों और कपड़ों की तलाश में आए।
प्रारंभिक चरण: मुल्ला अब्दुल गफूर और वीरजी वोरा जैसे भारतीय व्यापारियों ने, जिनके पास बड़ी संख्या में जहाज थे, शुरू में उनका मुकाबला किया।
यूरोपीय प्रभुत्व: यूरोपीय कंपनियों ने अपनी नौसैनिक शक्ति (Naval Power) का प्रयोग कर समुद्री व्यापार पर नियंत्रण कर लिया और भारतीय व्यापारियों को अपने एजेंट के रूप में काम करने पर मजबूर किया।
वस्त्र उद्योग में बदलाव:
कपड़ों की मांग बढ़ने से कताई, बुनाई, रंगाई आदि का विस्तार हुआ।
लेकिन शिल्पकारों की स्वतंत्रता घट गई। उन्हें 'पेशगी' (Advance) प्रणाली पर काम करना पड़ता था। यानी उन्हें वही कपड़ा बुनना होता था जिसका डिजाइन यूरोपीय एजेंट देते थे।
ब्लैक टाउन्स (Black Towns): 18वीं सदी में बंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे नगरों का उदय हुआ।
शिल्पकारों और व्यापारियों को इन नए नगरों में स्थापित 'ब्लैक टाउन्स' में सीमित कर दिया गया।
गोरे शासक (White Rulers) मद्रास में सेंट फोर्ट जॉर्ज और कलकत्ता में फोर्ट विलियम जैसी शानदार कोठियों में रहते थे।
12. वास्को द गामा और क्रिस्टोफर कोलंबस (खोज की यात्राएँ)
वास्को द गामा (पुर्तगाल):
वह अटलांटिक महासागर के पार यात्रा करते हुए, 'केप ऑफ गुड होप' (अफ्रीका का दक्षिणी छोर) से निकलकर हिंद महासागर पार करके 1498 में कालीकट (भारत) पहुँचा।
अगले साल वह पुर्तगाल लौटा। इस यात्रा में उसके 4 में से 2 जहाज नष्ट हो गए और 170 में से केवल 54 यात्री जीवित बचे।
उपलब्धि: उसने भारत के लिए समुद्री मार्ग खोल दिया।
क्रिस्टोफर कोलंबस (स्पेन):
वह भारत का मार्ग खोजने के लिए पश्चिम की ओर चला और अटलांटिक महासागर को पार करके 1492 में 'वेस्ट इंडीज' (तट) पर पहुँचा।
उसके पीछे स्पेन और पुर्तगाल के विजेता वहाँ आए और मध्य व दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया।
महत्वपूर्ण तथ्य (एक नज़र में)
काबुल: 16वीं सदी से राजनीतिक और वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण बना। यह रेशम मार्ग (Silk Route) से जुड़ा था। यहाँ घोड़ों का व्यापार मुख्य था (एक वर्ष में 30,000 रुपये तक का व्यापार होता था, जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी)। खजूर, कालीन, ताजे फल आदि भी यहाँ से लाए जाते थे।
अजमेर: यहाँ 'सर्वधर्म समभाव' का उदाहरण देखने को मिलता है।
बिदरी: बीदर के शिल्पकारों की तांबे-चांदी की जड़ाऊ कला।
गिल्ड: व्यापारियों का संघ जो उनके हितों की रक्षा करता था।
नगर, व्यापारी और शिल्पी
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