हिंदी व्याकरण (भाग-1): शब्द रचना - संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय
प्रस्तावना: शब्द रचना
भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण है, और वर्णों के सार्थक मेल से 'शब्द' बनते हैं। हिंदी व्याकरण में नए शब्दों का निर्माण मुख्य रूप से चार प्रकार से होता है:
संधि द्वारा
समास द्वारा
उपसर्ग द्वारा
प्रत्यय द्वारा
CTET परीक्षा के लिए ये चारों विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ हम नियमों और उदाहरणों के माध्यम से इनका बिंदुवार अध्ययन करेंगे।
1. संधि
दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे संधि कहते हैं।
उदाहरण: सम् + तोष = संतोष
संधि के भेद:
संधि तीन प्रकार की होती है:
स्वर संधि
व्यंजन संधि
विसर्ग संधि
(क) स्वर संधि
दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार को स्वर संधि कहते हैं। इसके 5 मुख्य भेद हैं:
1. दीर्घ संधि
जब हस्व या दीर्घ स्वर (अ, इ, उ) के बाद समान स्वर आए, तो दोनों मिलकर दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाते हैं।
नियम:
अ/आ + अ/आ = आ
इ/ई + इ/ई = ई
उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ
उदाहरण:
धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
विद्या + आलय = विद्यालय
कवि + इन्द्र = कवीन्द्र
भानु + उदय = भानूदय
2. गुण संधि
इसमें 'अ' या 'आ' के बाद यदि 'इ/ई', 'उ/ऊ' या 'ऋ' आए, तो क्रमश: 'ए', 'ओ' और 'अर' हो जाता है।
नियम:
अ/आ + इ/ई = ए (मात्रा:
े)अ/आ + उ/ऊ = ओ (मात्रा:
ो)अ/आ + ऋ = अर
उदाहरण:
नर + इन्द्र = नरेन्द्र
महा + ईश = महेश
ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश
देव + ऋषि = देवर्षि
3. वृद्धि संधि
जब 'अ' या 'आ' के बाद 'ए/ऐ' आए तो 'ऐ' और 'ओ/औ' आए तो 'औ' हो जाता है। (मात्रा में वृद्धि हो जाती है)।
नियम:
अ/आ + ए/ऐ = ऐ (मात्रा:
ै)अ/आ + ओ/औ = औ (मात्रा:
ौ)
उदाहरण:
एक + एक = एकैक
सदा + एव = सदैव
वन + औषधि = वनौषधि
महा + औदार्य = महौदार्य
4. यण् संधि
यदि 'इ/ई', 'उ/ऊ' या 'ऋ' के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो 'इ' का 'य', 'उ' का 'व' और 'ऋ' का 'र' हो जाता है।
पहचान: य, व, र से पहले आधा अक्षर होता है।
नियम:
इ/ई + भिन्न स्वर = य् + मात्रा
उ/ऊ + भिन्न स्वर = व् + मात्रा
ऋ + भिन्न स्वर = र् + मात्रा
उदाहरण:
अति + अधिक = अत्यधिक
इति + आदि = इत्यादि
सु + आगत = स्वागत
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
5. अयादि संधि
यदि 'ए', 'ऐ', 'ओ', 'औ' के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इनका परिवर्तन क्रमश: 'अय', 'आय', 'अव', 'आव' में हो जाता है।
नियम:
ए + स्वर = अय
ऐ + स्वर = आय
ओ + स्वर = अव
औ + स्वर = आव
उदाहरण:
ने + अन = नयन
नै + अक = नायक
पो + अन = पवन
पौ + अक = पावक
(ख) व्यंजन संधि
व्यंजन के बाद स्वर या व्यंजन आने से जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
प्रमुख नियम:
वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन:
यदि क्, च्, ट्, त्, प् के बाद कोई स्वर या किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण आए, तो पहला वर्ण अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण में बदल जाता है।
क् का ग्: दिक् + गज = दिग्गज
च् का ज्: अच् + अन्त = अजन्त
वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें वर्ण में परिवर्तन:
यदि क्, च्, ट्, त्, प् के बाद 'न' या 'म' आए, तो पहला वर्ण अपने वर्ग के पाँचवें वर्ण में बदल जाता है।
वाक् + मय = वाङ्मय
जगत + नाथ = जगन्नाथ
'त' संबंधी नियम:
यदि 'त्' के बाद 'ल' हो तो 'त्' का 'ल्' हो जाता है।
तत् + लीन = तल्लीन
यदि 'त्' के बाद 'च/छ' हो तो 'त्' का 'च्' हो जाता है।
उत् + चारण = उच्चारण
'म' संबंधी नियम:
'म' का अनुस्वार में बदलना:
सम् + कल्प = संकल्प
सम् + हार = संहार
(ग) विसर्ग संधि
विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
प्रमुख नियम:
विसर्ग का 'ओ' हो जाना:
यदि विसर्ग के पहले 'अ' हो और बाद में 'अ' या किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण या य, र, ल, व, ह हो।
मन: + बल = मनोबल
तप: + बल = तपोबल
विसर्ग का 'र्' हो जाना:
यदि विसर्ग के पहले 'अ/आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो।
नि: + आशा = निराशा
दु: + बल = दुर्बल
विसर्ग का 'श्', 'ष्', 'स्' हो जाना:
नि: + छल = निश्चल (श्)
नि: + कपट = निष्कपट (ष्)
नम: + ते = नमस्ते (स्)
2. समास
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बने नए सार्थक शब्द को समास कहते हैं।
समस्त पद: समास के नियमों से बना शब्द।
समास विग्रह: समस्त पद के सभी पदों को अलग-अलग करना।
समास के मुख्य 6 भेद हैं:
1. अव्ययीभाव समास
पहचान: पहला पद प्रधान होता है और वह अव्यय (उपसर्ग) होता है।
शब्द रूप: यथा, आ, भर, अनु, नि, प्रति, बे आदि से शुरू होते हैं।
उदाहरण:
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
प्रतिदिन = प्रत्येक दिन
भरपेट = पेट भरकर
आजीवन = जीवन भर
2. तत्पुरुष समास
पहचान: दूसरा पद (उत्तर पद) प्रधान होता है। दोनों पदों के बीच का कारक चिह्न (का, की, को, के लिए, से, में, पर) लुप्त हो जाता है।
भेद (कारक के आधार पर):
कर्म तत्पुरुष (को): गगनचुंबी (गगन को चूमने वाला)।
करण तत्पुरुष (से/द्वारा): तुलसीकृत (तुलसी द्वारा कृत), रोगमुक्त (रोग से मुक्त)।
सम्प्रदान तत्पुरुष (के लिए): प्रयोगशाला (प्रयोग के लिए शाला), देशभक्ति (देश के लिए भक्ति)।
अपादान तत्पुरुष (से - अलग होना): धनहीन (धन से हीन), पथभ्रष्ट (पथ से भ्रष्ट)।
संबंध तत्पुरुष (का/के/की): राजपुत्र (राजा का पुत्र), शिवालय (शिव का आलय)।
अधिकरण तत्पुरुष (में/पर): पुरुषोत्तम (पुरुषों में उत्तम), आपबीती (आप पर बीती)।
3. कर्मधारय समास
पहचान: उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में 'विशेषण-विशेष्य' या 'उपमेय-उपमान' का संबंध होता है।
विग्रह करने पर: 'है जो' या 'के समान' शब्द आते हैं।
उदाहरण:
नीलकमल = नीला है जो कमल
महात्मा = महान है जो आत्मा
चरणकमल = कमल के समान चरण
चंद्रमुख = चंद्रमा के समान मुख
4. द्विगु समास
पहचान: पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है। यह समूह या समाहार का बोध कराता है।
उदाहरण:
चौराहा = चार राहों का समूह
नवरत्न = नौ रत्नों का समूह
सप्ताह = सात दिनों का समूह
त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार
5. द्वंद्व समास
पहचान: दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह करने पर 'और', 'अथवा', 'या' लगता है। अक्सर दोनों शब्दों के बीच योजक चिह्न (-) होता है।
उदाहरण:
माता-पिता = माता और पिता
रात-दिन = रात और दिन
पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
दाल-रोटी = दाल और रोटी
6. बहुव्रीहि समास
पहचान: कोई भी पद प्रधान नहीं होता। दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अर्थ (विशेष संज्ञा) की ओर संकेत करते हैं।
उदाहरण:
दशानन = दस हैं आनन (मुख) जिसके (अर्थात् रावण)
लंबोदर = लंबा है उदर जिसका (अर्थात् गणेश)
नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका (अर्थात् शिव)
चक्रपाणि = चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके (अर्थात् विष्णु)
महत्वपूर्ण नोट (CTET के लिए):
यदि 'नीलकंठ' शब्द आए और विकल्प में 'कर्मधारय' और 'बहुव्रीहि' दोनों हों, तो हमेशा बहुव्रीहि को चुनें क्योंकि विशिष्ट अर्थ (शिव) को प्राथमिकता दी जाती है।
3. उपसर्ग
वे शब्दांश जो किसी शब्द के आरम्भ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं।
उपसर्ग के प्रकार:
(क) संस्कृत के उपसर्ग (तत्सम)
ये संख्या में 22 माने जाते हैं।
अति (अधिक/परे): अत्यधिक, अतिरिक्त, अत्याचार।
आ (तक/समेत): आजीवन, आगमन, आरक्षण।
प्र (आगे/अधिक): प्रबल, प्रगति, प्रसार।
प्रति (विरोध/प्रत्येक): प्रतिकूल, प्रतिदिन, प्रत्यक्ष।
सु (अच्छा): सुगम, सुपुत्र, स्वागत (सु + आगत)।
दुर् (बुरा/कठिन): दुर्बल, दुर्गम, दुर्घटना।
(ख) हिंदी के उपसर्ग (तद्भव)
अ/अन (निषेध): अनपढ़, अनजान, अलग।
अध (आधा): अधपका, अधमरा।
बिन (बिना): बिनब्याहा, बिनदेखा।
भर (पूरा): भरपेट, भरपूर।
(ग) उर्दू/विदेशी उपसर्ग
बे (बिना): बेईमान, बेचारा, बेकाम।
बद (बुरा): बदनाम, बदसूरत।
ला (बिना): लाइलाज, लापरवाह।
ना (अभाव): नालायक, नापसंद।
हम (समान/साथ): हमसफर, हमउम्र।
परीक्षा के लिए टिप:
शब्द को तोड़कर मूल शब्द पहचानें। जो शब्दांश आगे बचेगा, वही उपसर्ग है।
उदाहरण: अत्याचार = अति + आचार। यहाँ उपसर्ग 'अति' है, न कि 'अत्य'।
4. प्रत्यय
वे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन लाते हैं, प्रत्यय कहलाते हैं।
प्रत्यय के दो मुख्य भेद हैं:
1. कृत् प्रत्यय
ये क्रिया या धातु (मूल क्रिया) के अंत में लगते हैं।
इनसे बने शब्दों को 'कृदंत' कहते हैं।
उदाहरण:
लिख् (धातु) + आवट = लिखावट
पढ़ + आई = पढ़ाई
तैर + आक = तैराक
घबरा + आहट = घबराहट
2. तद्धित प्रत्यय
ये संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में लगते हैं।
इनसे बने शब्दों को 'तद्धितांत' कहते हैं।
उदाहरण:
मानव (संज्ञा) + ता = मानवता
मीठा (विशेषण) + आस = मिठास
अपना (सर्वनाम) + पन = अपनापन
दुकान + दार = दुकानदार
महत्वपूर्ण प्रत्यय सूची:
इक: समाज + इक = सामाजिक (यहाँ 'स' का 'सा' हो जाता है - आदि स्वर वृद्धि नियम)।
इत: हर्ष + इत = हर्षित।
ईय: भारत + ईय = भारतीय।
इमा: लाल + इमा = लालिमा।
वान: धन + वान = धनवान।
ई: खेत + ई = खेती।
शब्द रचना विश्लेषण उदाहरण:
अपमानित:
उपसर्ग: अप
मूल शब्द: मान
प्रत्यय: इत
स्वतंत्रता:
उपसर्ग: स्व
मूल शब्द: तंत्र
प्रत्यय: ता
CTET रिवीजन कैप्सूल: याद रखने योग्य बिंदु
संधि में वर्णों का मेल होता है, समास में शब्दों का मेल होता है।
यण् संधि की पहचान: य, व, र से पहले आधा वर्ण।
द्विगु समास में पहला पद संख्या होता है।
बहुव्रीहि समास में कोई पद प्रधान नहीं होता, तीसरा अर्थ निकलता है।
उपसर्ग शब्द के आगे और प्रत्यय शब्द के पीछे लगते हैं।
'इक' प्रत्यय लगने पर शब्द के पहले स्वर में वृद्धि हो जाती है (जैसे: धर्म -> धार्मिक)।
'स्वागत' में 'सु' उपसर्ग है, 'स्व' नहीं।
हिंदी व्याकरण (भाग-1): शब्द रचना
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