पर्यावरण अध्ययन शिक्षण: प्रमुख चुनौतियाँ

Sunil Sagare
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 पर्यावरण अध्ययन एक एकीकृत विषय है, जिसमें विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और पर्यावरण शिक्षा के तत्व शामिल होते हैं। प्राथमिक स्तर पर इसका उद्देश्य बच्चों को उनके प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश से जोड़ना है। हालाँकि, इस विषय को पढ़ाते समय शिक्षकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएँ केवल संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बाल मनोविज्ञान, पाठ्यक्रम की संरचना और कक्षा प्रबंधन से भी जुड़ी हैं।


1. व्यक्तिगत विभिन्नताएँ (Individual Differences)

हर कक्षा में छात्र अलग-अलग पृष्ठभूमि और क्षमताओं के होते हैं। यह शिक्षण की सबसे बड़ी चुनौती है।

  • बौद्धिक स्तर: एक ही कक्षा में प्रतिभाशाली, औसत और धीमी गति से सीखने वाले छात्र होते हैं। शिक्षक के लिए ऐसी विधि चुनना मुश्किल होता है जो सभी के लिए प्रभावी हो।

  • रुचि में अंतर: कुछ बच्चों को विज्ञान (प्रयोग) में रुचि हो सकती है, जबकि अन्य को सामाजिक मुद्दों (कहानियों) में।

  • अधिगम शैली (Learning Style):

    • कुछ बच्चे देखकर (Visual) सीखते हैं।

    • कुछ सुनकर (Auditory) सीखते हैं।

    • कुछ करके (Kinesthetic) सीखते हैं।

  • चुनौती: एक निश्चित समय (जैसे $35-40$ मिनट) की कक्षा में सभी शैलियों को शामिल करना कठिन होता है।


2. पाठ्यक्रम संबंधी समस्याएँ (Curriculum Related Problems)

अक्सर पाठ्यक्रम बच्चों की वास्तविक मानसिक आयु के अनुरूप नहीं होता।

  • अमूर्त अवधारणाएँ (Abstract Concepts): प्राथमिक स्तर (कक्षा 3 से 5) के बच्चे 'मूर्त संक्रियात्मक अवस्था' (Concrete Operational Stage) में होते हैं। यदि पाठ्यक्रम में अमूर्त विषय (जैसे - ओजोन परत का क्षरण, जटिल रासायनिक चक्र) शामिल हों, तो बच्चे इसे समझ नहीं पाते।

  • भारी बस्ता और सूचनाओं का बोझ: NCF-2005 'शिक्षा बिना बोझ के' (Learning without Burden) की बात करता है, लेकिन व्यवहार में पाठ्यक्रम बहुत विस्तृत होता है।

  • लचीलेपन का अभाव: पाठ्यक्रम अक्सर कठोर होता है और इसमें स्थानीय परिवेश (Local Context) को शामिल करने की गुंजाइश कम होती है। उदाहरण के लिए, रेगिस्तान के बच्चे को 'धान की खेती' पढ़ाना बिना संदर्भ के मुश्किल है।


3. संसाधनों का अभाव (Lack of Resources)

पर्यावरण अध्ययन केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके लिए सहायक सामग्री की आवश्यकता होती है।

  • TLM (Teaching Learning Material) की कमी: प्रभावी शिक्षण के लिए ग्लोब, चार्ट, मॉडल और वास्तविक वस्तुओं की आवश्यकता होती है, जो कई स्कूलों में उपलब्ध नहीं होते।

  • आईसीटी (ICT) का अभाव: आधुनिक समय में स्मार्ट क्लास और ऑडियो-विजुअल एड्स बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली और उपकरणों की कमी एक बाधा है।

  • पुस्तकालय और प्रयोगशाला: EVS में प्रयोगों का महत्व है, लेकिन प्राथमिक स्कूलों में विज्ञान किट या प्रयोगशालाओं का घोर अभाव होता है।


4. सामुदायिक संसाधनों का प्रयोग न होना (Lack of Community Resources)

EVS का मूल उद्देश्य बच्चे को समाज से जोड़ना है, लेकिन अक्सर स्कूल 'टापू' (Islands) की तरह काम करते हैं।

  • बाहरी दुनिया से अलगाव: समुदाय में कई संसाधन होते हैं जैसे - किसान, डाकिया, बढ़ई, ऐतिहासिक इमारतें, तालाब आदि। शिक्षण में इनका उपयोग न करना एक बड़ी समस्या है।

  • क्षेत्र भ्रमण (Field Trips) की कमी: सुरक्षा कारणों, समय की कमी या प्रशासनिक उदासीनता के कारण बच्चों को चिड़ियाघर, संग्रहालय या पार्कों में नहीं ले जाया जाता। इससे ज्ञान केवल किताबी रह जाता है।


5. व्यावहारिक और प्रायोगिक कार्यों की समस्या

EVS 'करके सीखने' (Learning by Doing) पर आधारित है।

  • सिद्धांत बनाम व्यवहार: शिक्षक अक्सर केवल व्याख्यान विधि (Lecture Method) का प्रयोग करते हैं। बच्चे परिभाषाएँ रट लेते हैं लेकिन उन्हें व्यावहारिक जीवन में लागू नहीं कर पाते।

  • प्रयोगों का अभाव: विज्ञान के सरल प्रयोग (जैसे - पानी का वाष्पीकरण, बीजों का अंकुरण) कक्षा में नहीं कराए जाते।

  • समस्या: बिना प्रयोग के विज्ञान शिक्षण नीरस हो जाता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) विकसित नहीं हो पाता।


6. शिक्षकों से संबंधित समस्याएँ

शिक्षक शिक्षण प्रक्रिया का धुरी होता है। यदि शिक्षक स्वयं तैयार नहीं है, तो शिक्षण प्रभावी नहीं हो सकता।

  • प्रशिक्षण की कमी: कई शिक्षकों को EVS की एकीकृत प्रकृति (Integrated Nature) की समझ नहीं होती। वे इसे केवल विज्ञान या केवल भूगोल की तरह पढ़ाते हैं।

  • शिक्षण विधियों का चयन: सही विधि का चयन एक बड़ी चुनौती है।

    • क्या आज 'कहानी विधि' का प्रयोग करें?

    • या 'खोज विधि' (Heuristic Method) का?

  • पूर्वग्रह (Bias): कभी-कभी शिक्षक स्वयं रूढ़िवादी धारणाओं से ग्रस्त होते हैं (जैसे - "लड़कियाँ विज्ञान में कमजोर होती हैं")। यह EVS के मूल्यों (समानता, न्याय) के खिलाफ है।


7. समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) की चुनौतियाँ

आधुनिक कक्षाएँ 'समावेशी' होती हैं, जहाँ सामान्य बच्चों के साथ विशेष आवश्यकता वाले बच्चे (CWSN) भी पढ़ते हैं।

  • दिव्यांग छात्र: दृष्टिबाधित या श्रवणबाधित बच्चों को EVS समझाने के लिए विशेष उपकरणों (जैसे - स्पर्शनीय मानचित्र, ब्रेल लिपि) की आवश्यकता होती है, जो अक्सर उपलब्ध नहीं होते।

  • पिछड़े बालक: सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों के पास घर पर शैक्षिक माहौल नहीं होता। उनके अनुभवों को कक्षा में सम्मान न मिलना उन्हें हतोत्साहित करता है।

  • भाषाई विविधता: भारत में बहुभाषिकता एक संसाधन है, लेकिन अगर शिक्षक केवल मानक भाषा (Standard Language) का प्रयोग करे, तो स्थानीय बोली बोलने वाले बच्चे पिछड़ जाते हैं।


8. मूल्यांकन संबंधी समस्याएँ (Evaluation Problems)

  • रटने पर जोर: परीक्षा प्रणाली अक्सर केवल तथ्यों की याददाश्त की जाँच करती है, न कि समझ या कौशल की।

  • सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) का सही पालन न होना: शिक्षक अक्सर केवल पेन-पेपर टेस्ट लेते हैं। अवलोकन (Observation), पोर्टफोलियो या प्रोजेक्ट वर्क जैसे टूल्स का प्रभावी उपयोग नहीं होता।

  • उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching) का अभाव: मूल्यांकन के बाद बच्चों की कमियों को दूर करने के लिए उपचारात्मक कक्षाएँ आयोजित करना आवश्यक है, जो समय की कमी के कारण नहीं हो पाता।


9. अनुशासन और कक्षा प्रबंधन

EVS की कक्षाओं में गतिविधियों (Activities) के दौरान शोर होना स्वाभाविक है।

  • सक्रियता बनाम शोर: कई शिक्षक और प्रधानाचार्य 'शांत कक्षा' को ही अच्छी कक्षा मानते हैं। EVS में चर्चा और समूह कार्य जरूरी है, जिससे शोर होता है। इसे 'अनुशासनहीनता' मान लेना एक समस्या है।

  • बड़ी कक्षाएँ: भारत में शिक्षक-छात्र अनुपात (PTR) कई जगह $1:40$ या $1:50$ से भी अधिक है। ऐसी भीड़भाड़ वाली कक्षा में व्यक्तिगत ध्यान देना असंभव हो जाता है।


10. अभिप्रेरणा की कमी (Lack of Motivation)

  • नीरस शिक्षण: जब शिक्षण केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ने तक सीमित हो जाता है, तो बच्चे ऊबने लगते हैं।

  • गृहकार्य में अरुचि: रटने वाला या दोहराव वाला गृहकार्य बच्चों को पसंद नहीं आता। EVS का गृहकार्य 'खोजपूर्ण' होना चाहिए (जैसे - अपने घर के आस-पास के पेड़ों की पत्तियाँ इकट्ठी करना), न कि केवल प्रश्न-उत्तर लिखना।


पर्यावरण शिक्षण को प्रभावी बनाने के समाधान (शिक्षण सूत्र)

इन समस्याओं को हल करने के लिए शिक्षकों को निम्नलिखित मनोवैज्ञानिक शिक्षण सूत्रों (Maxims of Teaching) का पालन करना चाहिए:

  1. ज्ञात से अज्ञात की ओर (Known to Unknown):

    • पहले उन चीजों के बारे में बात करें जो बच्चा अपने घर/पड़ोस में देखता है (जैसे - पालतू जानवर), फिर जंगली जानवरों (अज्ञात) के बारे में बताएँ।

    • उदाहरण: कुएं का पानी (ज्ञात) $\rightarrow$ भूमिगत जल स्तर (अज्ञात)।

  2. मूर्त से अमूर्त की ओर (Concrete to Abstract):

    • बच्चों को पहले ठोस वस्तुएँ दिखाएँ।

    • उदाहरण: पहले 'सेब' दिखाएँ या उसका चित्र दिखाएँ, फिर उसके गुणों या 'पोषण' (अमूर्त) की बात करें।

  3. सरल से जटिल की ओर (Simple to Complex):

    • पहले सरल अवधारणाएँ (जैसे - पानी के उपयोग) समझाएँ, फिर जटिल प्रक्रियाएँ (जैसे - जल चक्र या $H_2O$ की संरचना)।

  4. विशिष्ट से सामान्य की ओर (Specific to General):

    • यह आगमन विधि (Inductive Method) है।

    • उदाहरण: पहले अलग-अलग पक्षियों (तोता, चिड़िया, मोर) के उदाहरण दें, फिर निष्कर्ष निकालें कि 'सभी पक्षियों के पंख होते हैं'।

  5. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर (Analysis to Synthesis):

    • किसी समस्या को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर समझना और फिर उसे जोड़कर समग्र रूप में देखना।

    • उदाहरण: पौधे के विभिन्न भागों (जड़, तना, पत्ती) को अलग-अलग समझना, फिर पूरे पौधे की कार्यप्रणाली को समझना।


NCF-2005 के अनुसार सुझाव

शिक्षण समस्याओं को कम करने के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-2005) निम्नलिखित सुझाव देती है:

  • ज्ञान को स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ना: किताबी ज्ञान को रटने के बजाय उसे वास्तविक जीवन से जोड़ा जाए।

  • रटंत प्रणाली से मुक्ति: परीक्षाएँ लचीली हों और कक्षा की गतिविधियों से जुड़ी हों।

  • पाठ्यचर्या का संवर्धन: पाठ्यपुस्तक से आगे जाकर बच्चों को सीखने के अवसर दिए जाएँ।

  • एकीकृत दृष्टिकोण: विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को अलग-अलग न मानकर एक समग्र 'पर्यावरण अध्ययन' के रूप में देखा जाए। (कक्षा 1 और 2 में EVS की अलग किताब नहीं होती, इसे भाषा और गणित के माध्यम से पढ़ाया जाता है)।


प्रमुख परीक्षा उपयोगी तथ्य (Quick Revision)

  • डिस्लेक्सिया (Dyslexia): पढ़ने में कठिनाई। EVS में ऐसे बच्चे पाठ्यपुस्तक पढ़ने में समस्या महसूस करते हैं।

  • डिस्ग्राफिया (Dysgraphia): लिखने में कठिनाई।

  • दृश्य-श्रव्य सामग्री (Audio-Visual Aids): ज्ञानेंद्रियों का अधिकतम उपयोग करने के लिए (जैसे - आँख और कान)। यह अधिगम को स्थायी बनाता है।

  • दत्त कार्य (Assignment): इसका मुख्य उद्देश्य 'अधिगम विस्तार' (Extension of Learning) है, न कि केवल समय बिताना।


महत्वपूर्ण सारांश

पर्यावरण अध्ययन शिक्षण की समस्याएँ मुख्य रूप से संसाधनों की कमी, अनुचित शिक्षण विधियों, और व्यक्तिगत विभिन्नताओं को न समझ पाने के कारण उत्पन्न होती हैं। एक कुशल शिक्षक वह है जो:

  • स्थानीय और कम लागत वाली सामग्री (Low-cost material) का उपयोग करे।

  • कक्षा में लोकतांत्रिक माहौल बनाए।

  • बच्चों के पूर्व ज्ञान और अनुभवों को सम्मान दे।

  • शिक्षण को बाल-केंद्रित (Child-Centered) रखे।



पर्यावरण अध्ययन शिक्षण: प्रमुख चुनौतियाँ

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