1. आरंभिक मानव: वे इधर-उधर क्यों घूमते थे?
आरंभिक मानव को आखेटक-खाद्य संग्राहक कहा जाता है। यह नाम उनके भोजन जुटाने की विधि पर आधारित है। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे और फल-फूल, दाने, पौधे, पत्तियां और अंडे इकट्ठा करते थे।
ये लोग एक जगह पर स्थाई रूप से नहीं रहते थे, बल्कि घूमते रहते थे। इसके मुख्य 4 कारण थे:
भोजन की समाप्ति: एक ही जगह पर ज्यादा दिनों तक रहने से आसपास के पौधे, फल और जानवर समाप्त हो जाते थे। इसलिए और भोजन की तलाश में उन्हें दूसरी जगह जाना पड़ता था।
जानवरों का पीछा करना: जानवर अपने चारे (हिरण और मवेशी) या शिकार के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। इन जानवरों का शिकार करने के लिए मनुष्य भी इनके पीछे-पीछे जाया करते थे।
मौसमी फल-फूल: अलग-अलग मौसम में अलग-अलग प्रकार के पेड़-पौधों में फल-फूल आते हैं। इसलिए लोग मौसम के अनुसार उपयुक्त स्थानों की तलाश में घूमते थे।
पानी की आवश्यकता: जल जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। कई नदियाँ और झीलें मौसमी होती हैं (जिनमें साल भर पानी नहीं रहता)। सूखे मौसम में पानी की तलाश में उन्हें एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता था।
2. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age)
यह मानव इतिहास का सबसे लंबा काल है। 'पुरा' का अर्थ है प्राचीन और 'पाषाण' का अर्थ है पत्थर।
समय अवधि:
यह काल $20$ लाख साल पहले से $12,000$ साल पहले तक माना जाता है। मानव इतिहास की लगभग $99\%$ कहानी इसी काल के दौरान घटित हुई।
वर्गीकरण:
अध्ययन की सुविधा के लिए इसे तीन भागों में बांटा गया है:
आरंभिक पुरापाषाण काल: इसमें मानव ने पत्थर के बड़े और भद्दे औजार बनाना शुरू किया।
मध्य पुरापाषाण काल: औजारों में थोड़ा सुधार हुआ।
उत्तर पुरापाषाण काल: आधुनिक मानव का उदय इसी चरण के अंत में हुआ।
मुख्य विशेषताएं:
इस काल के लोग मुख्य रूप से शिकार और भोजन संग्रह पर निर्भर थे।
औजार बेडौल और मोटे पत्थरों से बने होते थे।
शतुर्मुर्ग के अंडे: भारत में पुरापाषाण काल के दौरान शतुर्मुर्ग होते थे। महाराष्ट्र के पटने नामक पुरास्थल से शतुर्मुर्ग के अंडों के अवशेष मिले हैं। इनके कुछ छिलकों पर चित्रांकन भी मिलता है और इनसे मनके भी बनाए जाते थे।
3. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)
यह वह समय है जब पर्यावरण में महत्वपूर्ण बदलाव आए और गर्मी बढ़ने लगी।
समय अवधि:
लगभग $12,000$ साल पहले से लेकर $10,000$ साल पहले तक।
मुख्य विशेषताएं और माइक्रोलिथ:
पर्यावरणीय बदलाव: लगभग $12,000$ साल पहले दुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आए और गर्मी बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में घास के मैदान बनने लगे।
शाकाहारी जानवरों की वृद्धि: घास के मैदान बढ़ने से हिरण, बारहसिंघा, भेड़, बकरी और गाय जैसे जानवरों की संख्या बढ़ी जो घास खाकर जिंदा रह सकते थे।
मछली: इस काल में मछली भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत बन गई।
माइक्रोलिथ (लघु पाषाण): इस काल के पाषाण औजार आमतौर पर बहुत छोटे होते थे। इन्हें माइक्रोलिथ कहा जाता है।
इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुठ्ठे लगे होते थे।
इनका उपयोग हंसिया और आरी जैसे औजार बनाने में किया जाता था।
पुराने प्रकार के औजार भी इस दौरान उपयोग में आते रहे।
4. नवपाषाण काल (Neolithic Age)
यह मानव जीवन में एक क्रांति का समय था जब मनुष्य संग्राहक से उत्पादक बना।
समय अवधि:
इसकी शुरुआत लगभग $10,000$ साल पहले हुई।
मुख्य विशेषताएं:
कृषि की शुरुआत: लोगों ने पौधों को उगाना और उनकी देखभाल करना सीखा। सबसे पहले उगाई गई फसलों में गेहूं और जौ शामिल हैं।
पशुपालन: लोगों ने जानवरों को पालतू बनाना शुरू किया।
सबसे पहले जिस जानवर को पालतू बनाया गया वह कुत्ते का जंगली पूर्वज था।
बाद में लोगों ने भेड़, बकरी और मवेशियों को पाला। ये जानवर झुंड में रहते थे और घास खाते थे।
अक्सर लोग जंगली जानवरों के आक्रमण से इन पालतू जानवरों की सुरक्षा करते थे।
औजार: इस काल के पत्थर के औजारों को अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी।
ओखली और मूसल: अनाज और वनस्पतियों को पीसने के लिए ओखली और मूसल का प्रयोग शुरू हुआ, जो आज हजारों साल बाद भी प्रयोग में लाए जाते हैं।
5. महत्वपूर्ण पुरास्थल और उनकी विशेषताएं (NCERT आधारित)
CTET परीक्षा में अक्सर स्थान और वहां मिली वस्तुओं का मिलान पूछा जाता है।
1. भीमबेटका (मध्य प्रदेश):
यह एक आवासीय पुरास्थल है।
यहाँ गुफाएं और कंदराएं मिली हैं।
लोग इन गुफाओं में इसलिए रहते थे क्योंकि यहाँ उन्हें बारिश, धूप और हवाओं से राहत मिलती थी।
यह स्थल नर्मदा घाटी के पास स्थित है।
शैल चित्रकला: यहाँ की गुफाओं की दीवारों पर चित्र मिले हैं। इनमें जंगली जानवरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है।
रंगों का निर्माण: ये रंग लौह अयस्क और चारकोल जैसे खनिजों से बनाए जाते थे।
2. हुंस्गी (कर्नाटक):
यह एक पुरापाषाण कालीन स्थल है।
यहाँ पर पत्थरों के औजार बनाने के कारखाने (Habitation-cum-factory sites) मिले हैं।
यहाँ के अधिकांश औजार चूना पत्थर (Limestone) से बनाए जाते थे।
3. कुरनूल गुफाएं (आंध्र प्रदेश):
यहाँ राख के अवशेष मिले हैं।
इससे यह प्रमाणित होता है कि आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे।
आग का उपयोग तीन कार्यों के लिए होता था:
प्रकाश के लिए।
मांस भूनने के लिए।
खतरनाक जानवरों को दूर भगाने के लिए।
4. मेहरगढ़ (पाकिस्तान):
यह संभवतः वह स्थान है जहां स्त्री-पुरुषों ने इस इलाके में सबसे पहले जौ-गेहूं उगाना और भेड़-बकरी पालना सीखा।
यह बोलन दर्रे के पास एक हरा-भरा समतल स्थान है।
घर: यहाँ चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक घर में $4$ या उससे अधिक कमरे होते थे, जिनमें से कुछ संभवतः भंडारण के काम आते थे।
कब्रें: मृत्यु के बाद सामान्यतः मृतक के सगे-संबंधी उसके प्रति सम्मान जताते थे। मेहरगढ़ में ऐसी कई कब्रें मिली हैं। एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था (संभवतः परलोक में खाने के लिए)।
5. बुर्ज़होम (कश्मीर):
यहाँ के लोग गड्ढे के नीचे घर बनाते थे, जिन्हें गर्तवास (Pit-houses) कहा जाता है।
इनमें उतरने के लिए सीढ़ियां होती थीं।
झोपड़ियों के अंदर और बाहर दोनों स्थानों पर आग जलाने की जगहें मिली हैं, जिससे पता चलता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते होंगे।
6. कोल्डिहवा और महागढ़ (उत्तर प्रदेश):
यहाँ चावल और जानवरों की हड्डियों के टुकड़े मिले हैं।
महागढ़ में मिट्टी के बर्तनों पर खुरों के निशान मिले हैं जो मवेशियों के पालन का संकेत देते हैं।
7. दाओजली हेडिंग (असम):
यह स्थल चीन और म्यांमार की ओर जाने वाले रास्ते में ब्रह्मपुत्र की घाटी की एक पहाड़ी पर स्थित है।
यहाँ खरल और मूसल जैसे पत्थरों के उपकरण मिले हैं (संकेत: लोग भोजन के लिए अनाज उगाते थे)।
यहाँ से जेडाइट (Jadeite) पत्थर भी मिला है, जो संभवतः चीन से लाया गया होगा।
काष्ठाश्म (अति प्राचीन लकड़ी जो सख्त होकर पत्थर बन गई है) के औजार और बर्तन भी यहाँ मिले हैं।
6. बसने की प्रक्रिया (Domestication)
लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को बसने की प्रक्रिया का नाम दिया गया है। यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे-धीरे चलती रही (लगभग $12,000$ साल पहले शुरू हुई)।
चयन: लोग उन्हीं पौधों और जानवरों का चयन करते थे जिनके बीमार होने की संभावना कम हो।
पौधे: लोग ऐसे पौधे चुनते थे जिनसे बड़े दाने वाले अनाज पैदा हों और जिनकी डंठलें अनाज के पके दानों के भार को संभाल सकें।
जानवर: उन्हीं जानवरों को प्रजनन के लिए चुना जाता था जो आमतौर पर अहिंसक होते थे।
इसी कारण पाले गए जानवर और उगाए गए पौधे धीरे-धीरे जंगली जानवरों और पौधों से भिन्न होते गए। (उदाहरण: जंगली जानवरों के दांत और सींग पालतू जानवरों की तुलना में बहुत बड़े होते हैं)।
7. पहिये और बर्तन का आविष्कार
यद्यपि NCERT के इस अध्याय में पहिये का विस्तृत वर्णन नहीं है, लेकिन नवपाषाण काल में पहिये का आविष्कार एक युगांतकारी घटना थी।
मिट्टी के बर्तन (Mridbhand):
अनाज का उत्पादन बढ़ने पर उसके भंडारण की आवश्यकता हुई।
इलाकों में लोगों ने मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तन बनाए, टोकरियाँ बुनीं या फिर जमीन में गड्ढा खोदा।
बाद में बर्तनों का प्रयोग खाना बनाने के लिए भी होने लगा (विशेषकर चावल, गेहूं और दलहन के लिए)।
नवपाषाण काल के बर्तनों पर अलंकरण (Painting) भी किया जाता था।
8. जनजाति (Tribes)
जब किसान और पशुपालक समूह में रहते हैं तो उन्हें अक्सर जनजाति कहा जाता है।
जीवनशैली: जनजाति के सदस्य शिकार, भोजन संग्रह, खेती, पशुपालन और मछली पकड़ने जैसे पेशे अपनाते हैं।
श्रम विभाजन: महिलाएं अक्सर खेती का सारा काम करती थीं (जमीन तैयार करना, बीज बोना, फसल काटना)। बच्चे पौधों की देखभाल करते थे और जानवरों को भगाते थे। पुरुष अक्सर पशुओं के बड़े झुंडों को चराते थे।
सांस्कृतिक परंपरा: जनजातियों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं होती हैं (भाषा, संगीत, कहानियां, चित्रकारी)।
समानता: जनजातीय समाज में अमीर और गरीब के बीच खास अंतर नहीं होता।
9. महत्वपूर्ण तिथियां और शब्दावली (Revision Table)
| शब्द / घटना | विवरण / समय |
| पुरापाषाण काल | $20$ लाख - $12,000$ साल पहले |
| मध्यपाषाण काल | $12,000$ - $10,000$ साल पहले |
| नवपाषाण काल | $10,000$ साल पहले से शुरुआत |
| बसने की प्रक्रिया | लगभग $12,000$ साल पहले शुरू |
| मेहरगढ़ में बस्ती | लगभग $8000$ साल पहले |
| माइक्रोलिथ | मध्यपाषाण काल के छोटे औजार |
| आरंभिक फसलें | गेहूं और जौ |
| आरंभिक पालतू पशु | कुत्ता, भेड़, बकरी |
10. निष्कर्ष और वैज्ञानिक/तकनीकी पहलू
इतिहास के अध्ययन में कार्बन डेटिंग जैसी विधियों का उपयोग होता है, लेकिन CTET स्तर पर आपको मुख्य रूप से पुरास्थलों (Sites) और वहां मिले साक्ष्यों (Evidences) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
औजारों का तकनीकी विकास:
प्रेशर फ्लेकिंग (Pressure Flaking): यह पत्थर के औजार बनाने की एक तकनीक थी। इसमें क्रोड (Core) को एक स्थिर सतह पर टिकाया जाता था और हड्डी या पत्थर से उस पर तब तक चोट की जाती थी जब तक मनचाहा आकार न मिल जाए।
निष्कर्ष:
आरंभिक समाज एक क्रमिक विकास का परिणाम था। मानव ने अपनी बुद्धिमत्ता से पर्यावरण के साथ सामंजस्य बिठाया। पत्थरों से शुरुआत करके वे खेती और स्थायी जीवन तक पहुँचे, जिसने आज की आधुनिक सभ्यता की नींव रखी।
QUIZ
Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes
