प्रस्तावना
गणित को अक्सर विद्यालयों में 'कठिन' और 'भय उत्पन्न करने वाले' विषय के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-2005) के अनुसार, गणित शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चे की सोच का 'गणितीयकरण' करना है। हालाँकि, वास्तविकता में शिक्षक और छात्र दोनों को इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं का विश्लेषण और समाधान एक प्रभावी शिक्षक बनने के लिए अनिवार्य है।
1. छात्र-केन्द्रित समस्याएँ (Student-Related Problems)
गणित शिक्षण में सबसे पहली और बुनियादी समस्याएँ सीधे छात्रों से जुड़ी होती हैं। यदि शिक्षार्थी (Learner) मानसिक या शारीरिक रूप से तैयार नहीं है, तो सर्वोत्तम शिक्षण विधियाँ भी विफल हो सकती हैं।
क. प्राथमिक स्तर पर कमजोर नींव
गणित एक ऐसा विषय है जो पदानुक्रमित संरचना (Hierarchical Structure) पर आधारित है। इसका अर्थ है कि एक अवधारणा दूसरी पर निर्भर करती है।
समस्या: माध्यमिक स्तर के छात्रों में गणितीय अवधारणाओं को समझने में कठिनाई का मुख्य कारण उनका प्राथमिक स्तर पर कमजोर होना है।
प्रभाव: यदि एक बच्चे को 'स्थानीय मान' का ज्ञान नहीं है, तो उसे 'दशमलव' या 'बीजगणित' समझ नहीं आएगा। यह क्रमिक विफलता छात्र में अरुचि पैदा करती है।
उदाहरण: यदि छात्र यह नहीं जानता कि $3 \times 4 = 12$ क्यों है, तो वह $3x + 4 = 16$ को हल करने में संघर्ष करेगा।
ख. गणितीय चिंता और भय (Math Phobia)
बहुत से छात्रों के मन में गणित के प्रति अकारण भय होता है।
कारण: असफलता का डर, अभिभावकों का दबाव, और समाज में व्याप्त यह धारणा कि "गणित बहुत कठिन है"।
परिणाम: यह भय छात्रों को कक्षा में प्रश्न पूछने या सक्रिय रूप से भाग लेने से रोकता है।
ग. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
सीखने की प्रक्रिया में स्वास्थ्य की भूमिका अहम है।
एकाग्रता की कमी: शारीरिक रूप से अस्वस्थ या कुपोषित बच्चे शीघ्र थक जाते हैं। गणित के लिए उच्च स्तर की एकाग्रता और मानसिक सतर्कता की आवश्यकता होती है।
मानसिक तनाव: किसी भी प्रकार की मानसिक विकृति या तनाव का प्रत्यक्ष प्रतिकूल प्रभाव बालकों के शिक्षण पर पड़ता है। थका हुआ मस्तिष्क जटिल गणनाएँ नहीं कर सकता।
घ. व्यक्तिगत विभिन्नता (Individual Differences)
एक ही कक्षा में विभिन्न बौद्धिक स्तर के छात्र होते हैं - मेधावी, सामान्य और पिछड़े हुए।
चुनौती: शिक्षक के लिए एक ही गति से पढ़ाना संभव नहीं होता। यदि वह मेधावी छात्रों के अनुसार पढ़ाता है, तो पिछड़े छात्र पीछे रह जाते हैं, और यदि वह धीरे पढ़ाता है, तो मेधावी छात्र बोरियत महसूस करते हैं।
2. शिक्षक संबंधी समस्याएँ (Teacher-Related Problems)
शिक्षक, कक्षा का सारथी होता है। यदि शिक्षक स्वयं तैयार नहीं है, तो शिक्षण प्रक्रिया बाधित होगी।
क. विषय ज्ञान का अभाव
शिक्षक का ज्ञान, अनुभव और योग्यता छात्रों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
यदि अध्यापक को अपने विषय की गहन जानकारी (Content Knowledge) नहीं है, तो वह अवधारणाओं को स्पष्ट नहीं कर पाएगा।
अधूरा ज्ञान छात्रों में भ्रांतियाँ (Misconceptions) उत्पन्न करता है।
आत्मविश्वास की कमी: विषय पर पकड़ न होने से शिक्षक कक्षा में आत्मविश्वास के साथ खड़ा नहीं हो सकता।
ख. शिक्षक का व्यवहार
शिक्षक का व्यक्तित्व और व्यवहार अधिगम वातावरण को बनाता या बिगाड़ता है।
कठोर व्यवहार: यदि शिक्षक बहुत सख्त है, तो छात्र अपनी शंकाओं का समाधान करने से डरेंगे। इससे 'कक्षा से पलायन' की प्रवृत्ति बढ़ती है।
आदर्श व्यवहार: सहानुभूति, सहयोग, मृदुभाषी और धैर्यवान शिक्षक बच्चों को कठिन प्रश्न हल करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
ग. शिक्षण विधियों का ज्ञान न होना
केवल गणित जानना ही पर्याप्त नहीं है; "गणित कैसे पढ़ाना है" (Pedagogy) यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है।
बहुत से शिक्षक आज भी केवल व्याख्यान विधि (Lecture Method) या रटकर सीखने पर जोर देते हैं।
आधुनिक विधियों जैसे आगमन-निगमन विधि, खेल विधि, या समस्या-समाधान विधि का प्रयोग न करना एक बड़ी समस्या है।
3. पाठ्यक्रम और कक्षा-प्रबंधन संबंधी समस्याएँ
कभी-कभी समस्या छात्र या शिक्षक में नहीं, बल्कि व्यवस्था और वातावरण में होती है।
क. पाठ्यक्रम की बोझिल संरचना
वास्तविकता से अलगाव: पाठ्यक्रम अक्सर छात्रों के दैनिक जीवन से जुड़ा नहीं होता है। जब छात्र यह नहीं समझ पाते कि "मैं यह क्यों पढ़ रहा हूँ?", तो उनकी रुचि खत्म हो जाती है।
लचीलेपन का अभाव: पाठ्यक्रम सभी प्रकार के छात्रों के लिए समान होता है, जो समावेशी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
ख. गणित शिक्षण का समय एवं अवधि
समय-सारिणी (Time-Table) बनाते समय मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की अनदेखी की जाती है।
थकान: यदि छात्र लगातार कई घंटों तक पढ़ाई करता है, तो थकान के कारण सीखने की गति धीमी हो जाती है।
समय का चुनाव: गणित जैसे कठिन और मानसिक श्रम वाले विषयों को विद्यालय की समय-सारिणी में प्रथम या द्वितीय कालांश (Period) में रखा जाना चाहिए जब छात्रों का मस्तिष्क तरोताजा हो। अक्सर इसे अंतिम घंटों में रखना एक त्रुटिपूर्ण निर्णय होता है।
ग. अभ्यास कार्यों का अनुचित विभाजन
गणित अभ्यास का विषय है, लेकिन "कितना अभ्यास?" यह एक बड़ा प्रश्न है।
असंतुलन: कभी-कभी बहुत अधिक गृहकार्य (Homework) दे दिया जाता है जिससे छात्र बोझिल महसूस करते हैं, और कभी-कभी बिल्कुल अभ्यास नहीं कराया जाता।
निरंतरता: अभ्यास प्रक्रिया निरंतर होनी चाहिए और छात्रों की क्षमता के अनुसार होनी चाहिए। बिना थकावट के अभ्यास कराना ही सही शिक्षण है।
घ. संसाधनों और वातावरण का अभाव
गणित किट: अधिकांश विद्यालयों में गणित प्रयोगशाला या गणित किट उपलब्ध नहीं हैं।
कक्षा का माहौल: कक्षा में उचित प्रकाश, वायु और बैठने की व्यवस्था न होना भी ध्यान भटकाने का कारण बनता है।
4. गणित शिक्षण की समस्याओं के समाधान (Remedial Measures)
इन समस्याओं को दूर करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
क. शिक्षण विधियों में सुधार
शिक्षक को पारंपरिक विधियों के स्थान पर बाल-केन्द्रित विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
आगमन विधि (Inductive Method): उदाहरणों से नियम की ओर जाना।
उदाहरण: पहले कई त्रिभुजों के कोणों को मापना और फिर यह निष्कर्ष निकालना कि त्रिभुज के तीनों कोणों का योग $180^\circ$ होता है।
खेल विधि (Play Way Method): प्राथमिक स्तर पर जोड़-घटाव सीखने के लिए खेल और पहेलियों का प्रयोग।
विश्लेषण-संश्लेषण विधि: जटिल समस्याओं को छोटे भागों में तोड़कर हल करना।
ख. उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)
यह शिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निदानात्मक परीक्षण (Diagnostic Test): सबसे पहले यह पता लगाना कि छात्र को कठिनाई कहाँ हो रही है (जैसे - हासिल वाले जोड़ में गलती करना)।
उपचार: उस विशिष्ट कमी को दूर करने के लिए दोबारा पढ़ाना या अलग तरीके से समझाना।
ग. गणित के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना
गणित को दैनिक जीवन से जोड़ें। बाजार का हिसाब, कमरे का क्षेत्रफल, या क्रिकेट का स्कोर जैसे उदाहरणों का प्रयोग करें।
छात्रों को यह समझाएं कि गणित केवल गणना करना नहीं है, बल्कि तार्किक सोच विकसित करना है।
घ. व्यक्तिगत ध्यान और समावेशी कक्षा
शिक्षक को कक्षा में व्यक्तिगत भेदों (Individual Differences) को स्वीकार करना चाहिए।
कमजोर छात्रों के लिए अतिरिक्त समय और मेधावी छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण प्रश्न (Enrichment Programs) तैयार करने चाहिए।
ङ. त्रुटियों को सीखने का हिस्सा मानना
NCF-2005 के अनुसार, "बच्चे की त्रुटियाँ सीखने की खिड़कियाँ हैं।"
शिक्षक को गलत उत्तर देने पर छात्र को डांटना नहीं चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि छात्र ने किस तर्क का प्रयोग किया और उसे सही दिशा देनी चाहिए।
5. महत्वपूर्ण अवधारणाएँ और उदाहरण (Exam Oriented)
परीक्षा के दृष्टिकोण से कुछ विशिष्ट समस्याएँ और उनके तकनीकी नाम महत्वपूर्ण हैं:
डिस्कैलकुलिया (Dyscalculia): यह एक अधिगम अक्षमता (Learning Disability) है जिसमें बच्चे को अंकों को समझने, गणना करने और गणितीय संक्रियाओं में कठिनाई होती है।
दृश्य-स्मृति अवरोध (Visual Memory Block): बच्चा संख्या रेखा का प्रयोग करने में या आकृतियों को याद रखने में कठिनाई महसूस करता है।
शून्य की समझ: अक्सर बच्चे स्थानीय मान में शून्य का महत्व नहीं समझते।
गलती का उदाहरण: बच्चे 'चार सौ सात' को $4007$ लिख देते हैं।
समाधान: 'अबेकस' या स्थानीय मान कार्ड का प्रयोग।
इबारती प्रश्न (Word Problems): भाषाई कौशल (Language Proficiency) की कमी के कारण छात्र प्रश्न को समझ नहीं पाते, भले ही उन्हें गणना आती हो।
निष्कर्ष
गणित शिक्षण की समस्याएँ केवल छात्र की नहीं होतीं, बल्कि यह संपूर्ण शिक्षा तंत्र की चुनौती है। एक कुशल शिक्षक वह है जो न केवल इन समस्याओं की पहचान करे, बल्कि अपने व्यवहार, ज्ञान और शिक्षण कौशल से कक्षा को एक रोचक और भयमुक्त स्थान बनाए। जब गणित को "बोझ" के बजाय "जीवन जीने की कला" के रूप में पढ़ाया जाएगा, तभी इन समस्याओं का वास्तविक समाधान संभव होगा।
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