ग्रामीण क्षेत्र पर शासन

Sunil Sagare
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ग्रामीण क्षेत्र पर शासन: औपनिवेशिक राजस्व नीतियां और किसान

भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित नहीं थी। ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक राजस्व (Revenue) कमाना और यूरोप में अपने व्यापार के लिए सस्ती दरों पर फसलें खरीदना था। इस अध्याय में हम समझेंगे कि कंपनी ने ग्रामीण भारत को उपनिवेश कैसे बनाया, राजस्व के कौन-कौन से तरीके अपनाए और इसका किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा।

१. कंपनी दीवान बन गई (The Company Becomes Diwan)

  • ऐतिहासिक घटना: १२ अगस्त १७६५ को मुगल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का दीवान नियुक्त किया।

  • राबर्ट क्लाइव की भूमिका: यह घटना राबर्ट क्लाइव के तंबू में हुई थी, लेकिन इसे ब्रिटिश शासन की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया।

  • दीवान का अर्थ: दीवान बनने का मतलब था कि कंपनी अब बंगाल प्रांत के वित्तीय प्रशासन की मुख्य प्रशासक बन गई थी। अब उसे अपनी सेना और व्यापार के खर्चों को पूरा करने के लिए राजस्व के स्रोत ढूंढने थे।

  • आरंभिक स्थिति:

    • दीवान बनने के बाद भी कंपनी खुद को मुख्य रूप से एक व्यापारी ही मानती थी।

    • वह भारी भरकम लगान तो चाहती थी, लेकिन उसके आकलन और वसूली की कोई नियमित व्यवस्था करने में हिचकिचा रही थी।

    • कोशिश यह थी कि ज्यादा से ज्यादा राजस्व हासिल किया जाए और कम से कम कीमत पर बढ़िया सूती और रेशमी कपड़ा खरीदा जाए।

  • परिणाम: ५ साल के भीतर बंगाल में कंपनी द्वारा खरीदी जाने वाली चीजों का कुल मूल्य दोगुना हो चुका था। १७६५ से पहले कंपनी ब्रिटेन से सोना-चांदी लाकर सामान खरीदती थी, लेकिन अब बंगाल से इकट्ठा होने वाले पैसे से ही निर्यात का सामान खरीदा जाने लगा।

२. बंगाल की अर्थव्यवस्था का संकट

कंपनी की नीतियों के कारण बंगाल की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंस गई।

  • कारीगर गांव छोड़कर भाग रहे थे क्योंकि उन्हें बहुत कम कीमत पर अपनी चीजें कंपनी को जबरन बेचनी पड़ती थीं।

  • किसान अपना लगान नहीं चुका पा रहे थे।

  • खेती चौपट होने की दिशा में अग्रसर थी।

  • १७७० का अकाल: १७७० में पड़े अकाल ने बंगाल में तबाही मचा दी। इसमें लगभग १ करोड़ लोगों की मौत हुई, जो बंगाल की आबादी का एक-तिहाई हिस्सा था।


३. खेती में सुधार की जरूरत: प्रमुख राजस्व प्रणालियां

कंपनी को समझ आ गया था कि अगर अर्थव्यवस्था संकट में रहेगी तो उसे राजस्व नहीं मिलेगा। इसलिए खेती में निवेश करना और सुधार लाना जरूरी हो गया। इसके लिए तीन प्रमुख प्रणालियां लागू की गईं:

(क) स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) - १७९३

  • लागू करने वाला: लॉर्ड कॉर्नवालिस।

  • क्षेत्र: मुख्य रूप से बंगाल, बिहार और उड़ीसा।

  • मुख्य प्रावधान:

    • राजाओं और तालुकदारों को जमींदारों के रूप में मान्यता दी गई।

    • उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने का जिम्मा सौंपा गया।

    • इनकी ओर से चुकाई जाने वाली राशि स्थायी रूप से तय कर दी गई थी। इसका मतलब था कि भविष्य में इसमें कभी इजाफा नहीं किया जाना था।

  • उद्देश्य:

    • कंपनी को आय का एक नियमित स्रोत मिले।

    • जमींदार जमीन में सुधार के लिए खर्च करने को प्रोत्साहित हों, क्योंकि राजस्व तो बढ़ना नहीं था, तो बढ़ा हुआ उत्पादन उनका मुनाफा होता।

स्थायी बंदोबस्त की समस्याएं:

  1. जमींदारों की उदासीनता: जमींदारों ने जमीन की बेहतरी में पैसा खर्च नहीं किया।

  2. राजस्व की अधिकता: कंपनी ने जो राजस्व तय किया था, वह इतना ज्यादा था कि उसे चुकाने में जमींदारों को भारी परेशानी हो रही थी। जो जमींदार राजस्व नहीं चुका पाता था, उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।

  3. किसानों का शोषण: गांवों में किसानों को यह व्यवस्था बहुत दमनकारी लगी। किसानों को जो लगान चुकाना था, वह बहुत ज्यादा था और जमीन पर उनका अधिकार सुरक्षित नहीं था।

  4. कर्ज का चक्र: लगान चुकाने के लिए किसान अक्सर महाजन से कर्ज लेते थे और अगर लगान नहीं चुका पाते, तो उन्हें पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।

(ख) महालवारी बंदोबस्त (Mahalwari Settlement) - १८२२

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कंपनी के अधिकारियों को लगा कि स्थायी बंदोबस्त से काम नहीं चलेगा। जब कंपनी का खर्चा बढ़ रहा हो तो वह स्थायी राजस्व पर कैसे निर्भर रह सकती थी?

  • जनक: होल्ट मैकेंजी (Holt Mackenzie)।

  • लागू हुआ: १८२२ में।

  • क्षेत्र: बंगाल प्रेसिडेंसी का उत्तर-पश्चिमी प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश का अधिकांश हिस्सा)।

  • अवधारणा: मैकेंजी का मानना था कि उत्तर भारतीय समाज में 'गांव' एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसे बचाए रखना चाहिए।

  • प्रक्रिया:

    • कलेक्टरों ने गांवों का दौरा किया, जमीन की जांच की और खेतों को मापा।

    • विभिन्न समूहों के रीति-रिवाजों को दर्ज किया।

    • एक खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर पूरे गांव या महाल (गांवों का समूह) से वसूल होने वाले राजस्व का हिसाब लगाया जाता था।

  • राजस्व का स्वरूप: इसे स्थायी रूप से तय नहीं किया गया, बल्कि इसमें समय-समय पर संशोधन का प्रावधान रखा गया।

  • वसूली का अधिकार: राजस्व इकट्ठा करने और कंपनी को सौंपने का जिम्मा जमींदार के बजाय गांव के मुखिया को दिया गया।

(ग) रैयतवारी/मुनरो व्यवस्था (Ryotwari System)

दक्षिण भारत में कंपनी ने अलग रास्ता अपनाया। वहां पारंपरिक जमींदार नहीं थे, इसलिए सीधे किसानों से समझौता करना बेहतर समझा गया।

  • जनक: कैप्टन एलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो।

  • क्षेत्र: मद्रास और बंबई (दक्षिण भारत)।

  • मूल शब्द: 'रैयत' का अर्थ है 'किसान' (खेतीहर)।

  • तर्क: रीड और मुनरो का तर्क था कि दक्षिण में पुश्तैनी जमींदार नहीं हैं। इसलिए सीधे उन किसानों (रैयतों) से बंदोबस्त करना चाहिए जो पीढ़ियों से जमीन पर खेती करते आ रहे हैं।

  • प्रक्रिया: राजस्व आकलन से पहले खेतों का सावधानीपूर्वक और अलग से सर्वेक्षण किया गया।

  • मुनरो का विचार: मुनरो का मानना था कि अंग्रेजों को "पिता की भांति" किसानों की रक्षा करनी चाहिए।

  • समस्याएं: यह व्यवस्था भी बहुत सफल नहीं रही। राजस्व की दरें बहुत ऊंची थीं। किसान गांव छोड़कर भागने लगे और कई क्षेत्र वीरान हो गए।


४. यूरोप के लिए फसलें (Crops for Europe)

अंग्रेजों ने यह महसूस किया कि ग्रामीण इलाकों से केवल राजस्व ही नहीं लिया जा सकता, बल्कि वहां यूरोप की जरूरतों के हिसाब से फसलें भी पैदा की जा सकती हैं।

प्रमुख फसलें और क्षेत्र:

  • पटसन: बंगाल

  • चाय: असम

  • गन्ना: संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश)

  • गेहूं: पंजाब

  • कपास: महाराष्ट्र और पंजाब

  • चावल: मद्रास

  • अफीम और नील: इनका विशेष महत्व था।

क्या रंग का भी कोई इतिहास है? (नील की कहानी)

भारतीय कपड़ों पर जो चमकदार नीला रंग दिखाई देता था, वह नील (Indigo) नामक पौधे से तैयार किया जाता था। अठारहवीं सदी के आखिर तक भारतीय नील की मांग पूरी दुनिया में थी।

भारतीय नील की मांग के कारण:

  1. भारतीय नील से बहुत चमकदार नीला रंग मिलता था।

  2. यूरोप में मिलने वाला वोड़ (Woad) नामक पौधा बेजान और फीका रंग देता था।

  3. यूरोप के कपड़ा उत्पादक वोड़ की जगह नील को पसंद करते थे।

  4. औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन में कपास का उत्पादन बढ़ा, जिससे कपड़ों की रंगाई के लिए नील की मांग में भारी उछाल आया।


५. नील की खेती के तरीके

भारत में नील की खेती के दो मुख्य तरीके थे: निज और रैयती

(१) निज खेती (Nij Cultivation)

इस व्यवस्था में बागान मालिक खुद अपनी जमीन में नील का उत्पादन करते थे।

  • वे या तो जमीन खरीद लेते थे या दूसरे जमींदारों से भाड़े पर ले लेते थे।

  • मजदूरों को काम पर लगाकर खेती करवाते थे।

निज खेती की समस्याएं:

  • जमीन की कमी: नील की खेती के लिए उपजाऊ जमीन चाहिए थी, जो पहले से ही आबादी से भरी थी। छोटे-मोटे खेत ही मिल पाते थे।

  • श्रम की कमी: बड़े बागानों के लिए बहुत सारे मजदूरों की जरूरत होती थी। लेकिन उसी समय किसानों का व्यस्त समय धान की खेती में होता था।

  • हल-बैलों की समस्या: एक बीघा नील की खेती के लिए दो हलों की जरूरत होती थी। हजारों हलों को खरीदना और उनका रखरखाव करना बागान मालिकों के लिए बड़ी समस्या थी।

  • इस कारण १९वीं सदी के अंत तक बागान मालिक निज खेती का दायरा बढ़ाने में हिचकिचाते थे। मात्र २५% से कम जमीन निज खेती के तहत थी।

(२) रैयती खेती (Ryoti Cultivation)

इस व्यवस्था में बागान मालिक रैयतों (किसानों) के साथ एक अनुबंध (सट्टा) करते थे।

  • कई बार गांव के मुखिया को भी किसानों की तरफ से समझौता करने के लिए बाध्य किया जाता था।

  • कर्ज: जो किसान समझौते पर दस्तखत कर देते थे, उन्हें नील उगाने के लिए कम ब्याज दर पर बागान मालिकों से नकद कर्ज (ददनी) मिल जाता था।

  • शर्त: कर्ज लेने वाले किसान को अपनी कम से कम २५% जमीन पर नील की खेती करनी होती थी।

  • चक्र: बागान मालिक बीज और उपकरण मुहैया कराते थे। जब फसल कटकर बागान मालिक को सौंप दी जाती थी, तो किसान को नया कर्ज मिल जाता था और यह चक्र चलता रहता था।

किसानों को नुकसान:

  • शुरू में कर्ज आकर्षक लगता था, लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि व्यवस्था बहुत कठोर है।

  • उन्हें नील की जो कीमत मिलती थी, वह बहुत कम थी।

  • कर्ज कभी खत्म नहीं होता था।

  • नील की जड़ें बहुत गहरी होती थीं, जो मिट्टी की सारी ताकत खींच लेती थीं। नील की कटाई के बाद वहां धान की खेती नहीं की जा सकती थी।


६. नील विद्रोह (The Blue Rebellion) - १८५९

मार्च १८५९ में बंगाल के हजारों रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। इसे ही नील विद्रोह कहा जाता है।

  • विद्रोह की घटनाएं:

    • किसानों ने लगान चुकाने से मना कर दिया।

    • तलवार, भाले और तीर-कमान लेकर नील फैक्ट्रियों पर हमला किया।

    • औरतें अपने बर्तन लेकर लड़ाई में कूद पड़ीं।

    • बागान मालिकों के लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया गया।

    • बागान मालिकों के एजेंटों (गुमाश्तों) की पिटाई की गई।

  • समर्थन:

    • स्थानीय जमींदार और गांव के मुखिया भी बागान मालिकों के खिलाफ थे क्योंकि उनकी ताकत छिन रही थी। उन्होंने किसानों को एकजुट किया।

    • किसानों को लगा कि ब्रिटिश सरकार भी उनके साथ है (१८५७ की बगावत के बाद सरकार एक और विद्रोह नहीं चाहती थी)।

  • बुद्धिजीवियों की भूमिका: कलकत्ता के पढ़े-लिखे लोग भी नील जिलों की ओर चल पड़े। उन्होंने रैयतों की दुर्दशा और बागान मालिकों की जोर-जबरदस्ती के बारे में लिखा।

    • महत्वपूर्ण तथ्य: दीनबंधु मित्र ने 'नील दर्पण' नाटक लिखा, जिसने इस अत्याचार को उजागर किया।

  • सरकार की प्रतिक्रिया:

    • लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इलाके का दौरा किया।

    • मजिस्ट्रेट एशले ईडन ने नोटिस जारी किया कि रैयतों को अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

    • बगावत को दबाने के लिए सेना बुलानी पड़ी।

    • नील आयोग (Indigo Commission): सरकार ने एक आयोग बनाया। आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया। आयोग ने कहा कि नील की खेती रैयतों के लिए फायदे का सौदा नहीं है।

    • फैसला: आयोग ने रैयतों से कहा कि वे मौजूदा अनुबंध पूरा करें, लेकिन आगे से वे चाहें तो नील की खेती बंद कर सकते हैं।

  • परिणाम: बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया। इसके बाद बागान मालिक बिहार की तरफ चले गए।

चंपारण आंदोलन (१९१७)

जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे, तो बिहार के एक किसान ने उन्हें चंपारण आकर नील किसानों की दुर्दशा देखने का न्योता दिया। १९१७ में महात्मा गांधी का चंपारण दौरा नील बागान मालिकों के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत बना।


७. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य (Quick Revision Points)

  1. कलामकारी छापा: आंध्र प्रदेश के बुनकरों द्वारा बनाया जाने वाला सूती कपड़े का छापा।

  2. मॉरिस कॉटन छापा: उन्नीसवीं सदी के ब्रिटेन के प्रसिद्ध कवि और कलाकार विलियम मॉरिस द्वारा बनाया गया फूल-पत्तियों वाला छापा। दोनों छापों में नील का प्रयोग होता था।

  3. बीघा: जमीन की माप की एक इकाई। ब्रिटिश राज से पहले इसका आकार अलग-अलग होता था। बंगाल में अंग्रेजों ने इसका क्षेत्रफल करीब एक-तिहाई एकड़ तय कर दिया था।

  4. लठियाल: बागान मालिकों द्वारा पाले गए लाठीधारी गुंडे जो किसानों को डराते थे।

  5. सट्टा: रैयती व्यवस्था में अनुबंध या एग्रीमेंट।

  6. तीनकठिया प्रणाली: बिहार (चंपारण) में किसानों को अपनी जमीन के ३/२० हिस्से पर नील की खेती करनी पड़ती थी।

मुख्य तिथियां (Timeline)

  • १७६५: ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल की दीवान बनी।

  • १७७०: बंगाल का भयानक अकाल।

  • १७९३: स्थायी बंदोबस्त लागू (लॉर्ड कॉर्नवालिस)।

  • १८२२: महालवारी व्यवस्था लागू (होल्ट मैकेंजी)।

  • १८५९ (मार्च): नील विद्रोह की शुरुआत।

  • १९१७: चंपारण आंदोलन (गांधीजी)।



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