राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005)

Sunil Sagare
0

NCF 2005 का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को 'रटंत प्रणाली' से मुक्त करना और बच्चों के सर्वांगीण विकास पर जोर देना है। यह रूपरेखा रचनावाद (Constructivism) पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि बच्चे अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं।


NCF 2005 की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि

  • उद्धरण: NCF 2005 का प्रारम्भ रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध 'सभ्यता और प्रगति' के एक उद्धरण से होता है। टैगोर ने इसमें बताया है कि "सृजनात्मकता और उदार आनंद बचपन की कुंजी है।"

  • समिति: प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में विद्वानों की एक समिति ने इसे तैयार किया।

  • आधार: यह 'शिक्षा बिना बोझ के' (Learning without Burden - 1993) की रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें बस्ते के बोझ को कम करने की सिफारिश की गई थी।

  • संवैधानिक मूल्य: यह रूपरेखा भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक और बहुलतावादी समाज के मूल्यों पर आधारित है।


NCF 2005 के 5 मार्गदर्शक सिद्धांत (Guiding Principles)

NCF 2005 ने पाठ्यचर्या निर्माण के लिए पाँच प्रमुख सिद्धांतों का प्रस्ताव रखा है, जिन्हें हर शिक्षक को याद रखना चाहिए:

  1. ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ना: शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों को जो पढ़ाया जा रहा है, उसका सम्बन्ध उनके दैनिक जीवन और वातावरण से होना चाहिए।

  2. पढ़ाई को रटंत प्रणाली से मुक्त करना: यह सुनिश्चित करना कि अधिगम रटने की जगह 'समझ' पर आधारित हो। परिभाषाओं को याद करने की जगह अवधारणाओं (Concepts) को समझने पर जोर दिया जाए।

  3. पाठ्यचर्या का संवर्धन (Curriculum Enrichment): पाठ्यचर्या केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहे। यह बच्चों को चहुँमुखी विकास के अवसर प्रदान करे, न कि केवल पुस्तक-केंद्रित ज्ञान।

  4. परीक्षा को लचीला बनाना: परीक्षाओं को अधिक लचीला बनाना और उन्हें कक्षा की गतिविधियों से जोड़ना। रटने की क्षमता की जगह तार्किक क्षमता का आकलन करना।

  5. लोकतांत्रिक पहचान का निर्माण: एक ऐसी अधिभावी पहचान का विकास करना जिसमें प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रीय चिंताएं समाहित हों। यानी, ऐसे नागरिक तैयार करना जो देश और समाज के प्रति जिम्मेदार हों।


सीखना और ज्ञान (Learning and Knowledge)

NCF 2005 के अनुसार सीखने की प्रक्रिया के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • ज्ञान का निर्माण: सीखना ज्ञान को ज्यों का त्यों स्वीकार करना नहीं है, बल्कि ज्ञान का निर्माण करना है। बच्चे अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर नए ज्ञान की रचना करते हैं।

  • सक्रिय विद्यार्थी: बच्चा एक निष्क्रिय श्रोता नहीं है। वह सक्रिय रूप से प्रश्न पूछता है, अन्वेषण करता है और समाज के साथ अंतःक्रिया करके सीखता है।

  • शिक्षक की भूमिका: NCF 2005 के अनुसार, शिक्षक की भूमिका एक 'सुविधादाता' (Facilitator) की है। शिक्षक ज्ञान का एकमात्र स्रोत नहीं है, बल्कि वह बच्चों को ज्ञान निर्माण करने में सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

  • गलतियां सीखने का हिस्सा हैं: बच्चों द्वारा की गई गलतियां अधिगम प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये गलतियां शिक्षक को यह समझने में मदद करती हैं कि बच्चे कैसे सोच रहे हैं।

  • सहयोगात्मक अधिगम: बच्चों को समूह में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वे अपने साथियों से चर्चा करके बहुत कुछ सीखते हैं।

  • चतुर अनुमान: 'चतुर अनुमान' को एक कारगर शिक्षा शास्त्रीय साधन के रूप में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


पाठ्यचर्या के क्षेत्र (Curricular Areas)

विभिन्न विषयों के शिक्षण के लिए NCF 2005 के विशिष्ट उद्देश्य हैं:

1. भाषा (Language)

  • बहुभाषिकता (Multilingualism): बहुभाषिकता को एक समस्या नहीं, बल्कि एक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए। यह संज्ञानात्मक विकास और सामाजिक सहिष्णुता को बढ़ाती है।

  • मातृभाषा: प्राथमिक स्तर पर शिक्षण का माध्यम बच्चे की मातृभाषा होनी चाहिए।

  • त्रि-भाषा सूत्र: इसे लागू करने पर जोर दिया गया है, जिसमें पहली भाषा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा हो।

2. गणित (Mathematics)

  • मुख्य उद्देश्य: गणित शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बच्चों की सोच का गणितीयकरण (Mathematization of thinking) करना है, न कि केवल गणना करना सिखाना।

  • तार्किक सोच: छात्रों में तार्किक ढंग से सोचने, अमूर्तनों का निर्माण करने और उन्हें संचालित करने की योग्यता का विकास करना।

  • डर को दूर करना: गणित को बच्चों के जीवन के अनुभवों का हिस्सा बनाना ताकि गणित का डर खत्म हो सके।

  • गणितीय अवधारणाओं को गतिविधियों और वास्तविक जीवन के उदाहरणों से समझाया जाना चाहिए।

3. विज्ञान (Science)

  • विज्ञान शिक्षण का उद्देश्य बच्चों में जिज्ञासा और रचनात्मकता का पोषण करना होना चाहिए।

  • प्रक्रिया पर जोर: रटने की जगह वैज्ञानिक प्रक्रियाओं (अवलोकन, प्रयोग, निष्कर्ष) को समझने पर बल देना चाहिए।

  • उच्च प्राथमिक स्तर पर वैज्ञानिक अवधारणाओं को मुख्य रूप से गतिविधियों और प्रयोगों द्वारा समझाया जाना चाहिए।

4. सामाजिक विज्ञान (Social Science)

  • इसका उद्देश्य समाज के प्रति आलोचनात्मक समझ (Critical understanding) का विकास करना है।

  • इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु का उपयोग बच्चों को सामाजिक वास्तविकता को समझने में मदद करने के लिए किया जाना चाहिए।

  • लैंगिक न्याय, मानवाधिकार और हाशिए पर स्थित समूहों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना।

5. कला शिक्षा, स्वास्थ्य और कार्य

  • कला शिक्षा: इसे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा माना जाए। यह बच्चों की रचनात्मकता और सौंदर्यबोध को विकसित करता है।

  • कार्य और शिक्षा: हस्तशिल्प और कार्य-केंद्रित शिक्षा को महत्व देना ताकि बच्चे शारीरिक श्रम का सम्मान करना सीखें।

  • शांति शिक्षा: नैतिक विकास और मूल्यों के पोषण के लिए शांति शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना।


विद्यालय और कक्षा का वातावरण

एक अनुकूल वातावरण ही प्रभावी अधिगम की कुंजी है।

  • समावेशी शिक्षा (Inclusive Education): सभी बच्चों को, चाहे उनकी शारीरिक, मानसिक या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो, एक ही छत के नीचे समान शिक्षा मिलनी चाहिए। अक्षमता वाले बच्चों को सामान्य स्कूलों में पढ़ाना चाहिए।

  • अनुशासन: अनुशासन का अर्थ 'डंडा' या भय नहीं है। सच्चा अनुशासन वह है जो आत्मानुशासन (Self-discipline) हो। कक्षा में सन्नाटा अधिगम का संकेत नहीं है; थोड़ी बहुत बातचीत और शोर सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

  • शिक्षक-छात्र अनुपात: प्राथमिक स्तर पर 1:30 का अनुपात आदर्श माना गया है।

  • शारीरिक दंड वर्जित: बच्चों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना सख्त मना है। इससे बच्चों में डर पैदा होता है और वे स्कूल से दूर भागते हैं।

  • पुस्तकें और संसाधन: पाठ्यपुस्तकें एकमात्र संसाधन नहीं हैं। पुस्तकालय, प्रयोगशाला, और मीडिया का उपयोग भी किया जाना चाहिए।


आकलन और मूल्यांकन (Assessment and Evaluation)

  • सतत और व्यापक मूल्यांकन (CCE): मूल्यांकन केवल साल के अंत में नहीं होना चाहिए, बल्कि यह शिक्षण प्रक्रिया के दौरान लगातार चलना चाहिए।

  • खुले प्रश्न (Open-ended questions): ऐसे प्रश्नों को प्रोत्साहित करना चाहिए जिनके एक से अधिक उत्तर हो सकते हैं और जो बच्चों को सोचने पर मजबूर करें।

  • प्रतिस्पर्धा से बचें: बच्चों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा (जैसे फर्स्ट आना) को हतोत्साहित करना चाहिए। हर बच्चे की सीखने की गति अलग होती है।

  • रिपोर्ट कार्ड: रिपोर्ट कार्ड में केवल अंक नहीं, बल्कि बच्चे की रुचियों और कौशल का गुणात्मक विवरण होना चाहिए।


व्यवस्थागत सुधार (Systemic Reforms)

  • शिक्षक शिक्षा: शिक्षकों के प्रशिक्षण में बदलाव की जरूरत है ताकि वे 'ज्ञान देने वाले' की जगह 'सुविधादाता' बन सकें।

  • परीक्षा सुधार: 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को लचीला बनाना और तनाव मुक्त करना।

  • बाल-केंद्रित शिक्षा: पूरी शिक्षा व्यवस्था का केंद्र 'बालक' होना चाहिए। स्कूल का समय, छुट्टियां, और गतिविधियां बच्चों की जरूरतों के अनुसार तय होनी चाहिए।

  • समुदाय की भागीदारी: स्कूल के प्रबंधन में माता-पिता और समुदाय (Panchayat, SMC) की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए।


महत्वपूर्ण बिंदु: एक नज़र में (Quick Revision Points)

  • स्रोत: सभ्यता और प्रगति (रवीन्द्रनाथ टैगोर)।

  • दृष्टिकोण: रचनावादी (Constructivist)।

  • शिक्षक: सुगमकर्ता / सुविधादाता (Facilitator)।

  • बच्चा: ज्ञान का निर्माता, सक्रिय अधिगमकर्ता।

  • भाषा: बहुभाषिकता एक संसाधन है।

  • गणित: तार्किक सोच का विकास।

  • पर्यावरण: पाठ्यपुस्तकों से बाहर जीवन से जुड़ाव।

  • अनुशासन: आंतरिक और स्व-अनुशासन।

  • लक्ष्य: शिक्षा बिना बोझ के।

NCF 2005 यह मानता है कि यदि बच्चे फेल होते हैं, तो यह बच्चे की विफलता नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की विफलता (System Failure) है। हर बच्चे में सीखने की क्षमता होती है, बस उसे सही वातावरण और अवसर मिलने की आवश्यकता है।



NCF 2005

Mock Test: 20 Questions | 20 Minutes

Time Left: 20:00

टिप्पणी पोस्ट करा

0 टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top