गणित का स्वरूप: अवधारणा, परिभाषाएँ और शिक्षण शास्त्र

Sunil Sagare
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1. प्रस्तावना (Introduction)

गणित केवल संख्याओं के जोड़-घटाव का नाम नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट प्रकार की भाषा है जो हमारे सोचने और तर्क करने के तरीके को निर्धारित करती है। विद्यालयी पाठ्यक्रम में गणित का स्थान सर्वोपरि है। कोठारी आयोग ने भी इस बात पर बल दिया था कि विद्यालय में विज्ञान और गणित की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।

'गणित' शब्द का शाब्दिक अर्थ है— "वह शास्त्र जिसमें गणनाओं की प्रधानता हो।"

अंग्रेजी में इसे 'Mathematics' कहा जाता है, जो यूनानी शब्द 'Mathemata' से बना है, जिसका अर्थ है— 'सीखी जाने वाली वस्तु'। प्राचीन भारतीय साहित्यों में भी गणित को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। वेदांग ज्योतिष में लिखा है:

"यथा शिखा मयूराणां, नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदांगशास्त्राणां, गणितं मूर्धनि स्थितम्॥"

(जिस प्रकार मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे ऊपर होता है, उसी प्रकार सभी वेदांग और शास्त्रों में गणित का स्थान सर्वोच्च है।)

एक भावी शिक्षक के रूप में, यह समझना आवश्यक है कि हम गणित क्यों पढ़ाते हैं? क्या यह केवल दैनिक लेन-देन के लिए है, या इसका उद्देश्य बच्चे के मस्तिष्क का गणितीयकरण (Mathematization of thought) करना है? राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के अनुसार, गणित शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बच्चे की सोच का गणितीयकरण करना है, न कि केवल उसे रटे-रटाए सूत्र सिखाना।


2. गणित की प्रमुख परिभाषाएँ (Definitions of Mathematics)

परीक्षाओं में अक्सर सीधे कथन देकर पूछा जाता है कि यह परिभाषा किस विद्वान ने दी है। यहाँ कुछ सबसे महत्वपूर्ण परिभाषाएँ दी जा रही हैं:

  • गैलीलियो (Galileo):

    "गणित वह भाषा है, जिसमें परमेश्वर ने सम्पूर्ण जगत या ब्रह्माण्ड को लिख दिया है।"

    (यह परिभाषा गणित की सार्वभौमिकता और वैज्ञानिक आधार को दर्शाती है।)

  • लॉक (Locke):

    "गणित वह मार्ग है, जिसके द्वारा बच्चों के मन या मस्तिष्क में तर्क करने की आदत स्थापित होती है।"

    (यह परिभाषा CTET में कई बार पूछी गई है। यह गणित के मानसिक अनुशासनात्मक मूल्य पर जोर देती है।)

  • रोजर बेकन (Roger Bacon):

    "गणित सभी विज्ञानों का सिंह द्वार एवं कुँजी है।"

    (इसका अर्थ है कि विज्ञान की किसी भी शाखा को समझने के लिए गणित का ज्ञान प्रवेश द्वार के समान है।)

  • मार्शल एच. स्टोन (Marshall H. Stone):

    "गणित ऐसी अमूर्त व्यवस्था का अध्ययन है, जो कि अमूर्त तत्त्वों से मिलकर बना है। इन तत्त्वों को मूर्त रूप में परिभाषित किया गया है।"

  • बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell):

    "गणित एक ऐसा विषय है जिसमें हम यह भी नहीं जानते कि हम किसके बारे में बात कर रहे हैं और न ही यह जान पाते हैं कि हम जो कह रहे हैं, वह सत्य है।"

    (यह कथन गणित की अत्यधिक अमूर्त प्रकृति और स्वयंसिद्धों पर निर्भरता को दर्शाता है।)

  • होगबेन (Hogben):

    "गणित सभ्यता और संस्कृति का दर्पण है।"

    (यह गणित के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को बताता है।)

  • बेंजामिन पीयर्स (Benjamin Peirce):

    "गणित वह विज्ञान है, जिसमें आवश्यक निष्कर्ष निकाले जाते हैं।"


3. गणित की प्रकृति और विशेषताएँ (Nature and Characteristics)

गणित की प्रकृति अन्य विषयों (जैसे इतिहास या साहित्य) से भिन्न है। इसकी अपनी भाषा, अपने संकेत और अपनी संरचना है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:

3.1 तार्किक संरचना (Logical Structure)

गणित रटने का विषय नहीं है, यह पूर्णतः तर्क पर आधारित है। गणित में 'क्या' (What) से अधिक 'कैसे' (How) और 'क्यों' (Why) महत्वपूर्ण है।

  • गणित की समस्याओं का हल एक निश्चित तार्किक क्रम (Algorithm) का पालन करता है।

  • उदाहरण के लिए, यदि $A > B$ और $B > C$, तो तार्किक रूप से $A > C$ होगा। यह निगमन तर्क का उदाहरण है।

3.2 अमूर्तता (Abstractness)

गणित की अवधारणाएँ अमूर्त होती हैं। हम 'तीन' या 'पाँच' को भौतिक रूप में नहीं देख सकते, हम केवल 3 सेब या 5 पेन देख सकते हैं। 'संख्या' अपने आप में एक अमूर्त विचार है।

  • गणित में हम अमूर्त विचारों को संकेतों में बदलते हैं।

  • शिक्षण का कार्य इन 'अमूर्त' (Abstract) अवधारणाओं को 'मूर्त' (Concrete) उदाहरणों से जोड़ना है।

  • उदाहरण: 'गोला' (Sphere) एक अमूर्त गणितीय आकृति है, जबकि 'गेंद' उसका मूर्त उदाहरण है।

3.3 सांकेतिक भाषा (Symbolic Language)

गणित की अपनी एक सार्वभौमिक भाषा है जिसमें संकेत, चिह्न और सूत्र शामिल हैं। यह भाषा किसी देश या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है।

  • चिह्न: $+$, $-$, $\times$, $\div$, $=$, $\sum$, $\int$ आदि।

  • चर राशियाँ: $x$, $y$, $z$ आदि।

  • यह भाषा संक्षिप्त (Brief) और सटीक (Precise) होती है। लंबे कथनों को छोटे समीकरणों में लिखा जा सकता है।

    • कथन: "किसी संख्या के दोगुने में पाँच जोड़ने पर पंद्रह प्राप्त होता है।"

    • गणितीय रूप: $2x + 5 = 15$

3.4 यथार्थता और सटीकता (Exactness and Precision)

गणित में उत्तर या तो सही होता है या गलत, इसमें 'शायद' की गुंजाइश बहुत कम होती है (प्रायिकता को छोड़कर, जो स्वयं अनिश्चितता को मापने का गणित है)।

  • $2 + 2$ हमेशा $4$ होगा, चाहे वह भारत में हो या अमेरिका में।

  • यह विज्ञान की क्रमबद्ध और संगठित शाखा है।

3.5 आगमनात्मक और निगमनात्मक विवेचन (Inductive and Deductive Reasoning)

गणित की प्रकृति में दो प्रकार के तर्क प्रमुख हैं:

  1. आगमन (Induction): विशिष्ट उदाहरणों से सामान्य नियम की ओर जाना। (उदाहरण $\rightarrow$ नियम)

    • जैसे: कई त्रिभुजों के कोणों को मापकर यह निष्कर्ष निकालना कि "त्रिभुज के तीनों कोणों का योग $180^\circ$ होता है।"

  2. निगमन (Deduction): सामान्य नियम से विशिष्ट सत्य की ओर जाना। (नियम $\rightarrow$ उदाहरण/हल)

    • जैसे: सूत्र $Area = \pi r^2$ का प्रयोग करके किसी विशिष्ट वृत्त का क्षेत्रफल निकालना।

3.6 विज्ञानों का आधार (Base of Sciences)

भौतिकी, रसायन और खगोल विज्ञान गणित के बिना अधूरे हैं।

  • गुरुत्वाकर्षण का नियम: $F = G \frac{m_1 m_2}{r^2}$ (गणितीय सूत्र के बिना इसे व्यक्त करना कठिन है)।

  • इसलिए इसे "विज्ञानों की रानी" (Queen of Sciences) भी कहा जाता है (गॉस के अनुसार)।


4. गणित शिक्षण का महत्व और मूल्य (Importance and Values)

विद्यालयी पाठ्यक्रम में गणित को शामिल करने के पीछे कई ठोस कारण हैं:

4.1 मानसिक अनुशासन का मूल्य

जैसा कि लॉक ने कहा, यह मस्तिष्क को प्रशिक्षित करता है। यह छात्रों में एकाग्रता, धैर्य और आत्मविश्वास विकसित करता है। जब एक छात्र किसी कठिन समस्या को हल करता है, तो उसमें "मैं कर सकता हूँ" की भावना जागृत होती है।

4.2 व्यावहारिक मूल्य

दैनिक जीवन में खरीद-फरोख्त, बजट बनाना, समय देखना, यात्रा की दूरी मापना—सब कुछ गणित पर निर्भर है। प्राथमिक स्तर पर 'अंकगणित' का ज्ञान इसीलिए अनिवार्य है।

4.3 वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

गणित छात्रों को तथ्यों की सत्यता की जाँच करना सिखाता है। यह अंधविश्वासों को दूर करता है क्योंकि गणित में "बिना प्रमाण के कुछ भी सत्य नहीं माना जाता"।


5. गणितीय कथन और प्रश्न (Mathematical Statements and Questions)

CTET में अक्सर 'खुले अंत वाले' और 'बंद अंत वाले' प्रश्नों पर सवाल पूछे जाते हैं। यह गणित की प्रकृति का एक व्यावहारिक पहलू है।

5.1 बंद अंत वाले प्रश्न (Closed-ended Questions)

ये वे प्रश्न हैं जिनका केवल एक निश्चित उत्तर होता है। ये तथ्यात्मक ज्ञान और रटने की क्षमता की जाँच करते हैं।

  • उदाहरण: $15 \times 3$ का मान क्या है? (उत्तर केवल $45$ है।)

  • उदाहरण: सबसे छोटी अभाज्य संख्या कौन सी है? (उत्तर केवल $2$ है।)

5.2 खुले अंत वाले प्रश्न (Open-ended Questions)

ये वे प्रश्न हैं जिनके एक से अधिक सही उत्तर हो सकते हैं। ये प्रश्न छात्रों की सृजनात्मकता (Creativity) और अपसारी चिंतन (Divergent Thinking) को बढ़ावा देते हैं। NCF 2005 ऐसे प्रश्नों पर जोर देता है।

  • उदाहरण: ऐसी दो संख्याएँ बताइए जिनका गुणनफल $45$ हो?

    • उत्तर: $(1, 45)$, $(3, 15)$, $(5, 9)$... (कई उत्तर संभव हैं)।

  • उदाहरण: एक आयत के बारे में आप जो भी गणितीय जानकारी जानते हैं, लिखिए।


6. गणित शिक्षण की विधियाँ (Teaching Methods in Mathematics)

गणित की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, इसे पढ़ाने के तरीके भी विशेष होते हैं:

  1. विश्लेषण विधि (Analytic Method): समस्या को छोटे-छोटे भागों में तोड़कर हल करना। ("अज्ञात से ज्ञात की ओर")। यह सिद्ध करने वाले प्रश्नों (Theorems) के लिए उत्तम है।

  2. संश्लेषण विधि (Synthetic Method): ज्ञात तथ्यों को जोड़कर निष्कर्ष तक पहुँचना। ("ज्ञात से अज्ञात की ओर")।

  3. आगमन विधि (Inductive Method): पहले कई उदाहरण देना, फिर नियम बनवाना। प्राथमिक स्तर के लिए सर्वश्रेष्ठ।

  4. निगमन विधि (Deductive Method): पहले सूत्र बता देना, फिर प्रश्न हल करवाना। उच्च कक्षाओं और समय बचाने के लिए उपयोगी।

  5. समस्या समाधान विधि (Problem Solving): छात्रों के सामने एक वास्तविक चुनौती रखना जिसे वे अपने गणितीय ज्ञान से सुलझाएँ।


7. गणितीय पाठ्यक्रम की संरचना (Structure of Mathematical Curriculum)

पाठ्यक्रम निर्माण में गणित की प्रकृति का विशेष ध्यान रखा जाता है:

  • क्रमबद्धता: गणित का पाठ्यक्रम सीढ़ीनुमा होता है। यदि छात्र को 'जोड़' नहीं आता, तो वह 'गुणा' नहीं सीख सकता। यदि 'बीजगणित' नहीं आता, तो 'त्रिकोणमिति' कठिन होगी।

  • लचीलापन: पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो कमजोर और प्रतिभाशाली दोनों प्रकार के छात्रों की आवश्यकताओं को पूरा करे।

  • जीवन से जुड़ाव: NCF 2005 के अनुसार, "गणित को बच्चे के जीवन के अनुभवों का हिस्सा बनाना चाहिए।"


8. गणित शिक्षण में त्रुटियाँ और उपचारात्मक शिक्षण

गणित में त्रुटियाँ (Errors) सीखने का एक अभिन्न अंग हैं। शिक्षक को त्रुटियों को नकारात्मक रूप में नहीं, बल्कि यह समझने के संसाधन के रूप में देखना चाहिए कि बच्चा सोच कैसे रहा है।

  • उदाहरण: यदि बच्चा लिखता है $0.5 \times 10 = 0.50$, तो यह दर्शाता है कि उसने दशमलव के स्थान का सही संप्रत्यय नहीं बनाया है।

  • उपचार: ड्रिल कार्य (Drill Work) और अभ्यास गणित में निपुणता लाते हैं, लेकिन इसका प्रयोग समझ विकसित होने के बाद ही किया जाना चाहिए।


9. गणित: कला या विज्ञान? (Art or Science?)

यह अक्सर बहस का विषय होता है।

  • गणित विज्ञान है: क्योंकि यह तर्क, प्रयोग और निश्चित निष्कर्षों पर आधारित है।

  • गणित कला है: क्योंकि इसमें पैटर्न, सममिति (Symmetry) और सौंदर्य बोध (Aesthetic sense) होता है। गणितीय आकृतियों (जैसे फ्रैक्टल्स) में अद्भुत सुंदरता होती है।

  • निष्कर्ष: गणित विज्ञान और कला दोनों का संगम है।


सारांश (Summary Points)

  1. गणित गणनाओं, स्थान, दिशा और मापन का विज्ञान है।

  2. यह अमूर्त विचारों को समझने का एक मूर्त माध्यम है।

  3. इसकी प्रकृति तार्किक, सटीक और क्रमबद्ध है।

  4. गणित शिक्षण का मुख्य उद्देश्य छात्रों की सोच का गणितीयकरण करना है।

  5. खुले अंत वाले प्रश्न छात्रों में सृजनात्मकता विकसित करते हैं।



गणित का स्वरूप: अवधारणा, परिभाषाएँ और शिक्षण शास्त्र

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