1. धातु विज्ञान और लौह स्तंभ (The Iron Pillar)
प्राचीन भारतीय शिल्पकार धातु विज्ञान में अत्यंत निपुण थे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण दिल्ली में स्थित लौह स्तंभ है।
स्थान: यह महरौली (दिल्ली) में कुतुब मीनार परिसर में स्थित है।
निर्माण काल: इसका निर्माण लगभग 1500 वर्ष पूर्व हुआ था।
शासक की पहचान: स्तंभ पर खुदे हुए अभिलेख में 'चंद्र' नामक एक शासक का उल्लेख है। इतिहासकार इसे गुप्त वंश (संभवतः चंद्रगुप्त द्वितीय) से जोड़ते हैं।
संरचनात्मक विशेषताएं:
ऊँचाई: 7.2 मीटर।
वजन: 3 टन से भी अधिक।
वैज्ञानिक चमत्कार: इस स्तंभ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 1500 वर्षों से खुले आसमान के नीचे, बारिश और धूप में खड़े होने के बावजूद इसमें आज तक जंग (Rust) नहीं लगा है। यह प्राचीन भारत की विकसित धातु तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण है।
अन्य धातु कार्य: हड़प्पावासी तांबे के धातु कर्म (Metallurgy) में कुशल थे और उन्होंने टिन और तांबे को मिलाकर कांस्य (Bronze) बनाया था, जबकि लौह स्तंभ लौह युग की उन्नति को दर्शाता है।
2. ईंटों और पत्थरों की इमारतें: स्तूप (Stupas)
बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ-साथ स्तूप निर्माण की परंपरा विकसित हुई। मौर्य काल से लेकर बाद के कालों तक स्तूप वास्तुकला में कई बदलाव आए।
शाब्दिक अर्थ: 'स्तूप' का शाब्दिक अर्थ 'टीला' होता है।
आकार: स्तूप विभिन्न आकारों के होते थे - कभी गोल, कभी लंबे, तो कभी बड़े या छोटे।
धातुमंजूषा (Relic Casket):
सभी स्तूपों के भीतर एक छोटा सा डिब्बा रखा जाता है।
इस डिब्बे में बुद्ध या उनके अनुयायियों के शारीरिक अवशेष (जैसे दाँत, हड्डी, या राख) रखे जाते हैं।
कभी-कभी इसमें उनके द्वारा प्रयुक्त वस्तुएं या कीमती पत्थर और सिक्के भी रखे जाते थे।
इसे स्तूप का 'हृदय' माना जाता है। इसे मिट्टी के टीले से ढक दिया जाता था, और बाद में ईंटों और पत्थरों से सजाया जाता था।
प्रदक्षिणा पथ:
स्तूप के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए एक वृत्ताकार रास्ता बना होता है, जिसे प्रदक्षिणा पथ कहते हैं।
इस रास्ते को रेलिंग (Railings) से घेरा जाता था।
श्रद्धालु इस पथ पर घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में परिक्रमा करते हैं, जो भक्ति का प्रतीक है।
तोरण (Gateways): रेलिंग और प्रवेश द्वारों (तोरण) को अक्सर विस्तृत मूर्तिकला और नक्काशी से सजाया जाता था।
प्रमुख उदाहरण:
सांची का स्तूप (मध्य प्रदेश): यह एक महान स्तूप है जिसका निर्माण कई सदियों में हुआ। ईंटों का टीला संभवतः अशोक के समय का है, जबकि रेलिंग और प्रवेश द्वार बाद के शासकों (शुंग/सातवाहन) द्वारा जोड़े गए।
अमरावती: यहाँ कभी एक भव्य स्तूप हुआ करता था। लगभग 2000 साल पहले इसे पत्थरों पर उकेरे गए चित्रों से सजाया गया था।
3. हिंदू मंदिरों का निर्माण
जिस समय स्तूप बनाए जा रहे थे, उसी समय हिंदू मंदिरों का निर्माण भी शुरू हुआ। ये मंदिर विशेष रूप से विष्णु, शिव और दुर्गा जैसे देवी-देवताओं की पूजा के लिए बनाए गए थे।
मंदिर वास्तुकला के प्रमुख अंग:
गर्भगृह:
यह मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता था।
यह एक छोटा कमरा होता था जहाँ मुख्य देवी या देवता की मूर्ति स्थापित की जाती थी।
पुरोहित यहीं धार्मिक अनुष्ठान करते थे और भक्त पूजा करते थे।
शिखर:
गर्भगृह को पवित्र और भव्य दिखाने के लिए उसके ठीक ऊपर काफी ऊँचाई तक निर्माण किया जाता था।
इस ऊँची संरचना को शिखर कहते हैं।
मंडप:
यह एक सभागार या हॉल होता था।
यहाँ लोग इकट्ठा होते थे, भजन-कीर्तन करते थे और धार्मिक चर्चाएं होती थीं।
प्रमुख प्राचीन मंदिर:
भीतरगाँव का मंदिर (उत्तर प्रदेश):
यह लगभग 1500 साल पहले बना था।
यह पकी हुई ईंटों और पत्थरों से बना एक आरंभिक मंदिर है।
इस पर शिखर निर्माण का प्रारंभिक रूप देखा जा सकता है।
महाबलीपुरम के एकाश्मक मंदिर (तमिलनाडु):
इन्हें 'रथ मंदिर' भी कहा जाता है।
विशेषता: ये 'एकाश्मक' (Monolithic) हैं, अर्थात इन्हें एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर तराश कर बनाया गया है।
ईंटों के मंदिरों में नीचे से ऊपर की ओर निर्माण होता है, जबकि इनमें पत्थर काटने वालों ने ऊपर से नीचे की ओर काम किया।
ऐहोल (कर्नाटक):
इसे 'मंदिर वास्तुशिल्प का पालना' कहा जा सकता है।
यहाँ का दुर्गा मंदिर लगभग 1400 साल पहले बनाया गया था।
यह अपनी अर्द्ध-वृत्ताकार (apsidal) पिछली संरचना के लिए प्रसिद्ध है।
4. चित्रकला (Paintings)
प्राचीन भारत में चित्रकला का सर्वोत्तम उदाहरण अजंता (Ajanta) की गुफाओं में मिलता है।
स्थान: अजंता (महाराष्ट्र)।
संदर्भ: यह वह जगह है जहाँ पहाड़ों में सैकड़ों सालों के दौरान कई गुफाएं खोदी गईं।
निर्माता: इनमें से ज्यादातर गुफाएं बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनाए गए विहार (Viharas) थे।
सजावट: इन गुफाओं को बेहतरीन चित्रों से सजाया गया है। चूंकि गुफाओं के अंदर अंधेरा होता था, इसलिए ये चित्र मशालों (Torches) की रोशनी में बनाए गए थे।
रंगों का रहस्य:
इन चित्रों के रंग 1500 साल बाद भी चमकदार और जीवंत हैं।
ये रंग पौधों (Plants) और खनिजों (Minerals) से बनाए गए थे।
आश्चर्य की बात यह है कि इन महान कलाकारों के नाम आज भी अज्ञात हैं।
विषय: चित्रों में मुख्य रूप से जातक कथाओं और बुद्ध के जीवन को दर्शाया गया है।
5. पुस्तकों की दुनिया (The World of Books)
इस युग में कई प्रसिद्ध महाकाव्यों की रचना हुई। महाकाव्य विशाल और लंबी रचनाएं होती हैं जो वीर पुरुषों, महिलाओं और देवताओं की कहानियों पर आधारित होती हैं।
(A) तमिल महाकाव्य (Sangam Era Epics)
लगभग 1800 से 2000 साल पहले दक्षिण भारत में दो महान तमिल महाकाव्यों की रचना हुई:
सिलप्पदिकारम (Silappadikaram):
रचयिता: इलांगो अडिगल (Ilango Adigal)।
समय: लगभग 1800 वर्ष पूर्व।
कथा: यह कोवलन (Kovalan) नामक एक व्यापारी की कहानी है जो पुहार (Puhar) में रहता था। उसे माधवी नामक एक नर्तकी से प्रेम हो जाता है, जिससे वह अपनी पत्नी कन्नगी (Kannagi) की उपेक्षा करता है। बाद में, वह और कन्नगी मदुरै चले जाते हैं। वहाँ पांड्य राजा के दरबारी जौहरी द्वारा कोवलन पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जाता है और राजा उसे मृत्युदंड देता है। कन्नगी, जो अभी भी उससे प्रेम करती थी, इस अन्याय के खिलाफ क्रोध और दुख से भर जाती है और मदुरै शहर का विनाश कर देती है।
मणिमेकलई (Manimekalai):
रचयिता: सत्तनार (Sattanar)।
समय: लगभग 1400 वर्ष पूर्व।
कथा: यह कोवलन और माधवी की बेटी की कहानी है।
ये रचनाएं कई सदियों तक खो गई थीं, लेकिन लगभग 100 साल पहले इनकी पांडुलिपियां दोबारा मिलीं।
(B) संस्कृत साहित्य
कालिदास: इन्होने संस्कृत में रचनाएं कीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मेघदूत है।
मेघदूत: यह एक गीति-काव्य है जिसमें एक विरही प्रेमी बरसात के बादल (मेघ) को अपना दूत बनाकर अपनी प्रेमिका के पास संदेश भेजने की कल्पना करता है।
पुराण (Puranas):
'पुराण' का शाब्दिक अर्थ है 'प्राचीन'।
विषय: इनमें विष्णु, शिव, दुर्गा या पार्वती जैसे देवी-देवताओं की कहानियां हैं।
इनमें दुनिया के निर्माण (सृष्टि) और राजाओं वंशावलियों के बारे में भी जानकारी मिलती है।
भाषा और पहुंच: पुराण सरल संस्कृत भाषा में लिखे गए थे ताकि सब उन्हें समझ सकें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हें स्त्रियाँ और शूद्र (जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी) भी सुन सकते थे।
इनका पाठ पुजारी मंदिरों में करते थे।
(C) महाभारत और रामायण
ये दोनों महाकाव्य सदियों से लोकप्रिय रहे हैं।
महाभारत:
यह कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध की कहानी है।
उद्देश्य: हस्तिनापुर की गद्दी प्राप्त करना।
यह कहानी बहुत पुरानी है, लेकिन इसका लिखित रूप (जैसा हम आज जानते हैं) लगभग 1500 साल पहले महर्षि व्यास द्वारा संकलित किया गया।
भगवद्गीता महाभारत का ही एक भाग है।
रामायण:
यह कौशल के राजकुमार राम की कहानी है।
राम को वनवास दिया गया, जहाँ उनकी पत्नी सीता का लंका के राजा रावण ने अपहरण किया। राम ने रावण को हराकर सीता को वापस पाया।
इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि माने जाते हैं।
6. ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें (Science and Technology)
गुप्त काल और उसके आसपास का समय विज्ञान और गणित के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी था।
(A) आर्यभट्ट
परिचय: वे एक महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री (Astronomer) थे।
ग्रंथ: उन्होंने संस्कृत में आर्यभट्टीयम नामक पुस्तक लिखी।
प्रमुख सिद्धांत:
दिन और रात: उन्होंने लिखा कि दिन और रात पृथ्वी के अपनी धुरी पर चक्कर काटने (Rotation) की वजह से होते हैं। (जबकि उस समय आम धारणा यह थी कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है)।
ग्रहण (Eclipses): उन्होंने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के लिए वैज्ञानिक तर्क दिए।
वृत्त की परिधि: उन्होंने वृत्त की परिधि (Circumference) निकालने की विधि भी ढूँढ निकाली, जो आज प्रयुक्त होने वाले सूत्र ($C = 2\pi r$) के लगभग बराबर ही सटीक है।
(B) शून्य (Zero)
अंकों का प्रयोग पहले से होता था, लेकिन भारत के गणितज्ञों ने 'शून्य' के लिए एक विशेष चिन्ह का आविष्कार किया।
यह गिनती की पद्धति (दशमलव प्रणाली) बाद में अरबों द्वारा अपनाई गई और फिर यूरोप तक फैली।
रोम के निवासी शून्य का प्रयोग किए बिना गिनती करते थे।
(C) आयुर्वेद (Ayurveda)
आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान की एक विख्यात पद्धति है जो प्राचीन भारत में विकसित हुई। दो प्रसिद्ध चिकित्सक थे:
चरक:
समय: प्रथम-द्वितीय शताब्दी ईसवी (कुषाण काल के आसपास)।
ग्रंथ: चरक संहिता। यह औषधि शास्त्र की एक विस्तृत पुस्तक है।
सुश्रुत:
समय: लगभग चौथी शताब्दी ईसवी।
ग्रंथ: सुश्रुत संहिता।
योगदान: इसमें उन्होंने शल्य चिकित्सा (Surgery) की विधियों का विस्तृत वर्णन किया है।
7. अन्य ऐतिहासिक तथ्य (Additional Facts for CTET)
कागज़ का आविष्कार:
कागज़ का आविष्कार करीब 1900 साल पहले काई लुन (Cai Lun) नामक व्यक्ति ने चीन में किया था।
उसने पौधों के रेशों, कपड़ों, रस्सियों और पेड़ की छाल को पीट-पीट कर लुगदी (Pulp) बनाई और उससे कागज़ तैयार किया।
यह तकनीक सदियों तक गुप्त रखी गई।
करीब 1400 साल पहले यह कोरिया पहुँची, फिर जापान।
बगदाद में यह करीब 1800 साल पहले पहुँची, जहाँ से यह यूरोप, अफ्रीका और अन्य एशिया में फैली।
जातक कथाएं: आम लोगों द्वारा कही जाने वाली कहानियों को बौद्ध भिक्षुओं ने लिखा और सुरक्षित किया। सांची के स्तूप की रेलिंग और अजंता के चित्रों में भी जातक कथाएं दिखाई गई हैं।
तीर्थयात्री: चीनी बौद्ध तीर्थयात्री (फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग) भारत आए और वे अपने साथ कई पांडुलिपियाँ और बुद्ध की मूर्तियाँ ले गए। ह्वेनसांग (Xuan Zang) ने अपना जीवन संस्कृत पांडुलिपियों का चीनी में अनुवाद करने में बिताया।
निष्कर्ष
प्राचीन भारत की इमारतें, चित्रकला और पुस्तकें हमें उस समय की समृद्ध संस्कृति, धार्मिक सहिष्णुता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय देती हैं। लौह स्तंभ से लेकर आर्यभट्ट के सिद्धांतों तक, यह कालखंड भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है जो सीटीईटी परीक्षा के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
इमारतें, चित्र तथा किताबें
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