1. भूमि संसाधन (Land Resources)
भूमि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। भूपृष्ठ के कुल क्षेत्रफल का लगभग $30\%$ भाग भूमि है। शेष $70\%$ भाग पर जल है।
भूमि का वितरण और जनसंख्या:
विश्व की $90\%$ जनसंख्या भूमि क्षेत्र के मात्र $30\%$ भाग पर निवास करती है।
शेष $70\%$ भूमि पर या तो विरल जनसंख्या है या वह निर्जन है।
सघन बसावट वाले क्षेत्र: नदी घाटियां और उर्वर मैदान (कृषि के लिए उपयुक्त)।
विरल बसावट वाले क्षेत्र: खड़ी ढाल, पर्वतीय क्षेत्र, जलाक्रांत क्षेत्र (जहां पानी जमा रहता है), मरुस्थल और सघन वन।
भूमि उपयोग (Land Use):
भूमि का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता है, जिसे 'भूमि उपयोग' कहते हैं:
कृषि
वानिकी
खनन
सड़क निर्माण
उद्योगों की स्थापना
भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारक:
भौतिक कारक: स्थलाकृति, मृदा, जलवायु, खनिज और जल की उपलब्धता।
मानवीय कारक: जनसंख्या और प्रौद्योगिकी।
स्वामित्व के आधार पर भूमि का वर्गीकरण:
निजी भूमि: व्यक्तियों के स्वामित्व में होती है।
सामुदायिक भूमि: समुदाय के स्वामित्व में होती है (जैसे- चारा, फल, नट या औषधीय जड़ी-बूटियां एकत्र करने के लिए)। इसे साझा संपत्ति संसाधन भी कहा जाता है।
2. भूस्खलन (Landslides)
पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन एक मुख्य प्राकृतिक आपदा है। यह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में चट्टानों, मलबे या पृथ्वी के खिसकने की घटना है।
भूस्खलन के कारण:
भूकंप
बाढ़
ज्वालामुखी
लंबे समय तक भारी वर्षा (जिससे नदी का प्रवाह रुक सकता है)।
न्यूनीकरण क्रियाविधि (बचाव के उपाय):
प्रतिधारी दीवार (Retention Wall): खिसकने वाली भूमि को रोकने के लिए दीवार का निर्माण करना।
वनस्पति आवरण: वनस्पति आवरण में वृद्धि कंक्रीट की दीवारों की तुलना में भूस्खलन को रोकने का एक सस्ता और प्रभावी तरीका है, क्योंकि जड़ें मिट्टी को जकड़ कर रखती हैं।
सतही अपवाह नियंत्रण: वर्षा जल और झरने के प्रवाह को रोककर भूस्खलन की गति को नियंत्रित करना।
3. मृदा संसाधन (Soil Resources)
पृथ्वी के पृष्ठ पर दानेदार कणों के आवरण की पतली परत मृदा कहलाती है। यह भूमि से निकटता से जुड़ी हुई है।
मृदा निर्माण:
मृदा का निर्माण चट्टानों से प्राप्त खनिजों और जैव पदार्थों तथा भूमि पर पाए जाने वाले खनिजों से होता है। यह अपक्षय (Weathering) की प्रक्रिया के माध्यम से बनती है।
महत्वपूर्ण तथ्य: केवल $1$ सेंटीमीटर मृदा को बनने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं।
मृदा निर्माण के कारक:
मृदा निर्माण में पांच प्रमुख कारक भूमिका निभाते हैं:
जनक शैल (Parent Rock): यह मृदा के रंग, गठन, रासायनिक गुणधर्म, खनिज मात्रा और पारगम्यता को निर्धारित करती है।
जलवायु (Climate): तापमान, वर्षा अपक्षय और ह्यूमस निर्माण की दर को प्रभावित करते हैं।
उच्चावच (Relief): तुंगता (ऊंचाई) और ढाल मृदा के संचय को निर्धारित करते हैं।
वनस्पति, प्राणिजात और सूक्ष्मजीव: ये ह्यूमस निर्माण की दर को प्रभावित करते हैं।
समय (Time): यह मृदा परिच्छेदिका की मोटाई को निश्चित करता है।
4. मृदा का निम्नीकरण और संरक्षण के उपाय
मृदा अपरदन और क्षीणता मृदा संसाधन के लिए दो मुख्य खतरे हैं।
मृदा निम्नीकरण के कारक:
वनोन्मूलन
अतिचारण
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग
वर्षा दोहन
भूस्खलन और बाढ़
मृदा संरक्षण की विधियां (CTET के लिए अति महत्वपूर्ण):
मल्चिंग (Mulching):
पौधों के बीच की अनावृत (खाली) भूमि को जैव पदार्थ जैसे प्रवाल (पुआल/भूसा) की एक परत से ढक दिया जाता है।
उद्देश्य: इससे मृदा की आर्द्रता (नमी) रुकी रहती है।
वेदिका फार्म (Terrace Farming):
चौड़े, समतल सोपान अथवा वेदिका तीव्र ढालों पर बनाए जाते हैं।
उद्देश्य: ताकि सपाट सतह फसल उगाने के लिए उपलब्ध हो जाए और पृष्ठीय प्रवाह व मृदा अपरदन कम हो।
समुच्चरेखीय जुताई (Contour Ploughing):
एक पहाड़ी ढाल पर समुच्च रेखाओं के समानांतर जुताई करना।
उद्देश्य: ढाल से नीचे बहते जल के लिए एक प्राकृतिक अवरोध का निर्माण करना।
रक्षक मेखलाएं (Shelter Belts):
तटीय और शुष्क प्रदेशों में पवन की गति रोकने के लिए वृक्ष कतारों में लगाए जाते हैं।
उद्देश्य: मृदा आवरण को बचाना।
समुच्चरेखीय रोधिकाएं:
समुच्च रेखाओं पर रोधिकाएं बनाने के लिए पत्थरों, घास, मृदा का उपयोग किया जाता है। रोधिकाओं के सामने जल एकत्र करने के लिए खाइयां बनाई जाती हैं।
चट्टान बांध:
यह जल के प्रवाह को कम करने के लिए बनाए जाते हैं। यह नालियों की रक्षा करते हैं और मृदा क्षति को रोकते हैं।
बीज की फसल (Intercropping):
वर्षा दोहन से मृदा को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न फसलें एकांतर कतारों में उगाई जाती हैं।
5. जल संसाधन (Water Resources)
जल एक नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है। भूपृष्ठ का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है, इसलिए पृथ्वी को 'जल ग्रह' कहना उपयुक्त है।
जल का वितरण:
महासागरों का जल: लवणीय (खारा) है और मानवीय उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं है।
अलवण जल (Fresh Water): केवल $2.7\%$ है।
बर्फ की चादरों और हिमानियों के रूप में: इस $2.7\%$ का लगभग $70\%$ भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय प्रदेशों में है।
मानव उपयोग के लिए उपलब्ध जल: कुल जल का केवल $1\%$ ही मानव उपयोग के लिए उपयुक्त और उपलब्ध है। यह भौम जल, नदियों और झीलों में पृष्ठीय जल तथा वायुमंडल में जलवाष्प के रूप में पाया जाता है।
जल चक्र:
जल निरंतर गतिशील है। वाष्पीकरण, वर्षण और वाह की प्रक्रियाओं द्वारा महासागरों, वायु, भूमि और पुनः महासागरों में चक्रण को जल चक्र कहते हैं।Getty Images
जल उपलब्धता की समस्याएं:
विश्व के कई प्रदेशों में जल की कमी है।
प्रभावित क्षेत्र: अधिकांश अफ्रीका, पश्चिमी एशिया, दक्षिणी एशिया, पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका, उत्तर-पश्चिमी मैक्सिको, दक्षिण अमेरिका के भाग और संपूर्ण ऑस्ट्रेलिया।
कारण: यह कमी मौसमी अथवा वार्षिक वर्षण में विविधता के परिणामस्वरूप हो सकती है या अति-उपयोग और जल स्रोतों के संदूषण के कारण।
जल संसाधनों का संरक्षण:
शोधन: पीड़कनाशी, रसायन और औद्योगिक बहिःस्राव जल को प्रदूषित करते हैं। इन रसायनों को जल निकायों में छोड़ने से पहले शोधित करना चाहिए।
वन और वनस्पति आवरण: ये धरातलीय प्रवाह को मंद करते हैं और भौम जल को पुनः पूरित करते हैं।
जल संग्रहण (Rainwater Harvesting): पृष्ठीय प्रवाह को बचाने के लिए वर्षा जल संग्रहण एक प्रभावी विधि है।
तथ्य: एक औसत व्यक्ति द्वारा प्रतिदिन लगभग $150$ लीटर जल का उपयोग किया जाता है।
तथ्य: वर्षा जल संग्रहण में, छत से वर्षा जल एकत्र करके उसे भविष्य के उपयोग के लिए टांकों में जमा किया जाता है। $2$ घंटे की बारिश का दौर $8,000$ लीटर तक पानी बचा सकता है।
सिंचाई की विधियां:
नहरें: नहरों को पक्का करना चाहिए ताकि रिसाव से पानी नष्ट न हो।
स्प्रिंकलर (Sprinklers): रिसाव और वाष्पीकरण से होने वाली जल क्षति को कम करने के लिए स्प्रिंकलर प्रभावी हैं।
टपकन/ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation): वाष्पीकरण की अधिक दर वाले शुष्क प्रदेशों में यह विधि बहुत उपयोगी है।
6. प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन
प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन केवल स्थल मंडल, जल मंडल और वायुमंडल के बीच जुड़े एक संकरे क्षेत्र में ही पाए जाते हैं, जिसे जैव मंडल (Biosphere) कहते हैं।
पारितंत्र (Ecosystem):
जैव मंडल में सभी जीवित जातियां जीवित रहने के लिए एक-दूसरे पर परस्पर निर्भर और संबंधित रहती हैं। इस जीवन आधारित तंत्र को पारितंत्र कहते हैं।
वनस्पति का वितरण:
वनस्पति की वृद्धि मुख्य रूप से तापमान और आर्द्रता पर निर्भर करती है।
वन (Forests): भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में विशाल वृक्ष उगते हैं। जैसे-जैसे आर्द्रता कम होती है, वृक्षों का आकार और सघनता कम हो जाती है।
घास स्थल (Grasslands): सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में छोटे आकार वाले वृक्ष और घास उगती है।
गुल्म (Scrubs): कम वर्षा वाले शुष्क प्रदेशों में कंटीली झाड़ियां और गुल्म उगते हैं। इन पौधों की जड़ें गहरी होती हैं और वाष्पोत्सर्जन से होने वाली आर्द्रता की हानि को घटाने के लिए इनकी पत्तियों की सतह कांटेदार और मोमी होती है।
टुंड्रा (Tundra): शीत ध्रुवीय प्रदेशों की वनस्पति में काई (मॉस) और लाइकेन सम्मिलित हैं।
वनों का वर्गीकरण (पत्तियों के आधार पर):
सदाबहार वन: ये वन किसी भी ऋतु में अपनी पत्तियां एक साथ नहीं गिराते।
पर्णपाती वन: ये वन वाष्पोत्सर्जन से होने वाली हानि को रोकने के लिए किसी विशेष ऋतु में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं।
7. प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन का संरक्षण
मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रजातियां असुरक्षित अथवा संकटपन्न हैं और कुछ लुप्त होने के कगार पर हैं।
वनों में आग (दावानल):
यह जीव-जंतुओं और वनस्पति के लिए एक बड़ा खतरा है।
कारण: तड़ित झंझा (बिजली गिरना), लोगों की लापरवाही, या शरारत।
नियंत्रण: शिक्षण द्वारा जागरूकता, उपग्रहों का उपयोग करके अग्नि बिंदुओं का पता लगाना।
संरक्षण के उपाय:
राष्ट्रीय उद्यान (National Park): वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के लिए एक या एक से अधिक पारितंत्रों की पारिस्थितिकी एकता की रक्षा के लिए नामित किया गया प्राकृतिक क्षेत्र।
वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary): विशेष प्रजातियों के सुरक्षित आवास।
जैवमंडल निचय (Biosphere Reserve): यह वैश्विक नेटवर्क द्वारा जुड़े रक्षित क्षेत्रों की एक श्रृंखला है, जिसे संरक्षण और विकास के बीच संबंध को प्रदर्शित करने के इरादे से बनाया गया है।
जागरूकता कार्यक्रम: सामाजिक वानिकी और वन महोत्सव जैसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना।
सीआईटीईएस (CITES - The Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora):
यह सरकारों के बीच एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि वन्य प्राणियों और पौधों के नमूनों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से उनके जीवन को कोई खतरा न हो।
इसके अंतर्गत पशुओं की $5,000$ से अधिक जातियां और पौधों की $28,000$ से अधिक जातियां रक्षित की गई हैं। (जैसे- भालू, डॉल्फिन, कैक्टस, प्रवाल, आदि)।
महत्वपूर्ण शब्दावली और सूत्र (Revision Capsule)
अपक्षय (Weathering): तापमान परिवर्तन, तुषार क्रिया, पौधों, प्राणियों और मनुष्य के क्रियाकलाप द्वारा अनावृत शैलों का टूटना और क्षय होना।
ह्यूमस (Humus): मृदा में मौजूद सड़े-गले जैव पदार्थ।
अलवण जल का प्रतिशत: $\approx 2.7\%$
मानव उपभोग योग्य जल: $\approx 1\%$
CITES: वन्य जीवों और वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन।
भूमि, मृदा, जल, प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन संसाधन
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