भाषा के कार्य

Sunil Sagare
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1. भाषा: अर्थ और प्रकृति

भाषा (Language) मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे विचारों, अस्मिता और संस्कृति का निर्माण करती है।

मुख्य बिंदु:

  • परिभाषा: भाषा भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। यह ध्वनियों, प्रतीकों और नियमों की एक व्यवस्था है।

  • नियमबद्ध व्यवस्था: भाषा अव्यवस्थित नहीं होती; यह व्याकरण के नियमों द्वारा संचालित होती है।

  • प्रतीकात्मकता: भाषा में प्रयुक्त शब्द (प्रतीक) किसी वस्तु की ओर संकेत करते हैं।

  • अर्जित संपत्ति: भाषा पैतृक संपत्ति नहीं है, इसे समाज और परिवेश से अर्जित किया जाता है।

  • सामाजिक वस्तु: भाषा का विकास और प्रयोग समाज के संदर्भ में ही संभव है।

  • परिवर्तनशील: भाषा स्थिर नहीं होती, यह नदी के जल की तरह सतत प्रवाहित और परिवर्तनशील होती है।

वाणी (Speech) और भाषा (Language) में अंतर:

  • भाषा: यह एक व्यापक संप्रत्यय है। इसमें वे सभी साधन आते हैं जिनसे हम विचार प्रकट करते हैं (संकेत, लिखित, मौखिक)।

  • वाणी: यह भाषा का मौखिक रूप है। यह मूर्त है और इसमें ध्वनियों का उच्चारण शामिल है। वाणी परिवर्तनशील है, जबकि भाषा का स्वरूप अधिक स्थायी होता है।

2. भाषा के कार्य (Functions of Language)

CTET के दृष्टिकोण से भाषा केवल 'बातचीत' तक सीमित नहीं है। इसके विविध कार्य हैं जो बच्चे के सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।

1. आवश्यकताओं की संतुष्टि बच्चा अपनी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं (भूख, प्यास, दर्द) को बताने के लिए भाषा का प्रयोग करता है। यह भाषा का सबसे प्राथमिक कार्य है।

2. विचार-विनिमय का साधन भाषा के माध्यम से हम अपने विचार दूसरों तक पहुँचाते हैं और दूसरों के विचार ग्रहण करते हैं। यह संप्रेषण (Communication) का आधार है।

3. सामाजिक संबंधों का आधार समाज में आपसी तालमेल, रिश्तों को बनाने और सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) के लिए भाषा एक सेतु का कार्य करती है। वाइगोत्स्की के अनुसार, भाषा सामाजिक विकास का मूल है।

4. ज्ञान प्राप्ति का साधन पुस्तकों, मीडिया और शिक्षकों से ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम भाषा ही है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान का हस्तांतरण भाषा द्वारा होता है।

5. व्यक्तित्व निर्माण व्यक्ति की भाषा शैली उसके व्यक्तित्व का दर्पण होती है। एक मधुर और स्पष्ट वक्ता समाज में अधिक प्रभावशाली माना जाता है। आत्मविश्वास के निर्माण में भाषा की अहम भूमिका है।

6. चिंतन का माध्यम हम जो भी सोचते हैं, वह भाषा के माध्यम से ही सोचते हैं। विचार और भाषा का गहरा संबंध है।

  • वाइगोत्स्की का मत: पहले भाषा और विचार अलग-अलग होते हैं, बाद में मिल जाते हैं। भाषा चिंतन को दिशा देती है।

  • पियाजे का मत: विचार भाषा से पहले आते हैं। भाषा विचारों का अनुसरण करती है।

7. सृजनात्मकता और संस्कृति साहित्य, कविता, कहानी और लोकगीतों के माध्यम से संस्कृति का संरक्षण भाषा ही करती है। बच्चे भाषा का प्रयोग करके नई रचनाएँ करते हैं।

3. भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक

बच्चों में भाषायी क्षमता का विकास समान गति से नहीं होता। इसे कई कारक प्रभावित करते हैं:

  • स्वास्थ्य: स्वस्थ बच्चे सक्रिय रूप से अंतःक्रिया करते हैं, जिससे उनका भाषा विकास तीव्र होता है।

  • बुद्धि: तीव्र बुद्धि वाले बच्चों का शब्द भंडार (Vocabulary) अधिक होता है और वे जल्दी बोलना सीखते हैं।

  • सामाजिक-आर्थिक स्तर: जिन परिवारों में बच्चों को बातचीत के अधिक अवसर मिलते हैं और समृद्ध भाषिक परिवेश मिलता है, उनका विकास बेहतर होता है।

  • परिवार का आकार: छोटे परिवारों में माता-पिता बच्चों से अधिक बात करते हैं, जिससे भाषा विकास तेज होता है।

  • द्वि-भाषावाद (Bilingualism): यदि सही तरीके से सिखाया जाए, तो दो भाषाएँ जानना संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) को बढ़ाता है।

  • लिंगीय भिन्नता: मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बालिकाएँ बालकों की अपेक्षा वाक्यों को जल्दी और शुद्धता से बोलना सीखती हैं।

4. भाषा विकास के सिद्धांत (महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक)

CTET में इन सिद्धांतों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।

नोम चॉमस्की (Noam Chomsky):

  • जन्मजात क्षमता: चॉमस्की का मानना है कि बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता जन्मजात होती है।

  • LAD (Language Acquisition Device): मानव मस्तिष्क में एक काल्पनिक यंत्र (LAD) होता है जो व्याकरण के नियमों को स्वतः ग्रहण कर लेता है।

  • सार्वभौमिक व्याकरण: सभी भाषाओं का मूल व्याकरण एक जैसा होता है जिसे बच्चे सहज रूप से सीख लेते हैं।

लेव वाइगोत्स्की (Lev Vygotsky):

  • सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत: बच्चे सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) के माध्यम से भाषा सीखते हैं।

  • निजी वाक् (Private Speech): बच्चे अपने कार्यों को निर्देशित करने के लिए स्वयं से बातें करते हैं। इसे वाइगोत्स्की ने संज्ञानात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना है।

जीन पियाजे (Jean Piaget):

  • अहंकेन्द्रित वाक् (Egocentric Speech): शैशवावस्था में बच्चा केवल अपने बारे में सोचता है और बोलता है।

  • संज्ञानात्मक विकास: पियाजे के अनुसार, भाषा विकास संज्ञानात्मक विकास का ही एक परिणाम है। "विचार भाषा से पहले आता है।"

बी. एफ. स्किनर (B.F. Skinner):

  • अनुकरण और पुनर्बलन: बच्चे बड़ों की नक़ल (Imitation) करके और सही बोलने पर मिलने वाले पुरस्कार/प्रोत्साहन (Reinforcement) से भाषा सीखते हैं।

5. भाषा विकास में सुनने की भूमिका (Role of Listening)

सुनना (Listening) भाषा सीखने का प्रथम सोपान है। यह एक निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

सुनना बनाम सुनना (Hearing vs Listening):

  • Hearing: कानों तक केवल ध्वनि का पहुँचना (शारीरिक क्रिया)।

  • Listening: ध्वनि को सुनकर उसका अर्थ ग्रहण करना (मानसिक क्रिया)।

महत्व:

  1. अन्य कौशलों का आधार: बोलना, पढ़ना और लिखना तभी संभव है जब बच्चा ध्यान से सुनता है। "अच्छा श्रोता ही अच्छा वक्ता बनता है।"

  2. शुद्ध उच्चारण: बच्चा शब्दों का उच्चारण वैसा ही करता है जैसा वह सुनता है।

  3. शब्द भंडार में वृद्धि: नए शब्द सुनने से शब्दावली बढ़ती है।

  4. ध्वनियों में विभेदीकरण: 'स' और 'श' या 'ब' और 'व' का अंतर सुनकर ही समझा जाता है।

  5. दूसरों के भावों को समझना: स्वर के उतार-चढ़ाव (Intonation) से वक्ता का मूड (क्रोध, खुशी) समझा जा सकता है।

कक्षा में सुनने का विकास:

  • कहानी सुनाना और उस पर प्रश्न पूछना।

  • श्रुतलेख (Dictation) बोलना।

  • कविताओं का सस्वर वाचन।

  • निर्देश देना और उनका पालन करवाना।

6. भाषा विकास में बोलने की भूमिका (Role of Speaking)

बोलना (Speaking) भाषा का अभिव्यक्त्यात्मक कौशल (Productive Skill) है। यह केवल ध्वनियाँ निकालना नहीं है, बल्कि अर्थपूर्ण बात कहना है।

महत्व:

  1. भावों की अभिव्यक्ति: अपने सुख-दुःख, आवश्यकता और विचारों को प्रकट करने के लिए।

  2. भाषा प्रवाह (Fluency): निरंतर बोलने के अभ्यास से भाषा में प्रवाह और गति आती है।

  3. आत्मविश्वास: जो बच्चा अपनी बात कक्षा में निडरता से कह पाता है, उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है।

  4. मूल्यांकन में सहायक: बच्चे ने कितना सीखा है, इसका पता उसके बोलने से चलता है।

  5. ज्ञान का स्थायीकरण: "पढ़ा हुआ भूल सकता है, लेकिन चर्चा किया हुआ याद रहता है।"

कक्षा में बोलने के अवसर:

  • चर्चा-परिचर्चा (Discussion): किसी विषय पर राय मांगना।

  • भूमिका निर्वाह (Role Play): डॉक्टर, दुकानदार आदि का अभिनय करवाना। यह संवाद कौशल के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

  • सस्वर पठन: पाठ को बोलकर पढ़ना।

  • चित्र वर्णन: चित्र दिखाकर उस पर विचार पूछना।

  • अंत्याक्षरी और वाद-विवाद: शब्दावली और तार्किक क्षमता के लिए।

7. भाषायी कौशल (Language Skills)

भाषा के चार आधारभूत कौशल हैं जो एक एकीकृत क्रम में सीखे जाते हैं (L-S-R-W), लेकिन ये एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं।

  1. श्रवण (Listening): सुनकर अर्थ ग्रहण करना।

  2. वाचन (Speaking): बोलकर विचार व्यक्त करना।

  3. पठन (Reading): पढ़कर अर्थ ग्रहण करना।

  4. लेखन (Writing): लिखकर विचार व्यक्त करना।

महत्वपूर्ण वर्गीकरण:

  • ग्रहणात्मक कौशल (Receptive Skills): सुनना और पढ़ना (इनमें हम ज्ञान ग्रहण करते हैं)।

  • अभिव्यक्त्यात्मक कौशल (Productive Skills): बोलना और लिखना (इनमें हम विचार पैदा करते हैं)।

8. भाषा और कक्षा-कक्ष (Pedagogical Approach)

एक शिक्षक के रूप में आपकी भूमिका:

  • समृद्ध भाषिक परिवेश (Rich Linguistic Environment): कक्षा में चार्ट, पुस्तकें, पत्रिकाएँ और बच्चों की रचनाएँ प्रदर्शित होनी चाहिए। बच्चों को आपस में बात करने की छूट होनी चाहिए।

  • मातृभाषा का सम्मान: बच्चे की घर की भाषा (मातृभाषा) को कक्षा में स्वीकार करना चाहिए। यह सीखने में बाधा नहीं, बल्कि संसाधन (Resource) है।

  • त्रुटियों के प्रति दृष्टिकोण: त्रुटियाँ सीखने का हिस्सा हैं। उन्हें तुरंत नहीं टोकना चाहिए, बल्कि सहज रूप से सही उच्चारण सुनाकर सुधारना चाहिए।

  • विविधता: बहुभाषिक कक्षा में विभिन्न भाषाओं का प्रयोग एक-दूसरे की संस्कृति को समझने के लिए किया जाना चाहिए।

महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी तथ्य (Quick Revision)

  • स्किनर: भाषा अनुकरण से सीखी जाती है।

  • चॉमस्की: भाषा सीखने की क्षमता जन्मजात होती है।

  • वाइगोत्स्की: भाषा सामाजिक अंतःक्रिया का परिणाम है।

  • पियाजे: संज्ञानात्मक विकास भाषा को निर्धारित करता है।

  • टेलीग्राफिक स्पीच (Telegraphic Speech): 1.5 से 2.5 वर्ष की उम्र में बच्चा दो शब्दों के छोटे वाक्य बोलता है (जैसे- "मम्मा पानी", "कार गई")। इसे तार वाली भाषा कहते हैं।

  • क्रिटिकल पीरियड: बचपन का शुरुआती समय भाषा अर्जन के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है।

  • भाषा का प्राथमिक रूप: सांकेतिक भाषा (Sign Language) को भी भाषा माना जाता है। मौखिक भाषा से पहले बच्चे संकेतों का प्रयोग करते हैं।

  • सस्वर वाचन का उद्देश्य: बच्चों की झिझक दूर करना और उच्चारण सही करना।



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