1. पर्यावरण (Environment) - आधारभूत समझ
पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच शब्द Environer से हुई है, जिसका अर्थ है 'पड़ोस' या 'घेरना'। सरल शब्दों में, जो कुछ भी हमें चारों ओर से घेरे हुए है, वह पर्यावरण है।
परिभाषा: किसी जीवधारी के चारों ओर पाए जाने वाले लोग, स्थान, वस्तुएं और प्रकृति मिलकर पर्यावरण कहलाते हैं।
यह प्राकृतिक (Natural) और मानव निर्मित (Man-made) घटनाओं का मिश्रण है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार: "पर्यावरण किसी जीव के चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं और उनके साथ अंतर्क्रिया को सम्मिलित करता है।"
पर्यावरण के क्षेत्र (Domins of Environment)
पृथ्वी के पर्यावरण को मुख्य रूप से चार क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है:
स्थलमंडल (Lithosphere): पृथ्वी की ठोस ऊपरी परत (पहाड़, पठार, मैदान)।
जलमंडल (Hydrosphere): जल के सभी स्रोत (नदी, झील, समुद्र, महासागर)।
वायुमंडल (Atmosphere): पृथ्वी के चारों ओर गैसों की परत।
जैवमंडल (Biosphere): वह संकीर्ण क्षेत्र जहां स्थल, जल और वायु मिलकर जीवन को संभव बनाते हैं।
2. पारिस्थितिकी और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology and Ecosystem)
यहाँ दो प्रमुख शब्दों में अंतर समझना आवश्यक है:
पारिस्थितिकी (Ecology): यह विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों और उनके पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
'Ecology' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अर्नेस्ट हेकल (Ernst Haeckel) ने 1869 में किया था।
पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem): यह प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है जहां जीवधारी आपस में और अपने आसपास के भौतिक पर्यावरण के साथ क्रिया करते हैं।
'Ecosystem' शब्द का प्रस्ताव सबसे पहले ए. जी. टॉन्सले (A.G. Tansley) ने 1935 में दिया था।
पारिस्थितिक तंत्र छोटा (जैसे एक तालाब) या बड़ा (जैसे महासागर) हो सकता है।
उष्णकटिबंधीय पारितन्त्र (Tropical Ecosystem) सबसे अधिक उत्पादक पारितन्त्र माना जाता है।
3. पारिस्थितिकी तंत्र के घटक (Components of Ecosystem)
पारिस्थितिकी तंत्र मुख्य रूप से दो घटकों से मिलकर बना है:
A. अजैविक घटक (Abiotic Components)
यह निर्जीव घटक हैं जो जीवों को प्रभावित करते हैं:
भौतिक कारक: तापमान, आर्द्रता, प्रकाश, वायुमंडलीय दाब।
अकार्बनिक पदार्थ: जल, ऑक्सीजन ($\text{O}_2$), कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$), नाइट्रोजन ($\text{N}_2$)।
कार्बनिक पदार्थ: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड (जो मृत जीवों से प्राप्त होते हैं)।
B. जैविक घटक (Biotic Components)
इसमें सभी जीवित प्राणी शामिल हैं। इन्हें उनके पोषण के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
1. उत्पादक (Producers):
ये अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (स्वपोषी)।
मुख्य रूप से हरे पौधे जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा भोजन निर्माण करते हैं।
रासायनिक समीकरण:
$$\text{6CO}_2 + \text{12H}_2\text{O} \xrightarrow[\text{Chlorophyll}]{\text{Sunlight}} \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + \text{6H}_2\text{O} + \text{6O}_2$$
2. उपभोक्ता (Consumers):
ये भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं (परपोषी)।
प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers): शाकाहारी जीव जो सीधे पौधों को खाते हैं। उदाहरण: टिड्डा, बकरी, हिरण, गाय।
द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers): मांसाहारी जो शाकाहारी जीवों को खाते हैं। उदाहरण: मेंढक, बिल्ली, लोमड़ी।
तृतीयक/शीर्ष उपभोक्ता (Tertiary Consumers): वे मांसाहारी जो अन्य मांसाहारी जीवों को खाते हैं। उदाहरण: शेर, बाघ, बाज।
3. अपघटक (Decomposers):
इन्हें 'प्रकृति का मेहतर' (Nature's Scavengers) या सफाई कर्मी भी कहा जाता है।
ये मृत पौधों और जानवरों के शरीरों को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं।
उदाहरण: जीवाणु (Bacteria) और कवक (Fungi)।
ये पोषण चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि ये खनिजों को वापस मिट्टी में मिला देते हैं।
4. पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow)
पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एकदिशीय (Unidirectional) होता है। ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है।
खाद्य श्रृंखला (Food Chain)
जीवों का वह क्रम जिसमें ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होती है।
उदाहरण:
$$\text{Grass} \rightarrow \text{Grasshopper} \rightarrow \text{Frog} \rightarrow \text{Snake} \rightarrow \text{Eagle}$$(घास $\rightarrow$ टिड्डा $\rightarrow$ मेंढक $\rightarrow$ सांप $\rightarrow$ बाज)
खाद्य जाल (Food Web)
प्रकृति में खाद्य श्रृंखलाएं स्वतंत्र नहीं होतीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। बहुत सी खाद्य श्रृंखलाओं का यह समूह 'खाद्य जाल' कहलाता है।
खाद्य जाल जितना जटिल होगा, पारिस्थितिक तंत्र उतना ही अधिक संतुलित और स्थाई होगा।
लिंडमैन का 10% का नियम (10% Law of Energy)
इस नियम का प्रतिपादन रेमंड लिंडमैन (Raymond Lindeman) ने 1942 में किया था।
इसके अनुसार, एक पोषी स्तर (Trophic Level) से दूसरे स्तर में केवल 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है।
शेष 90% ऊर्जा श्वसन और जैविक क्रियाओं में ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है।
उदाहरण गणना:
यदि सूर्य से पौधों को $10,000$ जूल ऊर्जा मिलती है, तो विभिन्न स्तरों पर ऊर्जा इस प्रकार होगी:
यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला में 4 या 5 से अधिक चरण नहीं होते, क्योंकि शीर्ष तक पहुँचते-पहुँचते ऊर्जा बहुत कम रह जाती है।
5. जैव-भू-रासायनिक चक्र (Bio-Geochemical Cycles)
पोषक तत्वों का पर्यावरण से जीवों में और जीवों से वापस पर्यावरण में प्रवाह चक्रीय होता है।
जल चक्र (Water Cycle)
जल का वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा के रूप में निरंतर चक्रण।
प्रक्रिया: वाष्पीकरण $\rightarrow$ संघनन $\rightarrow$ वर्षण $\rightarrow$ संग्रह।
नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
वायुमंडल में $78\%$ नाइट्रोजन है, लेकिन पौधे इसे सीधे ग्रहण नहीं कर सकते।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): राइजोबियम (Rhizobium) जैसे जीवाणु, जो दलहनी फसलों की जड़ों में पाए जाते हैं, वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट्स ($\text{NO}_3^-$) में बदलते हैं।
6. प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे और प्रदूषण (Environmental Issues)
मानवीय गतिविधियों ने पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचाई है। CTET के लिए निम्नलिखित मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
A. ग्रीन हाउस प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग
पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा ऊष्मा को रोक लेना ग्रीन हाउस प्रभाव कहलाता है। यदि यह गैसें न हों, तो पृथ्वी बहुत ठंडी हो जाएगी, लेकिन इनकी अधिकता से तापमान बढ़ रहा है (Global Warming)।
प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें:
कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$) - मुख्य कारक (जीवाश्म ईंधन का जलना)।
मीथेन ($\text{CH}_4$) - धान के खेत और पशुओं की जुगाली से निकलती है।
नाइट्रस ऑक्साइड ($\text{N}_2\text{O}$)।
जल वाष्प ($\text{H}_2\text{O Vapour}$)।
क्लोरोफ्लोरोकार्बन ($\text{CFCs}$)।
B. ओजोन परत का क्षरण (Ozone Layer Depletion)
ओजोन परत समताप मंडल (Stratosphere) में पाई जाती है।
कार्य: सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों (UV Rays) को रोकना। UV किरणें त्वचा कैंसर और मोतियाबिंद का कारण बनती हैं।
क्षरण का कारण: क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जो रेफ्रिजरेटर और एसी से निकलते हैं।
मापन इकाई: ओजोन परत की मोटाई डॉब्सन (Dobson Unit - DU) में मापी जाती है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987): ओजोन परत के संरक्षण के लिए किया गया अंतर्राष्ट्रीय समझौता।
C. अम्लीय वर्षा (Acid Rain)
कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआं जब बारिश के पानी के साथ मिलता है, तो अम्लीय वर्षा होती है।
जिम्मेदार गैसें: सल्फर डाइऑक्साइड ($\text{SO}_2$) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड ($\text{NO}_2$)।
रासायनिक प्रक्रिया:
$$\text{SO}_2 + \text{H}_2\text{O} \rightarrow \text{H}_2\text{SO}_4 \quad (\text{Sulphuric Acid})$$$$\text{NO}_2 + \text{H}_2\text{O} \rightarrow \text{HNO}_3 \quad (\text{Nitric Acid})$$प्रभाव: इसे 'इमारतों का कुष्ठ रोग' या 'Stone Cancer' भी कहते हैं। आगरा का ताजमहल इसी कारण पीला पड़ रहा है (Mathura Oil Refinery से निकलने वाले $\text{SO}_2$ के कारण)।
7. पर्यावरण संरक्षण: आंदोलन और कानून
भारत और विश्व स्तर पर पर्यावरण बचाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं।
प्रमुख पर्यावरण आंदोलन
चिपको आंदोलन (1973):
स्थान: उत्तराखंड (चमोली जिला, गोपेश्वर)।
नेता: सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट। महिलाएं (गौरा देवी) पेड़ों से चिपक कर उनकी रक्षा करती थीं।
अप्पिको आंदोलन (1983):
स्थान: कर्नाटक।
नेता: पांडुरंग हेगड़े। यह दक्षिण भारत का चिपको आंदोलन था।
खेजड़ली आंदोलन (बिश्नोई आंदोलन):
स्थान: राजस्थान।
नेता: अमृता देवी बिश्नोई। इन्होंने 1730 में खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान दी थी।
वन अधिकार अधिनियम, 2007 (Forest Rights Act)
यह कानून 31 दिसंबर 2007 से प्रभावी हुआ।
नियम: जो लोग कम से कम 25 वर्षों से जंगल में रह रहे हैं, उनका वहां की वन भूमि और वहां पैदा होने वाली उपज (गोंद, शहद, जड़ी-बूटी) पर कानूनी अधिकार है। उन्हें वहां से हटाया नहीं जा सकता।
जंगल के अधिकार का निर्णय वहां की ग्राम सभा करती है।
प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रयास
स्टॉकहोम सम्मेलन (1972): पर्यावरण पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन। इसी में 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाने की घोषणा हुई।
पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit, 1992): रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में हुआ। इसमें एजेंडा-21 दस्तावेज़ जारी किया गया जो सतत विकास (Sustainable Development) से संबंधित है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (भारत): 1986 में लागू हुआ।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम: 1972।
प्रोजेक्ट टाइगर: 1973 में शुरू हुआ (बाघों को बचाने के लिए)।
महत्वपूर्ण पर्यावरण दिवस (Important Days)
22 मार्च: विश्व जल दिवस
22 अप्रैल: पृथ्वी दिवस
22 मई: अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस
5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस
16 सितंबर: विश्व ओजोन दिवस
11 जुलाई: विश्व जनसंख्या दिवस
8. आपदा प्रबंधन (Disaster Management)
आपदाओं को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है:
प्राकृतिक आपदा: बाढ़, सूखा, भूकंप, सुनामी, चक्रवात।
भूकंप: गुजरात के भुज में 26 जनवरी 2001 को भीषण भूकंप आया था जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।
सुनामी: 2004 में आई थी।
मानव जनित आपदा: भोपाल गैस त्रासदी, चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना।
भोपाल गैस त्रासदी (1984): यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिथाइल आइसोसायनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ था।
9. शैक्षणिक संदर्भ (Pedagogy Snippet)
CTET परीक्षा में अक्सर NCERT की पुस्तकों के संदर्भ पूछे जाते हैं:
डॉ. जाकिर हुसैन: भारत के पूर्व राष्ट्रपति। उन्होंने बच्चों के लिए कई कहानियां लिखीं।
उनकी एक प्रसिद्ध कहानी NCERT कक्षा 5 की पुस्तक में है: "उसी से ठंडा, उसी से गर्म"।
इस कहानी का उद्देश्य बच्चों को सांस लेने की प्रक्रिया (फूंक मारने से चीजें ठंडी या गर्म होना) को सरल तरीके से समझाना है।
10. निष्कर्ष और सतत विकास
पर्यावरण अध्ययन का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना है।
सतत विकास (Sustainable Development): विकास की ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम अपनी वर्तमान जरूरतों को पूरा करते हुए, आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करें।
3R सिद्धांत: पर्यावरण बचाने के लिए 3R का पालन करें:
Reduce (कम उपयोग): संसाधनों की बर्बादी रोकें।
Reuse (पुनः उपयोग): चीजों को फेंकने के बजाय दोबारा इस्तेमाल करें।
Recycle (पुनः चक्रण): बेकार वस्तुओं को नए रूप में बदलना।
Note: आगामी परीक्षा के लिए 'ग्रीन हाउस गैसों' और 'वन अधिकार अधिनियम 2007' को विशेष रूप से याद रखें।
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes
