आश्रय (Shelter) पर्यावरण अध्ययन (EVS) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यह केवल "घर" तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जीव-जंतुओं के आवास, पक्षियों के घोंसले, मनुष्यों के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार बने घर और स्वच्छता जैसे पहलू भी शामिल हैं। CTET की परीक्षा में हर साल इस अध्याय से $2$ से $3$ प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
प्रस्तावना: आश्रय क्या है?
किसी भी जीव-जंतु का वह परिवेश या स्थान जहाँ वह निवास करता है, उसे उसका आश्रय या आवास कहते हैं। आवास जीव को न केवल रहने का स्थान प्रदान करता है, बल्कि उसे खराब मौसम (सर्दी, गर्मी, बारिश) और शत्रुओं से सुरक्षा भी प्रदान करता है।
यह वह स्थान है जहाँ जीव अपनी दैनिक क्रियाएँ करता है, भोजन प्राप्त करता है और अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाता है। आवास को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है:
स्थलीय आवास: जमीन पर रहने वाले जीवों का आवास (जैसे- वन, घास के मैदान, मरुस्थल, पर्वतीय क्षेत्र)।
जलीय आवास: जल में रहने वाले जीवों का आवास (जैसे- तालाब, झील, समुद्र)।
1. विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में मानव आवास (NCERT आधारित)
भारत एक विशाल देश है जहाँ की जलवायु और भौगोलिक स्थिति हर राज्य में अलग-अलग है। इसलिए, यहाँ के घरों की बनावट भी वहाँ की जलवायु, उपलब्ध सामग्री और लोगों की जीवनशैली पर निर्भर करती है। CTET के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण खंड है।
(क) असम के घर (बाँस के घर)
असम भारत का एक पूर्वोत्तर राज्य है जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है। यहाँ के घरों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
ऊँचाई: यहाँ घर जमीन से लगभग $10$ से $12$ फुट ($3$ से $3.5$ मीटर) की ऊँचाई पर बनाए जाते हैं।
निर्माण सामग्री: इन घरों को बनाने में मजबूत बाँस (Bamboo) के खंभों का उपयोग किया जाता है। बाँस को यहाँ 'हरा सोना' भी कहा जाता है।
कारण: जमीन से ऊपर उठाने का मुख्य कारण बाढ़ (Flood) और जहरीले कीड़े-मकोड़ों से सुरक्षा है।
आंतरिक संरचना: घर अंदर से भी लकड़ी के बने होते हैं।
छतें: यहाँ की छतें ढालू (Sloping) होती हैं ताकि बारिश का पानी आसानी से नीचे गिर सके और छत पर जमा न हो।
(ख) मनाली (हिमाचल प्रदेश) के घर
मनाली एक पहाड़ी इलाका है जहाँ बारिश के साथ-साथ बर्फबारी भी होती है।
सामग्री: यहाँ के मकान पत्थर और लकड़ी दोनों के उपयोग से बनाए जाते हैं।
छतें: घरों की छतें ढालू होती हैं, जिससे बर्फ पिघलकर नीचे गिर सके।
संरचना: यहाँ घर एक या दो मंजिल के हो सकते हैं। दीवारों पर मिट्टी या चूने की पुताई की जा सकती है।
(ग) लेह-लद्दाख के घर (शीत मरुस्थल)
लद्दाख एक ठंडा रेगिस्तान है जहाँ बारिश बहुत कम होती है। यहाँ के घरों की बनावट बहुत विशिष्ट होती है और परीक्षा में बार-बार पूछी जाती है:
मंजिलें: यहाँ के घर दो मंजिला होते हैं और पत्थरों को काटकर एक के ऊपर एक रखकर बनाए जाते हैं।
निचली मंजिल (Ground Floor): निचली मंजिल में कोई खिड़की नहीं होती। यह मंजिल जानवरों (जैसे याक, बकरी) को रखने और आवश्यक सामान (गोबर के उपले, लकड़ी) इकट्ठा करने के लिए उपयोग की जाती है। अत्यधिक ठंड के दिनों में परिवार भी नीचे की मंजिल पर शिफ्ट हो जाता है।
ऊपरी मंजिल: लोग (परिवार) पहली मंजिल पर रहते हैं।
छत (Roof): यहाँ की छतें समतल (Flat) होती हैं। यह घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। गर्मियों में लोग इन छतों का उपयोग लाल मिर्च, सीताफल, मक्का और धान आदि सुखाने के लिए करते हैं ताकि वे सर्दियों के लिए भोजन सुरक्षित रख सकें।
दीवार और फर्श: पत्थरों के ऊपर मिट्टी और चूने की मोटी परत चढ़ाई जाती है। फर्श और छतें लकड़ी की बनी होती हैं (लकड़ी के मोटे तने उपयोग में लाए जाते हैं) ताकि ठंड से बचा जा सके।
(घ) राजस्थान के घर (रेगिस्तानी आवास)
राजस्थान में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है और बारिश कम होती है। यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों के घरों की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
दीवारें: घरों की दीवारें बहुत मोटी मिट्टी की बनी होती हैं। मिट्टी की मोटी दीवारें बाहर की गर्मी को अंदर जाने से रोकती हैं, जिससे घर ठंडा रहता है।
छतें: घरों की छतें कटीली झाड़ियों (जैसे कीकर) से बनी होती हैं।
लिपाई-पुताई: दीवारों को सुंदर बनाने के लिए मिट्टी से लीपा जाता है। फर्श को गोबर से लीपा जाता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि गोबर से लीपने पर मिट्टी में कीड़े (Insects) नहीं लगते।
(ङ) कश्मीर के आवास
कश्मीर में पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए अलग-अलग प्रकार के आवास होते हैं:
हाउस बोट (House Boat): यह पर्यटकों के लिए होते हैं। ये डल झील और झेलम नदी में तैरते रहते हैं। इनकी लंबाई $80$ फुट तक और चौड़ाई $8-9$ फुट तक हो सकती है। इनकी छतों पर लकड़ी की सुंदर नक्काशी होती है जिसे 'खतमबंद' कहा जाता है। यह जिग-सॉ पहेली जैसी दिखती है।
डोंगा (Donga): यह स्थानीय लोगों का आवास है। यह भी पानी में तैरता हुआ घर है जिसमें अलग-अलग कमरे होते हैं। इसमें नक्काशी नहीं होती।
पत्थर के घर: कश्मीर के गाँवों में पत्थरों को काटकर, एक के ऊपर एक रखकर और मिट्टी से जोड़कर घर बनाए जाते हैं। इनमें लकड़ी का भी इस्तेमाल होता है। इन घरों की छतें ढलवाँ होती हैं। पुरानी खिड़कियाँ बाहर की ओर उभरी होती हैं, जिन्हें 'डब' कहा जाता है।
(च) इग्लू (Igloo)
यह बर्फीले क्षेत्रों (टूंड्रा प्रदेश) में एस्किमो शिकारियों का अस्थायी निवास है।
निर्माण: यह बर्फ के बड़े-बड़े ब्लॉकों को जोड़कर बनाया जाता है।
आकार: इसका आकार गुंबद जैसा होता है और प्रवेश द्वार बहुत छोटा होता है ताकि बर्फीली हवा अंदर न जा सके।
सिद्धांत: बर्फ की दीवारों के बीच मौजूद हवा उष्मारोधी (Insulator) का काम करती है, जो अंदर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है। अंदर जानवरों की खाल और फर का उपयोग गर्मी के लिए किया जाता है।
(छ) टेंट (Tent)
टेंट लोगों का अस्थायी निवास होता है।
सामान्य टेंट: शहरों में गरीब वर्ग प्लास्टिक का टेंट लगाते हैं। पर्वतारोही दो तह वाली प्लास्टिक शीट के टेंट इस्तेमाल करते हैं ताकि ठंड न लगे।
रेबो (Rebo): लद्दाख की चांगपा (Changpa) जनजाति याक (Yak) के बालों से पट्टियाँ बुनकर टेंट बनाती है, जिसे 'रेबो' कहते हैं। यह टेंट अत्यधिक ठंड से बचाता है।
2. जीव-जंतुओं के आश्रय
जानवरों का आवास उनके शारीरिक लक्षणों और वातावरण के अनुकूल होता है।
(क) स्थलीय आवास (Terrestrial Shelter)
घास स्थल: यहाँ वृक्ष घने और बड़े होते हैं। यहाँ रहने वाले जानवर (जैसे हिरण, जेबरा) तेज दौड़ने वाले होते हैं ताकि वे शिकारियों से बच सकें। इनका रंग भूरा होता है जो घास में छिपने में मदद करता है।
पर्वतीय आवास: यहाँ रहने वाले जानवरों (जैसे याक, भालू, पहाड़ी बकरी) की चमड़ी मोटी होती है और शरीर पर घने बाल होते हैं जो उन्हें ठंड से बचाते हैं। पहाड़ी बकरियों के खुर बहुत मजबूत होते हैं ताकि वे चट्टानों पर दौड़ सकें।
(ख) जलीय आवास (Aquatic Shelter)
समुद्र: यहाँ का जल लवणीय (खारा) होता है। मछलियों और अन्य जीवों का शरीर धारा-रेखीय (Streamlined) होता है ताकि वे पानी को काटते हुए आसानी से तैर सकें। वे श्वसन के लिए जल में घुलित ऑक्सीजन का उपयोग 'गिल्स' (Gills/गलफड़े) के माध्यम से करते हैं। (अपवाद: व्हेल और डॉल्फिन फेफड़ों से साँस लेती हैं और साँस लेने के लिए पानी की सतह पर आती हैं)।
तालाब और झील: यहाँ पाए जाने वाले पौधों की जड़ें मिट्टी में स्थिर रहती हैं, लेकिन तना लंबा, खोखला और हल्का होता है जो पानी की सतह तक आता है। पत्तियाँ रिबन जैसी या मोम की परत वाली होती हैं ताकि सड़ें नहीं।
महत्वपूर्ण जंतु और उनके घर (सूची)
| जीव (Animal) | आश्रय (Shelter) |
| शेर (Lion) | माँद (Den) |
| घोड़ा (Horse) | अस्तबल (Stable) |
| गधा (Donkey) | अस्तबल (Stable) |
| कुत्ता (Dog) | कुक्कुरशाला (Kennel) |
| गाय/बकरी | शेड/बाड़ा (Shed) |
| मुर्गी | दड़बा (Coop) |
| चूहा/साँप/खरगोश/चींटी | बिल (Burrow) |
| सुअर | शूकरशाला (Sty) |
| मकड़ी | जाला (Web) |
नोट:
रजत मछली (Silver fish): नाम में मछली है, लेकिन यह एक छोटा कीड़ा (Insect) है, यह पानी में नहीं रहता। यह अक्सर पुरानी किताबों में पाया जाता है।
उभयचर (Amphibians): जो जल और थल दोनों पर रह सकते हैं। उदाहरण: मेंढक, मगरमच्छ, साँप।
3. पक्षियों के घोंसले (Most Important for CTET)
पक्षी केवल अंडे देने के लिए घोंसले बनाते हैं। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और उड़ने लगते हैं, तो वे घोंसला छोड़ देते हैं। हर पक्षी का घोंसला बनाने का तरीका अलग होता है।
कौआ (Crow): यह पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर अपना घोंसला बनाता है। इसके घोंसले में लोहे के तार और लकड़ी की शाखाएँ जैसी कठोर चीजें भी पाई जाती हैं।
कोयल (Koel): यह बहुत चालाक पक्षी है। यह अपना घोंसला नहीं बनाती। यह कौए के घोंसले में चुपके से अंडे दे देती है। कौआ अपने अंडों के साथ कोयल के अंडों को भी सेता है।
कलचिड़ी (Indian Robin): यह पत्थरों के बीच खाली जगह में, जमीन पर अपना घोंसला बनाती है। घोंसला घास से बना होता है और उसके ऊपर नाजुक टहनी, जड़ें, ऊन, बाल और रुई बिछी होती है।
दर्जिन चिड़िया (Tailor Bird): जैसा नाम वैसा काम। यह अपनी नुकीली चोंच से दो पत्तों को आपस में सिलकर एक थैली जैसा बना लेती है और उसमें अंडे देती है।
जुलाही चिड़िया (Weaver Bird/Baya): इसमें नर पक्षी (Male) बहुत सुंदर-सुंदर घोंसले बुनता है। मादा पक्षी (Female) उन सभी घोंसलों को देखती है और जो उसे सबसे अच्छा लगता है, उसमें वह अंडे देती है। इसका घोंसला लालटेन की तरह टहनियों से लटका हुआ होता है।
फाख्ता (Dove): यह कैक्टस (नागफनी) के काँटों के बीच या मेहंदी की झाड़ में अपना घोंसला बनाता है।
गौरैया और कबूतर: ये आमतौर पर मनुष्यों के घरों में, अलमारी के ऊपर, आईने के पीछे या खंडहरों में घोंसला बनाते हैं।
बसंत गौरी (Barbet): यह गर्मियों में 'टुक-टुक' की आवाज करती है। यह पेड़ के तने में गहरा छेद करके उसमें अंडे देती है।
शकरखोरा (Sunbird): यह किसी छोटे पेड़ या झाड़ी की डाली पर लटकता हुआ घोंसला बनाता है। इसके घोंसले में बाल, घास, पतली टहनियाँ, सूखे पत्ते, कपड़ों के चिथड़े और यहाँ तक कि मकड़ी के जाले भी होते हैं।
उल्लू (Owl): यह पेड़ के किसी भी खोखले भाग का उपयोग अपने घोंसले के रूप में कर लेता है।
चील (Kite): यह सबसे ऊँचे पेड़ पर सबसे बड़ा घोंसला बनाती है (लगभग $4$ फीट चौड़ा)। चील साल-दर-साल उसी घोंसले का इस्तेमाल करती है।
4. कीटों का सामाजिक जीवन (Social Insects)
कुछ कीड़े समूह (Group) में रहते हैं और मिल-जुलकर काम करते हैं। इन्हें सामाजिक कीट कहते हैं।
मधुमक्खी (Honeybee): यह छत्ते में रहती है। हर छत्ते में एक रानी मक्खी होती है जो अंडे देती है। कुछ नर मक्खी होते हैं, और बाकी श्रमिक मक्खियाँ होती हैं जो रस ढूँढती हैं और छत्ता बनाती हैं।
चींटियाँ (Ants): इनका काम भी बँटा होता है। रानी चींटी अंडे देती है, सिपाही चींटियाँ बिल का ध्यान रखती हैं और मजदूर चींटियाँ भोजन ढूँढकर लाती हैं।
दीमक (Termites) और ततैया (Wasps): ये भी समूह में रहते हैं।
अपवाद: मकड़ी (Spider) समूह में नहीं रहती, यह अकेला रहना पसंद करती है।
5. आवास निर्माण को प्रभावित करने वाले कारक
किसी भी स्थान पर घर कैसा बनेगा, यह मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करता है:
स्थान की भौगोलिक स्थिति: घर पहाड़ पर है, मैदान में है या रेगिस्तान में।
जलवायु (Climate): वर्षा की मात्रा, तापमान और हवा की गति।
उपलब्ध निर्माण सामग्री: वहाँ आसानी से क्या मिलता है - पत्थर, बाँस, मिट्टी या बर्फ।
सामाजिक और आर्थिक स्थिति: व्यक्ति की आर्थिक क्षमता भी घर के आकार और मजबूती को तय करती है।
6. स्वच्छता और आवास
एक अच्छा आवास केवल दीवारों और छत से नहीं बनता, बल्कि उसकी स्वच्छता भी महत्वपूर्ण है।
कचरा प्रबंधन: घर से निकलने वाले कचरे को सही तरीके से निस्तारित करना चाहिए। गीले कचरे (सब्जी के छिलके आदि) से खाद बनाई जा सकती है, जबकि सूखे कचरे (प्लास्टिक, काँच) का पुनर्चक्रण (Recycle) किया जाना चाहिए।
स्वच्छ भारत अभियान: भारत सरकार द्वारा २ अक्टूबर २०१४ को गाँधी जयंती पर इस अभियान की शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य भारत को खुले में शौच से मुक्त (ODF) बनाना और कचरा प्रबंधन में सुधार करना है।
निष्कर्ष
आश्रय जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। बदलते परिवेश और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आज मनुष्यों और जीव-जंतुओं दोनों के आवास खतरे में हैं। एक शिक्षक के रूप में, यह आवश्यक है कि हम बच्चों को न केवल विभिन्न प्रकार के आवासों के बारे में पढ़ाएँ, बल्कि उन्हें पर्यावरण संरक्षण और पशु-पक्षियों के आवासों को सुरक्षित रखने के प्रति संवेदनशील भी बनाएँ।
आश्रय (Shelter)
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